श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
श्रीहरिः
श्रीमदानन्दरामायणस्थविषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| सारकाण्ड<br>प्रथम सर्ग | राम-लक्ष्मणको लेकर विश्वामित्रका जनकपुरको प्रस्थान और महल्योद्धार | ११ | |
| मङ्गलाचरण | १ | रामके आगमनसे जनकपुरनिवासियो सब-लोगोंका हर्षोल्लास | १२ |
| रघुवंशकी संक्षिप्त वंशावली | १ | राजा जनक द्वारा अपनी प्रतिज्ञाकी घोषणा | १४ |
| रावणका ब्रह्मासे अपने मरणका हेतु पूछना, ब्रह्माका रामके हाथों रावणके मरणका भविष्य बतलाना और रावणका कौसल्याको सन्दूकमें बंद करके समुद्रनिवासी तिमिंगलको सौंपना | ३ | रावण द्वारा धनुष उठानेका प्रयास और उसमें विफलता, सभामें रामका आगमन | १५ |
| महाराज दशरथके साथ कौसल्याका गान्धर्व-विवाह | ४ | सीताका रामको देखना और मुग्ध होकर मन ही मन देवताओंसे प्रार्थना करना | १७ |
| दशरथजीका सुमित्रा-कैकेयीके साथ विवाह, महाराज दशरथका देव-दानवयुद्धमें जाना | ५ | रामके हाथों शिवधनुष टूटना | १८ |
| उस युद्धमें कैकेयीका रथकी टूटी धुरीमें अपना हाथ लगाकर राजा दशरथके प्राण बचाना, जिससे दशरथजीका कैकेयीको दो वरदान देना तथा अयोध्याको सकुशल लौटना | ६ | राजा जनकके आज्ञानुसार सीताका राजसभामें आना और रामके गलेमें वरमाला डालना | १९ |
| राजा दशरथ द्वारा श्रवणका वध और श्रवणके अंधे माता-पिताका शाप देना | ७ | राजा जनकका महाराज दशरथके पास निमंत्रण भेजना, रामादि चारों भ्राताओंके विवाहका निश्चय और सीताके जन्मका वृत्तान्त | २१ |
| ऋष्यशृङ्ग द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न होना और अग्निका प्रकट होकर हवि देना | ७ | राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्नका क्रमशः सीता-उर्मिला-माण्डवी और श्रुतकीर्तिके साथ विवाह और एक मास बाद महाराज दशरथका अयोध्याको प्रस्थान | ३० |
| द्वितीय सर्ग | मार्गमें राम-परशुरामका साक्षात्कार | ३१ | |
| पृथ्वीका दुःखित होकर देवताओंके पास जाना और सब देवताओंका क्षीरसागर जाकर विष्णुभगवान्की स्तुति करना और भगवान्की आकाशवाणी सुनना, राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्नका जन्म और उन पुत्रोंकी बाल-लीला | ८ | राम द्वारा परशुरामका गर्वभञ्जन और परशुराम-का रामको आत्मरूपता सुनाना | ३२ |
| गुरु वसिष्ठका रामादि चारों भाइयोंको शास्त्रीय शिक्षा देना | ९ | महाराज दशरथका अयोध्यामें पहुँचना और उत्सव मनाना | ३३ |
| तृतीय सर्ग | चतुर्थ सर्ग | ||
| महामुनि विश्वामित्रका राजा दशरथकी सभामें जाकर यज्ञरक्षार्थ राम-लक्ष्मणको माँगना, मार्गमें विश्वामित्रका दोनों बालकोंको शस्त्रास्त्रकी शिक्षा देना और श्रीरामके हाथों ताडुकावध | १० | दीपावलीके अवसरपर पुनः राजा जनकका महाराज दशरथको बुलाना और तदनुसार उनका प्रस्थान | ३४ |
| जनकपुरमें राजा दशरथका सत्कार और जनकपुरसे लौटते समय रास्तेमें उनको बहुतसे वैरी राजाओंका घेरना | ३५ | ||
| रामका उन राजाओंके साथ घोर युद्ध और भरतका मूर्छित होना | ३६ | ||
| रामके आज्ञानुसार लक्ष्मणका मुद्गल मुनिके आश्रममें सञ्जीवनी बूटी लेने जाना और आश्रमवासियों द्वारा उपस्थित की गयी |
६ | विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| बाधाओंको दूर करने हेतु संजीवनी लाकर भरतको जीवित करना | ३७ |
| महाराज दशरथका मुनि मुद्गलसे रामके भविष्यका प्रश्न और उसका संतोषजनक उत्तर पाना | ३८ |
| वृंदाका वृत्तांत और उसके द्वारा विष्णु भगवान् के शापित होनेका इतिहास | ३६ |
| सौराष्ट्रके एक निपुण ब्राह्मण तथा उसकी स्त्री कलहाका उपाख्यान | ४१ |
| पञ्चम सर्ग | |
| धर्मदत्त विप्र द्वारा कलहाका उद्धार | ४५ |
| रामका सीताके साथ अयोध्यामें सानन्द निवास | ४८ |
| रामकी संक्षिप्त दिनचर्या | ४९ |
| महाराज दशरथका रामसे ज्ञानोपदेश सुनाने की प्रार्थना करना और रामका ज्ञानोपदेश देना | ५१ |
| षष्ठ सर्ग | |
| नारदका रामको देवताओंका संदेश सुनाना | ५१ |
| राम-सीताका परस्पर वनगमनसम्बन्धी परामर्श | ५४ |
| रामके राज्याभिषेककी तैयारी, गुरु वसिष्ठका रामके महलोंमें आना और उपदेश देना, अभिषेककी तैयारी देखकर मन्थराका दुःखित होना | ५५ |
| मंथराका कैकेयीके पास जाकर उसे उत्तेजित करना और धरोहरस्वरूप रखे दोनों वरदान माँगनेको प्रेरित करना, तदनुसार कैकेयीका कोपभवनप्रवेश, राजा दशरथका उसके पास पहुँचना और वरदानकी बात सुनकर विकल होना, प्रातःकाल रामका पिताके पास जाकर धैर्य देना | ५६ |
| कैकेयीके रामवनगमनसम्बन्धी वरदान मांगनेके समाचारसे पुरवासियोंकी व्याकुलता दूर करनेके लिए वामदेवको रामकी प्रतिज्ञा तथा नारदके आगमनकी बात बताना | ५७ |
| राम-लक्ष्मण-सीताका वनगमन | ५७ |
| प्रयाग होते हुए रामका चित्रकूट पहुँचना, जयंतकी कथा तथा दशरथमरण | ५८ |
| भरतका ननिहालसे आकर पिताकी क्रिया करनेके बाद चित्रकूट जाना और रामके अनुरोधसे इनकी चरणपादुका लेकर अयोध्या लौटना | ६० |
| रामका अत्रिके आश्रमपर जाना | ६० |
| सप्तम सर्ग | |
| रामके द्वारा विराधका वध | ६२ |
| सुतीक्ष्णके आश्रमपर रामका जाना और वहाँसे अगस्त्यके आश्रमपर होते हुए पञ्चवटी पहुँचना, वहाँ जटायुसे मिलन और लक्ष्मणके हाथों शूर्पणखाके पुत्र साम्बका मरण | ६३ |
| लक्ष्मणका शूर्पणखाके नाक-कान काटना | ६४ |
| रामके हाथों खरदूषण-त्रिशिरा और उनकी चौदह हजार राक्षसी सेनाका निधन तथा शूर्पणखाका लंकामें रावणके पास जाना | ६५ |
| सीताके अनुरोधसे रामका मृग मारीचके वधको जाना और रावण द्वारा सीताका हरण | ६७ |
| जटायु-रावणयुद्ध, पञ्चवटीकी कुछ विशेष कथाएँ | ६८ |
| राम-लक्ष्मणका लौटकर आश्रम पहुँचना, वहाँ मरणोन्मुख जटायुसे रावण द्वारा सीताहरणका वृत्तांत सुनना और रामका मृत जटायुकी अपने हाथों दाहक्रिया करना | ६९ |
| सीताको व्यग्रतामय खोजते हुए रामको देखकर पार्वतीका वहाँ पहुँचना और उनके ईश्वरत्वकी परीक्षा करना, कबन्धवध और कबन्धकी जातकथा | ७१ |
| रामका शबरीके आश्रमपर पहुँचना और शबरीको मुक्ति प्राप्त होना, वहाँसे रामका पम्पासरोवर जाना | ७१ |
| अष्टम सर्ग | |
| राम-सुग्रीवकी मित्रता और सुग्रीवका रामको अपना दुःख सुनाना | ७२ |
| बालि-सुग्रीवयुद्ध और रामके हाथों बालिका मरण तथा रामका बालिको वरदान | ७५ |
| रामका प्रवर्षण पर्वतपर निवास, कालांतरमें सुग्रीवको सीताकी खोजके विषयमें निश्चिन्त देखकर रामका लक्ष्मणको भेजना | ७१ |
| सुग्रीवका बहुतेरे वानरोंको सीताको खोजने लिये भेजना और हनुमान्-अङ्गद आदिका एक तपस्विनीसे मिलना | ७७ |
| अङ्गद आदिका सम्पातीसे मिलना और सम्पातीका अपना पूर्ववृत्तांत बताते हुए सीताके मिलनेका उपाय बताना | ७९ |
| नवम सर्ग | |
| हनुमान् द्वारा समुद्रलङ्घन और मार्गमें नागमाता सुरसासे साक्षात्कार | ७९ |
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| हनुमान्जीके द्वारा सिंहिकावध, समुद्रपार पहुँच-कर रात्रिके समय हनुमान्जीका लङ्कामें प्रवेश और लङ्किनीसे साक्षात्कार | ८० | वादिसे मिलना और वहांसे चलकर मधुवन होते हुए रामके पास पहुँचकर उन्हें सीताका हाल सुनाना | ९८ |
| हनुमान्का रावणके भवनमें जाकर उसकी दाढ़ी-मूँछ जलाना, मन्दोदरीको सीताके सदृश सुन्दरी देखकर हनुमान्का पछताना, सीता और मन्दोदरीके सादृश्यका कारण | ८१ | दशम सर्ग<br>हनुमान्का रामको लङ्काका स्वरूप बतलाना | ९९ |
| हनुमान्जीका सीताके समक्ष पहुँचना | ८३ | रामका लङ्काको प्रस्थान | १०० |
| उसी समय रावणका सीताके पास आकर विविध प्रलोभन देना और सीताका रावणको फटकारना | ८४ | उधर लङ्कामें हनुमान्का पराक्रम देखकर रावणका घबड़ाना और राजसभामें आकर परामर्श करना, विभीषणका समझाना और रावणसे तिरस्कृत होकर रामकी शरणमें जाना | १०१ |
| बातोंसे हारकर रावणका सीताको मारनेके लिए उद्यत होना और मन्दोदरीका रोकना | ८५ | राम-विभीषणमें मैत्री, रामका कुपित होकर समुद्रपर आग्नेय बाण चलानेको उद्यत होना और समुद्रका सेतुबन्धके लिए उपाय बताना, रामका समुद्रतटपर शिवलिंग स्थापित करनेका निश्चय करके हनुमान्को शिवलिंग लानेके लिए काशी भेजना | १०३ |
| बहुतेरी राक्षसियोंको सीताको डराने-धमकानेके लिए नियुक्त करके रावणका अपने घर जाना | ८५ | शिवजीका हनुमान्को एक प्राचीन इतिहास बताना | १०४ |
| त्रिजटाका सीताको आश्वासन, हनुमान् द्वारा रामयश वर्णन और प्रकट होकर राममुद्रिका-प्रदान | ८६ | विन्ध्यपर्वतकी वृद्धिसे देवताओं तथा मनुष्योंकी घबड़ाहट और अगस्त्य मुनिका विन्ध्यके क्रोधको शांत करनेके लिए काशीका त्याग | १०६ |
| हनुमान्का अशोकवाटिका उजाड़ना | ८७ | राम द्वारा हनुमान्का गर्वहरण | १०७ |
