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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद ६८

खोजे ने बीरबल की बड़ी दुर्निन्द की। यह बादशाह का मुँहलगा खोजा था इसलिये खुलेआम उसकी अवहेलना करना उचित न समझकर प्रमाणों द्वारा मुहतोड़ उत्तर देना शुरू किया। वह बोले-“तुम स्वयं विचारकर देखो कि मेरे दर्बार में बीरबल सा हाजिर जवाब एक आदमी भी नहीं है।” खोजा बादशाह के मुख से बीरबल की प्रशंसा सुनकर मनही-मन भड़क उठा और बोला-“हुजूर यदि आप बीरबलको हाजिर जवाब बतलाते हैं तो वह मेरे तीन सवालों का जवाब दे। यदि ठीक २ उत्तर दे देगा तो मैं भी उसे श्रेष्ठ मान लूँगा। बादशाहने उससे सवाल पूछने को कहा। खोजा बोला-“(१) आकाश में तारों की कितनी संख्या है (२) दुनियाँ में स्त्री पुरुष अलग २ कितने हैं। (३) धरती अपना बीच कहाँ रखती है।” बादशाह खोजे को अपने पास बैठाकर बीरबल को बुलवाने के लिये सिपाही भेजा। जब वह आया तो उससे खोजे के तीनों सवालों का उत्तर माँगा। बीरबल चुपके बाजार से एक बड़ा मेढ़ा खरीद लाया और उसे बादशाह के सामने खड़ा कर बोला-“खोजा साहब ! इसके पीठ के बालों की गणना कर लेवें। इसके शरीर में जितने बाल हैं उतने ही आकाश में तारे भी हैं। फिर इधर उधर गोड़ से पड़ताल कर एक जगह जमीन में खूटी गाड़ कर बोला- “पृथ्वीनाथ ! पृथ्वी का मध्य यही है, यदि खोजे को यकीन न हो तो स्वयं नाप ले, जब पहले और तीसरे सवालों के बाद दूसरे की बारी आई तो बीरबल हँसा पड़ा परन्तु

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