अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल बिनोद ८२
भाई को बीरबल से पुराना परिचय होने का स्मरण हो आया । वह तत्क्षण बहन के उद्धार का उपाय पूछने के लिये बीरबल के घर पहुँचा । उस समय बीरबल चारपाई पर पड़े २ पुस्तक पढ़ रहा था, अपने मित्र का सन्देशा सुन उसे पास बुलाकर उसका कुशल समाचार पूछा । वह अपने बहिन की दुर्दशा का आद्योपान्त कारण बतलाकर बोला- "मैं आपसे अपने बहिन के उद्धार की तरकीब बूझने आया हूँ । मेरी मदद कीजिये ।” बीरबल बोला—"तुम चारो भाई नंगे सिर होकर अपने बहनोई के पास इस ढंग से जावो मानो कोई मर गया हो; तब तक मैं भी आ पहुँचता हूँ। उधर पंडितजी स्त्री के द्वार न खोलने पर क्रुद्ध होकर नौकरों से कहा- "अभी बढ़ई को बुला लाकर दरवाजे को तोड़ डालो। इसी बीच वे चारो भी नंगधड़ंग सिर खोले आ पहुँचे। इनके आनेके थोड़ी देर पश्चात बीरबल भी शवदाह का सब सामान लिये हुए आया और पंडितजी के ऐन द्वार पर टिकठी बाँधने लगा। उधर स्त्री के भाइयों ने पंडितजी को जबरन चारोतरफ से कपड़े से ढक कर कफनि- याना प्रारम्भ किया, जब पंडितजी ने चींचप्पड़ मचाया तो वे क्रोधित होकर बोले-“खबरदार ! चुपचाप पड़े रहो, बिना पहले तुम्हें कफनियाये किसकी मजाल है जो मेरी बहन को हाथ लगाये।” वे पंडितजी को बाँध कर बीरबल के पास ले गये। इस नवीन कौतूहल को देखने के लिये वहाँ पर आदमियों की जमघट सी लग रही थी । अपने पड़ोसियों के सामने अपनी ऐसी दुर्गति देख पंडितजी का शिर लज्जा के बोझ से दब गया और अपनी रिहाई के लिये चारो सालों से अनुनय