भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १३ ]

सर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७१५

अद्वैतानन्दचैतन्यशुद्धसत्त्वैकलक्षणः । बहिराः सुतीक्ष्णात्र रामचन्द्रः प्रकाशते ॥ ५० ॥ सत्त्वविद्यार्थिनो नित्यं रमते चित्सुखात्मनि । इति रामपदेनाभौ परब्रह्मभिधीयते ॥ ५१ ॥ जय रामेति यन्नाम कीर्तयन्ननिशं नयेत् । सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम् ॥ ५२ ॥ श्रीरामेति परं मन्त्रं तदेव परमं पदम् । तदेव तारकं विद्धि जन्ममृत्युभयापहम् । श्रीरामेति वदन् ब्रह्मभावमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ५३ ॥ अस्य श्रीरामकवचस्य अगस्त्यऋषिः अनुष्टुप्छन्दः सीताक्ष्मणोपेतः श्रीरामचन्द्रो देवता श्रीरामचन्द्रप्रसादसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः । अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि सर्वाभीष्टफलप्रदम् । नीलजीमूतसङ्काशं विद्युद्वर्णाभ्वरावृतम् ॥ ५४ ॥ कोमलाङ्गं विशालाक्षं पुन्नामनिगुन्दुरम् । सीतासौमित्रिसहितं जटामुकुटधारिणम् ॥ ५५ ॥ सासितूणधनुर्बाणपाणि दानवमर्दनम् । सदा चोरभये राजभये शत्रुभये तथा ॥ ५६ ॥ ध्यात्वा रघुपतिं युद्धे कालानलसमप्रभम् । चीरकृष्णाजिनधरं भस्मोद्धूलितविग्रहम् ॥ ५७ ॥ आकर्णाकृष्टसशरकोदण्डञ्चमडितम् । रणे रिपून् रावणादींस्तीक्ष्णमार्गद्वृष्टिभिः ॥ ५८ ॥ महद्रथं महावीरसुग्रीवेन्द्रव्यपस्थितम् । लक्ष्मणायंर्महद्वीरैर्वृतं हनुमदादिभिः ॥ ५९ ॥ सुग्रीवार्यभदावीर्यैः शैलवृक्षकरोद्यतैः । दैत्यान्करालहुङ्कारैर्भुम्डुकारमहारवैः । ६० ॥ नदद्भिः परिपादाद्भिः समरे रावणं प्रति । श्रीराम शत्रुमपान्ये हन मर्दय खादय । ६१ ॥ भूतप्रेतपिशाचादीन् श्रीरामाशु विनाशय । एवं ध्यात्वा जपेद्रामकवचं सिद्धिशायकम् ॥ ६२ । सुतीक्ष्ण यच्चकवचं श्रृणु वक्ष्याम्यनुत्तमम् । श्रीरामः पातु मे मूर्ध्नि पूर्वं च रघुवंशजः ॥ ६३ ॥ दक्षिणे मे रघुवरः पश्चिमे पातु पावनः । उत्तरे मे रघुपतिर्भालं दशरथात्मजः ॥ ६४ ॥

मुनीक्षण ! सुनिए, मैं आज सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाला रामकवच बतलाऊँगा ॥ ४९ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस संसारके बाहर-भीतर सब व्योमोर व अद्वैत, आनन्दस्वरूप, शुद्ध और सत्त्वगुणमय रामचन्द्रजी प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ५० ॥ परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखनेवाले लोग जिसके चिन्मयरूप आनन्द लूटते हैं, वे ही परब्रह्म 'राम' इस नामसे पुकारे जाते हैं ॥ ५१ ॥ जो मनुष्य 'जय राम' इस मन्त्रका कीर्तन करता है, वह सब पापोस छूटकर विष्णुभगवान्के परम पदको प्राप्त होता है । ५२ ॥ श्रीराम यह सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है, यह परमपद है, यह मृत्यु-भय आदिको दूर कर देता है और 'श्री राम' कहता हुआ प्राणी परब्रह्मको प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। विनियोगके बाद सब कामनाओंका पूर्ण करनेवाला ध्यान बतला रहा हूँ। जिनका नील मेघके समान श्याम शरीर है, जो बिजलीके समान चमकते हुए पीले वस्त्रको धारण किये हुए हैं, जिनके कोमल अङ्ग हैं, बड़ी-बड़ी आंखें हैं, जो अतिशय सुन्दर और पुष्ट हैं, जिनके साथ सीता और लक्ष्मण विद्यमान हैं, जो जटा-मुकुट धारण किये हैं, तलवार, तरकस, धनुष-बाण हाथमें लिये हैं और जो दानवोंका संहार करते हैं। मनुष्यको चाहिए कि राजभय, चोरभय और संग्रामका भय आ जाय तो कालानलके समान क्रुद्ध रामचन्द्रजीका ध्यान करे। जो पीताम्बर तथा कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं और धूलिसे जिनका शरीर धूसरित हो रहा है ॥ ५३-५७ । कानतक जिन्होंने धनुषकी डोरी खींच रक्खा है संग्रामभूमिमे रावण आदि राक्षसोंपर जो तीक्ष्ण बाणवृष्टि कर रहे हैं ॥ ५८ ॥ इन्द्रके रथपर बैठे जो महावीर शत्रु का संहार करनेमें लगे हुए हैं और जो लक्ष्मण हनुमान्जी आदि वीरोंसे घिर हुए हैं ॥ ५९ ॥ जिनके साथ सुग्रीव वादि योद्धा हाथमें पाषाणखण्ड और बड़े-बड़े वृक्ष लिये शत्रुओंका संहार कर रहे हैं। ऐसे हे राम ! इसको मारो—इसको खा-जाओ और भूत प्रेत, पिशाच आदिको नष्ट कर दो। इस प्रकार रामचन्द्रजीका ध्यान करके सिद्धिदायक रामकवचका जप करे ॥ ६० । ६१ । ६२ ॥ अगस्त्यजी कहते हैं कि हे सुतीक्ष्ण ! मैं अतिशय उत्तम रामकवच कहता हूँ। श्रीराम मेरे मस्तक और पूर्व दिशाकी रक्षा करें। दक्षिणकी ओर रघुवर तथा

