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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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८१ अकबर बीरबल विनोद में बैठकर भोजन कर रहे थे। उनकी थाली में परोसे खाद्य पदार्थ में एक बाल निकला जिसकारण पंडितजी को बड़ा रंज हुआ और अपनी स्त्रीको संबोधित कर बोले-"देखो ! आज तो मैं तुम्हारी पहली चूकके कारण तुम्हें क्षमा करता हूँ परन्तु फिर यदि ऐसी असावधानी करोगी (खाद्य पदार्थ में बाल निकलेगा) तो तुम्हारे शिर के बाल मूड़ लूँगा।" "हरि इच्छा भावी बलवाना।" यद्यपि बिचारी स्त्री अपने स्वामी का जिद्दी स्वभाव समझ कर बराबर भयभीत रहा करती थी और भोजन बनाने वा परोसने के समय अपने बालों को खूब सम्भार कर बाँधे रहती थी, परन्तु होनी को कौन रोक सकता है, वह तो होकर ही रहती है। कुछ दिनोपरान्त एक दिन जब युक्त पंडितजी फिर भोजन करने बैठे तो उनकी खाद्यसामग्री में एक बाल निकला, पंडितजी बहुत नाराज हुए और अपने स्त्री का बाल मुड़ा देने के लिये नाई को बुलवाया। अपने स्वामी को नितान्त क्रोधित देखकर स्त्री ने भीतर से किवाड़ बन्द कर लिया। पंडित जी ने हजार हूँ डाट फटकार सुनाई परन्तु स्त्री ने किवाड़ नहीं ही खोला। इतना सब होजाने पर भी पंडित जी अपनी जिद्द पर तुले ही रहे। स्त्री ने सोचा "अब इस प्रकार काम चलना कठिन दीख पड़ता है, कोई उपाय तत्काल करनी चाहिये। उसने एक आदमी को पोहर भेजकर अपने भाइयों को सहायता के लिये बुलवाया। उसके चार भाई थे, अपनी बहिन को इस प्रकार अपमानित होते सुन उन्हें अपने बहनोई के हठवादिता पर बड़ा खेद हुआ और उसके उद्धार का उपाय सोचने लगे। इतने में उसके बड़े ३