| हनुमान्का रावणके भेजे हुए बहुतेरे सैनिकोंको मारना | ८८ | हनुमान्का अपनी लायी मूर्तिको अलग स्थापित करना और रामका वरदान देना | १०८ |
| मेघनादके ब्रह्मपाशमें बँधकर हनुमान्का रावणके समक्ष जाना | ८९ | शिवजीका रामको एक प्राचीन इतिहास बताना और रामके आज्ञानुसार नलका सेतुबन्धन करना | १११ |
| हनुमान्का रावणको सदुपदेश और रावणका दैत्योंको हनुमान्की पूँछ जलानेका आदेश देना | ९१ | रावणको शुकका सदुपदेश और उसके द्वारा शुकका तिरस्कृत होना, शुकके पूर्वजन्मकी कथा | ११२ |
| हनुमान् द्वारा लङ्कादहन | ९३ | रामके आदेशसे अङ्गदका लङ्का जाना और लौटते समय रावणका एक महल उठाते लाना | ११३ |
| लङ्का भस्म कर देनेपर सीताके भी जल मरने-की बात सोचकर हनुमान्का दुःखी होना और आकाशवाणी सुनकर धीरज धरना | ९३ | अङ्गदके मुखसे रावणकी दर्पोक्ति सुनकर सुग्रीवका रावणके पास जाना और उसके साथ बाहुयुद्ध करना | ११४ |
| लङ्काका प्राचीन इतिहास, गज-ग्राहके प्रसंगमें ग्राहके पूर्वजन्मकी कथा, गज-ग्राहका सहस्रवर्षव्यापी युद्ध और भगवान् द्वारा गजका उद्धार | ९४ | माल्यवान्का रावणको उपदेश<br>एकादश सर्ग | ११५ |
| गरुड़का एक गजको लेकर भक्षण करनेके लिए त्रिकूट पर्वतपर पहुँचना और हनुमान्का अशोक-वाटिका में सीतासे फिर मिलना | ९६ | राम-रावणका युद्धारम्भ | ११६ |
| लङ्कासे लौटते समय एक मुनिके द्वारा हनुमान्का गर्वोपहार | ९७ | वानरी सेनापर मेघनादका शक्तिप्रयोग और रामकी आज्ञासे हनुमान द्वारा लायी हुई द्रोणगिरि-की ओषधिसे सबकी मूर्छा दूर होना | ११७ |
| समुद्रके इस पार आकर हनुमान्का अङ्गद- |
८
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| रावणका लक्ष्मणपर शक्तिप्रयोग और हनुमान्का द्रोणगिरि लाने समय कालनेमिसे भेंट | ११८ | रामका राज्याभिषेक | १३९ |
| तड़ागपर जल पीनेके लिए गये हुए हनुमान्की मगरीका पकड़ना, हनुमान्के हाथों कालनेमिका वध और वहाँसे चलकर हनुमान्का भरत-के बाणप्रहारसे मूच्छित होकर गिरना | १२० | श्रीशिवजीके द्वारा रामकी स्तुति | १४० |
| ऐरावण-मैरावण द्वारा राम-लक्ष्मणका हरण | १२० | राज्याभिषेकोत्सवपर स्वर्गसे महाराज दशरथ-का आना, रामका ब्राह्मणों-मित्रों तथा परिवारके लोगोंको उपहार देना | १४१ |
| हनुमान्का राम-लक्ष्मणको खोजने पाताल जाना, वहाँ मकरध्वजसे भेंट, मकरध्वजका अपनी जन्मकथा सुनाना और हनुमान्का कामाक्षादेवीके मंदिरमें प्रवेश | १२१ | हनुमान्को रामके विविध वरदान और भोजनके समय हनुमान्का कौतुक | १४२ |
| हनुमान्का मैरावणकी पत्नीसे ऐरावण-मैरावण-के मरणका उपाय पूछना और उस नागकन्याका उन दोनोंकी मृत्युका उपाय बताना | १२२ | पुष्पक विमान, सुग्रीव तथा विभीषणकी विदाई | १४३ |
| रामके द्वारा ऐरावण-मैरावणका वध | १२४ | रामके रमणसुखकी समाप्तिका वर्णन | १४४ |
| उस नागकन्याको रामका वरदान, रावणका कुम्भकर्णको जगाना, रावणकी प्रेरणासे उसका समरभूमिमें जाना और रामके हाथों कुम्भकर्णका निधन | १२५ | त्रयोदश सर्ग | |
| मेघनादका निकुम्भिला देवीके मंदिरमें जाकर यज्ञ करना और हनुमान् तथा लक्ष्मण द्वारा यज्ञविध्वंस | १२६ | रामके यहाँ अगस्त्य आदि ऋषियोंका आग-मन, रामका अगस्त्यसे मेघनादका वृत्तांत पूछना और उनका बताना | १४६ |
| लक्ष्मण द्वारा मेघनादका वध | १२७ | रावण-कुम्भकर्ण आदिकी जन्मकथा | १४७ |
| सुलोचनाका सती होना | १२८ | माताकी आज्ञासे रावणका शिवलिंग लेने कैलाश जाना और अपने मस्तक काटकर शिवजीको प्रसन्न करना तथा वरदान पाना | १४८ |
| रावणका सीताको रामका कटा हुआ नकली सिर दिखाना | १२९ | रावण-कुम्भकर्ण-विभीषणका तप करके ब्रह्मा-को प्रसन्न करना और उनसे वरदान पाना | १४९ |
| मन्दोदरीका रावणको समझाना और रावणका रामके समक्ष नकली सीताको काटना | १३० | रावणको कुबेरपुत्र नलकुबरका शाप, मेघनाद-का इन्द्रको पराजित करना और उसका इन्द्रजित् नाम पड़ना | १५० |
| राम-रावणका भीषण युद्ध | १३१ | रावणका बालिसे लड़ने जाना और बालिका उसे अपनी कांखमें रख लेना | १५१ |
| रामके हाथों रावणका वध | १३२ | रावणका वानरराज बालिसे युद्ध करने जाना और परास्त होना | १५२ |
| द्वादश सर्ग | रावणका राजा अनरण्यसे युद्ध और उनका रावणको शाप | १५३ | |
| राम-सीताका मिलन | १३३ | रावण-सनत्कुमारका वार्तालाप, रावणकी श्वेत-द्वीपयात्रा और वहाँकी स्त्रियोंके हाथों पिटना | १५४ |
| रामकी अयोध्या लौटनेकी तैयारी और विभीषणके प्रश्न | १३४ | बालि-सुग्रीवकी जन्मकथा | १५५ |
| रामका त्रिजटाको वरदान | १३५ | ब्रह्माका बालिको किष्किन्धाका राज्य देना और हनुमान्की जन्मकथा | १५६ |
| रामका अवध-प्रस्थान, मार्गमें सम्पातीसे भेंट और रामका सीताको विविध दृश्य दिखाना | १३६ | हनुमान्का सूर्यको निगलना, हनुमान्पर इन्द्रका वज्रप्रहार, पवनका क्रोध और हनुमान्को ब्रह्माका वरदान | १५७ |
| उधर अवधि बीतते देखकर भरतका चितामें कूदनेको तैयार होना और उसी समय हनुमान्जी-का पहुँचना | १३७ | इन्द्रका राहुको सूर्य देना और हनुमान्को मुनियोंका शाप मिलना | १५८ |
| राम-भरतका मिलन | १३८ | रामराज्यके सुखका वर्णन | १५९ |
| २ | विषयानुक्रमणिका | ९ |
|---|
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| <center>यात्राकाण्ड<br>प्रथम सर्ग</center> | ब्राह्मणोंके साथ सीताका ससमारोह गंगापूजन करना | १८१ | |
| श्रीशिवजीसे पार्वतीके प्रश्न और शङ्करजीका उत्तर | १६१ | रामके दर्शनार्थ च्यवन मुनिका आना और बाणोंसे प्राप्त होनेवाले कष्टोंका वर्णन करना, उनका दुःख दूर करनेके लिए रामका अपने बाणसे जलंघ्य खाई खोदना | १८२ |
| सहसा वाल्मीकिके मुखसे कविताका प्रादुर्भाव | १६२ | कुम्भोदर मुनिका रामदूतोंसे वार्तालाप, दूतोंके आग्रह करनेपर भी उनका बिना भोजन किये लौटना और पूछनेपर कारण बताना | १८३ |
| ब्रह्माका वाल्मीकिके आश्रमपर आकर राम-चरित लिखनेका आग्रह करना | १६३ | कुम्भोदर मुनिके आक्षेप सुनकर रामका तीर्थयात्राकी तैयारी करना; पुष्पक विमानका रामके आदेशसे दस योजन विस्तृत और सौ धनुषका ऊंचा होना | १८४ |
| <center>द्वितीय सर्ग</center> | रामका तीर्थयात्राके लिए प्रस्थान | १८५ | |
| वाल्मीकिकृत रामायणनिर्माण, उसे सुननेके लिए देवता-यक्ष-नागादिकोंका आगमन | १६४ | रामकी चार ध्वजाओंका वर्णन | १८६ |
| रामायण प्राप्त करनेके लिए उनमें परस्पर कलह और विष्णुभगवान् द्वारा रामायणका विभाजन | १६५ | <center>षष्ठ सर्ग</center> | |
| नारदजीके द्वारा व्यासजीको चार श्लोक प्राप्त होना | १६७ | रामका सदल-बल प्रयाग पहुँचना, वहाँसे चलकर काशी पहुँचना और विविध लोकोपकारी कार्य तथा दान करते हुए एक साल वहाँ रहना | १८७ |
| <center>तृतीय सर्ग</center> | काशीमें रामका अनेक तीर्थोंकी स्थापना करना | १८८ | |
| पार्वतीका शंकरजीसे रामदास विष्णुदासके चरित्रविषयक प्रश्न और शिवजीका उत्तर | १६९ | रामकी गयायात्रा, वहाँ फल्गुनदीमें सीताके बालूकाकी दुर्गा बनाते समय राजा दशरथका अपने हाथों बालूकापिण्ड लेना | १९१ |
| सीताका रामसे गङ्गातटपर चलनेकी प्रार्थना | १७१ | पिताको पिण्डदान देते समय राजा दशरथका हाथ न दीखनेपर रामका विस्मित होना, लक्ष्मण और सीतासे पूछनेपर सीताका कारण बताना | १९२ |
| रामका लक्ष्मणको यात्राकी तैयारी करनेका आदेश देना | १७२ | सीताका आम्रवृक्ष, फल्गुनदी, गयावाल ब्राह्मणों, बिल्ली तथा अश्वको साक्षी देनेके लिए कहना और उनके इनकार करनेपर शाप देना, अन्तमें सूर्यकी साक्षीसे प्रसन्न रामके पिता दशरथका प्रत्यक्ष प्रकट होना | १९३ |
| गङ्गायात्रासम्बन्धी समाचारसे प्रजाजनमें उल्लासकी लहर | १७३ | <center>सप्तम सर्ग</center> | |
| <center>चतुर्थ सर्ग</center> | रामकी दक्षिण भारतकी तीर्थयात्राका विवरण | १९५ | |
| रामचन्द्रका ज्योतिषी बुलाकर उत्तम मुहूर्त्त पूछना | १७४ | तोताद्रिमें कन्याकुमारीका रामसे भेंट और रामका उसे वरदान देना | १९८ |
| रामचन्द्रका गङ्गातटको प्रस्थान | १७५ | <center>अष्टम सर्ग</center> | |
| यात्राकालीन उल्लासका वर्णन | १७६ | भारतके पश्चिमी प्रदेशके तीर्थोंकी यात्राका विवरण, सवारीपर बैठकर यात्रा करनी चाहिए या | |
| रामका महर्षि मुद्गलके आश्रमपर पहुँचना | १७८ | ||
| महर्षि मुद्गलका अपने नवीन आश्रमसे रामके दर्शनार्थ प्राचीन आश्रमपर जाना और पूछनेपर आश्रमत्यागका कारण बतलाना, रामका मुनि मुद्गलसे सरयूकी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न और मुनिका उत्तर | १७९ | ||
| रामके आदेशसे लक्ष्मणका बाण चलाकर सरयूके दो भाग करके एक भागको मुद्गलके पूर्व आश्रमपर लाना | १८० | ||
| <center>पञ्चम सर्ग</center> | |||
| सीताका गंगापूजनकी तैयारी करना, कौसल्या आदि सासुओं, सोहागिन स्त्रियों तथा बहुतेरे |
| १० | विषयानुक्रमणिका |
|---|