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७१६आनन्दरामायणे[ सर्गः १३

भ्रुवोर्दूर्वादलश्यामस्तयोर्मध्ये जनार्दनः । श्रोत्रं मे पातु राजेन्द्रो दृशौ राजीवलोचनः ॥६५॥
घ्राणं मे पातु राजर्षिर्गण्डं मे जानकीपतिः । कर्णमूले खरध्वंसी भालं मे रघुपल्लभः ॥६६॥
जिह्वां मे वाक्पतिःपातु दन्तपङ्क्ती रघूत्तमः । ओष्ठौ श्रीरामचन्द्रो मे मुखं पातु परात्परः ॥६७॥
कण्ठं पातु जगद्वन्द्यः स्कन्धौ मे रावणांतकः । वक्षो मे पातु काकुत्स्थः पातु मे हृदयं हरिः ॥६८।
सर्वाङ्ग्यंगुलिपर्वाणि हस्तौ मे राक्षसांतकः । वक्षो मे पातु काकुत्स्थः पातु मे हृदयं हरिः ॥६९॥
स्तनौ सीतापतिः पातु पार्श्वो मे जगदीश्वरः । मध्यं मे पातु लक्ष्मीशो नाभिं मे रघुनायकः ॥७०॥
कौसल्येयः कटिं पातु पृष्ठं दुर्गतिनाशनः । गुह्यं पातु हृषीकेशः सक्थिनी सत्यविक्रमः ॥७१॥
ऊरू शार्ङ्गधरः पातु जानुनी हनुमत्प्रियः । जंघे पातु जगद्व्यापी पादौ मे ताटिकांतकः ॥७२॥
सर्वाङ्गं पातु मे विष्णुः सर्वसन्धीननामयः । ज्ञानेन्द्रियाणि प्राणादीन्पातु मे मधुसूदनः ॥७३॥
पातु श्रीरामभद्रो मे शब्दादीन्विषयानपि । द्विपदादीनि भूतानि मत्सम्बन्धीनि यानि च ॥७४॥
जामदग्न्यमहादर्पदलनः पातु तानि मे । सौमित्रिपूर्वजः पातु वागादीनीन्द्रियाणि च ॥७५॥
रोमांकुरण्यशेषाणि पातु सुग्रीवराज्यदः वाङ्मनोबृद्धयहंकारैर्ज्ञानाज्ञानकृतानि च ॥७६॥
जन्मान्तरे कृतानीह पापानि विविधानि च तानि सर्वाणि दग्ध्वाशु हरकोदण्डखण्डनः ॥७७॥
पातु मां सर्वतो रामः शार्ङ्गबाणाधरः सदा इति श्रीरामचन्द्रस्य कवचं वज्रसंमितम् ॥७८।
गुह्याद्गुह्यतमं दिव्यं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा समाहितः ॥७९॥
स याति परमं स्थानं रामचन्द्रप्रसादतः । महापातकयुक्तो वा गोघ्नो वा भ्रूणहा तथा । ८०॥
श्रीरामचन्द्रकवचपाठनाच्छुद्धिमाप्नुयात् ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ।८१।


पश्चिमकी पवन ( पवनपुत्र ) रक्षा करे। ऊपरकी ओर सूर्य्यास्त और ललाटकी दशरथात्मज रक्षा करें दूर्वादलके समान श्याम जनार्दन भौंहोंके मध्यभागकी रक्षा कर कानोंको राजेन्द्र आँखोंकी राजीवलोचन ॥ ६३-६५ ॥
नाककी राजर्षि, गंडस्थलकी जानकीपति, कर्णमूलकी खरध्वंसी और रघुपल्लभ ललाटकी रक्षा करें ॥ ६६ ॥
उसी प्रकार जिह्वाकी रक्षा वाक्पति, दन्तपङ्क्तिके रघूत्तम दोनों ओंठों ओर मुखकी रक्षा परात्पर भगवान् करें ॥ ६७ ॥ कण्ठकी जगद्वन्द्य दोनों कन्धा रावणाम्तक ओर मेरी दोनों भुजाओंकी रक्षा शास्तिको मारनेवाले धनुर्बाणधारी राम करें ॥ ६८ ॥ मेरी सब उँगलियों और दोनों हाथोका रक्षा राक्षसान्तक, वक्षस्थलको काकुत्स्थ ओर हरिभगवान् मेरे हृदयकी रक्षा करे । ६९ ॥ दोनो स्तनोंका सीतापति, पार्श्वभागको जगदीश्वर, मध्यभागकी लक्ष्मीपति ओर नाभिकी श्रीरघुनायक रक्षा करें ॥ ७० ॥ कमरकी कौसल्येय, पीठकी दुर्गतिनाशन, गुह्यभागकी हृषीकेश और सत्यविक्रम भगवान् हड्डियोंकी रक्षा करें ॥ ७१ ॥ शाङ्गधर भगवान् दोनों घुटनोंकी, हनुमानजीके प्रिय दोनों जानुभागका, जगद्व्यापी दोनों जंघाओंकी ओर ताड़काका नाश करनेवाले भगवान् मेरे पैरोंकी रक्षा कर ॥ ७२ ॥ विष्णुभगवान् मेरे सब अङ्गोंकी, अनामय मेरे शरीरकी, सन्धियोंकी और मधुसूदन भगवान् मेरे प्राणादि तथा ज्ञानेन्द्रियोंकी रक्षा कर । ७३ ॥ श्रीरामभद्र मेरे शब्दादि विषयोंकी रक्षा कर मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले जितन दो पैरके जन्तु ( मनुष्य ) हों, उनकी रक्षा महान् दर्पको नष्ट करनेवाले परशुराम भगवान् करें सौमित्रिपूर्वज ( राम ) मेरी वाक् आदि इन्द्रियोंकी रक्षा कर ॥ ७४ ॥ ७५ ॥
सुग्रीवको राज्य देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी मेरे सारे रोमकूपोंकी रक्षा करें। मन, बुद्धि, अहङ्कार, ज्ञान एवं अज्ञानस किय हुए इस जन्म तथा जन्मान्तरके पातकोंका जलाकर भस्म करते हुए शिवजीका धनुष तोड़नेवाले धनुर्बाणधारी श्रीराम मेरी सब ओर रक्षा कर । हे मुनिसत्तम सुतीक्ष्ण ! यह वज्रसदृश रामकवच गूढ़से भी गूढ़ है। जो प्राणी इसे पढ़ता, सुनता या दूसरोंको सुनाता है, वह रामचन्द्रकी कृपासे परम धामको प्राप्ति करता है। वह चाहे महापातकी, गोघाती या भ्रूणहत्याकारी ही क्यों न हो ॥ ७६-८० ॥ इस श्रीरामकवचका पाठ करनेसे प्राणी शुद्ध होकर ब्रह्महत्या आदि पातकोंसे भी मुक्त हो जाता है। इसमें कोई संशय नहीं है

