अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextनिश्चत किया और उसके कहने का भावार्थ भी उनकी समझ में आ गया, लेकिन यहाँ कौन आकर बोल गया यह उनके मन में स्थिर न हो सका। वह भली भाँति से जानते थे कि इस स्थानपर आने में पशु पक्षी तक भयभीत होते हैं भला कोई मनुष्य कैसे आ सकता है। उधर विचारा गंग प्राण लेकर भागा तो सही परन्तु फिर भी चौकीदारों की हद से बाहर नहीं जा सका; आखिरश पकड़ा ही गया। चौकीदारों ने देखा कि यह तो कविवर गंग हैं, इनका यहाँ आना मतलब से खाली न होगा। अगर कोई चोर घुसा होता तो हम उसे मार डालते; परन्तु इनको मारना उल्टे हम लोगों का प्राण घातक होगा। वे उसे सजीव छोड़ दिये। विचारा गंग कैद कर लिया गया, बादशाह क्रोध से तम तमाया हुआ महल से बाहर निकला, बेगमों ने हरचन्द उन्हें रोकने की कोशिश की परन्तु किसी की एक न सुनी। कवि गंग की घोड़े और गदहे वाली उपमा उनके मनमें उबल रही थी। बेगमों को अपने दरबारियों की इस हरकत पर बड़ी नाराजगो हुई और वे उन्हें लाखों प्रकार की बददुआयें देने लगीं। अन्त में यह जानकर उन्हें कुछ तसल्ली हुई कि जिसने हम लोगों के रंग में भंग डालकर बादशाह को बाहर निकाला है उसका प्राणदण्ड की सजा मिलेगी और आज से सबपर विदित हो जायगा कि ऐसा कर्म करने वाले की कैसी दुर्गति होती है। दरबारियों का जब बादशाह का बेगमों के फन्दे से छूटना और कवि गंग पर आई विपत्ति का समाचार मिला तो हर्ष और शोक दोनों को एक साथ ही प्राप्त हुए।