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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

काण्डानि यस्मिन्नव कीर्तितानि ते हे विष्णुदासाघहरं मनोहरम् ॥६०॥

७९२आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं नवोत्तरं सर्गशतं मयेरितम् ।
काण्डानि यस्मिन्नव कीर्तितानि ते हे विष्णुदासाघहरं मनोहरम् ॥६०॥
दिने दिने पापचयान्प्रकुर्व्वन्नरः पठेत् श्लोकमपीह भक्त्या।
विमुक्तसर्वापचयः प्रयाति रामस्य सालोक्यमनन्यलभ्यम् ॥६१॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं हे रामदासस्य मुखेन कीर्त्तितम् ।
श्रीराघवेणैव जनाघनाशनं नानाचरित्रैर्वरकौतुकैर्युतम् ॥६२॥
धन्यः स वाल्मीकिमुनिः कवीश्वरो रामायणं वै शतकोटिनिर्मितम् ।
कृतं पुरा येन सविस्तरं शुभं यस्माच्च सारं कथितं मया तव ॥६३॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं श्रीजानकीक्रीडनकौतुकैर्युतम् ।
शृण्वन्ति गायन्ति वदन्ति चाऽपरान्कुर्व्वन्ति पारायणमादराच्च ये ॥६४॥
लभंति पुत्रानतिबुद्धिमत्तरान्स्त्रींश्चापि पौत्रान्परमान्मनोहरान् ।
धनानि धान्यानि पशूंश्च मानवाः श्रीरामचन्द्रस्य पदं प्रयांति ते ॥६५॥
आनन्दसंगं पठतश्च नित्यं श्रोतुश्च भक्त्या लिखितुश्च रामः ।
अतिप्रसन्नश्च सदा समीपे सीतासमेतः श्रियमातनोति ॥६६॥
आनन्दरामायणजाह्नवीयं पापापर्हत्री मलिनस्य जंतोः ।
आनन्दरामायणकामधेनुस्त्रियं जनानामभिकामदोग्ध्री ॥६७॥
रामायणं जनमनोहरमादिकाव्यं ब्रह्मादिभिः सुरवरैरपि संस्तुतं च ।
श्रद्धान्वितः पठति शृणुयान्त्स नित्यं विष्णोः प्रयाति सदनं स विशुद्धदेहः ॥६८॥
नवोत्तरशतैः सर्गे रामकीर्तनमालिकाम् । कृत्वा कण्ठे सुखं तिष्ठ शिष्येमां त्वं मयोदिताम् ॥६९॥

श्रीशिव उवाच

आनन्दरामचरितमिदं स्वीयगुरोर्मुखात् । श्रुत्वा स विष्णुदासस्तं ननामाऽर्च्य पुनः पुनः ॥७०॥


प्रकार लोगोंको चाहिए कि शुभाशुभ फल जानना हो तो इस शकुनसे जान लें। हे शिष्य ! तुमने हमसे जो कुछ पूछा, वह मैंने बतलाया ।। ५९ ।। इस तरह हमने तुमको एक सौ नौ सर्गोंवाली यह उत्तम रामायण सुनायी । इसमें समस्त पापोंको हरनेवाले नौ कांड कहे गये हैं ॥ ६० ॥ दिनों दिन पाप करनेवाला मनुष्य भी यदि इस रामायणके एक श्लोकका भी पाठ करता है तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह रामके चरणोंकी सालोक्य मुक्ति प्राप्त करता है ॥ ६१ ॥ इस आनन्दरामायणको श्रीरामदासने सुनाया है, जिसमें रामचन्द्रजी-की अनेक कौतुकमयी कथायें वर्णित हैं ।। ६२ ।। कवीश्वर वाल्मीकि ऋषि धन्य हैं कि जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तारपूर्वक रामचरितका वर्णन किया है। उसीका सारांश मैंने तुम्हें सुनाया है ॥ ६३ ॥ जो लोग श्रीसीताजीकी क्रीडाओंसे युक्त इस आनन्दरामायणका सादर श्रवण और गायन करते अथवा औरोंको सुनाते हैं, वे बड़े बुद्धिमान् लोग पुत्र, स्त्री, विशाल वैभव, अन्न तथा उत्तम पशुओंको प्राप्त करते हैं और अन्तमें रामचन्द्रजीके चरणोंको प्राप्त होते हैं ॥ ६४ ।। ६५ ।। जो प्राणी नित्य इस आनन्दरामायणका पाठ करते, सुनते अथवा लिखते हैं। उनपर रामचन्द्र परम प्रसन्न होकर सीताके साथ उनके हृदयमें विराजमान रहते हुए सब तरहसे उनका कल्याण करते हैं ॥ ६६ ॥ यह आनन्दरामायणरूपिणी गङ्गा पापियोंके समस्त पाप हरती है और आनन्दरामायणरूपिणी यह कामधेनु भक्तोंकी सब कामना पूर्ण करती है ॥ ६७ ॥ यह आनन्दरामायण अति मनोहर और ब्रह्मादि देवताओंसे भी संस्तुत है। जो श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे लोग विशुद्धकाय होकर अन्तमें विष्णुभगवान्के लोकको पाते हैं। हे शिष्य ! एक सौ नौ सर्गोंवाली इस रामकीर्तनरूपिणी मालाको धारण करके तुम जहाँ चाहो, सुखसे रहो ।। ६८ ।। ६९ ।। श्रीशिवजी बोले—अपने गुरु श्रीरामदासके मुखसे इस

