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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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५९ अकबर बीरबल विनोद बनवाने की इच्छा जागृत हुई। इस अभिप्राय से प्रेरित होकर बोला-“बीरबल ! क्या तुम मेरे लिये एक अधर महल बनवा सकते हो ?” बनवा देना तुम्हारा काम है और रुपया खर्चाना मेरा।” बीरबल ने सोच विचार कर उत्तर दिया-“पृथिवी- नाथ थोड़ा ठहर कर महल बनवाने का कार्यारम्भ करूँगा। इस कार्य के लिये कुछ मुख्य सामानों के संग्रह में समय की आवश्यकता है। बादशाह इस पर राजी हो गया। फिर बीरबल ने एक दूसरी बात छेड़कर बादशाह का मन दूसरे कामों में उलझा दिया, सायंकाल अवकाश पाकर घर लौट गया। दूसरे दिन बहेलियों को रुपये देकर जंगल से तोतों को पकड़ लाने की आज्ञा दी। हुक्म की देर थी बहेलिये उसी दिन सैकड़ों तोते पकड़ लाये। बीरबल ने कुछ तोतों को चुन कर खरीद लिया। और उनके पढ़ाने का भार अपनी बुद्धिमती कन्या को सौंप आप दरबार का आवश्यक कार्य्य करने लगा। लड़की ने बुद्धिमानी से पिता के आदेशानुसार तोतों को पढ़ाकर पक्का कर दिया। जब बीरबल ने उनकी परीक्षा ली तो वे उसके मरजी के माफिक निकले। फिर क्या था बीरबल तोतों को लिये हुए दरबार में हाजिर हुआ। उन को दीवान खाने में बन्द कर आप बादशाह के पास गया। तोते पिंजड़ों से बाहर निकाल कर छोड़ दिये गये थे। सब तरफ से किवाड़ बन्द था। तोते भीतर ही भीतर अपनी शिक्षा के अनुसार अलग अलग राग अलाप रहे थे। बादशाह को सलामकर बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ !