श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ | आनन्दरामायण | [ सर्गः १
ततः समुद्रमध्ये हि जीविनावान्धवरंहसा । गगणः कोशलं गत्वा कृत्वा परममङ्गरम् ॥४४॥ कोसलाख्यं नृपं जित्वा कौसल्यां तां जहार सः । ततः प्रमुदितो लङ्कां ययावाकाशवर्त्मना ॥४५॥ दृष्ट्वा तिमिङ्गिले मत्स्यं नयन लवणार्णवे । चिन्ते विचारयामास देवास्ते मम शत्रवः ॥४६॥ लङ्कायाश्च हरिष्यन्ति कौसल्यां गुप्तविग्रहाः । अतोऽन्तर्मिङ्गिलोपमेयं न्यासभूतां करोम्यहम् ॥४७॥ इति निश्चित्य मतिमि पेटिकायां विधाय ताम् । मत्स्यं समर्प्य हृष्टात्मा ययौ लङ्कां दशाननः ॥४८॥ तिमिङ्गिलोप तन्मत्स्ये धृन्वाऽब्धौ व्यचरन्मुदम् । अग्रे दृष्ट्वा रिपुं स्वायं तेन युद्धार्थमुद्यतः ॥४९॥ द्वीपे तां पेटिकां स्थाप्य सङ्ग्रामं रिपुणाऽकरोत् । एतस्मिन्नन्तरे नौकाखण्डं तं द्वीपमागतम् ॥५०॥ तदा तौ मन्त्रिणृपती द्वावेव समारुरुहतुः । तत्र तां पेटिकां दृष्ट्वा समुद्घाट्यातिविस्मितौ ॥५१॥ तस्यां दृष्ट्वाऽथ कौसल्यां ज्ञात्वा वृत्तं परस्परम् । नया मुहूर्त्तमद्ध्ये द्वीपे दशरथो नृपः ।५२। गान्धर्व्याख्यं विवाहं च चकार मुदिताननः । ततो राजाऽथ कौसल्या सुमन्त्रो मन्त्रिसत्तमः ॥५३॥ प्रप.स्थित्व। पेटिकायां तद्द्वारं पिदधुः पुनः । तिमिङ्गिलो रिपुं जित्वा वक्त्रास्ये तु पेटिकाम् ॥५४॥ लङ्कायां रावणश्चापि समाहूय विधिं पुनः । उवाच प्रहसन्वाक्यं सभायां संस्थितः सुखम् ॥५५॥ विप्र तव मृषा वाक्यं रावणेन मया कृतम् । हरी दशरथस्तोये कौसल्या मोषिता मया ॥५६॥ तद्रावणवचः श्रुत्वा सभायां पद्मसंभवः । दीर्घस्वरेण प्रोवाच ॐपुण्याहमिति स्फुटम् ॥५७। रणं संभ्रमान्प्राह किमिदं व्याहृतं त्वया । विधिः प्रोवाच लग्नं तु जातं दशरथस्य हि ।५८। तदा विधिं मृषा कर्तुं दूतान्संप्रेष्य मन्दगम् । तिर्मिङ्गिलात्समानाय्य पेटिकां मण्डपोऽन्तिके ॥५९॥ समुद्घाट्य दर्शामी तत्र तस्यां दशाननः । तदाऽनिचकिंतः क्रुद्धस्तान् हर्तु खड्गमाददे ॥६०।
नावकहरु सहित गगनदीम का पश्च । ३८-४३ ॥ वहाॅम बहत हुए वे दोनों समुद्रमें जा मिले । उधर शवण भी लङ्का से चलकर साम्मनगर में जा पहुॅचा और भयानक युद्ध करके राजा कोसलको जीत लिया। तदनन्तर कौसल्याका हरण करके वह आनन्दके साथ आकाशमार्गसे लङ्काको चला ॥ ४४॥ ४५ ॥ गगनमण्डर समुद्रम महारूप तिमिङ्गिल मण्डलको देखकर उसने सोचा कि सब देवता मेरे शत्रु हैं। कही रूप बदलकर वे लङ्का से कौसल्याको चरा न ले जायें। इसलिए इसको यहीं इस तिमिङ्गिलको धरोहररूपमें सौंप दूं तो ठीक हो ॥ ४६।४७ ॥ ऐसा सोचकर उसने कौसल्याको पिटारीमें बन्द करके तिमिङ्गिलको समर्पण कर दिया और स्वयं आनन्दके साथ लङ्का चला गया ॥ ४८ ॥ वह मछली उस पिटारी को मुखम रखकर सुखपूर्वक समुद्रम घूमने लगी । सहसा अपने शत्रुको सामने देखकर उसने अनुके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया। ४९ ॥ तदनुसार पिटारीको एक टापूपर रखकर वह शत्रुसे युद्ध करने लगी। उसी समय वह नावका टुकडा भी उसी टापूक किनार आ लगा ॥ ५० ॥ तब राजा दशरथ तथा सुमन्त्र उस द्वीपपर उतर पड़े। वहाँ उनकी दृष्टि उस पिटारीपर पड़ी। खोलकर देखनेपर उसमें कौसल्याको देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । ५१ ॥ बादमें एक दूसरेसे सब बालोंको जान करके प्रसन्न हुए और अच्छे मुहूत्तम वहींपर राजा दशरथने प्रसन्नतापूर्वक कौसल्याके साथ गान्धर्व विवाह कर लिया । पश्चात् राजा, कौसल्या तथा मन्त्रिवोर्यमें श्रेष्ठ मन्त्री सुमन्त्र ये तीनों पुनः पिटारीमें घुस गये और ढकना बन्द कर लिया। मछलीने शत्रुको जीतकर उस सन्दूकको फिर अपने मुखमें रख लिया । ५२-५४ ॥ उधर लङ्कामें रावण सुखपूर्वक सभाके बीचम बैठा और ब्रह्माजीको बुलाकर हँसते हुए बोला- । ५५ ॥ हे ब्रह्मन् ! मैंन आपके वचनको झूठा कर डाला। दशरथको जलमे डुबोकर कौसल्याको छुपा दिया ॥ ५६ ॥ भरी सभामें रावणके इस बचनको सुनकर ब्रह्माजीने जोरसे स्पष्ट शब्दोंमे "ॐ पुण्याहम्" ऐसा कहा ॥ ५७ ॥ यह सुनकर रावणने पूछा कि यह आपने क्या कहा ? ब्रह्माजी बोले- अरे ! राजा दशरथका विवाह हो गया ॥ ५८ ।, रावण ब्रह्माक वचनको असत्य प्रमाणित करनेके लिये दूतों द्वारा मछलीसे पेटी मंगवायी और ज्यों ही खोलकर ब्रह्माजीको दिखलाना चाहा त्यों ही उसमे सुमन्त्रके साथ दशरथ कौसल्याको देखकर