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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल बिनोद २४ है तो उसे सामने लावो, सरदार की साक्षी से तो नगर व्या- पारी का शेरअली होना साबित होता है। ईरान का व्या- पारी बोला-"गरीबपरवर ! मैं इस स्थान में पहले पहल आया हूँ, यहाँ की भाषा तक नहीं समझता और न यहाँ पर मेरा कोई परिचित ही है। अभी मेरा सामान भी बाहर ही पड़ा हुआ है, उसको यहाँ लाने में अभी कई दिन व्यतीत हो जायेंगे, फिर मैं किसकी साक्षी दूँ। हाँ इतना जरूर है कि मैं दूर देशों से सुनता आ रहा हूँ कि आपके दर्बार में बड़ा सच्चा न्याय होता है इसलिये कृपया हमारा उचित न्याय करा दीजिये । दोनों फरीकैनों की बातें सुनकर एक सभासद् ने बाद- शाह से अर्ज किया-"पृथ्वीनाथ ! यह मामला बड़ा ही बेढंगा दीख पड़ता है। इसका फैसला कवि गंग से कराया जाय। वे ऐसे२ मामलातों को महज खिलवाड़ मात्र समझा करते हैं। विचारा कवि गंग बड़ा घबराया और झट बोल उठा- "हजूर । बीरबल के रहते इसका न्याय करने की दूसरे की आवश्यकता नहीं है अतएव इसका न्याय बीरबल से ही कराया जाय। वे इससे कभी इनकार नहीं कर सकते। बादशाह तो पहले ही से समझ रहा था, उसने बीरबल को आज्ञा दी-"इस मामले को अच्छी तरह जांचकर न्याय करो।" बीरबल ने भी सहर्ष स्वीकार किया । बीरबल की कार्रवाई शुरू हुई। वह दोनों व्यापारियों को पास बुलाकर उनसे बहुत प्रकार की पूछ-ताछ की परन्तु फिर भी कुछ मतलब की बात हासिल न हुई।