अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद ३४ कोई उलट फेर नहीं कर सकता। समय आने पर किसी की चाहे कितनी ही प्यारी वस्तु क्यों न हो, हाथ से निकल जाती है। आप से यह मेरी अन्तिम प्रार्थना है कि मेरे पीछे कृपाकर मेरे कुटुम्ब का पालन करते रहियेगा। आपके अतिरिक्त कोई उनको सहारा देनेवाला नहीं है। आह ! ...आह... !! मेरा जी बहुत घबड़ा रहा है। इसप्रकार ढोंग रचकर बीरबल अपने तईं को ऐसा बनाया मानों कोई सचमुच असाधारण बीमार हो। बादशाह बोला-“तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, मैं तुम्हारे बाल बच्चों का अच्छी तरह पालन करता रहूँगा।” इसके बाद बादशाह वहाँ से बिदा हो अपने महल को चला गया। इधर जब रात्रि आई तो बीरबल के घर से रोने की आवाज आने लगी। बीरबल के मृत्यु का समाचार लोगों के कानों कान पहुँचा। क्रमशः खबर पाकर बीरबल के जाति विरादरी के लोग एकत्रित हुये। सर्वसम्मति से उरद का एक पुतला बनाकर उसके साथ कुछ रिश्ते के लोग स्मशान पहुँचे और उसे चितापर विधिवत रखकर उसमें आग लगा दी। इधर बीरबल तहखाने की एक कोठरी में छिप रहा और अपने घर के लोगों से सख्त मनाही कर दी की उसके छिपने का हाल किसी पर विदित न हो। जब बीरबल के मृत्यु का समाचार बादशाह के पास पहुँचा, तो वह अपने प्यारे दीवान की मृत्यु पर शोक करने लगा, परन्तु अन्य मुसलमान अमीर उमराव बीरबल की मृत्यु से बड़े प्रसन्न हुए और इस खुशी में फकीरों को मिठाई खिलाई। हिन्दू प्रजा अनाथ सी होकर चारों तरफ शोक मनानेलगी।