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७१७

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७१७

भोः सुतीक्ष्ण यथा पृष्टं त्वया मम पुरा शुभम् । तथा श्रीरामकवचं मया ते विनिवेदितम् ॥८२।
श्रीरामदास उवाच
एवं शिष्य त्वया पृष्टं श्रीरामकवचं वरम् । हनुमत्कवचं चापि तथा ते विनिवेदितम् ॥८३॥
वायुपुत्रस्य रामस्य कवचञ्च नरैर्भुवि । विना सीताकवचेन पठनीयं न वै कदा ॥८४॥
आदौ पठित्वा कवचं वायुपुत्रस्य धीमतः । पठनीयं ततः सीताकवचं सौख्यवर्धनम् ॥८५॥
ततः श्रीरामकवचं पठनीयं महत्तमम् । एवमेव हि मंत्राश्च जपनीयास्त्रयः क्रमात् ॥८६।
विष्णुदास उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि सीतायाः कवचं शुभम् । तथान्यान्यपि वैदेह्याः स्तोत्रादीनि वदस्व तत् ॥८७ ।
सीतायास्तोषदं भूम्यां तत्सर्वं विस्तरेण च ।
श्रीमहादेव उवाच
इति तद्वचनं श्रुत्वा रामदासोऽब्रवीद्वचः ॥८८॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे कवचद्वयवर्णनं नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥


चतुर्दशः सर्गः

( सीताकवच आदिका निरूपण )
श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि सीतायाः कवचं शुभम् । पुरा प्रोक्तं सुतीक्ष्णाय पृच्छते कुंभजन्मना ॥ १ ॥
एकदा कुंभजन्मानं सुतीक्ष्णः प्राह वै मुनिः । रहः स्थितं गुरुं दृष्ट्वा प्रणम्य भक्तिपूर्वकम् । २ ।
सुतीक्ष्ण उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि सीतायाः प्रीतिदानि हि ।
यानि स्तोत्राणि कर्माणि तानि त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
अगस्तिरुवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । भादौ वक्ष्याम्यहं रम्यं सीतायाः कवचं शुभम् ॥ ४ ॥


॥ ८१ । हे सुतीक्ष्ण ! जैसा तुमने मुझसे पूछा था, मैन श्रीरामकवच तुम्ह सुना दिया। ८२ ॥ श्रीरामदास कहते हैं-हे शिष्य ! तुमने हमसे श्रीरामकवच और हनुमत्कवच पूछा था, सो मैन कह सुनाया ॥ ८३ ॥ रामकवच तथा हनुमत्कवचका पाठ सीताकवचके बिना न करना चाहिए ॥ ८४ ॥ पहले बुद्धिमान् वायुपुत्रके कवचका पाठ करके सुख बढ़ानेवाले सीताकवचका पाठ करना चाहिए ॥८५॥ उसके बाद सर्वश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रकवचका पाठ करना चाहिए । इस तरह इन तीनों कवचोंका एक साथ पाठ करे । ८६ ।। विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! मैं सीताकवच तथा सीताके अन्यान्य स्तोत्रोंको सुनना चाहता हूँ, सो आप मुझसे कहिए ॥ ८७ ॥ जिससे सीताजी प्रसन्न हो सकें, वह सब स्तुतियाँ विस्तारपूर्वक कहें। श्रीमन्महादेवजीने कहा कि इस प्रकार विष्णुदासकी बात सुनकर रामदास बोले । ८८ ।। इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥

श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! अब मैं सीताकवच बतलाता हूँ, जिसे अगस्त्यजीने सुतीक्ष्णसे कहा था ॥ १ ॥ एक बार जब कि अगस्त्यजी एकान्तमें बैठे थे, सुतीक्ष्णने जाकर भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और कहा-हे गुरो ! मैं सीताजीको प्रसन्न करनेवाले स्तोत्र और कवच सुनना चाहता हूँ। आप कृपा करके

७१८आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

या जाताऽवनिमतस्ततः स्वतनयारूपेण मन्दारिना पद्माक्षनृपतेः सुता लङ्कां गता या मातुलुङ्गोद्भवा ।
या रत्ने लयम् गता उदधौ नृपगृहे जाता पुनर्या या नामाङ्गलवना शशाङ्कमुखा मां पातु रामप्रिया ॥ ५ ॥

अस्य श्रीसीताकवचमन्त्रस्य अगस्त्य ऋषिः । श्रीरामा देवता । अनुष्टुप्छन्दः । रामेति बीजम् । जनकजेति शक्तिः । अवनिजेति कीलकम् । पद्माक्षनुतेत्यस्त्रम् । मातुलुङ्गीति कवचम् । मूलकणुरुधेति मन्त्रः । श्रीमत्परमचन्द्रान्वयसकलकामदासिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।
अथ अङ्गुलिन्यासः— ॐ ह्रीं सीतायै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं रामायै तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ह्रीं जनकजायै मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं अवनिजेत्यै अनामिकाभ्यां नमः ॐ ह्रां पद्माक्षनुतायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः अः मातुलुङ्गे करपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः कार्यः ।

अथ ध्यानम्

सीतां कमलपत्राक्षीं विद्युत्पुञ्जसमप्रभाम् । द्विभुजां सुकुमाराङ्गीं पीतकौशेयवासिनीम् ॥ ६ ॥
सिंहासने रामचन्द्रवामभागस्थितां वराम् । नानालङ्कारसंयुक्तां कुण्डलद्वयधारिणीम् ॥ ७ ॥
चूडाकङ्कणकेयूररशनादिसुशोभिताम् । श्रीमन्तं रुचिरं बिभ्रतीं तिलकेन च ॥ ८ ॥
मयूराकारनेत्राग्रं मण्डलाग्रं शोभितां शुभाम् । हरिद्रां कज्जलं दिव्यं कुङ्कुमं कुसुमानि च ॥ ९ ॥
बिभ्रतीं सुगन्धिद्रव्यं सुगन्धस्नेहमुत्तमम् । स्मितवदनां गौरवर्णीं मन्दारकुसुमं करे ॥ १० ॥
बिभ्रन्तीमपरं हस्ते मातुलुङ्गमुत्तमम् । रम्यनासां च बिम्बोष्ठीं चन्द्रवाहनलोचनाम् ॥ ११ ॥
कलानाथसमानास्यां कम्बुकण्ठमनोहराम् । मातुलुङ्गोद्भवां देवीं पद्माक्षदुहितां शुभाम् ॥ १२ ॥
मैथिलीं रामदयितां दासीभिः परिवेष्टिताम् । एवं ध्यात्वा जनकराज्ञीं हेमकुम्भपयोधराम् ॥ १३ ॥
सीतायाः कवचं दिव्यं पठनीयं शुभावहम् ॥ १४ ॥
श्रीसीता पूर्वतः पातु दक्षिणेऽवतु जानकी । प्रतापरूपा तु वैदेही पातूदीच्यां च मैथिली ॥ १५ ॥
अधः पातु मातुलुङ्गी ऊर्ध्वं पद्माक्षजाऽवतु । मध्येऽवनिमुता पातु सर्वतः पातु मां रमा ॥ १६ ॥


