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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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७१ अकबर बीरबल विनोद बीरबल इस घोड़ी सवार को भी अपने साथ ले लिया और दोनों को लिये दिये बादशाहके पास पहुँचा। तब बीरबल बोला—"पृथिवीनाथ ! चारों मूर्ख आपके सामने उपस्थित हैं।" बादशाह तो दो को ही देख रहा था अतएव बोला-"तीसरा मूर्ख कहाँ है?" बीरबल ने कहा-"तीसरा नम्बर हुजूर का है जो आपको ऐसे २ मूर्खों के देखने की इच्छा होती है। चौथा मूर्ख मैं हूँ जो उन्हें ढूंढकर आपके पास लाता हूँ।" बादशाह को बीरबल के ऐसे उत्तर से बड़ी प्रस- न्नता हुई और जब उन्हें उनकी मूर्खता का परिचय मिला तो खिलखिलाकर हँस पड़े।

बीरबल की चतुरता एक बार आश्विन के महीने में बीरबल बीमार पड़ा जिस कारण महीनों दर्बार में नहीं आया। एक दिन बादशाह को उसे देखने की इच्छा हुई। वह दो कर्म चारियों के साथ उसके मकान पर गया। बीरबल बादशाह को देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसका कुम्हिलाया हुआ हृदय- कमल कुछ खिल सा गया। ये आपस में बड़ी देर तक बार्तालाप करते रहे न बीरबल बादशाह को छोड़ना चाहता था और न बादशाह बीरबल को ही, बातचीत में कई घंटों का समय व्यतीत हो गया। इसी बीच बीरबल को पाखाना मालूम हुआ। ऐसी विवशता के कारण वह बादशाह से कुछ देर की मुहलत लेकर बगल की एक कोठरी में