अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context१६३ अकबर बीरबल विनोद बादशाह बाहर निकलने के दूसरे ही दिन सारे नगर में अपने प्रगट होने का ढिंढोरा पिटवा दिया जिससे प्रजावर्ग में आनन्द की वर्षा होने लगी और अत्याचार यानी बगावत करने की इच्छा करने वालों को भय उत्पन्न होगया । दरबार के समय नगर के हर एक विभाग से दरबारी गण और प्रजावर्ग के लोग आ आ कर दरबार को भरने लगे। बादशाह क्रोधोन्मुख सिंहासन पर आ बिराजे । इतने दिनों के पश्चात आज बादशाह को लोगों ने सिंहासन पर आरूढ़ देखा । लोग बादशाह को सलाम कर करीने से अपनी २ जगहों पर जा बैठे । बादशाह से रुख मिलाने की किसी में शाहस न थी, सबका सिर नीचे को झुका हुआ था । इसी बीच सिपाही लोग गंग कवि को रात्रि वाली पोशाक में बांधकर दरबार में ले आये । गंग को प्रोत्साहन देकर भेजने वाले दीवान प्रभृत सभी दरबारियों ने गंग के निराले ढंग को देखा । वे मनही मन ईश्वरसे उसकी खैर मनाते हुए सुअवसर की प्रतीक्षा करने लगे । वे तन मन से उसकी जीवन रक्षा करने के लिये तत्पर थे । बादशाह गंगको न पहचान कर बोले—"मैं क्या देख रहा हूँ; क्या यह कोई प्रेत वा पिशाच तथा भूत तोनहीं है ?" तब गंग कवि को सुअवसर मिला और वह बधा बँधा झुक कर बादशाह को सलाम किया । सलाम करते समय उसकी लम्बी टोपी जमीन पर गिर पड़ी जिससे उसका चेहरा साफ साफ दिखाई पड़ने लगा । बादशाह गंग को देखकर पहचान गये और बोले-"गंग ! तुमने किस अधिकार से १३