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९३

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९३

रामदासः स्वशिष्यायानंदरामायणं प्रिये । एवमुक्त्वा मुनिः संध्यां कर्तुं गोदां गमिष्यति ॥७१॥ एवं देवि तवाग्रेऽद्य मयाऽपि परिकीर्तितम् । आनन्दरामचरितं श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥७२॥ रामकीर्तनमालायां मेरुस्थानं स्वयं महान् । सर्गो मया ते कथितः श्रवणान्मङ्गलप्रदः ॥७३॥

श्रीपार्वत्युवाच
यदा वाल्मीकिना देव कृतं रामायणं वरम् । तदा क्व रामदासः स मंत्रादोऽपिस्त्वयाऽकथि ॥७४॥
क्व तदा विष्णुदासोऽपि संशयो मेऽत्र जायते ।

श्रीशिव उवाच
त्रिकालज्ञा ज्ञानदृष्ट्या मुनिनाऽत्र कथान्तरे ॥७५॥
उभयोर्भाषितं संवादः सोऽपि पूर्वं प्रवर्णितः । यथा रामस्य चरितं रामान्पूर्वं प्रवर्णितम् ॥७६॥
संदेहोऽत्र त्वया नैव कार्यः पर्वतकन्यके । रामदासमुखेनैतद्राघवेणैव वर्णितम् ॥७७॥
आनन्दरामायणमादरेण श्रीरामचन्द्रेण मुनेर्मुखेन ।
तद्रामदासस्य मुखैव चोक्तं भक्तिप्रदं मुक्तिदमैतदद्य ॥७८॥
आनन्दरामायणमादरेण पुत्रे प्रसूते पठनीयमेतत् ।
विवाहकाले व्रतबन्धकाले श्राद्धे पठेत्पर्वणि मङ्गले च ॥७९॥
आनन्दरामायणमादरेण कारागृहस्थस्य विमुक्तये च ।
उत्पातशांत्यै भयनाशनाय प्रभोः कृपार्थं पठनीयमादरात् ॥८०॥
आनन्दरामायणमादरेण शृणोति वा श्रावयते च भक्त्या ।
स स्वीयकामानाखिलानवाप्य वैकुण्ठलोकं खलु गच्छति खेः ॥८१॥
आनन्दरामायणतोऽधिकानि न संति तीर्थानि हरेः स्थलानि ।
क्षेत्राण दानान्यपि पुण्यदानि तथा पुराणान्यथ कीर्तितानि ॥८२॥


प्रकार आनन्दरामायणको सुननेके बाद विष्णुदासने इस ग्रन्थका पूजन करके वारम्बार प्रणाम किया ॥७०॥ हे प्रिये ! रामदास अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनाकर सन्ध्या करनेके लिए गोदावरीके तटपर चले गये ॥ ७१ ॥ हे देवि ! जिस तरह रामदासने अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनायी थी, उसी तरह मैने भी पुण्यवर्द्धक इस उत्तम रामचरितका वर्णन कर दिया है ॥ ७२ ॥ रामके गुणोंका गान करने-वाली अनेक ग्रंथमालायें हैं। उनमें यह आनन्दरामायण सुमेरुके समान विराजमान है। इस रामायणमें भी जो सर्गोंकी माला है, उसमें यह सर्ग सुमेरुकी तरह है। इसका श्रवण करनेसे सर्वथा मङ्गल होता है ॥ ७३ ॥ श्रीपार्वतीजीने कहा-हे देव ! जब श्रीवाल्मीकिजीने यह रामायण बनायी थी, तब रामदास और विष्णुदास कहाँ थे ? जिनका संवाद आपने मुझे सुनाया। यह मेरे हृदयमें एक महान् संदेह उत्पन्न हो गया है। श्रीशिवजी बोले-हे पार्वती ! वाल्मीकिजीने अपनी त्रिकालदर्शिता दृष्टिसे इस भावी संवादको पहले ही जान लिया था। इसी कारण संवाद होनेके पहले ही उसका वर्णन कर दिया। जैसे उन्होंने रामजन्मसे पहले रामायण लिख दी थी। हे पर्वतकन्यके ! तुम इस विषयमें किसी प्रकारका संदेह न करो। रामदासके मुखसे साक्षात् रामचन्द्रजीने स्वयं इस चरित्रका वर्णन किया है। उन मुनिके मुखसे स्वयं रामचन्द्रजीने आदरपूर्वक इस रामायणको कहा है। इसीलिए यह इस संसारमें भक्ति और मुक्ति देनेवाली वस्तु बन गयी है ॥ ७४-७८ ॥ लोगोंको चाहिए कि पुत्र होनेपर, विवाहमें, यज्ञोपवीतमें, श्राद्धमें तथा किसी मङ्गलमय कार्यके समय आनन्दरामायणका पाठ अवश्य करें ॥ ७९ ॥ यदि कोई मनुष्य कारागारमें हो और उसे छुड़ानेकी आवश्यकता आ पड़े अथवा किसी उत्पात तथा भयको शांत करना हो अथवा भगवान्की कृपा प्राप्त करनी हो तो आदरपूर्वक इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८० ॥ जो मनुष्य आनन्दरामायणका आदरपूर्वक पाठ करते या सुनते-सुनाते हैं, वे अपनी समस्त कामनायें पूर्ण करके अन्तमें वैकुण्ठलोकको जाते हैं ॥ ८१ ॥ आनन्दरामायणसे बढ़कर तीर्थ, भगवन्मन्दिर, क्षेत्र, दान तथा पुराण