कहिए ॥ २ ॥ ३ ॥ अगस्त्यजीने कहा—हे वत्स तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान होकर सुनो । पहले मैं सीताजीका कवच सुनाता हूँ ४ । जो सीता पृथ्वीसे उत्पन्न हुईं और मिथिलानरेशके द्वारा पाली-पोसी गयीं, जो मातुलुङ्गीसे उत्पन्न होकर पद्माक्ष नामक राजाकी पुत्री कही गयीं, जो समुद्रके रत्नोंमें लीन हुईं और बार बार लङ्का गयीं, ऐसी मन्दारकी, शूलहस्ता और रामकी प्रेयसी सीता मेरी रक्षा करे ॥ ५ ॥

"अस्य श्री" से लेकर "एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः" यहां तक विनियोग तथा अङ्गन्यासका विधान बतलाया गया है । इसके बाद ध्यान है । जिसका भाव इस प्रकार जानना चाहिए—कमलकी पखुडियोंके समान जिनके नेत्र हैं, विद्युत्पुञ्जके समान जिनकी कान्ति है, जिनके दो भुजाये हैं और जो पीताम्बर पहने हैं । जो सिंहासनपर रामके वामभागमें बैठी हैं, कानोंमें कुंडल पहने हैं कुन्द चूड़ामणि भुजाओंमें केयूर तथा कमरमें करधनी पहने हैं, जिनके समन्ताद्भाग सूर्य-चन्द्रमाके समान आभूषण सुशोभित हो रहे हैं माथेमें तिलक लगा हुआ है नाकमें मयूरके आकारका सुन्दर आभूषण पड़ा है ॥ ६-९ ॥ हरिद्रा, काजल, कुंकुम, विविध प्रकारके फूल तथा तरह तरहके सुगंधित द्रव्य और इत्र आदि चमक रहे हैं, जिनका मुस्कराता हुआ मुखमण्डल है, गौर वर्ण है, जो एक हाथमें मन्दारक फूल लिये हैं, दूसरे हाथमें उत्तम मातुलुङ्ग विराजमान है, जिनकी मृदु मुस्कान है, बिम्बके समान ओष्ठ हैं मृगके नेत्रोंके समान जिनके नेत्र हैं, चन्द्रमाके समान मुख है, शङ्खके समान जिसकी गाढी वाणी है, जो मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) से उत्पन्न होनेवाली पद्माक्ष नृपतिकी पुत्री और रामकी भामिनी हैं, जिन्हें दासियाँ पंखा झल रही हैं, सुवर्णकलशके समान जिनके स्तन हैं, ऐसी सीताका ध्यान करके इस दिव्य सीताकवचका पाठ करना चाहिए ॥ १०-१४ ॥ पूर्वकी ओर सीता मेरी रक्षा करें, दक्षिणकी तरफ जानकी रक्षा करे, पश्चिमकी वैदेही रक्षा करें, उत्तरकी मैथिली रक्षा करें ॥ १५ ॥ निचला

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् [ ७१९

स्मितानना शिरः पातु पातु भालं नृपात्मजा । पद्माऽवतंसाऽधोर्ध्वञ्चे मृगाक्षी नयनेऽवतु ॥१७॥
कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामवल्लभा । नासाग्रं मक्षिका पातु पातु वक्त्रं तु राजसी ॥१८॥
तामसी पातु दन्तानी पातु जिह्वां पतिव्रता । दन्तान् पातु महामाया चिबुकं कनकप्रभा ॥१९॥
पातु कण्ठं सौम्यरूपा स्कंधौ पातु सुगन्धिनी । भुजौ पातु वरारोहा करौ कंकणमण्डिता ॥२०॥
नखान् रक्तनखा पातु कुक्षी पातु लघूदरा । पृष्ठं पातु गदापानी पार्श्व गन्धप्रमोदिनी ॥२१॥
पृष्ठदेशे वह्निगुप्ताऽवतु मां सर्वदैव हि । दिव्यप्रदा पातु नाभिं कटिं राक्षसमोहिनी ॥२२॥
गुह्यं पातु रत्नगुप्ता लिंगं पातु हरिपिया । ऊरू पातु रमेशानी जानुनी विषमप्रभा ॥२३॥
जंघे पातु सदा सुभ्रूर्गुल्फौ चामरवीजिता । पादौ कल्पलता पातु पादांगानि कृशोंदिका ॥२४॥
पादांगुलीः सदा पातु मम नूपुरनिःस्वना । रोमाण्यवतु मे नित्यं पीतकोशेयवासिनी ॥२५॥
रात्रौ पातु कालरूपा दिने दर्शनतत्परा । सर्वकालेषु मां पातु मूलकासुरघातिनी ॥२६॥
एवं सुतीक्ष्ण सीतायाः कवचं ते मयेरितम् । इदं प्रातः समुत्थाय स्नात्वा नित्यं पठेत्तु यः ॥२७॥
जानकीं पूजयित्वा च सर्वान्कामानवाप्नुयात् । धनार्थी प्राप्नुयाद् द्रव्यं पुत्रार्थी पुत्रमवाप्नुयात् ॥२८॥
स्त्रीकामार्थी शुभां नारी सुखार्थी सौख्यमवाप्नुयात् । अष्टवारं जपनीयं सीतायाः कवचं यदा ॥२९॥
अष्टभ्यो विप्रवर्य्येभ्यो नमः प्रीत्याऽर्पयेन्मनः । फलपुष्पादिसहितानि यानि दानि पृथक् पृथक् ॥३०॥
सीतायाः कवचं चेदं पुण्यं पापनाशनम् । ये पठन्ति नरा भक्त्या ते धन्या मानवा भुवि ॥३१॥
पठति रामकवचं सीतायाः कवचं विना । तथा विना लक्ष्मणस्य कवचेन वृथा स्मृतम् ॥३२॥
तस्मात्तु सदा संजप्यं कवचानां चतुष्टयम् । आदौ तु वायुपुत्रस्य लक्ष्मणस्य ततः परम् ॥३३॥
ततः पठेच्च सीतायाः श्रीरामस्य ततः परम् । एवं सदा जाप्यं कवचानां चतुष्टयम् ॥३४॥
इति सीताकवचम् ।