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| गयीं, इस विषयमें रामदास-विष्णुदासका प्रश्नोत्तर | २०० | सभी देशोंमें अबाध गतिसे घूमकर घोड़ेका अयोध्या लौटना | २२० |
| पुष्पक विमानपर नित्य करोड़ों ब्राह्मणोंके भोजनका प्रबन्ध | २०१ | चतुर्थ सर्ग<br>रामके अश्वमेध यज्ञमें सब देवताओं तथा शिवजीका आगमन, राम द्वारा सबका स्वागत-सत्कार होना और राम तथा शिवजीमें कुछ मनोरञ्जक वार्तालाप | २२१ |
| रामके पुष्पक विमानको देखकर अन्यान्य तीर्थवासियोंकी विविध कल्पनायें | २०३ | अश्वमेध यज्ञमें कुम्भोदर मुनिका आगमन, रामके साथ बातचीत और कुम्भोदर मुनिका अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रसे रामकी स्तुति करना | २२३ |
| नवम सर्ग<br>उत्तर दिशाकी तीर्थयात्राका विवरण, रामको बदरीनारायण तथा मानसरोवरकी यात्रा, वहाँसे कैलास जाना और यहाँपर सीताका कामधेनु को पाना | २०४ | पञ्चम सर्ग<br>विष्णुदासका गुरु रामदाससे अष्टोत्तरशतनाम-विषयक प्रश्न और उनका उत्तर | २२४ |
| सब तीर्थोंकी यात्रा करके रामका अयोध्या लौटना | २०५ | रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र | २२५ |
| अयोध्यामें रामका भव्य स्वागत | २०६ | रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रका माहात्म्य | २२७ |
| यात्राकाण्डकी फलश्रुति | २०७ | षष्ठ सर्ग<br>यज्ञके समय रामकी दिनचर्या | २२८ |
| यागकाण्ड<br>प्रथम सर्ग<br>अश्वमेध यज्ञके लिए रामका गुरु वसिष्ठसे परामर्श | २०८ | सप्तम सर्ग<br>ध्वजारोहणयज्ञके विषयमें प्रश्नोत्तर | २३१ |
| वसिष्ठका लक्ष्मणको यज्ञकी तैयारीके लिये संदेश देना | २१० | ध्वजारोहणविधि, माहात्म्य एवं फलश्रुति | २३२ |
| यज्ञकी सामग्रियोंका विवरण | २११ | अष्टम सर्ग<br>अश्वमेध यज्ञकी समाप्तिपर रामको अवभृथ-स्नानके लिए यात्रा | २३६ |
| द्वितीय सर्ग<br>राम-सीताका यज्ञकी दीक्षा लेना | २१३ | यात्राकालमें रामके दर्शनार्थ जनताकी व्यग्रता और रामका लक्ष्मणको सुप्रबन्धके लिए निर्देश | २३७ |
| श्यामकर्ण घोड़ेकी पूजा करके भूभ्रमणके लिये छोड़ना और शत्रुघ्न-सुमन्त आदिका उसकी रक्षाके लिये जाना | २१४ | रामका सरयूमैं सपरिवार अवभृथस्नान | २३८ |
| यज्ञसमारोहमें बहुतेरे ऋषियोंका आगमन | २१५ | कामधेनु गौ देनेको उद्यत रामसे वसिष्ठका सीताको दानमें माँगना | २३९ |
| यहाँ आए हुये ऋषियोंका रामके द्वारा स्वागत-सत्कार और कामधेनुकी पूजा करके पाकशालामें बाँधना तथा उससे मनचाही वस्तुयें प्राप्त करके सब अभ्यागतोंकी इच्छा पूर्ण करना | २१६ | तदनुसार रामका सीताको दान देना और पुनः वसिष्ठकी बतायी योजनाके अनुसार सुवर्णराशि देकर सीताको वापस लेना | २४० |
| तृतीय सर्ग<br>श्यामकर्ण घोड़ेके साथ शत्रुघ्नका ब्रह्मावर्त पहुँचना, वहाँ गङ्गाकी रुकावटसे दुखी होकर गङ्गाकी प्रार्थना करना और गङ्गाका प्रसन्न होकर उन्हें मार्ग देना | २१७ | नवम सर्ग<br>अश्वमेध यज्ञकी समाप्तिपर शिवजीका रामसे वरदान माँगना और उनका देना | २४१ |
| श्यामकर्ण घोड़ेका मगधमें पहुँचना और वहाँके राजासे उपहार पाना | २१८ | पार्वतीका सीताजीसे वर माँगना और उनका देना | २४३ |
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| यज्ञके ऋत्विजोंको रामका दान ओर अतिथियोंको उपहार भेंट | २४४ | सप्तम सर्ग | |
| सिंहासनारूढिन रामको नदी-समुद्र तथा अन्यान्य देवताओंसे विविध प्रकारके उपहार मिलना | २४५ | रामके यहाँ व्यासजीका आगमन <br> व्यासका रामके एक पत्नीव्रतकी प्रशंसा करना | २७९ |
| अयोध्यामें रामका दरबार | २४६ | रामका व्यासजीसे अगले जन्ममें बहुत-सी स्त्रियोंको प्राप्त करनेका उपाय पूछना | २८० |
| यज्ञमें आये हुए अतिथियोंका प्रस्थान | २४७ | व्यासजीके आज्ञानुसार रामका दोसह्र सीताकी सुवर्णमूर्तियें दान देना, रामके सम्मुख कितनी ही देवांगनाओंका आकर रामपर मुग्ध होना | २८१ |
| —:o:— <br> विलासकाण्ड <br> प्रथम सर्ग | उन स्त्रियोंको रामका वरदान | २८२ | |
| शिवकृत रामस्तवराज | २४९ | अष्टम सर्ग | |
| द्वितीय सर्ग | गुणवतीका वृत्तान्त, अरण्यमें गुणवतीके पतिका मरण | २८३ | |
| रामके द्वारा सीताके सौन्दर्यका वर्णन और पक्षियों द्वारा रामकी स्तुति | २५७ | गुणवतीका अयोध्यामें रामके सम्मुख पहुँचना, रामकी तत्कालीन शोभाका वर्णन | २८४ |
| तृतीय सर्ग | गुणवतीको रामका वरदान मिलना | २८५ | |
| सीतासे प्रश्न करनेपर रामका देहरामायण-वर्णन | २६१ | पिंगला नागकी वेश्याका रामके समक्ष पहुँचना, राम द्वारा पिंगलाका वृत्तान्त सुनकर सीताका कुपित होना | २८६ |
| अपने दिये हुए ज्ञानके विषयमें रामका प्रश्न और सीताका उत्तर | २६३ | क्रोधवश सीताका मरनेके लिए उद्यत होना, रामकी विकलता, आधी रातके समय रामका गुरु वसिष्ठको बुलानेके लिए लक्ष्मणको भेजना, गुरुके चरण छूकर रामका शपथ खाना | २८८ |
| चतुर्थ सर्ग | सवेरे सीताका पिंगला वेश्याको बुलाकर डांटना और मारना, पिंगलाको सीताका शाप और उससे उद्धारका समय निर्धारित करना | २८९ | |
| रामकी दिनचर्या और बन्दीजनोंकी स्तुति | २६६ | नवम सर्ग | |
| सीताके अगणित अलंकारोंका वर्णन | २६८ | रामकी कुरुक्षेत्रयात्रा, लोपामुद्रा और जानकीजीकी बातचीत | २८९ |
| पञ्चम सर्ग | लोपामुद्रासे शास्त्रार्थमें सीताकी विजय | २९० | |
| राम-सीताका जलविहार | २७२ | विलासकाण्डका माहात्म्य एवं विलासकाण्डके पाठकी विधि | २९१ |
| षष्ठ सर्ग | —:o:— <br> जन्मकाण्ड <br> प्रथम सर्ग | ||
| राम-सीताके शयनका वर्णन, राम-सीताका विहार | २७६ | धात्रीके मुखसे रामका सीताके गर्भिणी होनेका समाचार सुनना | २९३ |
| राम और सीताका एक छज्परसे बाजारके कौतुक देखना, सीताका एक दीन-हीन ब्राह्मणीको अपना दरबा लिये भीख मांगनेपर उद्यत देखना, सीताका उसके उससे दरिद्रताका कारण पूछना और उसका बताना, सीताका उस ब्राह्मणीको एक लाख स्वर्णमुद्रा दिलदाना | २७७ | सीताका जंगलोंमें सैर करनेकी इच्छा प्रकट करना और इसकी तैयारीके लिए रामका लक्ष्मणको आदेश देना | २९४ |
| सीताका लक्ष्मणके द्वारा सारे देशमें यह घोषणा करवाना कि कोई भी स्त्री बिना वस्त्राभूषणके दिखलायी न दे। यदि वह धनाभावके कारण वस्त्राभूषण न धारण कर सकती हो तो उसे राज्यसे दिया जाय | २७८ | ||
| भगवान् रामकी तत्कालीन दिनचर्या | २७९ |
| १२ | विषयानुक्रमणिका | ||
|---|---|---|---|
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
| पालकीपर चढ़कर रामका सीता तथा सब परिवारको साथ लेकर वनकी यात्रा करना | २९५ | पुष्पक विमान द्वारा उस समय रामका भी वहाँ पहुँचना और बादमें रामका भी अश्वमेध यज्ञ करनेका निश्चय करना | ३०९ |
| इन लोगोंका वनमें पहुँचना और वनकी शोभाका वर्णन | २९६ | स्वर्णमयी सीता बनाकर रामका यज्ञाारम्भ, रामके नन्द्वे यज्ञ पूर्ण होना और कुशकी उत्पत्तिका वृत्तान्त | ३१० |
| द्वितीय सर्ग | वाल्मीकिका कुश-लवको रामायणकी शिक्षा देना और अल्प समयमें उनका सीखना | ३११ | |
| राम-सीताका वनविहार | २९८ | पञ्चम सर्ग | |
| छठें मासमें सीमन्तोन्नयनसंस्कार और जनकजीसे रामका सीतालयारसम्बन्धी वार्तालाप | २९९ | विष्णुदासकृत रामदाससे रामरक्षास्तोत्रके विषयमें प्रश्न और रामरक्षास्तोत्रका सार | ३१२ |
| वनमें, जहाँ कि सीता आकर रहनेवाली थीं, वहाँपर जनकजीका प्रबन्ध | ३०० | रामरक्षास्तोत्रका माहात्म्य | ३१३ |
| तृतीय सर्ग | रामनामके स्मरणका फल | ३१५ | |
| रामका सीताको त्यागनेका कारण बतलाना | ३०१ | षष्ठ सर्ग | |
| रामका विजय नामक गुप्तचरसे जनताके गुप्त विचार पूछना | ३०२ | सीताका बारम्बार उसे पतिवियोग दूर करनेके लिए कोई व्रत पूछना और उनका बतलाना | ३१६ |
| उसके मुखसे प्रजाके हृदयकी यह बात मालूम करना कि सीता कितने ही वर्ष रावणके यहाँ रह चुकी थीं, फिर भी उसे रामने अपना लिया। यह अच्छा नहीं किया। विजयका रामको एक धोबीकी बात सुनाना। कैकेयीका सीतासे रावणकी आकृति पूछना और सीताका दोपहरमें केवल रावणके एक अँगूठेका आकार बनाना | ३०३ | सीताका व्रतारम्भ और लवका रामके बगीचे-से कमल लाने जाना | ३१७ |
| सीताके चली जानेपर कैकेयीका उस अँगूठे-के अनुरूप रावणके सारे शरीरकी तसवीर बना देना और इसी समय रामका पहुँचना, तसवीरके विषयमें रामके पूछनेपर कैकेयीका सीताकी बनायी बतलाना | ३०४ | लवका बगीचेके रक्षकोसे मुठभेड़ और विजयी होकर लौटना | ३१८ |
| प्रातःकालके समय सीताको वनमें त्यागनेके लिए लक्ष्मणका प्रस्थान | ३०५ | दूसरे दिन फिर लवका उन लोगोंसे युद्ध और लवकी विजय | ३१९ |
| वाल्मीकिके आश्रमपर पहुँचकर गद्गद वाणी-में लक्ष्मणका सीताको सब वृत्तान्त बतलाना | ३०६ | रामका लवको पकड़नेके लिये वाल्मीकि ऋषिके आश्रमपर दूत भेजना, इसपर वाल्मीकिका यह उत्तर देना कि चलो, मैं रामके अपराधीको लेकर स्वयं वहाँ आता हूँ | ३२० |
