अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल बिनोद १४ पहरे वाले सन्तरी को पुकार कर बोला-"देखो इतनी रात्रि में कौन धोबी कपड़ा छाँट रहा है; उसे तुरत पकड़कर मेरे पास लाओ ?" पहरे वाला सिपाही हुक्म पाते ही कई अन्य सिपाहियों के साथ वहाँ पर जा पहुँचा जहाँ से कपड़े धोने की आवाज आ रही थी । वे सब बड़े हैरान और परेशान हुए क्योंकि देखते क्या हैं कि एक सिरसे पैर तक अति सुन्दरी युवती कपड़े पछाड़ रही है । सिपाहियों ने उसे कई बार पुकार कर बादशाह का हुक्म सुनाया परन्तु वह उनकी बातें अनसुनी कर बराबर अपने काम में व्यस्त रही-आखिर एक सिपाही उसके बिल्कुल समीप पहुँचकर बोला-"अरी तू कौन है जो इतनी धृष्टता कर रही है और पुकारने पर सुनती भी नहीं ! चल तुझे बादशाह ने बुलाया है ?" लड़की तो येनकेन प्रका- रेण बादशाह के पास पहुँचना ही चाहती थी । परन्तु फिर भी अपना अभिप्राय छिपाकर बोली-"आप लोग मुझे क्यों दुख देने पर उतारू हुए हैं, लो मैं अपने घर चली जाती हूँ ।" सिपाहियों ने कहा-"खबरदार तुम्हारा भला इसी में है कि सीधे हमलोगों के साथ बादशाह के पास चलो ।" लड़की कपड़ों को जहाँ का तहाँ छोड़ उनके पीछे हो ली और जब बादशाह के सन्निकट पहुँची तो बड़े अदब से झुककर सलाम की और डरीसी होकर एक किनारे खड़ी हो बादशाह के हुक्म की प्रतीक्षा करने लगी । बादशाह क्रोध से आग बबूला हो रहा था । उसने अपनी लाल लाल आँखे निकाकर पूछा- "ऐ कम्बख्त ! तूं कौन है और इस रात्रि के मध्यकाल में यहाँ