७९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं प्रोक्तं मया ते गिरिजे सविस्तरम् ।
संस्मृत्य पापापहरं निरन्तरं मनोहरं लप्स्यसि राघवे मतिम् ॥८३॥

आदौ हत्वा दशास्यं द्विजवचनपुरस्त्वेन यात्राश्च यज्ञान्
कृत्वा भुक्त्वातिभोगानवनितलविशीर्णां गृहीत्वाऽथ सीताम् ।
लब्ध्वा नानावस्तुपास्तान्त्यजनिमगतान्पार्थिवादींश्च जित्वा
कृत्वा नानोपदेशान् गजपुरनिकटे स्वार्थलोकं जगाम ॥८४॥

वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान्पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वायव्यकोणादिषु ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥८५॥

आनन्दरामायणहारदीपमं ये पूर्णकाण्डं चरमं नरोत्तमाः ।
पठंति शृण्वंति हरेः परं पदं गच्छंति पूर्णेप्सितमालभंति ते ॥८६॥

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं जप्यं पवित्रं श्रवणीयमादरात् ।
यन्मङ्गलानामति मङ्गलप्रदं स्मरामि नित्यं प्रणमामि सादरम् ॥८७॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे उमामहेश्वर-संवादे तथा रामदासविष्णुदाससंवादे ग्रंथसंख्याकीर्तनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


मादिका श्रवण, इनमेंसे एक भी नहीं है ॥ ८२ ॥ हे गिरिजे ! मैंने विस्तारपूर्वक यह उत्तम आनन्द-रामायण तुम्हें सुना दिया। तुम इस पापापहारी चरित्रका निरन्तर मनन किया करो। ऐसा करनेसे तुम्हें सुन्दर भगवद्भूति प्राप्त होगी और तुम्हारी बुद्धि रामकी ओर दौड़ पड़ेगी ॥ ८३ ॥ रामने पहले रावणका वध किया। फिर ब्राह्मणके वचनका सम्मान करते हुए तीर्थोंकी यात्रायें कीं और बहुतसे यज्ञ किये। फिर विविध प्रकारके भोगोंको भोग करके पातालमें जाती हुई सीताको उबारा। तदनन्तर पृथ्वीतलके अनेक राजाओंको जीतकर बहुत सा वस्तुरत्न लाये। तत्पश्चात् लोगोंको विविध प्रकारका उपदेश देकर वे हस्तिनापुरके समीप गंगातटसे अपने परम धामको चले गये ॥ ८४ ॥ जिन रामचन्द्रजीके वाम भागमें सीता, आगे हनुमान्जी, पीछे लक्ष्मण, शत्रुघ्न तथा भरत, दायें-बायें एवं वायव्य आदि कोणोंमें सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा जाम्बवान् विराजमान हैं। उन सबके मध्यमें नीलकमलकी नाईं सुशोभित श्यामवर्ण श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ ८५ ॥ जो लोग हारकी भाँति सुन्दर इस अन्तिम पूर्णकाण्डका पाठ करते या सुनते हैं, वे परम पदको प्राप्त होते हैं और उनकी सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं ॥ ८६ ॥ लोगोंको चाहिए कि इस पवित्र आनन्दरामायणका आदरपूर्वक कीर्तन तथा श्रवण किया करें। क्योंकि यह मङ्गलोंका भी मङ्गल-दाता है। इसी कारण मैं तो नित्य इसका आदरपूर्वक स्मरण और नमन करता हूँ ॥ ८७ ॥ इति श्रीशतकोटि-रामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे गोण्डामण्डलान्तर्गतसिसई (टिकरिया) ग्रामनिवासि पं० रामदत्तात्मज पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

॥ इति पूर्णकाण्डं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु
समाप्तोऽयं ग्रन्थः