| चतुर्थ सर्ग | सप्तम सर्ग | ||
| रामकी उस आज्ञा पालन करनेके लिए लक्ष्मणका विचार करना-जिसमें उन्होंने कहा था कि लौटते समय सीताके दोनों हाथ काट ले आना। उस निर्दय कार्यको करनेमें असमर्थ लक्ष्मणका प्राण त्यागनेपर उद्यत होना और बढ़ईके रूपमें विश्वकर्मासे भेंट | ३०७ | रामका अन्तिम यज्ञके लिये श्यामकर्ण घोड़ा छोड़ने और उसरीतिसे वाल्मीकिका सीताके साथ रामके यज्ञमें जाना | ३२१ |
| विश्वकर्माका सीताकी भुजा बनाकर देना और उसे लेकर लक्ष्मणका अयोध्या लौटना | ३०८ | कुश-लवका रामायणगान सुनकर सबका मुग्ध होना और बादमें रामकी सभामें लव-कुशका रामा-यणगान | ३२२ |
| अर्धरात्रिके समय सीताके गर्भसे पुत्ररत्न उत्पन्न होना | ३०८ | रामका उन दोनों बालकोंको पुरस्कार दिला-दाना और उनका लेनेसे इनकार करना | ३२३ |
| लवका रामके श्यामकर्ण बहेड़ेको पकड़ना और लव तथा शत्रुघ्नका संग्राम, लवका हनुमान्, सुमन्त्र और भरतको काँखमें दबाकर माता सीताके पास ले आना | ३२४ | ||
| रामके आज्ञानुसार लवको पकड़नेके लिये |
विषयानुक्रमणिका (पृष्ठ १३)
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| लक्ष्मणका जाना, लव और लक्ष्मणमें युद्ध | ३२५ | विवाहकाण्ड<br>प्रथम सर्ग<br>रामकी सभामें महाराज भूरिकीर्तिका स्वयंवर पत्र आना | ३४५ |
| लक्ष्मणका लवको ब्रह्मापाशमें बाँधकर राम- के समक्ष ले जाना, रामके आज्ञानुसार लोगों- का लवपर जलके घड़े उड़ेलना और लवका लड़ना | ३२६ | पत्र पढ़नेके अनन्तर रामका स्वयंवरमें जानेकी तैयारी करना, रामकी स्वयंवरयात्रा | ३४६ |
| लवको छुड़ानेके लिए कुशका जाना | ३२७ | रामका अपने पुत्रोंके साथ स्वयंवरमें पहुँचना | ३४७ |
| राम-लक्ष्मण और कुशका युद्ध | ३२८ | रामका आगमन सुनकर राजा भूरिकीर्तिकी नगरनिवासिनी महिलाओंकी प्रसन्नताका वर्णन | ३४८ |
| अष्टम सर्ग<br>रामका एक मन्त्रीको वाल्मीकिके पास भेजना | ३२९ | द्वितीय सर्ग<br>दूसरे रोज रामका स्वंयबर-सभामें जाना और रामके दूतोंका वहाँ आये हुए राजाओंका परिचय देना | ३४९ |
| रामकी सभामें वाल्मीकिका सीताके साथ लिये हुए आना | ३३० | सभामें चम्पिका नामकी राजकन्याका प्रवेश | ३५० |
| रामके प्रति वाल्मीकिकी उक्ति और सीताको हाथों सहित देखकर रामका सन्देह | ३३१ | चम्पिकाको साथ लिये मुन्यन्दाका सब राजाओंके समक्ष जाना और चम्पिकाको उन राजाओंकी स्थिति समझाना | ३५१ |
| सीताकी शपथ, सीताका पृथ्वीमें प्रवेश करना और पृथ्वीसे रामकी प्रार्थना | ३३२ | चम्पिकाका सब राजाओंके सामनेसे होकर रामके सम्मुख पहुँचना | ३५३ |
| पृथ्वीपर रामका कोप और रामका पृथ्वीसे सीताको वापस पाना | ३३३ | अन्तमें चम्पिकाका कुशके सामने पहुँचना और कुशके गलेमें वरमाला डालना | ३५४ |
| यज्ञमें आये हुए राजाओं और ऋषियोंकी विदाई | ३३४ | तृतीय सर्ग<br>मुनन्दाका सुमति नामकी दूसरी राजकन्याको साथ लेकर पहलेकी तरह सब राजाओंका यश सुनाना | ३५५ |
| नवम सर्ग<br>ऊर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति आदिका गर्भिणी होना और यथासमय पुत्र उत्पन्न करना, पुत्रोंकी उत्पत्तिके अवसरपर रामका उत्साह | ३३५ | सुमतिका सब राजाओंके सामनेसे होकर लवके समक्ष पहुँचना और उनके गलेमें वर- माला डालना, दूसरे दिन भूरिकीर्तिका रामके पास जाकर विदाईके लिए मुहूर्त निश्चित करना | ३५७ |
| रामका कुलगुरु वशिष्ठसे सब बच्चोंके शुभाशुभ लक्षण पूछना और वशिष्ठका सब बालकोंके लक्षण बतलाना | ३३६ | विवाहकार्यका प्रारम्भ | ३५८ |
| पुत्रवती बहिनोंके साथ सीताका सानन्दमय जीवन बिताना | ३३८ | लव-कुशका विवाहसण्डपमें पहुँचना और विवाह सम्पन्न होना | ३५९ |
| गुरु वशिष्ठसे रामका लव-कुशके उपनयनका परामर्श और व्रतबन्धकी तैयारियोंके लिये रामका लक्ष्मणको आदेश | ३३९ | चतुर्थ सर्ग<br>विवाहके अनन्तर होनेवाले लोकाचार | ३६० |
| व्रतबन्ध (उपनयन) संस्कार समारोह | ३४० | भूरिकीर्तिकी नगरीसे राम आदिको विदाई, रामका अयोध्या पहुँचना और अयोध्यावासियों द्वारा उनका स्वागत | ३६१ |
| व्रतबन्धसंस्कार | ३४१ | ||
| लव-कुश आदि बालकोंका वेदाध्ययन, बालकोंका गुरुगृहसे वापस आनेपर अयोध्या नगरीके उत्साहका वर्णन | ३४२ | ||
| जन्मकांडके सुननेका फल और उसकी महिमाका वर्णन | ३४४ |
| १४ | विषयानुक्रमणिका | ||
|---|---|---|---|
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
| विदाहोत्सवमें आये हुए अभ्यागतोंको विदाई, रामदासका विष्णुदासको कुशके विषयमें गुप्त भविष्यकी बातें बतलाना | ३६२ | का विह्वल होना और नारदका सब हाल बतलाना, यूपकेतुका अपने मोहनशस्त्रसे सब राजाओंको मोहित करके मदनसुन्दरीको वरना | ३७५ |
| पञ्चम सर्ग | यूपकेतुका सब राजाओंके साथ युद्ध | ३७६ | |
| सीता तथा भ्राताओंके साथ रामका वनमें अगस्त्यके आश्रमपर जाना | ३६३ | यूपकेतुका खड्ग उठाकर अपने श्वशुर कम्बुकण्ठको मारनेके लिए उद्यत होना और मदनसुन्दरीकी प्रार्थनासे छोड़ देना, अन्तमें शम्भुसे यूपकेतुका साक्षात्कार और वहांसे लौटकर फिर क्रान्तिपुरीको जाना | ३७७ |
| अगस्त्य ऋषि द्वारा रामका सत्कार और वनमें रामको पांच अप्सराओंका मिलना | ३६४ | नवम सर्ग | |
| अगस्त्यसे उन अप्सराओंके विषयमें रामका प्रश्न और उनका उत्तर, रामके बाण मारनेके लिए उद्यत होनेपर जलदेवियोंका प्रकट होना और बारह कन्यायें रामको अर्पित करना | ३६५ | दूतके मुखसे यूपकेतुका सब समाचार ज्ञात होनेपर रामका क्रान्तिपुरीके लिए प्रस्थान, क्रान्तिपुरीमें बाह्यपूर्वक रामका पहुंचना | ३७८ |
| षष्ठ सर्ग | वहीं यूपकेतुका विवाह होना, भगवान्की स्तुति करके नारदका प्रस्थान, विवाहकाण्डका श्रवणफल | ३७९ | |
| बहुतसे गंधर्व और पन्नगोंका आना और रामकी स्तुति करना, अपने तथा लक्ष्मण आदिके पुत्रोंकी कुछ भविष्यकी बातें अगस्त्य ऋषिसे रामको मालूम होना | ३६६ | विवाहकाण्डके अनुष्ठानकी विधि | ३८० |
| गंधर्वोंको अयोध्या आनेकी आज्ञा देकर रामका अपनी पुरीको वापस लौटना | ३६७ | राज्यकाण्ड (पूर्वार्द्ध) | |
| अयोध्यामें पहुंचकर उन कन्याओंको वशिष्ठके यहां रखना, गंधर्वो और नागोंका अयोध्यापुरीमें पहुंचना तथा विवाहके मुहूर्तका निश्चित होना | ३६८ | प्रथम सर्ग | |
| सप्तम सर्ग | रामसहस्रनामके विषयमें विष्णुदासका प्रश्न और रामदासका उत्तर | ३८१ | |
| सब कन्याओंके साथ राम आदिके पुत्रोंके विवाहकी तैयारी | ३६९ | सनत्कुमार और गणेशका वार्तालाप | ३८२ |
| मन्दोदरी नामकी कन्याके संग लवका विवाह, अन्य कन्याओंके सङ्ग अन्य पुत्रोंका विवाह, राम आदिके आनन्दका वर्णन | ३७१ | राम सहस्रनाम | ३८३ |
| अष्टम सर्ग | रामसहस्रनामका माहात्म्य | ३९१ | |
| रामके पास कम्बुकण्ठ नामक राजाका पत्र आना, कम्बुकण्ठकी कन्या मदनसुन्दरीके पास नारदजीका पहुंचना | ३७३ | द्वितीय सर्ग | |
| मदनसुन्दरीका नारदजीसे रामचन्द्रजीको पति बनानेका उपाय पूछना और नारदका उसे उपाय बताना | ३७३ | कल्पवृक्षके विषयमें रामदास-विष्णुदासका प्रश्नोत्तर | ३९२ |
| नारदका अयोध्या पहुंचना और उनके मुखसे सब हाल सुनकर यूपकेतुका क्रान्तिपुरीको चल देना | ३७४ | रामके पास साठ हजार शिष्योंके साथ दुर्वासाका आगमन और सबके लिए भोजन तथा पूजनके लिए ऐसे फूल माँगना, जिन्हें संसारमें किसीने न देखा हो | ३९३ |
| यूपकेतुको न देखकर परिवार समेत राम- | रामका पत्रके साथ एक बाण इन्द्रके पास भेजना और इन्द्रका कल्पवृक्ष तथा पारिजात स्वयं लाकर अयोध्यामें रामको देना | ३९४ | |
| सीताका कल्पवृक्षकी स्तुति करके उसके द्वारा प्राप्त सामग्रीसे शिष्यों समेत दुर्वासाको भोजन कराना | ३९५ | ||
| भोजनके बाद प्रसन्न दुर्वासाका रामसे स्तुति करके प्रस्थान | ३९६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| तृतीय सर्ग | |
| रामोपासक तथा कृष्णोपासक दो विप्रोंमें परस्पर मधुर विवाद | ४०७ |
| दोनों ब्राह्मणोंका विवाद निपटानेके लिए आकाशवाणीका होना | ४०६ |
| चतुर्थ सर्ग | |
| एक कौए को रामका वरदान | ४०७ |
| रामपर आसक्त सौ नागरिक स्त्रियोंका आगमन | ४०८ |
| उन स्त्रियोंकी अनुचित प्रार्थनापर रामका उत्तर और वरदान | ४०९ |
| रामका दास-दासियोंको बुलाना, किन्तु वहाँ किसीका उपस्थित न रहना, लक्ष्मणका अपने दूत भेजकर उन्हें बुलवाना और दास-दासियोंका हरिकीर्तन छोड़कर आनेसे इन्कार करना | ४१० |
| मध्य रात्रिमें एक स्त्री (निद्रा) का रुदन सुनकर पुष्पक द्वारा रामका उसके पास जाना और उसे वरदान देना | ४११ |
| कुम्भकर्णके पोत्र पौण्ड्रककी लंकापर चढ़ाई करके विभीषणको परास्त करना और विभीषणका रामके पास आकर अपना दुःख सुनाना | ४१२ |
| रामका लंका जाकर पौण्ड्रकको परास्त करके विभीषणको राजगद्दीपर बिठाना कुछ काल बाद मूलकासुरसे परास्त होकर विभीषणका रामकी शरणमें जाना | ४१३ |
