अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context७७ अकबर बीरबल विनोद खोज खबर न ली। परन्तु जब सोचते सोचते तीन चार दिनों का अरसा बीता और वह नहीं आया तो उन्हें बीरबल को देखने की इच्छा हुई। वे अपने चन्द सिपाहियों के साथ बीरबल के मकान पर गये। जब उसे बादशाहके आगमन की सूचना मिली तो झट दूसरे दरवाजे से होकर बाहर निकल गया और लोगों की आंख बचाकर सीधे दरबार में जा पहुँचा। गुप्त मार्ग से जनाने महल में पहुँचकर उस नशीली चीज की तलाश करने लगा। जब बाहर उसका सुराख न लगा तो बक्स की तालीके फिराक में पड़ा, दैवात ताली मिल गई, वह एक कोने में अच्छी तरह छिपाकर रक्खी हुई थी। बक्स का ताला खोलकर उसके अन्दर की चीजों को देखा। एक तरफ कोने में एक बोतल रक्खी हुई मिली, उसे चुपके से बाहर निकाल कर अपनी शाल के अन्दर छिपा लिया और द्रुत वेग से घर की तरफ राही हुआ। बादशाह को उसके घर वालों से पूछने पर विदित हुआ. "थोड़ी देर हुआ दरबार की तरफ गये हैं।" यह सुनकर उसको कुछ चिन्ता सी हुई और बीरबल के जाने का कारण जानने के लिये व्याकुल हो उठा। मनमें सोचा-"बिना किसी अनिवार्य कारणके बीरबल ऐसी दशामें नहीं जा सकता था। वह अपने साथियों सहित लौटने लगा। अभी दो चार सीढ़ी ही उतर कर गया था कि सामने से बीरबल आता हुआ दिखाई पड़ा। बीरबल मनहीं मन सोचता हुआ आरहा था कि बादशाह के पूछने पर क्या उत्तर दूँगा। इसी बीच बादशाह की दृष्टि उसपर जो पड़ी और वह वहीं रुक गया। पास