अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context२३ अकबर बीरबल बिनोद
भी अमीरों की सी थी । जब यह मामला चल रहा था इसी बीच एक सरदार साहब भी आ पहुँचे और नगर व्यापारी शेरअली को कैदी की सूरत में देखकर बोले- "शेरअली ! यह तुम्हारी क्या हालत है, तुम कैदी की सूरत में क्यों दिखाई पड़ रहे हो ?" शेरअली को इस सरदार के आनेसे बड़ी तसल्ली हुई और बोला- "सरदार साहब ! आप भी जानते हैं कि मैं कितने वर्षों से इस नगर में व्यापार कर रहा हूँ और यहाँ का बच्चा बच्चा मुझे पहचानता है। समय के फेर से वा दैव की अकृपा से आज मैं अपने ही दास द्वारा अभिशापित किया जा रहा हूँ । सरदार बादशाह को चिताकर बोला- "गरीबपरवर ! यह शेरअली आजकल का व्यापारी नहीं है बल्कि लड़ाई के समय में इसने कई बार सरकार को रुपये की मदद देकर राजभक्ति प्रकट की है। (शेरअली की तरफ इशारा करके ) "शेरअली ! यह तुम्हारी ही उदारता का कारण था कि मैंने गुजरात ऐसे सामर्थ्यशाली अधिपति पर विजय प्राप्त की थी तुम्हारी वह मदद हमारी नहीं बल्कि बादशाह की मदद थी।" सरकार की तरफसे तुमको अभी तक उसका कोई पुरस्कार नहीं मिला है ? सरदार की इस सारगर्भित शाक्षी से बादशाह खुश हो गया और बोला शेरअली को उस उपकार का बदला चुकाया जायगा । बादशाह ने ईरान के सौदागर की तरफ इशारा करके कहा- "क्यों भाई ! तुमको भी किसीकी साक्षी दिलानी है, यदि