| सामन्त राजाओंके साथ रामकी मूलकासुर-पर चढ़ाई और भीषण युद्ध होना | ४१४ |
| ब्रह्माजीके द्वारा मूलकासुरके मरणकी गुप्त युक्तिका ज्ञात होना और रामका सीताको लानेके लिए गरुड़को भेजना | ४१५ |
| पञ्चम सर्ग | |
| रामके विरहसे सीताकी व्यथाका वर्णन | ४१६ |
| रामसे मिलनेके लिए सीताका विविध मन्नतियाँ मानना | ४१७ |
| सीताका गरुड़पर आरूढ़ होकर प्रस्थान, राम-सीताका मिलाप और मूलकासुरका वध करनेके लिए रथपर सवार होकर सीताका रण-भूमिको प्रयाण | ४२० |
| षष्ठ सर्ग | |
| सीता-मूलकासुरका सामना और वार्तालाप | ४२० |
| सीताके हाथों मूलकासुरका वध | ४२१ |
| ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा सीताकी स्तुति | ४२२ |
| रामके हाथों विभीषणका राज्याभिषेक | ४२३ |
| विभीषणके द्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर रामका त्रिकूटाका सत्कार करना | ४२४ |
| रामका अयोध्या लौटना | ४२५ |
| लवणासुरसे त्रस्त मुनियोंका रामके पास जाना और च्यवन मुनिका लवणासुरके पूर्वजन्मका वृत्तान्त | ४२५ |
| रामकी आज्ञासे शत्रुघ्नका लवणासुरको मारने-के लिये मधुवन जाना | ४२६ |
| सप्तम सर्ग | |
| शत्रुघ्न द्वारा लवणासुरका वध | ४२८ |
| अपनी सेनाके साथ रामका दिग्विजयके लिए प्रस्थान | ४२९ |
| पुष्करदा अगद लोन राजाओंके साथ रामका तुमुल युद्ध | ४३० |
| उन्हें जीतकर रामका मथुरा जाना और वहाँसे यदनादि विविध देशोंकी यात्रा | ४३१ |
| अष्टम सर्ग | |
| रामकी किम्पुरुष आदि देशोंकी विजययात्रा, भारतवर्षके विविध द्वीपों, द्वैपाय्य नदियों और पर्वतोंका वर्णन | ४३१ |
| नवम सर्ग | |
| रामकी प्लक्षादि द्वीपोंकी विजययात्रा | ४३५ |
| विविध द्वीपोंपर विजय प्राप्त करते हुए रामका दूतोदसागर पहुँचना | ४३७ |
| रामकी शाकद्वीप यात्रा | ४३८ |
| रामका पुष्करद्वीप पहुँचना | ४३९ |
| लोकालोक पर्वत तक जाकर रामका अयोध्या लौटना | ४४० |
| जीते हुए द्वीपोंपर राम द्वारा अपने भाइयों और पुत्रोंकी नियुक्ति | ४४१ |
| दशम सर्ग | |
| रामका लक्ष्मणसे एक कुत्तेके रोनेका कारण पूछना | ४४१ |
| पूछनेपर कुत्तेका व्यर्थ मारनेवाले एक संन्यासी-को अपराधी बताना | ४४२ |
| रामका संन्यासीको बुलवाना और दोष प्रमाणित हो जानेपर कुत्तेके ही अपराधीको |
१६ विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| दण्ड देनेके लिए कहना और कुत्तेका संन्यासीको कहींका मठाधीश बनानेका दण्ड देना | ४४१ | उनका कारुणिक भारीपीत सुनकर रामका प्रकट होना और वरदान देना | ४६० |
| इस दण्डपर चकित लोगोंका कुत्तेसे कारण पूछना और उसका बतलाना, एक दिन एक विप्रका अपने मरे हुए बच्चेको लेकर रामके समक्ष आना और रोना | ४४४ | उन सबको साथ लेकर विप्रका लक्ष्मण आदिके पास आना और वहाँसे एक सरोवरपर पहुँचना | ४६१ |
| रामका उसे आश्वासन देना और बच्चेके शवको तैलकी द्रोणमें रखवाना | ४४५ | ऋषिके समक्ष रामका वाराहमृगवध करना | ४६१ |
| उसी समय शृङ्गवेरपुरसे एक और शवका आना | ४४६ | वहाँसे रामका मथुरा जाना, वहाँ एकान्तमें रामके पास रात्रिमें नारीरूप धारण करके यमुनाका आगमन | ४६३ |
| उसकी विधवाको सांत्वसन देकर रामका पुष्पक विमानपर चढ़कर बाहर निकलना, उनके चले जानपर और पांच शवांका अयोध्या आना | ४४७ | कालिन्दी (यमुना) को राम वरदान | ४६४ |
| रामका दण्डकवनमें एक शूद्रको उग्र तप करते देखना, उससे बात करना और वधदान देना | ४४८ | ### राज्यकाण्ड (उत्तरार्द्ध)<br>त्रयोदश सर्ग<br>सभामें बैठे हुए रामका एक मनुष्यको हँसो सुनकर घबराना | ४६५ |
| रामके समक्ष एक गृध्र और उलूकका अभियोग तथा रामका न्याय | ४४९ | रामका अपने राज्यमें हँसनेकी मनाही करना | ४६६ |
| रामका पूर्वोक्त सातों मृतकोंको जीवित करना | ४५० | रामके इस आदेशसे मनुष्यों तथा देवताओंमें आतंक छा जाना और विरोध-प्रदर्शनार्थ ब्रह्माका अयोध्याके एक पीपल वृक्षमें प्रविष्ट होकर जोरोंसे हँसना | ४६७ |
| ### एकादश सर्ग<br>मृगयाके लिए रामकी यात्रा और | ४५० | एक दिन सभामें किसी दूतको हँसते देखकर रामका हँसना और बादमें पछतात हुए अपनी हँसीपर विचार करना | ४६८ |
| ऋतुवर्णन | ४५१ | कारण ज्ञात होनेपर अनुचरोंको हँसनेवाला पीपल काट डालनेकी आज्ञा देना, उसे काटनेको गये हुए देवोंका ब्रह्माकी आज्ञावशसे व्याहृत होकर चीत्कार करना | ४६८ |
| रामका एक मृगका पीछा करते हुए अपने साथियोंसे बिछुड़कर वनमें दूर निकल जाना वहाँ सिंहको मारना और मृत मृगका अपनी आहरणपर सुलाना | ४५३ | बादमें रामकी आज्ञासे सुग्रीवका जाना, वहाँ पत्थरोंको मारते उनका भी मूर्छित होना और रामका वसिष्ठजी बुलाकर कारण पूछना | ४६९ |
| रामका एक कान्तारमें घुसना, वहाँ चार स्त्रियोंका मृतप्राय दशामें देखना और उन्हें जीवित करना | ४५२ | वसिष्ठका कारण बतलाना, ब्रह्माकी धृष्टता सुनकर रामका कुपित होना और क्रुद्ध रामको वहाँपर वाल्मीकिका समझाना | ४७० |
| रामका उन स्त्रियोंसे वार्तालाप, उनका रामपर मोहित होना और उनको रामका वर देना | ४५३ | आनन्दरामायणकी महिमा | ४७१ |
| ### द्वादश सर्ग<br>उन चारोंके साथ आगे चलकर एक स्थानपर रामका सोलह हजार स्त्रियोंको देखना | ४५५ | वाल्मीकिका ब्रह्माको बुलवाना | ४७२ |
| उन सब स्त्रियोंका रामपर मोहित होना | ४५६ | ब्रह्माका रामकी स्तुति करना और वसिष्ठका मेरे त्रिगुणोंके विषयमें प्रश्न | ४७३ |
| उन सबका वरण करनेके लिए रामको विवश करना और रामका असमर्थान होना | ### चतुर्दश सर्ग<br>वसिष्ठके प्रश्नका ब्रह्मा द्वारा उत्तर, वश्विनो- | ||
| रामके वियोगमें उन स्त्रियोंकी करुणावस्थाका वर्णन | ४५८ | कुमारोंका विष्णुके गण जय-विजयको शाप देना और |
| ३ | विषयानुक्रमणिका | १७ |
|---|
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| उद्धारके समयका निर्देश | ४७४ | कंकण देना उस कंकणकी प्राप्तिके विषयमें अगस्त्यसे लवका प्रश्न और उन मुनिका उत्तर | ५०० |
| जय-विजयके अगले जन्मकी कथा, ब्रह्मा- की स्तुतिसे रामका प्रसन्न होना, महर्षि वाल्मीकिका रामसे कुछ प्रश्न | ४७५ | एक स्वर्गीय प्राणीको मरे हुए मुर्देका मांस खाते देखकर अगस्त्यका विस्मित होना, उससे कारण पूछना और उसका बतलाना | ५०० |
| वाल्मीकिका अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना, तस्करवृत्तिपरायण वाल्मीकिका एक विप्रका दण्ड-कमण्डल तथा जूते आदि छीनना बादमें तपती रेतपर चलते हुए ब्राह्मणको दुखी देखकर दयावश जूते लौटा देना | ४७६ | दण्डकारण्यके विषयमें महर्षि अगस्त्यसे लवका प्रश्न और ऋषिका उत्तर | ५०१ |
| वाल्मीकिका शङ्ख विप्रसे अपने पूर्वजन्मका हाल पूछना | ४७७ | दण्डकारण्यकी कथा, राजा दण्डकका भृगुकी कन्याके साथ बलात्कार और राजाको भृगुका शाप | ५०२ |
| शङ्खका वाल्मीकिके पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना, प्रेतपालक वाल्मीकिकी स्त्रीकी सेवा और आश्वासन | ४७८ | अष्टादश सर्ग<br>रामभद्रकी रचनाविधि | ५०३ |
| वाल्मीकिका देहान्त और उनकी स्त्रीका सती होना | ४७९ | विश्वम्भरनामक रामनाथपुरके ब्राह्मणोंको राममुद्रा युक्त शिला दिखनेका कारण पूछना और रामदासका उत्तर | ५०४ |
| उनके अगले जन्ममें कृश नामके ऋषि- का यहां एक क्षत्रिणीका आना और उपन वाल्मीकिका जन्म किरातों द्वारा पालित होनेके कारण वाल्मीकिका व्याधवृत्ति स्वीकार करना | ४८० | बहुत समय बाद एक दुष्ट राजा द्वारा सताये जानेपर उन ब्राह्मणों द्वारा वह शिला एक सरोवरमें फेंकना | ५०७ |
| वाल्मीकिको सप्तर्षियोंका उपदेश | ४८१ | उस सरोवरको बाढ़से हनुमान्जीका उन ब्राह्मणोंकी रक्षा करना और राममुद्रांकित शिलाको सरोवरसे निकालना | ५०८ |
| उनके उपदेशसे वाल्मीकिका 'मरा-मरा' यह मन्त्र जपते हुए कठोर तप करना और बहुत वर्षों बाद सप्तर्षियोंका फिर वहाँ आना और उन्हें बाँबीसे बाहर निकालना, वाल्मीकिके मुखसे श्लोकका जन्म | ४८२ | वह शिला दिखाकर हनुमान्जीका उस दुष्ट राज को शूलीपर चढ़ाना और ब्राह्मणोंको आश्वासन देना | ५०९ |
| अकारादि क्रमसे रामनामकी महिमा | ४८३ | एकोनविंश सर्ग<br>रामकी दिनचर्या | ५१० |
| पञ्चदश सर्ग<br>रामराज्यकी विशेषतायें | ४८५ | वैद्य और ज्योतिषीसे रामका वार्तालाप | ५११ |
| षोडश सर्ग<br>रामका लव-कुश आदि पुत्रों तथा भरत-लक्ष्मण आदि भ्राताओंको राजनीतिक उपदेश | ४९० | रामकी सभा और उसकी शोभा | ५१२ |
| सप्तदश सर्ग<br>कुशकी पुत्री हेमाका स्वयंवर | ४९६ | कुशकी उत्पत्तिके बाद सीताके वनमें न रहनेका कारण | ५१६ |
| चित्रांगद द्वारा हेमाका अपहरण और उसके साथ लव कुश आदिका भीषण युद्ध | ४९७ | बीसवाँ सर्ग<br>लवका वसिष्ठसे रात्रिमें सोते समय कानमें बाँसुरीके समान होनेवाले शब्दका कारण पूछना और वसिष्ठका उत्तर देना | ५१८ |