भालको नृपात्मजा, ऊपर पद्मावतंसा, अधोभागको अनतिसुता और मृगी और दृग रक्षा करें ॥ १७ ॥
स्मितानना मुखकी, नृपात्मजा मस्तककी, भौंहोंके बीचमें पद्मा और दृग तथाकी मृगाक्षी रक्षा करे ॥ १७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी प्रेयसी कपोल और कर्णमूलकी रक्षा करे, नासिकाके अग्रभागकी राजसी मुखकी,
तामसी वाणीकी, पतिव्रता जिह्वाकी, महामाया दाँतकी, कनकप्रभा चिबुककी, सौम्यरूपता कण्ठकी, सुगन्धिता
कन्धोंकी, वरारोहा बाहुकी और कंकणमण्डिता हाथोंकी रक्षा करे ॥ १८-२० ॥ रक्तनखा नाखुनोंकी, लघूदरा
कुक्षिकी, गदापाणी पीठकी, पार्श्वभागकी गन्धमोदिनी और वह्निगुप्ता सदा मेरे पृष्ठदेशकी रक्षा करे ।
दिव्यप्रदा मेरी नाभिका और राक्षसमोहिनी कमरकी रक्षा करे ॥ २१-२२ ॥ रत्नगुप्ता गुदाकी और हरिप्रिया
लिंगकी रक्षा करे। रमेशानी दोनों घुटनोंकी और विषमप्रभािणी जानुभागकी रक्षा करे ॥ २३ ॥ सुभ्रू जंघोंकी,
चामरवीजिता गुल्फकी तथा कृशाङ्गिका शरीरके सब अङ्गोंकी रक्षा करे ॥२४॥ कल्पलता पैरोंकी उँगलियों-
की और पीताम्बरधारिणी मेरे रोमांकी रक्षा करे ॥ २५ ॥ रात्रिके समय कालरूपा, दिनको दर्शनतत्परा और
सब समय मूलकासुरघातिनी मेरी रक्षा करे । २६ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सीता कवच सुनाया ।
जो प्राणी सवेरे स्नानाके बाद नित्य इसका पाठ करके जानकीजीका पूजा करता है, वह अपनी सब इच्छायें
पूर्ण कर लेता है। धनको चाहनेवाला धन और पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाला पुत्र पाता है ॥ २७ ॥ २८ ॥
स्त्रीकी कामनावाला सुन्दरी स्त्री और सुख चाहनेवाला सौख्य पाता है। उपासकको चाहिए कि सदा आठ
बार सीता-कवचका जप करे । आठ ब्राह्मणोंको फलपुष्प आदि वस्तुयें पृथक-पृथक् दान दे ॥ २९ ॥ ३० ॥
यह सीतकवच बड़ा पवित्र और पापोंका नाशक है । जो लोग भक्तिपूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे
प्राणी संसारमें धन्य हैं ॥ ३१ ॥ जो लोग सीता तथा लक्ष्मणकवचका पाठ करते हैं, उनका वह पाठ व्यर्थ हो
जाता है ॥ ३२ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा इन चारो कवचोंका पाठ करे । इसका क्रम इस प्रकार है-
पहले हनुमान्जीका, फिर लक्ष्मणका, इसके बाद सीताका, तदनन्तर श्रीरामकवचका पाठ करना चाहिए

७२०आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

परं सुतीक्ष्ण सीतायाः कवचं ते मयेरितम् । अतः परं शृणुष्वान्यन्सीतायाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥३५॥ यस्मिन्नष्टोत्तरशतं सीतानामानि संति हि । अष्टोत्तरशतं सीतासाम्नां स्तोत्रमनुत्तमम् ॥३६॥ ये पठंति नरास्त्वत्र तेषां च सफलो भवः । ते धन्या मानवा लोके ते वैकुंठं व्रजंति हि ॥३७॥ अस्य श्रीसीतानामाष्टोत्तरशतमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । रमेति बीजम् । मातुलुंगीति शक्तिः । पद्माक्षजेति कीलकम् । अवनिजेत्यस्त्रम् । जनकजेति कवचम् । मूलकासुर-मर्दिनीति परमो मन्त्रः । श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे सकलकामनासिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । अथांगुलिन्यासः । ॐसीतायै अंगुष्ठाभ्यां नमः ! ॐरमायै तर्जनीभ्यां नमः । ॐमातुलुङ्ग्यै मध्यमाभ्यां नमः । ॐपद्माक्षजायै अनामिकाभ्यां नमः । ॐअवनिज्ञायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ! ॐजनकजायै करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अथ हृदयादिन्यासः । ॐसीतायै हृदयाय नमः । ॐरमायै शिरसे स्वाहा । ॐमातुलुङ्ग्यै शिखायै वषट् । ॐपद्माक्षजायै नेत्रत्राय वषट् । ॐजनकत्मजायै अस्त्राय फट् । ॐमूलकासुरमर्दिन्यै इति दिग्बन्धः । अथ सीतानामाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् । वामांगे रघुनाथस्य रुचिरे या संस्थिता शोभना या विप्रान्धिव्यान्नगम्यनयना या विप्रपद्मानना । विद्युत्पुंजविराजमानवसना भक्तातिसंखण्डना श्रीमद्राघवपादपद्मयुगलन्यस्तेक्षणा साऽवतु ॥३८॥ श्रीसीता जानकी देवी वैदेही राघवप्रिया । रमाऽवनिसुता रामा राक्षसान्तप्रकारिणी ॥३९॥ रत्नगुप्ता मातुलुङ्गी मैथिली भक्ततोषदा । पद्माक्षजा कंजनेत्रा स्मितास्या नूपुरस्वना ॥४०॥ वैकुंठनिलया मा श्रीर्मुक्तिदा कामपूरणी । नृपात्मजा हेमवर्णा मृद्वङ्गी सुभाषिणी ॥४१॥ कुशांबिका दिव्यदा च लवमाता मनोहरा । हनुमद्वन्दितपदा मुग्धा केयूरधारिणी ॥४२॥ अशोकवनमध्यस्था रावणादिकमोहिनी । विमानमध्यस्था सुभ्रूः सुकेशी रत्ननान्विता ॥४३॥

