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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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७३ अकबर बीरबल विनोद पहले ही सी चतुरता देखकर बड़ा प्रसन्न हुए और उससे असली भेद प्रकट कर दिया । —०:***:०— अपनी मनमानी दूँगा दिल्ली का एक नागरिक बड़ा सूम था। वह अपने परिश्रम और कृपणता के कारण रत्नों का एक बड़ा कोष संग्रह किये हुए था। वह उन रत्नों को एक ऐसी साधारण सन्दूक में छिपाकर रक्खे हुए था कि जिससे देखने वाले को उसमें रत्न होने का भ्रम न हो सके। उसका घर भी साधारण गृहस्थों के समान कच्चा और टूटा फूटा हुआ था। भला ऐसे भग्न मकान में रत्न होने की कौन संभावना कर सकता था ? दैवात एक दिन मध्य रात्रि में उसके घर में आग लगी । कंजूस उस आग को बुझाने की कोई तरकीब न देख कर कुछ साधारण वस्त्रों को लेकर घर से बाहर निकल आया । ये वस्त्र उसके रोजमर्रा के काम आने वाले थे । घर जलने की चिन्ता में विचारा कंजूस छाती पीट पीटकर रुदन करने लगा। उसके रोने का शब्द सुन और आग की लपट देखकर उसके अड़ोस पड़ोस के बहुतेरे आदमी एकत्र हो गये। उन आदमियोंमें एक लोहार भी था। लोहारने कंजूस को फटकारते हुए कहा-“इस साधारण झोपड़े के लिये तूँ इतना रुदन क्यों कर रहा है, इसमें तेरा कौन सा बड़ा नुकसान हो जायगा ?” सूम बोला-“भाई तू झोपड़ा जलता देखता है और मैं अपने रत्नों को जलते देख रहा हूँ; फिर तू