| उस युद्धमें कुशका विजयी होना और प्रसन्न होकर रामका उन्हें एक कंकण देना उस कंकण की प्राप्तिके विषयमें कुशका महर्षि अगस्त्यसे प्रश्न और उनका उत्तर | ४९८ | रामका रामावतारको श्रेष्ठ बतलाना | ५१९ |
| हनुमान्जीका मुद्गल ऋषिके आश्रमसे संजीवनी बूटी लाकर लवकी मूर्छा दूर करना | ४९९ | मत्स्य, कूर्म, वाराह नृसिंह, वामन, परशुराम, कृष्ण, बौद्ध तथा कल्कि अवतारके दोषोंका वर्णन | ५२० |
| लवको भी रामका एक अगस्त्यप्रदत्त | राम के रामावतारके गुणोंका वर्णन | ५२२ | |
| इक्कीसवाँ सर्ग<br>संतोषानके समय सीताका दर्शन करनेके लिए बहुतेरी स्त्रियोंका आना | ५२५ | ||
| रामका पूर्वकालके कार्योंका सिंहावलोकन | ५२६ |
१८ | विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| लवका गुरु वसिष्ठसे पोथियोंके प्रत्येक पन्नेमें एक ओर था तथा दूसरी ओर राम लिखनेका कारण पूछना और उनका बताना | ५२७ | सूर्यका यमको ले जाकर रामसे क्षमा मँगवाना | ५४६ |
| रामका एक दासको वरदान देना, रामका एक ही समय दो रूप धारण करके विश्वामित्र और वाल्मीकिके यहां जाना | ५२८ | रामका अपने राज्यभरमें धार्मिक आदेश | ५४७ |
| राज्यकाण्डके पारायणका माहात्म्य | ५५१ | ||
| बाईसवाँ सर्ग | मनोहरकाण्ड | ||
| राजा मूरिखेलीके यहाँसे बहुतेरा भोगका आना और बिना रामको अर्पण किये सीताका उसमेंसे एक फूल सूंघ लेना | ५३१ | प्रथम सर्ग | |
| एकादशीके रोज़ सीताके साड़ीसे फँस-कर एक तुलसीका पत्र टूटना और उसी समय नारदका आ पहुंचना | ५३२ | रामदाससे विष्णुदासका नारदकथित रामायण (रघुरामायण) का सार पूछना | ५५३ |
| भोजन परोसनेपर नारदका सीताके संस्पृष्ट भोजन करनेसे इन्कार करना और रामके पूछने पर कारण बताना | ५३३ | द्वितीय सर्ग | |
| सीताका टूटा तुलसीपत्र टहनीमें जोड़नेके प्रयासमें विफल होना | ५३४ | अयोध्यावासियोंका रामसे कुछ उपदेश देनेके लिए प्रार्थना करना | ५६० |
| नारदकी बतायी युक्तिसे फिर सीताका प्रयास करना और तुलसीपत्रका जुड़ जाना | ५३५ | रात्रिके समय दूतोंका प्रजामनोंको उपदेश | ५६१ |
| नारदकृत रामस्तुति | ५३६ | प्रातःकाल पुनः पुरवासियोंका रामसे वार्तालाप | ५६२ |
| तेईसवाँ सर्ग | एक दिन स्त्रियोंका रामसे उपदेश देनेकी प्रार्थना करना और रामका स्त्रियोंको श्रेष्ठोंसे उपदेश दिलवाना | ५६४ | |
| आनन्दरामायणका पाठ करनेसे एक साधारण सिपाहीका राजमन्त्री हो जाना | ५३८ | श्रेष्ठोंसे प्राप्त ज्ञानके विषयमें रामका कैकेयीसे प्रश्न | ५६१ |
| उसका अभ्युदय देखकर सब सिपाहियोंका आनन्दरामायणके आराधनामें लग जाना, सिपाहियोंके अनाहसे घबड़ाकर सब राजाओंका रामके पास जाना | ५३९ | सुमित्राको रामका ज्ञानापदेश | ५६६ |
| आनन्दरामायणके श्रवणसे यमपुरका सूना होना और यमराजका ब्रह्मा-शिव आदि देवताओंके साथ अयोध्या आना | ५४० | माता कौसल्याको रामका शोक नकरने और आत्मज्ञानका उपदेश दिलाना | ५६८ |
| उनकी दुर्दशाको सुनकर रामका आनन्द-रामायणपर प्रतिबन्ध लगाना | ५४१ | कालान्तरमें कौसल्या-सुमित्रा आदिका देहत्याग | ५६९ |
| चौबीसवाँ सर्ग | तृतीय सर्ग | ||
| रामका मृत सुमन्त्रको यमदूतोंसे छीनकर वापस लाना | ५४३ | विष्णुदासका रामदाससे रामकी मानसी पूजा-विधि पूछना | ५७० |
| सुमन्त्रकी जन्मकालीन गाथा | ५४४ | रामदासका उत्तर और गुरुके लक्षण बतलाना | ५७१ |
| कुपित यमराजकी अयोध्यापर चढ़ाई | ५४४ | विभिन्नसंख्य अक्षरोंवाले राममन्त्र | ५७२ |
| लव और यमराजमें भयानक युद्ध, लवके ब्रह्मास्त्रकी मारसे यमराजकी घबराहट और सूर्य भगवान्का आकर लवको समझाना | ५४५ | मानसी पूजाका विधि-विधान | ५७३ |
| नमस्काराष्टकमन्त्र | ५७५ | ||
| बहिःपूजाविधान | ५७७ | ||
| मञ्चपुष्पांजलिके विषयमें विष्णुदास-रामदासका प्रश्नोत्तर और चन्द्र-महिचन्द्र आदि नौ भक्तोंकी कथा | ५८३ | ||
| उन नवों भक्तोंका कठोर तप करना और उन्हें रामका प्रत्यक्ष दर्शन मिलना | ५८३ | ||
| उन नवों भक्तोंको रामका वरदान | ५८४ | ||
| चतुर्थ सर्ग | |||
| अहोबिलके रामशिलातीर्थादिके विषयमें विष्णुदासका रामदाससे प्रश्न और उसका उत्तर | ५८५ | ||
| रामदासका विष्णुदासको आध्यात्मिक उपदेश | ५८९ |
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राममुद्राको पूर्ण करनेकी विधियाँ | ६११ | किस कामनाकी पूर्तिके लिए किस देवताकी आराधना करनी चाहिए | ६७० |
| महोत्तरशत रामलिङ्गतोभद्रके भेद | ६०२ | रामके रकारादि नामोंका महत्त्व | ६७१ |
| पञ्चम सर्ग | रामतारक मन्त्रका माहात्म्य | ६७२ | |
| रामलिङ्गतोभद्र आदि विविध मन्त्रोंकी रचनाविधि | ६०४ | दशम सर्ग | |
| षष्ठ सर्ग | चैत्रमासकी महिमा | ६७३ | |
| रामतोभद्रमें तत्तद्देवताओंकी स्थापनविधि | ६२७ | चैत्रस्नान करनेवालोंके लिए कुछ विशेष नियम | ६७४ |
| श्रीरामकी प्रिय वस्तुओंका विवरण | ६३० | स्त्रियोंके लिए शीतला गौरीस्नान तथा पूजन विधि | ६७९ |
| प्रतिदिन रामकी पूजाविधि | ६३२ | रामनवमीको रामचन्द्रके पूजनका विधान चैत्रमें आनन्दरामायणके पारायणका विधान | ६८० |
| रामनवमीका व्रत करनेवाले एक विप्रकी कथा | ६३७ | अन्य विधि-विधान | ६८१ |
| एक रात्रिमें राजसेवकोंका आकर उस विप्रको सताना | ६४० | एकादश सर्ग | |
| हनुमान्जीके गर्जनसे राज्यके सब पुरुषोंका मरण, तभीसे उस राज्यमें स्त्रीराज्य होना | ६४१ | चैत्रमासके महत्त्वका कारण | ६८३ |
| उस राज्यमें पुरुष उत्पन्न न होनेका कारण | ६४२ | रामका देवताओंको वरदान | ६८४ |
| रामनवमी व्रतकी फलश्रुति | ६४४ | चैत्रस्नान करनेवाले नृसिंह ब्राह्मणकी कथा | ६८५ |
| सप्तम सर्ग | शम्भु ब्राह्मणकी कथा | ६८८ | |
| रामशतनाम आदि लिखनेकी रीति और वस्त्रपत्रविधि | ६४४ | शम्भु विप्रका एक बहेलियेको उपदेश | ६८९ |
| रामनामकी महिमा | ६४५ | शम्भु द्वारा वहाँ आये हुए एक राक्षसका उद्धार | ६९१ |
| राजा युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे रामनामजप तथा पुरश्चरणविधि पूछना और श्रीकृष्णका बतलाना | ६४७ | शम्भु विप्र तथा व्याधकी अयोध्यायात्रा | ६९२ |
| आनन्दरामायणके पाठ और दानका माहात्म्य | ६४९ | शम्भुके मार्गमें एक सिंह तथा हाथीका सामने आना, उस सिंह तथा हाथीके पूर्वजन्मकी कथा | ६९३ |
| रामनामजपकी महिमा | ६५० | शम्भुका उन दोनोंके उद्धारका आश्वासन | ६९४ |
| कविताओंका स्वरूप और कवियोंकी श्रेणी | ६५२ | आगे बढ़नेपर शंभुकी एक कार्पटिक (अध्वारूढो) से भेंट और वार्तालाप | ६९५ |
| अष्टम सर्ग | शंभु द्वारा अयोध्याकी शोभाका वर्णन | ६९७ | |
| वेदादिके पाठका माहात्म्य | ६५३ | कार्पटिकके साथ शंभु विप्रका अयोध्यासे लौटकर उस पूर्व शापग्रस्त राक्षसका उद्धार करना | ७०१ |
| दानपात्रके विषयमें रामदास-विष्णुदासका प्रश्नोत्तर | ६५४ | द्वादश सर्ग | |
| शास्त्रोंके अध्ययनकी महिमा | ६५५ | मृगयाके प्रसंगमें रामकी एक शबरीसे भेंट | ७०२ |
| विविध रामायणोंकी चर्चा | ६५६ | रामका दुर्गामन्दिरमें जाकर बहुतसी स्त्रियोंकी पूजा स्वीकार करना और वरदान देना | ७०५ |
| रामायणके पाठ और रामसम्बन्धी कविता करनेका फल | ६५८ | रामनामकी महिमा | ७०६ |
| आयुर्वेदादिकोंके अध्ययनका फल | ६५९ | रामका मुनियोंको उपदेश | ७०७ |
| दानियोंको दानपात्रका विचार करना ही चाहिए और ब्राह्मणका धन हड़पनेका कुफल | ६६० | त्रयोदश सर्ग | |
| विष्णुदास-रामदासमें रामकी विशेष पूजाके विषयमें प्रश्नोत्तर, रामकी पूजाके मास तथा तिथियोंका निर्देश | ६६१ | हनुमत्कवच और उसका माहात्म्य | ७०८ |
| दोलापूजनकी विधि | ६६३ | रामकवच | ७१४ |
| बत्तीस पक्वान्नोंकी धारणा और पीनेका माहात्म्य | ६६७ | चतुर्दश सर्ग | |
| सीताकवचके विषयमें विष्णुदासका प्रश्न और सीताकवच | ७१७ | ||
| सीताहृदयसहस्रनामस्तोत्र | ७२० |
२० विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| दिक्पोके लिए कुछ उपयोगी फल | ७२१ | ब्रह्माका सोमवंशी राजाओंको साथ लेकर रामके पास जाना और क्षमा मँगवाना | ७७१ |
| रामनामस्तोत्रकी स्वरूपविधि | ७२३ | रामका ब्रह्माको वाल्मीकिके पास भेजना और वाल्मीकिके परामर्शसे सोमवंशी राजाओंकी स्त्रियोंका सीताके पास जाना | ७७२ |
| पंचदश सर्ग | सीताके अनुरोधपर युद्धविराम, ब्रह्माका रामसे वैकुण्ठधाम पधारनेकी प्रार्थना करना और रामकी स्वीकृति | ७७३ | |
| लक्ष्मणकवच | ७२५ | पञ्चम सर्ग | |
| भरतकवच | ७२७ | रामको परम धाम जानेके लिये उद्यत देखकर हरण, सुग्रीव, विभीषण आदिका अपने साथ ले चलनेके लिये आग्रह करना | ७७४ |
| शत्रुघ्नकवच | ७२९ | यज्ञमें आए हुए राजाओं, मित्रो तथा पुत्रोकी विदाई और उनकी स्थान स्थानपर नियुक्ति | ७७५ |
