अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context६१ अकबर बीरबल बिनोद कमी पड़ती थी। जब दीनदयाल को मौके पर रुपयों का प्रबन्ध होना असम्भव दीख पड़ा तो अपने मुनीम को हुण्डी वालों का हिसाब किताब मिलान करने की आज्ञा देकर आप रुपये की तलाश में बाहर निकला। उस समय नगर में एक महाजन के अतिरिक्त ऐसा दूसरा कोई भी बड़ा महाजन नहीं था जो एकमुस्त पाँच लाख की थैली उधार देता। दीनदयाल ने उसी से कर्ज लेकर हुण्डी सकर देने का निश्चय किया। वह साहूकार बड़ा धूर्त, दुष्ट और निर्दय था, परन्तु लाचार, कोई दूसरी सूरत न सूझ पड़ने पर दीनदयाल को उसके द्वार पर कर्ज के निमित्त जाना पड़ा। दीनदयाल ने उस महाजन से बारह दिनों की अवधि पर पाँच लाख रुपये कर्ज माँगा। उसका विश्वास था की उपरोक्त समय के अन्तरगत उसके पास बहुत सा रुपया आ जावेगा। उसने मारवाड़ी को उसकी इच्छानुसार सूद देने का पक्का विचार कर लिया था। केशवदास बराबर दीनदयाल को समूल नष्ट करने की चेष्टा में लगा रहता कारण की उसका और दीन- दयाल का व्योपारिक द्वेष था। दीनदयाल का कारोबार इतना बड़ा और समुन्नत था कि उसके आगे दूसरे व्योपारियों का व्योपार चलना कठिन था। दीनदयाल निःसन्तान था अतएव अगले डाह के कारण मारवाड़ी इस घात में लगा हुआ था कि यदि किसी प्रकार दीन- दयाल मारा जाय तो फिर उसका कारोबार भलीभाँति रु निकले।