॥ ३३ । ३४ ॥ अगस्त्यजी कहते हैं—हे सुतीक्ष्ण ! इस तरह मैने तुम्हें सीताकवच सुनाया। इसके अनन्तर सीताजीका एक दूसरा स्तोत्र सुनाता हूँ ॥ ३५ ॥ जिसमें एक सौ आठ सीताके नाम गिनाये गये हैं। इसलिए इसका नाम "सीतानामाष्टोत्तरशतनाम" रखा गया है । ३६। जो मनुष्य इसका पाठ करते हैं, उनका जन्म सफल हो जाता है। वे मनुष्य धन्य हैं और वे अन्तमें वैकुण्ठलोकको जाते हैं ॥ ३७ ॥ "अस्य श्रीः" यहाँसे "मूलकासुरमर्दिन्यै" यहाँ तक विनियोग तथा अङ्गन्यास आदिका विधान बतलाया गया है ॥ अथ ध्यानम् ॥ जो एक सुन्दर सिंहासनपर रामके वामांगमें बैठी हैं, पूणके नेत्रोंकी भाँति जिसके नेत्र हैं, जो चन्द्रवदनी हैं, जो बिजलीके समूहकी तरह चमकनेवाले कपड़े पहने हैं, जो अपने भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेमें कुछ भी कसर नहीं रखतीं, जिनके नेत्र श्रीरामचन्द्रजीके चरणमें लगे हुए हैं, वे सीता हमारी रक्षा करें ॥ ३८ ॥ अब यहनाम शतनाम कहता हूँ। जैसे—(१) श्रीसीता, (२) जानकी (३) देवी, (४) वैदेही अर्थात् विदेह जनककी पुत्री, (५) राघवप्रिया, (६) रमा (७) अवनिसुता (पृथ्वीकी कन्या), (८) रामा, (९) राक्षसान्तप्रकारिणी (राक्षसों- का नाश करनेवाली), (१०) रत्नगुप्ता, (११) मातुलुङ्गी (१२) मैथिली, (१३) भक्ततोषदा (भक्तोंको प्रसन्न करनेवाली) (१४) पद्माक्षजा (पद्माक्षनामक राजाकी कन्या) (१५) कंजनेत्रा (कमलके समान नेत्रोंवाली), (१६) स्मितास्या (जिसका मुस्कराता हुआ मुख है), (१७) नूपुरस्वना, (१८) वैकुण्ठानिलया (वैकुण्ठलोकमें निवास करनेवाली), (१९) मा (२०) श्री, (२१) मुक्तिदा, (२२) कामपूरणी (अपने भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेवाली), (२३) नृपात्मजा, (२४) हेमवर्णा, (२५) मृद्वङ्गी (जिसका कोमल अङ्ग है), (२६) सुभाषिणी ॥ ३९-४१ ॥ (२७) कुशांबिका (कुशकी माता (२८) दिव्या (लंकासे लौटनेपर रामके कटु वाक्य सुनकर शपथ खानेवाली, २९) लवमाता, (३०) मनोहरा, (३१) हनुमद्वन्दितपदा (हनुमान्जीने जिसके चरणोंकी वन्दना की थी), (३२) मुग्धा (३३) केयूरधारिणी, (३४) अशोकवनमध्यस्था (अशोकवनमें निवास करनेवाली

सर्गः १४] मनोहरकाण्डम् ७२१


रजोरूपा सत्वरूपा तामसी वह्निवासिनी । हेममृगापक्तचित्ता वाल्मीक्याश्रमवासिनी ॥४४॥ पतिव्रता महामाया पीतकौशेयवासिनी । मृगनेत्रा च विद्रोही धनुर्विद्याविशारदा ॥४५॥ सौम्यरूपा दशरथस्नुषा चामरवीजिता सुमेधादुहिता दिव्यरूपश त्रैलोक्यपालिनी ॥४६॥ अन्नपूर्णा महालक्ष्मीर्धीर्लज्जा च सरस्वती । शान्तिः पुष्टिः क्षमा गौरी प्रभाऽयोध्यानिवासिनी ॥४७॥ वसन्तशीतला गौरा रसातलमृतप्लावना रसानासमग्रसंस्था हेमकेयूरमण्डिता ॥४८॥ सुरार्चिता धृतिः कीर्तिः स्मृतिमंधा विभावरी । लघुदरा वरारोहा हेमकुण्डलमण्डिता ॥४९॥ द्विजपत्न्यर्पितनिजभूषा राघवतोषिणी । श्रीरामसेवनरता रत्नताटङ्कधारिणी । ५०। रामवामांगसंस्था च राघवच्छेदकारणी शरयूरसक्रीडाकारिणी राममोहिनी । ५१॥ सुवर्णतुलिता पुष्पा पुण्यकीर्त्तिः कलस्वती । कलगण्ठा कम्बुकण्ठा २भेरूर्मजगामिनी । ५२. रामचिन्तमना रामवन्दिता रामवल्लभा । श्रीरामपदचिह्नाङ्का रामरामेति भाषिणी ५३। रामपर्यङ्कशयना रामांप्रिक्षालिनी वरा । कामधेनुप्रसन्तुष्टा मातुलुङ्गकरे धृता । ५४ । दिव्यचन्दनसंस्था श्रीमूककासुरमर्दिनी । एवमष्टोत्तरशतं सीतानाम्नां सुपुण्यदम् । ५५ । ये पठंति नरा भूमौ ते धन्याः स्वर्गगामिनः । अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतायाः स्तोत्रमुत्तमम् । ५६ जपनीयं प्रयत्नेन सर्वदा भक्तिपूर्वकम् । सन्ति स्तोत्राण्यनेकानि पुण्यदानि महान्ति च ॥५७॥