| मनन एवं कीर्तन करने योग्य राममन्त्र | ७३१ | रामके आज्ञानुसार कुशका अयोध्या आना | ७७६ |
| षोडश सर्ग | रामका लक्ष्मणको वरदान | ७७७ | |
| रामायणश्रवणके बादके कर्त्तव्य | ७३८ | षष्ठ सर्ग | |
| गरुड़की शंका और रामके द्वारा समाधान | ७३९ | दूसरे दिन सवेरे रामका नजलोकोंको बुलाकर अपने परम धाम आनेकी बात बतलाना | ७७८ |
| वानरोंकी उत्पत्तिका इतिहास और वानरोंको वरदान | ७४० | रामके आगमनकी बात जानकर स्वर्गके देवताओंमें उत्साहका सञ्चार | ७७९ |
| हनुमन्तसाकारोपासनविधि | ७४१ | सौमित्रिका रामके समक्ष स्तुति करना | ७८० |
| सप्तम सर्ग | गरुड़पर बैठकर रामका वैकुण्ठधाममें जाना और रामके साथ गये सभी अयोध्यावासियोंको सान्तानिक लोक प्राप्त होना | ७८१ | |
| श्रीरामचन्द्रीयादि साररामायण | ७४३ | सप्तम सर्ग | |
| अष्टादश सर्ग | कुशके बादवाले सूर्यवंशी राजाओंकी वंशावली | ७८२ | |
| अर्जुनके कपिध्वज नाम पड़नेका कारण | ७५१ | अन्य रामायणों तथा आनन्दरामायणमें भेदका कारण | ७८३ |
| पूर्णकाण्ड<br>प्रथम सर्ग | अष्टम सर्ग | ||
| रामकी सभामें हस्तिनापुरसे दूतका आना | ७५७ | विष्णुदासका रामदाससे आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका पूछना और रामदासका अनुक्रमणिकासूत्र कहना | ७८४ |
| वाल्मीकिका रामको चन्द्रवंशी राजाओंका इतिहास सुनाना | ७६० | नवम सर्ग | |
| द्वितीय सर्ग | आनन्दरामायण सुननेका फल | ७८८ | |
| रामका सामन्त राजाओंको बुलवाना | ७६१ | अनुष्ठानविधि | ७८९ |
| रामका भरतको मण्डोपाधिके पदपर अभिषेक करनेका सङ्कल्प करना, किन्तु भरतका यह पद स्वीकार न करना जिससे उस पदपर कुशका अभिषेक | ७६२ | पारायणविधि | ७९० |
| हस्तिनापुरीपर चढ़ाईके लिये परामर्श, रामका शरयू और अयोध्याको वरदान | ७६४ | आनन्दरामायणका संक्षिप्त माहात्म्य | ७९२ |
| रामका हस्तिनापुरको प्रस्थान | ७६५ | पार्वतीजी और शिवजीका रामदास-विष्णुदासके विषयमें प्रश्नोत्तर | ७९३ |
| तृतीय सर्ग | |||
| रामका हस्तिनापुर पहुँचना | ७६६ | ||
| राम और सोमवंशी राजाओंका युद्ध | ७६७ | ||
| उस भीषण युद्धको देखकर देवताओंमें घबराहट और शान्तिका उपाय सोचना | ७६८ | ||
| चतुर्थ सर्ग | |||
| कुशका ब्रह्मास्त्र संधान करना और ब्रह्माका आकर रोकना | ७७० |
इति आनन्दरामायणविषयानुक्रमणिका समाप्त
श्रीसीतापतये नमः
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
सारकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
(दशरथ-कौसल्याविवाह तथा ऋष्यशृङ्ग द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ)
श्रीवाल्मीकिरुवाच
वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वाय्वादिकोणेषु च ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥ १ ॥
आदौ रावणमर्दनं द्विजगिरा तीर्थाटनं सीतया साकेते दशवाजिमेधकरणं पत्न्या विलासाटनम् ।
स्त्रीपुत्रग्रहण स्नुषार्थमटनं पृथ्व्याश्च संरक्षणं रामार्चादिनिरूपणं दयितया स्वीय स्थलारोहणम् ॥ २ ॥
एकदा पार्वती देवी शंकरं प्राह हर्षिता । कैलासवासिनं नत्वा रामभक्त्यैकवत्सला ॥ ३ ॥
पार्वत्युवाच
शंभो त्वया पुराणानि कथितानि ममांतिके । रघुनाथस्य चरितं जन्मकर्मसमन्वितम् ॥ ४ ॥
कथयस्वाधुना देव मम प्रीतिविवर्द्धनम् । आनन्ददायकं कर्म रघुवीरेण यत्कृतम् ॥ ५ ॥
श्रीवाल्मीकि मुनि कहते हैं कि जिनके बायें भागमें सीताजी, सामने हनुमान, पीछे लक्ष्मण, दोनों बगल शत्रुघ्न और भरत वायव्य ईशान अग्नि तथा नैऋत्यकोणमें क्रमशः सुग्रीव, विभीषण, तारापुत्र युवराज अङ्गद और जाम्बवान् हैं उनके बीच विराजमान श्याम कमलसदृश मनोहर कान्तिवाले परमपुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ १ ॥ इस ग्रन्थके सारकांडम ऋषिवाक्यसे दुष्ट रावणका हनन, दूसरे यात्राकांडमें सीताके साथ रामकी तीर्थयात्रा, तीसरे यागकांडमे अयोध्यामें दस अश्वमेध यज्ञ, चौथे विलासकांडमे पत्नीके साथ विलास, पाँचवें जन्मकांडमें लव-कुशकी उत्पत्ति तथा सीताकी पुनः स्वीकृति, छठें विवाहकांडमें लवकुशके विवाहके लिए प्रस्थान, सातवें राज्यकांडमें धर्मपूर्वक पृथ्वीका रक्षण, आठवें मनोहरकांडमें रामकी पूजा आदिका वर्णन और नवें पूर्णकांडमें सीतासहित भगवान् रामचन्द्रके स्वधाम पधारने आदिका सुन्दर चरित्र वर्णित है ॥ २ ॥ एक समय रामचन्द्रजीकी भक्तिमें तत्पर देवी पार्वतींने कहा हे शम्भो ! आपने बहुतसे पुराणोंकी सुन्दर कथा मुझे सुनायी । हे देव ! अब आप कृपा करके मेरी प्रीति बढ़ानेवाले रघुवीर रामचन्द्रके आनन्ददायक कर्म और उनके जन्म आदिकी मनोहर
२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १
सम्यक् पृष्टं त्वया कान्ते रामचन्द्रकथानकम् । कथयामि सविस्तारं महामंगलकारकम् ॥ ६ ॥ आदिनारायणाद्ब्रह्माऽभून्मरीचिर्विधेः सुतः । मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तत्सूनुः सूर्य उच्यते ॥ ७ ॥ सूर्यपुत्रः श्राद्धदेवो मनुर्वैवस्वतस्त्विति । स एव प्रोच्यते तस्येक्ष्वाकुः पुत्रः प्रतापवान् ॥ ८ ॥ इक्ष्वाकोस्तु विकुक्षिर्हि शशादश्च स एव हि । विकुक्षेस्तु ककुत्स्यश्च स एवात्र पुरञ्जयः ॥ ९ ॥ स एवोक्तश्चेन्द्रवाहः ककुत्स्यनृपतेः सुतः । अनेनास्तस्य पुत्रोऽभूद्विश्वरन्धिश्च तत्सुतः ॥ १० ॥ चन्द्रश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद्युवनाश्वः प्रतापवान् । शावन्तो युवनाश्वस्य शावन्तस्य सुतो महान् ॥ ११ ॥ बृहदश्व इति ख्यातस्तस्माज्जज्ञे नृपोत्तमः । कुवलाश्वो नृपतिर्दृढाश्वस्तत्सूनुतः स्मृतः ॥ १२ ॥ हर्यश्व इति तत्पुत्रो निकुम्भस्तत्सुतः स्मृतः । बर्हणाश्वो निकुम्भस्य बर्हणाश्वनृपोत्तमात् ॥ १३ ॥ कृताश्वो नृपतिः प्रोक्तः श्येनजित्तन्सुतः स्मृतः । युवनाश्वः श्येनजितो युवनाश्वनृपोत्तमात् ॥ १४ ॥ मान्धाता त्रसदस्युर्हि स एव कथितो भुवि । पुरुकुत्सश्च मान्धातुः पुरुकुत्सस्य वै पुत्रः ॥ १५ ॥ त्रसदस्युरिति ख्यातोऽनरण्यश्चापि तत्सुतः । अनरण्यस्य हर्यश्वो हर्यश्वस्यारुणः सुतः ॥ १६ ॥ त्रिबन्धनोऽरुणाज्जातस्त्रिबन्धनसुतो महान् । सत्यव्रतः स एवात्र त्रिशङ्कुरिति वै स्मृतः ॥ १७ ॥ सत्यव्रतस्य पुत्रोऽभूद्धरिश्चन्द्रः प्रतापवान् । रोहितस्तन्सुतः प्रोक्तस्तस्माच्च हरितः स्मृतः ॥ १८ ॥ हरितस्य सुतश्चम्पः सुदेवश्चम्पदङ्गजः । सुदेवाद्द्विजयः प्रोक्तस्तत्पुत्रो भरुक स्मृतः ॥ १९ ॥ भरुकस्य वृकः पुत्रो वृकपुत्रस्तु बाहुकः । बाहुकान्तत्सगो जज्ञेऽसमञ्जः सगरान्मजः ॥ २० ॥ असमञ्जसश्च पुत्रोऽभूदंशुमानिति नामतः । तस्य पुत्रो दिलीवस्तु दिलीपाच्च भगीरथः ॥ २१ ॥ भगीरथाच्छ्रुतो जातः श्रुतान्नाभः प्रकीर्त्यते । नाभस्य सिन्धुद्वीपश्व ह्ययुतायुश्च तत्सुतः ॥ २२ ॥ ऋतुपर्णस्त्वयुतायोः सुदासस्तस्य कीर्त्यते । मित्रसहः स एवात्र कल्माषांघ्रिः स एव हि ॥ २३ ॥ उदासमस्याश्मकः पुत्रो मूलकोऽश्मकदेहजः । स एव नारीकवचो मूलकस्य सुतो महान् ॥ २४ ॥ नाम्ना दशरथः प्रोक्तस्तस्य पुत्रः प्रतापवान् । नाम्ना त्वैडविडः प्रोक्तस्तस्य विश्वसहः स्मृतः ॥ २५ ॥ तस्य पुत्रश्च खट्वाङ्गः खट्वाङ्गाद्दीर्घबाहुकः । दिलीपश्व स एवात्र तस्य पुत्रो रघुः स्मृतः ॥ २६ ॥
कथा सुनाइये ॥ ३-५ ॥ शिवजी बोले-हे कान्ते ! तुमने श्रीरामचन्द्रका कथाविषयक बड़ा अच्छा प्रश्न किया है । मैं उस मङ्गलकारिणी कथाको विस्तारपूर्वक कहता हूँ ॥ ६ ॥ आदि नारायण विष्णुसे ब्रह्माजी जायमान हुए । ब्रह्मासे मरीचि, मरीचिसे कश्यप, कश्यपसे सूर्य और सूर्यसे श्राद्धदेव हुए ॥ ७॥८॥ उन्हींको वैवस्वत मनु भी कहते हैं । उनके बड़े प्रतापी इक्ष्वाकु, इक्ष्वाकुसे विकुक्षि अथवा शशाद और विकुक्षिके ककुत्स्य अर्थात् पुरञ्जय हुए । ककुत्स्यसे इन्द्रवाह, इन्द्रवाहसे अनेना, अनेनासे विश्वरन्धि, विश्वरन्धिसे चन्द्र और चन्द्रका युवनाश्व नामक प्रतापी पुत्र हुआ । युवनाश्वसे शावन्त, शावन्तसे बृहदश्व तथा बृहदश्वसे कुवलाश्व सर्वश्रेष्ट राजा हुए । कुवलयाश्वसे दृढाश्व, दृढाश्वसे हर्यश्व, हर्यश्वसे निकुम्भ, निकुम्भसे बर्हणाश्व, बर्हणाश्वसे कृताश्व, कृताश्वसे श्येनजित्, श्येनजित्से युवनाश्व, युवनाश्वसे मान्धाता हुए । जो संसारमे त्रसदस्यु नामसे प्रसिद्ध थे । मांधातासे पुरुकुत्स, पुरुकुत्ससे फिर दूसरे त्रसदस्यु हुए । त्रसदस्युसे अनरण्य, अनरण्यसे हर्यश्व, हर्यश्वसे अरुण, अरुणसे त्रिबन्धन, त्रिबन्धनसे सत्यव्रत हुए । उनका नाम त्रिशंकु भी था ॥ ६-१७ ॥ सत्यव्रतसे हरिश्चन्द्र नामके बड़े सत्यवादी और प्रतापी राजा हुए । हरिश्चन्द्रसे रोहित, रोहितसे हरित, हरितसे चंप, चंपसे सुदेव, सुदेवसे विजय, विजयसे भरुक, भरुकसे वृक, वृकसे बहुक, बाहुकसे सगर, सगरसे असमञ्जस, असमञ्जससे अंशुमान्, अंशुमान्से दिलीप, दिलीपसे भगीरथ, भगीरथसे श्रुत, श्रुतसे नाभ, नाभसे सिन्धुद्वीप, सिन्धुद्वीपसे अयुतायु, अयुतायुसे ऋतुपर्ण और ऋतुपर्णसे सुदास हुए । वे मित्रमह और कल्माषांघ्रि नामसे भी प्रसिद्ध थे ॥ १८-२३ ॥ सुदाससे अश्मक, अश्मकसे मूलक, मूलकसे नारीकवच, नारीकवचसे दशरथ,
