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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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बनेगी अतएव कृपाकर मुझे प्राण दण्ड की आज्ञा दीजिये । बादशाह ने शेरअली से पूछा-शेरअली-"अब तुम इस आदमी को क्या करना चाहते हो।" शेरअली बोला- "गरीबपरवर ! अब मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है मेरी बात रह गई अब आपके जी में जो आवे सो कीजिये। शेर- अली के ऐसे सन्तोषप्रद वाक्यों से बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई परन्तु उसने अपना राज किसी पर जाहिर न किया। विचारा अपराधी नसीबा जीवन की आशात्यागकर एक तरफ खड़ा था। बादशाह उसकी तरफ लक्ष्य कर बोला- "नसीबा ! तुम्हारा अपराध प्राण-दण्ड पाने के योग्य है परन्तु तूने मेरे साथ उपकार किया है और मैंने अभी तक तुझे उसका कुछ बदला नहीं चुकाया है अतएव तुझे जीवन- दान देता हूँ और पुरस्कार में तुझे दर्बार का एक काम सौंपता हूँ, अब तुम उसी काम के सहारे से अपना जीवन निर्वाह करो। नसीबा खुशी के मारे फूला न समाया और बड़ी प्रसन्नता से उस पद को स्वीकार किया। बादशाह ने मन में विचार किया कि इस न्याय में बीरबल ने कमाल किया है इसकारण उसको भी उचित पुरस्कार देना परमोचित है। बादशाह ने तीन पोशाक मँगवाई। उसमें पहली कुछ आभूषणों के साथ असली शेरअली को और दूसरी बीरबल को तथा तीसरी नसीबा नामी गुलाम को देकर बिदा किया। नसीबा शेरअली के चरणों पर गिरकर अपने अप-

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