श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 199 of 811
Read in contextसर्गः ५ ] यात्राकाण्डम् १८४
आकाशशुम्बिनाश्चित्रा इमेऽग्रे कस्य वै ध्वजाः । हनुमत्कोविदारोग्रजेयवाणांकिताः शुभाः ॥ ३१॥ श्वेतनीलहरित्पीतवर्णाः परमशोभनाः । दृश्यन्तेऽग्रे पताकाश्च श्रूयते जयनिःस्वनः ॥३२॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा दूताः प्रोचुःप्रहर्षिताः । रामो राजीवपत्राक्षोऽयोध्यायाः पालकः प्रभुः ॥३३॥ सोऽयं यात्रार्थमायातो वयं तस्याज्ञया स्थिताः । मयमद्यैव रामेण निर्मितं चात्र वर्तते ॥३४॥ क्षुपार्तस्त्वं सुखं गच्छ भुक्त्वा पीत्वा सुखं व्रज । ततेषां वचनं श्रुत्वा परिनृत्य मुनिः पुनः ३५॥ आगतो येन मार्गेण तेन मार्गेण मययौ । गच्छन्तं न मुनिं दृष्ट्वा रामदूताम्प्रहर्षिताः ॥३६॥ रुद्ध्वा मार्गे मुनेस्तस्य वचनं प्रोचुरादरात् किमर्थं त्वं परावृत्य मुने गच्छसि वै पुनः ॥३७॥ आगतोऽसि पथा येन तेनैव त्वं वदस्व नः । इति तेषां वचः श्रुत्वा निवन्धान्मुनिसत्तमौ ॥३८॥ तूष्णीं स्थित्वा क्षणन्ध्यात्वा निश्वयं कृतवान् हृदि। इदानीं राघवोऽयोध्यां यात्रां कृत्वा गमिष्यति ३९। नानादेशेषु सर्वत्र नृणां तद्दर्शनं कथम् । भविष्यति तथाऽन्यत्र रामतीर्थानि भूतले ॥४०॥ भविष्यन्ति कथं नृणां महापापहराणि च । कथं रामेश्वरं भूम्यां भविष्यन्ति गतिप्रदाः ॥४१॥ अतः किञ्चित्करिष्येऽद्य येन रामस्तु भूतले । यात्रोद्देशेन सर्वत्र सीतया सह यास्यति ॥४२॥ अनेन लोकशिक्षाऽपि भविष्यति न संशयः । इति निश्चित्य स मुनिः प्राह दूतान्मन्दस्मितः ॥४३॥ दूताः शृणुत मे वाक्यं हतो येन दशाननः । मद्यपुत्रो बन्धुपुत्रैर्न कृतं तीर्थसेवनम् ॥४४॥ तथा यज्ञः कृतो नैव तस्यान्नं नाहमत्तियाम् । दीयतां मम मार्गो हि सर्वमुक्त्वैतन् मम ॥४५॥ कथनीयं राघवाय यात्रायत्नान् करिष्यति । इति तस्य वचः श्रुत्वा विमस्याविशपानमाः ॥४६॥ दत्त्वा मार्गं शापभीत्या दूता रामांतिक ययुः । रामं नत्वा मुनेस्तस्य कर्णे सर्वं न्यवेदयन् ॥४७॥ राघवोऽपि मुनेस्तस्य ज्ञात्वाऽभिप्रायमुत्तमम् । भद्रं वृत्तं सभामध्ये सहासः प्रतिष्टतः स्फुटम् ॥४८॥
इस लए किसकी आश्रम यहां ठहरे हा ? ये सामने गगनस्पर्शी तथा चित्र विचित्र हनुमान्, कोविदार, गरुड और बाणमं चिह्नित श्वेत, नील, हरित एवं पीत रंगका परम सुन्दर पताकाएं किसका फहरा रही हैं ? वह जयकार किसका सुनाई दे रहा है ? ॥ ३१-३२ ॥ मुनिके बचन सुनकर दूत बोले -कमलनयन और अयोध्याके पालक प्रभु रामचन्द्रजी यात्राके लिए यहां आए हुए हैं, उनकी आज्ञासे ही हम लोग यहां उपस्थित हैं। उन्हीं रामजीके द्वारा स्थापित अन्नक्षेत्र यहां है। यदि आप भूखे हों तो सुखस वहाँ चलिए और भोजनादि करके जाइये। उनके वचन सुनकर मुनि लौट पड़े और जिस मागसे आये थे, उसी मार्गसे फिर आने लगे। जाते हुए मुनिको देख शीघ्र दूत लोग उनके। राह रोककर आदर बोले- हे मुने ! आप जिस मार्गसे आये थे, उसी मार्गसे फिर लौट क्यों जा रहे हैं ? आप जिस कार्यसे आये हो, उस हम लोगोंको बताइए। दूतोंके इस आग्रह भरे वचनको सुना तो चुपचाप खड़े होकर थोड़ी देर हृदयम सोच करके मुनिने विचार किया कि यदि इस समय रामचन्द्रजी यात्रा करके अयोध्या चले जायेंगे ॥ ३३-३९ ॥ तब अन्यान्य देशोक मनुष्योंको उनका दर्शन कैसे मिलेगा और दूसरे स्थानोंपर मनुष्योंके बच्चे बड़े पापोंको नष्ट करनेवाला रामतीर्थ कैसे बनेगा ? अनेक मोक्ष-दायक रामेश्वर कैसे स्थापित होंगे ? इस लिए आज मैं कोई ऐसा उपाय करता हूँ कि जिससे रामचन्द्रजी संसारमें सब स्थानोंपर यात्राके उद्देश्यसे सीताजीके साथ जायँ ॥ ४०-४२ ॥ इस यात्रासे लोगोंको शिक्षा भी मिलेगी। इसमें संदेह नहीं है। ऐसा विचार करके कुछ हँसत हुए मुनिने दूतोंसे कहा - ॥ ४३ ॥ हे दूतो ! मेरे बचन सुनो। जिसने बाह्यणपुत्र दशानन रावणको मारा और भाई एवं पुत्रोंके सहित न तीर्थसेवन किया और न यज्ञ ही किया, उस रामके अन्नको मैं नहीं खाऊंगा। आप लोग मुझे जाने दें। मेरी बात रामसे कहियेगा। इसे सुनकर वे अवश्य तीर्थयात्रा तथा यज्ञ करेंगे। मुनिके इस बचनको सुनकर वे घबड़ाये हुए दूत शापके डरसे मुनिको मार्ग देकर रामचन्द्रजीके पास गये। वहाँ पहुँचकर रामजीको प्रणाम करके उनके कानमे उस मुनिकी सबक धीरेसे निवेदन कर दिया ॥ ४४-४७ ॥ श्रीरामने भी मुनिके उस उत्तम अभिप्रायको जानकर सर्व बात