अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context११ अकबर बीरबल बिनोद बड़ी घबड़ाहट के साथ बोला- "गरीब परवर ! अपना तो-ता, अपना तो-ता ।" उसकी घबराहट देखकर बादशाह बोल उठा- "क्या वह मर गया ?" बीरबल बात सँभालते हुए उत्तर दिया- "नहीं पृथ्वीनाथ ! वह बड़ा बिरागी हो गया है, आज सुबह से ही अपना मुख ऊपर किये हुए है और कोई अंग नहीं हिलाता, उसकी चोंच और आँखें भी बन्द हैं।" बीरबल की ऊपर कही बातें सुनकर बादशाह ने कहा- "तब क्यों नहीं कहते कि वह मर गया।" बीरबलने उत्तर दिया- "आप चाहे जो कुछ भी कहें परन्तु मेरी समझ में तो यही आता है कि वह मौन होकर तपस्या कर रहा है। आप चलकर स्वयं देख लेवें तो बहुत अच्छा हो ।" बादशाह ने बीरबल की बात मान ली और दोनों तोते के पास पहुँचे, तोते की दशा देखकर बादशाह ने बीरबल से पूछा- "बीरबल ! कहने को तो तुम बड़े चतुर बनते हो फिर भी तोते के मरने की तुम्हे खबर न मिली। यदि यही बात मुझसे पहले ही बतला दिये होते, तो मुझको यहाँ तक आने की क्या जरूरत थी ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथ्वीनाथ ! मैं लाचार था, क्योंकि यदि पहले ही बतला दिये होता तो जान से हाथ धोना पड़ता । उसकी इस चालाकी से बादशाह बहुत खुश हुआ और उसको अपनी पहली आज्ञा का स्मरण हो आया । उसने बीरबल की बड़ी प्रशंसा की और एक बड़ी रकम पुरस्कार में देकर उसे बिदा किया। बीरबल उसी क्षण उस रकम को