सर्गः १ ] सारकाण्डम् ३
सर्गः १ ] सारकाण्डम् ३
रघोः पुत्रो ह्यजः प्रोक्तस्तस्माद्दशरथः स्मृतः । ततो दशरथाज्जातः श्रीरामः परमेश्वरः ॥२७॥
यस्य नामान्यनन्तानि गृणन्ति मुनयः सदा । विष्णोरारभ्य कथिता एकषष्टिर्नृपा मया ॥२८॥
एकषष्टिनृपाणाम्ते मध्ये रामो विराजते । तस्य ते चरितं कृत्स्नं संक्षेपाच्च ब्रवीम्यहम् ॥२९॥
इक्ष्वाकुकुलसम्भवः क्षत्रियो लोकविश्रुतः । बभूव सर्यूतारेऽप्योध्यायां पार्थिवोत्तमः ॥३०॥
नाम्ना दशरथः श्रीमान् जम्बूद्वीपपतिर्महान् । शशास राज्यं धर्मेण सैन्येन महताऽऽवृतः ॥३१॥
अयोध्यायास्तु सान्निध्ये देशे श्रीकोमलाह्वये । कोमलायां महापुण्यः कोसलाख्यो नृपो महान् ॥३२॥
तस्यासीद्दुहिता रम्या कौसल्या पतिकाम्यका । तस्या दशरथेनैव विवाहो निश्चितो मुदा ॥३३॥
लग्नार्थे तं समानेतुं दूता दशरथं नृपम् । पञ्चदिनिश्चयं कृत्वा विवाहदिवसस्य च ॥३४॥
तदा दशरथोऽपि साकेते सरयूजले । नौकास्थो जलजां क्रीडां चक्रे वै मन्त्रिभिर्बुधैः ॥३५॥
निशायां सेनपा युक्तः स्तुतो मागधवन्दिभिः । रत्नदीप्रप्रकाशैश्च ननृतुर्वारयोषितः ॥३६॥
तस्मिन्काले तु लङ्कायां विधिं पप्रच्छ रावणः । कस्मान्मे मरणं ब्रह्मन् सत्वं मां वक्तुमर्हसि ॥३७॥
तद्रावणवचः श्रुत्वा कथयामास तं विधिः । कौसल्यायां दशरथाद्रामः साक्षाज्जनार्दनः ॥३८॥
चतुर्धा पुत्ररूपेण भूत्वा न विहनिष्यति । पञ्चमेऽहनि लग्नस्य गतो दशरथस्य हि ॥३९॥
दिवसो निश्चितो विप्रैः कौसल्याख्येन रावण । तद्विधेर्वचनं श्रुत्वा पुष्पकस्थो दशाननः ॥४०॥
अयोध्यां सत्वरं गत्वा राक्षसैः परिवेष्टितः । नौकास्थं तं दशरथं जित्वा युद्धैः सुदारुणैः ॥४१॥
बभञ्ज निजपादेन तां नौकां सरयूजले । तदा सर्वे मृतास्तत्र मग्ना विमले जले ॥४२॥
दशरथसुमन्त्रौ द्वौ नौकाखण्डोपरि स्थितौ । शनैः शनैः प्रवाहेण गत्वा च गङ्गोदरीं नदीम् ॥४३॥
दशरथसे ऐन्दिरथ ऐन्दिरथसे विधार, विधारसे खट्वाङ्ग, खट्वाङ्गसे दीर्घबाहु हुए। उनका नाम दिलीप भी था। दिलीपसे रघु, रघुसे अज और अजसे बड़े प्रतापी महाराज दशरथ हुए। दशरथके भार्यात् परमेश्वर मर्यादापुरुषोत्तम रामचन्द्रजी जयमान हुए ॥ २४-२७॥ उनके अनन्त नाम हैं। जिनका मुनिगण सदा गुणगान करते हैं। विष्णुसे लेकर ६१ (इकसठ) राजे मैंने गिनाये। उन राजाओंके बाद रामचन्द्रजी प्रकट हुए। उनका चरित्र मैं तुमको संक्षेपमें बताता हूँ ॥ २८।२९॥ इक्ष्वाकुकुलमें श्रेष्ठ, अगाध प्रसिद्ध बलवान् क्षत्रिय, सरयू नदीके किनारे बसी हुई अयोध्या नगरीके राजा जम्बूद्वीपके स्वामी, बडभागी श्रीमान् राजा दशरथ विशाल सेना रखकर धर्म तथा न्यायपूर्वक राज्यका शासन करते थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ अयोध्याके पास ही कोसलदेशकी कोसलपुरीमें कोसल नामका एक बड़ा पुण्यात्मा राजा राज्य करता था ॥ ३२। उसकी विवाहके योग्य एक सुन्दरी कौसल्या नामकी पुत्री थी। उसका उसके पिता कोसलने दशरथके साथ विवाह निश्चित किया। बादमें आनन्दके साथ विवाहके दिनका निश्चय करके उन्होंने लग्नके निमित्त राजा दशरथको बुलानेके लिए दूतको भेजा ॥ ३३ ॥ ३४॥ उस समय राजा दशरथ सरयूनदीके बीच नौकापर बैठकर इष्टमित्रों तथा मन्त्रियोंके साथ जलक्रीड़ा कर रहे थे। रात्रिका समय था, चारों ओर सैनिक लगे थे, चारणगण स्तुति कर रहे थे और रत्नके दीपके प्रकाशमें सम्पन्न नाव जगमगा रही थी। वाराङ्गनायें नानाप्रकारके नृत्य गान कर रही थीं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ उसी समय लङ्काके राजा रावणने ब्रह्मासे पूछा- हे ब्रह्मन् ! मेरा किसके हाथों मरण होगा ? यह आप स्पष्ट कहिये ॥ ३७॥ रावणका वचन सुनकर ब्रह्माने कहा कि दशरथकी स्त्री कौसल्यासे साक्षात् जनार्दन भगवान् राम आदि चार पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न होंगे उनमेंसे राम तुमको मारेंगे। कोसलराजने ब्राह्मणोंसे पूछकर राजा दशरथके लग्नका आजसे पाँचवां दिन निश्चित किया है। ब्रह्माका यह वचन सुना तो रावण बहुतसे राक्षसोंको साथ लेकर शीघ्र अयोध्यानगरीको चल पड़ा। वहाँ जा और घोर युद्ध करके उसने नौकापर बैठे राजा दशरथको पराजित किया और पादप्रहारसे नावको तोड़कर सरयूके जलमें डुबो दिया। उस समय और सब तो जलमें डूबकर मर गये। परन्तु राजा दशरथ तथा सुमन्त्र नामका मन्त्री दैवेच्छासे नावके टुकड़ोंपर बैठकर धीरे-धीरे
४ | आनन्दरामायण | [ सर्गः १
ततः समुद्रमध्ये हि जीविनावान्धवरंहसा । गगणः कोशलं गत्वा कृत्वा परममङ्गरम् ॥४४॥ कोसलाख्यं नृपं जित्वा कौसल्यां तां जहार सः । ततः प्रमुदितो लङ्कां ययावाकाशवर्त्मना ॥४५॥ दृष्ट्वा तिमिङ्गिले मत्स्यं नयन लवणार्णवे । चिन्ते विचारयामास देवास्ते मम शत्रवः ॥४६॥ लङ्कायाश्च हरिष्यन्ति कौसल्यां गुप्तविग्रहाः । अतोऽन्तर्मिङ्गिलोपमेयं न्यासभूतां करोम्यहम् ॥४७॥ इति निश्चित्य मतिमि पेटिकायां विधाय ताम् । मत्स्यं समर्प्य हृष्टात्मा ययौ लङ्कां दशाननः ॥४८॥ तिमिङ्गिलोप तन्मत्स्ये धृन्वाऽब्धौ व्यचरन्मुदम् । अग्रे दृष्ट्वा रिपुं स्वायं तेन युद्धार्थमुद्यतः ॥४९॥ द्वीपे तां पेटिकां स्थाप्य सङ्ग्रामं रिपुणाऽकरोत् । एतस्मिन्नन्तरे नौकाखण्डं तं द्वीपमागतम् ॥५०॥ तदा तौ मन्त्रिणृपती द्वावेव समारुरुहतुः । तत्र तां पेटिकां दृष्ट्वा समुद्घाट्यातिविस्मितौ ॥५१॥ तस्यां दृष्ट्वाऽथ कौसल्यां ज्ञात्वा वृत्तं परस्परम् । नया मुहूर्त्तमद्ध्ये द्वीपे दशरथो नृपः ।५२। गान्धर्व्याख्यं विवाहं च चकार मुदिताननः । ततो राजाऽथ कौसल्या सुमन्त्रो मन्त्रिसत्तमः ॥५३॥ प्रप.स्थित्व। पेटिकायां तद्द्वारं पिदधुः पुनः । तिमिङ्गिलो रिपुं जित्वा वक्त्रास्ये तु पेटिकाम् ॥५४॥ लङ्कायां रावणश्चापि समाहूय विधिं पुनः । उवाच प्रहसन्वाक्यं सभायां संस्थितः सुखम् ॥५५॥ विप्र तव मृषा वाक्यं रावणेन मया कृतम् । हरी दशरथस्तोये कौसल्या मोषिता मया ॥५६॥ तद्रावणवचः श्रुत्वा सभायां पद्मसंभवः । दीर्घस्वरेण प्रोवाच ॐपुण्याहमिति स्फुटम् ॥५७। रणं संभ्रमान्प्राह किमिदं व्याहृतं त्वया । विधिः प्रोवाच लग्नं तु जातं दशरथस्य हि ।५८। तदा विधिं मृषा कर्तुं दूतान्संप्रेष्य मन्दगम् । तिर्मिङ्गिलात्समानाय्य पेटिकां मण्डपोऽन्तिके ॥५९॥ समुद्घाट्य दर्शामी तत्र तस्यां दशाननः । तदाऽनिचकिंतः क्रुद्धस्तान् हर्तु खड्गमाददे ॥६०।
नावकहरु सहित गगनदीम का पश्च । ३८-४३ ॥ वहाॅम बहत हुए वे दोनों समुद्रमें जा मिले । उधर शवण भी लङ्का से चलकर साम्मनगर में जा पहुॅचा और भयानक युद्ध करके राजा कोसलको जीत लिया। तदनन्तर कौसल्याका हरण करके वह आनन्दके साथ आकाशमार्गसे लङ्काको चला ॥ ४४॥ ४५ ॥ गगनमण्डर समुद्रम महारूप तिमिङ्गिल मण्डलको देखकर उसने सोचा कि सब देवता मेरे शत्रु हैं। कही रूप बदलकर वे लङ्का से कौसल्याको चरा न ले जायें। इसलिए इसको यहीं इस तिमिङ्गिलको धरोहररूपमें सौंप दूं तो ठीक हो ॥ ४६।४७ ॥ ऐसा सोचकर उसने कौसल्याको पिटारीमें बन्द करके तिमिङ्गिलको समर्पण कर दिया और स्वयं आनन्दके साथ लङ्का चला गया ॥ ४८ ॥ वह मछली उस पिटारी को मुखम रखकर सुखपूर्वक समुद्रम घूमने लगी । सहसा अपने शत्रुको सामने देखकर उसने अनुके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया। ४९ ॥ तदनुसार पिटारीको एक टापूपर रखकर वह शत्रुसे युद्ध करने लगी। उसी समय वह नावका टुकडा भी उसी टापूक किनार आ लगा ॥ ५० ॥ तब राजा दशरथ तथा सुमन्त्र उस द्वीपपर उतर पड़े। वहाँ उनकी दृष्टि उस पिटारीपर पड़ी। खोलकर देखनेपर उसमें कौसल्याको देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । ५१ ॥ बादमें एक दूसरेसे सब बालोंको जान करके प्रसन्न हुए और अच्छे मुहूत्तम वहींपर राजा दशरथने प्रसन्नतापूर्वक कौसल्याके साथ गान्धर्व विवाह कर लिया । पश्चात् राजा, कौसल्या तथा मन्त्रिवोर्यमें श्रेष्ठ मन्त्री सुमन्त्र ये तीनों पुनः पिटारीमें घुस गये और ढकना बन्द कर लिया। मछलीने शत्रुको जीतकर उस सन्दूकको फिर अपने मुखमें रख लिया । ५२-५४ ॥ उधर लङ्कामें रावण सुखपूर्वक सभाके बीचम बैठा और ब्रह्माजीको बुलाकर हँसते हुए बोला- । ५५ ॥ हे ब्रह्मन् ! मैंन आपके वचनको झूठा कर डाला। दशरथको जलमे डुबोकर कौसल्याको छुपा दिया ॥ ५६ ॥ भरी सभामें रावणके इस बचनको सुनकर ब्रह्माजीने जोरसे स्पष्ट शब्दोंमे "ॐ पुण्याहम्" ऐसा कहा ॥ ५७ ॥ यह सुनकर रावणने पूछा कि यह आपने क्या कहा ? ब्रह्माजी बोले- अरे ! राजा दशरथका विवाह हो गया ॥ ५८ ।, रावण ब्रह्माक वचनको असत्य प्रमाणित करनेके लिये दूतों द्वारा मछलीसे पेटी मंगवायी और ज्यों ही खोलकर ब्रह्माजीको दिखलाना चाहा त्यों ही उसमे सुमन्त्रके साथ दशरथ कौसल्याको देखकर