अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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विनय करने लगे। उसकी स्त्री समीप की कोठरी से छिपकर सारी दुर्दशाएँ देख रही थी, पति को भाइयों से गिड़गिड़ाते देख उसे दया आ गई और उसका पवित्र हृदय धर्म-सागर में गोते मारने लगा। स्त्री ने कहा-“चाहे जो हो, मैं पति की ऐसी दुर्दशा अपनी आँखों नहीं देख सकती। वह मेरा देवता है, उसके कोप करने से मेरा सर्वनाश हो जायगा। पतिकी हँसी कराकर कुल्टाएँ भलेही प्रसन्न हो सकती हैं; परन्तु पतिपरायणा नहीं। वह कपाट खोलकर बाहर आई और अपने भाइयों से उसे छोड़ देने का आग्रह करने लगी। भाइयों को बहन कहने पर अमल न करते देख बीरबल स्वयं उनसे क्षमा- प्रार्थी हुआ और उसके पति को छोड़ देने की आज्ञा दी। पण्डितजी छोड़ दिये गये। अन्त में उन्हें अपनी हठधर्मी पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। इस स्वाँग से बीरबल का अभिप्राय था कि पति के जीवितावस्था में स्त्री का मुंडन नहीं हो सकता था। पहले पति मर ले तो स्त्री का मुंडन किया जाय। बीरबल पंडितजी को छोड़वा और उनकी स्त्री का कष्ट निवारण कर लौट गया। चारो भाई अपनी बहन के घर मिहमानी करने के लिये टिकरहे। धन्य है हमारी उन भारत ललनाओं को जो आने पर कठिन संकट उठा कर भी पतिव्रत की रक्षा करती हैं। ऐ देवियों ! पति से कष्ट उठाकर भी पति सेवा करना तेरा ही काम है! अपने पति को कष्ट में देख; भला तुम कैसे सहन कर सकती हो। पति को ईश्वर तुल्य मानकर पूजन करने वाली संसार प्रसिद्ध एक मात्र भारतललना ही है।