अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context३५ अकबर बीरबल विनोद लोगों ने कई दिनों तक अपना २ कार्य क्रम बन्द रक्खा । हर तरफ से बीरबल की मृत्यु का समाचार आने लगा । बाद- शाह ने बीरबल के बालकों को उसकी क्रिया करने के लिये काफी सहायता दी ; कुछ दिनों तक अकबर बिना दीवान के ही सभासदों की सहायता से राजकीय कार्यों को निपटाता रहा, परन्तु जब प्रजावर्ग और बादशाह दोनों को क्रमशः बीरबल विस्मर्ण हो गया तो सभासदों की सम्मति से एक मुसलमान को अपना दीवान बनाया । नये दीवान की अन्धाधुन्धी से प्रजा वर्ग में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और चारों तरफ से त्राहि-त्राहि की ध्वनि सुन पड़ने लगी । अपनी मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् बीरबल अपने कार्य साधन के लिये तत्पर हुआ और अपने पुत्र को एक लाख रुपया देकर बोला-“ तुम यहाँ से दो मील दूर किसी पहाड़ी पर एक बड़ा भव्य महल तय्यार कराओ । महल ऐसा हो कि उसकी लपट ( चमक ) कई मीलों तक पहुँचे । यह काम बड़े गुप्त रूपसे करना है, अतएव महल का पूर्णतया निर्माण एक ही रात में होना चाहिये ।” बीरबल का पुत्र बड़ा समझदार था । पिताके आदेश पर पहले महल में लगने वाली वस्तुओं को बड़ी सावधानी से संग्रह किया । जब उसे भली भाँति सन्तोष हो गया कि अब समान के अभाव में महल बनने का कोई काम न रुकेगा, तो वह गुप्त रीति से बहुत से कारीगरों को नियुक्त कर एक रात में हल्ला बोल दिया, और कारीगरों को भली- भाँति ताकीद करदी कि महल बनने का काम बड़ी गुप्त रीति