अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल बिनोद १६ लड़की ने उत्तर दिया-“जी हाँ, पृथिवीनाथ ! आपका अनु- मान बिल्कुल ठीक है।” बादशाह उसकी इस चतुरता से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसको आभूषण और द्रव्य पुरस्कार में देकर बड़ी इज्जत से पालकी में बैठाकर बिदा किया। लड़की ने घर पहुँचकर पिता का चरण स्पर्श कर रात की घटना का सारा वृतान्त कह सुनाया। बीरबल अपनी बुद्धिमती कन्या से बहुत प्रसन्न हुआ और उसका पुरस्कार उसे लौटाकर बहुत आशीर्वाद दिया।
पंडित की पदवी ।
एक मूर्ख ब्राह्मण को पंडित कहलवाने की बड़ी प्रबल इच्छा थी। विचारा सतत् प्रयत्न करने पर भी जब कामयाब न हुआ तो उसे बीरबल से मिलकर कार्य-साधन की तरकीब सूझी। वह तुरंत बीरबल के मकान की तरफ प्रस्थान किया। बीरबल का घर उसके घर से दूर था। रास्ते का थका-माँदा जब वहाँ पहुँचा तो लोगों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि अभी बीरबल दरबार से नहीं आया है। 'मरता क्या न करता' वह तो पंडित कहलाने की धुन में चूर हो रहा था, तत्काल वहाँ से मुड़ा और दरबार की तरफ राही हुआ। मौन मारे चला जा रहा था, अचानक बीच रास्ते में उसकी बीरबल से मुलाकात हो गई। वह बड़ी विनम्रतापूर्वक अपना दोनों हाथ जोड़कर बीरबल से बोला-“बुद्धिवर प्रधान जी ! मैं निरक्षर भट्टाचार्य्य हूँ, यानी मुझे पढ़ना लिखना कुछ भी नहीं आता