BharatKosha
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 86 of 292

Read in context
Page 86

अकबर बीरबल विनोद ७२

पाखाना फिरने गया। इस बीच बादशाह के जी में बीरबल के बुद्धि-परीक्षा की बात समाई, उसने ख्याल किया कि बीरबल महीनों से बीमार है; शायद उसकी चतुरता में कुछ कमी पड़ गयी हो। जानना चाहिये कि अब यह कितना चतुर रह गया है। नौकरों द्वारा उसके पलँग के चारों पायों तले चार कागज के टुकड़े रखवा कर खामोश रहा। थोड़ी देर बाद बीरबल पाखाने से लौटकर आया और अपनी पलँग पर लेट रहा। बादशाह उसकी परीक्षा के अभिप्राय से इधर उधर की बातें छेड़कर उसे भुलावा देने लगा। बीरबल एक तरफ बादशाह की बातें सुनता जाता था दूसरी तरफ किसी चीज की खोज में व्यस्त था। वह ऊपर नीचे इस प्रकार से देख रहा था मानों किसी चीज का अनुसंधान कर रहा हो। बादशाह ने उसकी उसक पुसक का कारण पूछा। बीरबल ने कहा-"पृथिवीनाथ! जान पड़ता है कि यहाँ पर कुछ रद्दो बदल हो गया है? वे अनजान सा मुँह बनाकर बोले-"क्या रद्दो बदल हुआ है?" बीरबल ने उत्तर दिया-मुझे मालूम होता है कि या तो इस मकान की दीवाल कागज भर नीचे को दब गई है वा मेरी पलँग एक कागज ऊँची हो गई है। बादशाह ने कहा-"हाँ हाँ अक्सर देखा जाता है कि बीमारी की दशा में निर्बलता के कारण लोगोंके दिमागमें तुम्हारे समान ही फितूर आ जाता है परन्तु दरअसल में वह बात ठीक नहीं रहती।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ! ऐसा नहीं हो सकता, मैं बीमार हूँ तो मेरी बुद्धि बीमार नहीं है।" बादशाह बीरबल की