अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context६६ अकबर बीरबल विनोद अपना असली भाव छिपाकर उत्तर दिया- "गरीब परवर स्त्री पुरुषों की संख्या तो इन खोजों के कारण बिगड़ गई है क्योंकि ये न तो स्त्रियों की संख्या में आते हैं और न पुरुषों के ही। यदि सब खोजे जान से मरवा दिये जायें तो ठीक- ठीक गणना निकल सकती है।" खोजे का मुँह छोटा होगया। उसके मुँह से एक बात भी न निकली। बादशाह ने बहुत कुछ उसे भला बुरा सुनाया। बिचारा लाज का मारा, दुम दबाकर जनानखाने में चला गया। बादशाह ने बीरबल को पारितोषिक देकर बिदा किया। चार मूर्ख एक दिन मनोरंजन के समय बादशाह के मनमें यह बात आई- "संसार में मूर्खों की संख्या तो अमित है; परन्तु मैं ऐसे चार मूर्ख देखना चाहता हूँ जिनकी जोड़ के दूसरे न हों।" उसने बीरबल से कहा- "बीरबल ! चार मूर्ख इस ढंग के तलाश करो कि जिनकी जोड़ के दूसरे न मिलें।" वह बादशाह की आज्ञा मानकर नगर से बाहर निकला। ढूंढ़ने वालों को क्या नहीं मिल सकता, केवल सच्ची लगन होनी चाहिये। कुछ दूर जाकर बीरबल को एक आदमी दिखलाई पड़ा जो थाली में पान का एक जोड़ा बीड़ा और मिठाई लिये हुये बड़े उत्साह से नगर की तरफ जल्दी २ भागा जा रहा था।