अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context१३ अकबर बीरबल विनोद
आई। वह अपने पिताका चेहरा उतरा और विचार-मग्न देख कर ठिठक गई। जब उसको खड़े कई मिनट व्यतीत होगये और पिता का ध्यान न टूटा तो वह उद्विग्न होकर पितासे चिन्ता का कारण पूछा। यद्यपि यह बीरबलकी बड़ी लड़की थी और वह इसकी बुद्धिमत्ता को कई बार परीक्षा भी ले चुका था। फिर भी ऐसे गूढ़ विषय में उसे सफलता मिलेगी ऐसी आशा स्वप्न में भी न थी। इसलिये कुछ समय तक उसकी बातों को अनसुनी कर टाल-मटोल करता रहा। पुत्री के पुनः पुनः अनुरोध करने पर उसे विवश होकर बादशाह का जटिल प्रश्न सुनाना पड़ा। कन्या बोली—"पिताजी ! यह कौनसी ऐसी कठिन बात है जिसके लिये आप ऐसे चिन्ताकुल हो रहे हैं। चलिये भोजन का समय बीता जा रहा है। मैं उसका उत्तर एक हफ्ते के भीतर ही बादशाह को पहुँचा दूँगी।" लड़की के ऐसे उत्तरसे बीरबल की चिन्ता घटी और शाह- सकर भोजन करने गया। इस प्रकार जब दो दिन व्यतीत हो गये तो बीरबल की लड़की ने एक नयी तरकीब निकाली। वह ढूँढ़कर बहुतेरे पुराने वस्त्रों को घर से बाहर निकाल लाई और उनका एक गठ्ठर तैयार किया। जब आधी रात का समय हुआ तो उस गठ्ठर को सिरपर लादकर नदी तटपर जा पहुँची और 'छियो-छियो' कर वस्त्र पछारने लगी। बादशाह का महल ठीक नदी तटपर बना हुआ था अर्ध रात्रि के समय नींद के प्रथम प्रहर में जब कपड़ा धोने की आवाज बादशाह के कान में पड़ी तो उसकी निद्रा भंग हो गई और