(३५) रावण निकृन्तयिनी, (३६) विमानगता (३७) मुदा (३८) मृगेशी, (३९) रत्नमण्डिता (४०) रजोरूपा (४१) सत्वरूपा (४२) तामसी, (४३) वह्निवासिनी (अग्निमें निवास करनेवाली), (४४) हेममृगा-सक्तचित्ता (सुवर्णके मृगमें जिनका मन आसक्त हो गया था) (४५) वाल्मीक्याश्रमवासिनी (वाल्मीकिके आश्रममें निवास करनेवाली) । ४४ ॥४० (४६) पतिव्रता (४७) महामाया, (४८) पीतकौशेयवासिनी (रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाला), (४९) मृगनेत्रा, (५०) विद्रोही, (५१) धनुर्विद्याविशारदा (धनु-विद्यामें निपुण) (५२) सौम्यरूपा (५३) दशरथस्नुषा (५४) चामरवीजिता, (५५) सुमेधादुहिता, (५६) दिव्यरूप, (५७) त्रैलोक्यपालिनी (५८) अन्नपूर्णा (५६) महालक्ष्मी, (६०) धी, (६१) लज्जा, (६२) सरस्वती, (६३) शान्ति, (६४) पुष्टि (६५) क्षमा (६६) गौरा, (६७) प्रभा, (६८) अयोध्या-निवासिनी, (६६) वसन्तशीतला, ७०) गौरा (७१) रसातलमृतप्लावना (वर्षाके ऋतुमें शीतलता होती उसके अनुसार हरण करनेसे सन्तुष्ट रहनेवाली (७२) रसानासमग्रसंस्था, ७३) हेमकेयूरमण्डिता, (७४) सुरार्चिता, (७५) धृति (७६) कीर्ति (७७) स्मृति, (७८) मेधा, (७६) विभावरी, (८०) लघुदरा, (८१) वरारोहा । ८२) हेमकुण्डलमण्डिता ॥ ४५-४९। (८३) द्विजपत्न्यर्पितनिजभूषा (जिसने अपने सब आभूषण एक ब्राह्मणीको दे दिये थे), (८४) राघवतोषिणी, (८५) श्रीरामसेवनरता, (८६) रत्नताटङ्क-धारिणी (रत्नके बने कर्णफूल पहननेवाली) ॥ ५० ॥ (८७) रामवामांगसंस्था, (८८) राघवच्छेदकारिणी, (८९) शरयूरसक्रीडाकारिणी (सरयूर्जाके जलमें विहार करनेवाला, ९०) राममोहिनी, (९१) सुवर्ण-तुलिता, (९२) पुष्पा (९३) पुण्यकीर्ति, (९४) कलस्वती, (६५) कलगण्ठा, (६६) कम्बुकण्ठा, ९७) गम्भीरा, (६८) गजगामिनी, (६९) रामचिन्तमना, (१००) रामवन्दिता, (१०१) रामवल्लभा, (१०२) श्रीरामपदचिह्नाङ्का (जिनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणका चिह्न विद्यमान है), (१०३) रामरामेतिभाषिणी (सदा राम राम कहनेवाली) (१०४) रामपर्यङ्कशयना, (१०५) रामांघ्रिक्षालिनी (रामके पैर धोनेवाली), (१०६) कामधेनुप्रसन्तुष्टा, (१०७) मातुलुङ्गकरधृता, (१०८) दिव्यचन्दनसंस्था शूलकासुरघातिनी (दिव्य चन्दनपर स्थित एवं शलकासुरका नाश करनेवाली) ये एक सौ आठ सीताजीके नाम बड़े पुण्यदायी हैं ॥ ५१-५५ ॥ जो लोग इस अष्टोत्तरशतनामक पाठ करते हैं, वे धन्य और स्वर्गगामी होते हैं । यह स्तोत्र सर्वोत्तम है ॥ ५६ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा भक्तिपूर्वक इसका पाठ किया करें । यद्यपि बहुतसे बड़े-बड़े और-और पुण्यदायक स्तोत्र हैं, किन्तु हे भूसुर ! वे सब इसके

७२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १४

दानेन सदृशानीह तानि सर्वाणि भूसुर। स्तोत्राणामुत्तमं चेदं भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥५८॥ एवं सुतीक्ष्ण ते प्रोक्तमष्टोत्तरशतं शुभम्। सीतानाम्नां पुण्यदं च श्रवणान्मङ्गलप्रदम् ॥५९॥ नरैः प्रातः समुत्थाय पठितव्यं प्रयत्नतः। सीतापूजनकालेऽपि सर्ववाञ्छितदायकम् ॥६०॥ अन्यत्सीतातोषदानि व्रतादीनि महान्ति च। यानि संत्यत्र ते शिष्य तानि सम्यग्वदाम्यहम् ॥६१॥ नारीभिस्तु सदा कार्यं सीतायास्तुष्टिहेतवे। वसन्तशीतलागौरीस्नानं तथै तु तत्कृते ॥६२॥ यत्र सीताकृतं तीर्थं रामतीर्थं न वर्तते। तथा लक्ष्म्याश्च गौर्याश्च सरस्वत्यादियोषिताम् ॥६३॥ तीर्थेषु च सदा कार्यं तदभावे नदीषु च। यत्र यत्र रामतीर्थं तद्वामे जानकीकृतम् ॥६४॥ ज्ञेयं तीर्थं तु सर्वत्र नैकं ज्ञेयं तु राघवम्। वसन्तशीतलागौरीस्नानं सौभाग्यवर्धनम् ॥६५॥ न कुर्वन्त्यथ या नार्यः स्नानन्ताः सप्तजन्मसु। भवन्ति विधवास्तस्मात्सदा स्नानं समाचरेत् ॥६६॥

सुतीक्ष्ण उवाच भो गुरो शीतलागौरीस्नानस्योद्यापनं कथम्। स्त्रीभिः कार्यं वदस्वाद्य सविस्तारं शुभावहम् ॥६७॥

अगस्तिरुवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सुतीक्ष्ण शृणु सादरम्। चैत्रमासे सिते स्त्रीभिस्तृतीयायाः षडाह्न वै ॥६८॥ कार्यं तु शीतलागौरीस्नानं त्रिंशद्दिनानि हि। वैशाखस्य सिते पक्षे द्वितीयायामुपोष्य च ॥६९॥ स्त्रीभिश्च विधिना कार्यं निशायामधिरोचनम्। पूर्वोक्तञ्च प्रकर्तव्यं मण्डपादिकमुत्तमम् ॥७०॥ तत्र रघूनामपदमष्टोत्तरसहस्रकम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं वृक्षाणान्यन्यानि वा क्रमात् ॥७१॥ स्थापनीयं मध्यदेशे तन्मध्ये पद्मजोपरि। धान्यराशिं तोयपूर्णः स्थापनीयो घटः शुभः ॥७२॥ तन्मुखे ताम्रपात्रं च स्थापनीयं तु विस्तृतम्। आच्छाद्य पात्रं कौशेयवस्त्रेण तन्मनोरमम् ॥७३॥ तस्मिन्सीतारामयोश्च द्वे मूर्ती रूपविनिर्मिते। स्थापनीये पूजनीये षोडशैरुपचारकैः ॥७४॥ नवमाषात्मको रामः सीताऽष्टमाषनिर्मिता। निजशक्त्याऽथवा कार्ये द्वे मूर्ती रजतस्य वा ॥७५॥

बराबर नहीं हो सकते । यह स्तोत्र सब स्तोत्रोंमें उत्तम तथा भुक्ति-मुक्तिदायक है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस तरह मैंने तुमसे सीताजीका अष्टोत्तरशतनाम कहा, जो पुण्यदायक और सुननेसे मङ्गलदाता है ॥ ५९ ॥ लोगोंका चाहिय कि रोज सबेरे उठकर और सीताका पूजन करके अवश्य इसका पाठ करें । ऐसा करनेसे उनके कामनाएं पूर्ण हो जायँगी । इसके अतिरिक्त और भी बहुतसे ऐसे व्रत आदि हैं, जिनसे सीताजी प्रसन्न हो सकती हैं। हे शिष्य ! उन्हें आज मैं तुम्हें बतलाता हूँ । ६० । ६१ ॥ सीताजी- को प्रसन्न करनेके लिए स्त्रियोंको चाहिए कि सीताके द्वारा स्थापित किसी भी तीर्थमें जाकर शीतलागौरीका व्रत करे ॥ ६२ ॥ यदि आसपास कोई सीताकृत न हो तो लक्ष्मी, गौरी तथा सरस्वती आदि किसी भी देवीके तीर्थमें उक्त जप करें । यदि वह भी न हो तो किसी नदीके तटपर जाकर व्रत करें । जहाँ-जहाँ रामतीर्थ है, उसके वामभागमें सीतातीर्थ अवश्य रहता है। कहींपर भी अकेला रामतीर्थ नहीं रहता । वसन्तशीतला गौरी नामक व्रत स्त्रियोंका सौभाग्य बढ़ाता है ॥ ६३ ६४ ॥ जो स्त्रियां इस व्रतको नहीं करतीं, वे सात जन्म तक नष्ट विधवा रहकर जीवन बिताती हैं। इससे स्त्रियोंको सदा शीतलागौरीका स्नान करना चाहिए ॥ ६६ ॥ सुतीक्ष्णने कहा-हे गुरो ! इस शीतला गौरीका स्नान करनेके अनन्तर इसका उद्यापन कैसे करना चाहिए। सो मुझे आप विस्तारपूर्वक बताइए । ६७॥ अगस्त्यजीने कहा-हे शिष्य सुतीक्ष्ण ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सुनो। चैत्रशुक्ल तृतीयासे लेकर तीस दिनतक शीतलागौरीका स्नान करें और वैशाख शुक्ल द्वितीयाको उपवास करके रात्रिके समय पूर्वोक्त विधिके अनुसार मण्डप आदि बनावे ॥ ६८-७० । उसमें अष्टोत्तरसहस्रात्मक रघूनामतोभद्र, षष्टीत्तरशतात्मक या और कम संख्याका भद्र बनाकर उसके मध्यमें कमलपर धान्यराशि रखकर जलसे भरा घट स्थापित करे । ७१ ॥ ७२ । कलशके मुखपर एक बड़ा-सा ताम्रपात्र रक्खे और उसको रेशमी वस्त्रसे ढांक दे ॥ ७३ ॥ उसपर सुवर्णकी बनी हुई सीता

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७२३

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७२३

गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यवसनादिकम् । सर्वं पृथगष्टविधं जानक्यै तु निवेदयेत् ॥७६॥ ततः स्त्रीभ्यो वायनानि वस्त्रालंकारसंयुभिः । कुंकुमादिपूरितानि देयानि विविधानि च । ७७॥ देयानि कांस्यपात्राणि पक्वान्नपूरितानि च । त्रयस्त्रिंशत्तथा ऽष्टाविंशतिर्देयानि शक्तितः । ७८॥ त्रयस्त्रिंशच्च युग्मानि भोजयेच्च प्रयत्नतः । अथवा ऽष्टौ यथाशक्त्या भोजनीयानि पट्टशैः । ७९॥ रात्रौ जागरणं कार्यं गीतवाद्यादिमङ्गलैः । प्रातःकाले तृतीयायां स्नात्वा सम्पूज्य जानकीम् ८०। होमश्चापि प्रकर्तव्यः सीतामन्त्रेण यत्नतः । तिलाज्यैः पायसैश्चापि सहस्राण्यष्टभूसुरैः । ८१॥ मुद्गहीनं नवान्नं च ज्ञेयमशानमुत्तमम् । तन्मीतातोपदं ज्ञेयं तेन वा जुहुयात्सुखम् ॥८२॥ ततः स्वयं सुहन्मित्रैर्भुक्त्वा च यथासुखम् । एवमुद्यापनविधिस्तत्राग्रे विनिवेदितः ॥८३॥

श्रीरामदास उवाच

अगस्तिना सुनीथाय यदिदं कथितं पुरा । तत्सर्वं च त्वया पृष्टं मया तेऽद्य निवेदितम् ॥८४॥

विष्णुदास उवाच

कथं रमारामभद्रं कार्यं स्त्रीभिः प्रपूजने । तत्सर्वं विस्तरेणाद्य कथयस्व महाप्रभो । ८५॥

श्रीरामदास उवाच

यथा प्रोक्तं मया शिष्य रामतोभद्रमुत्तमम् । कार्यं रमारामभद्रं तथैव सकलं शुभम् ॥८६॥ किंचिद्विशेषस्तत्रास्ति नवभ्यः षट्पदाष्टकम् । लिंगस्थलेषु कर्तव्या वापिकाश्चैव पूर्ववत् ॥८७॥ मुद्रायामेव किंचिच्च विशेषोऽस्ति शृणुष्व तम् । नकारश्च मकारश्च पर्यटन्नूर्ध्वमेवचः ॥८८॥ ऊर्ध्वं रमेश्वक्षरे द्वे रचनीये तु पूर्ववत् एवं कृत्वा रमानाम् क्षेत्रवर्णं निरीक्षयेत् ॥८९॥ एतद्रमारामभद्रं देवानां पूजनादिषु । नानाकर्मसु सर्वेषु कर्तव्यं च प्रयत्नतः ॥९०॥ विना रमारामभद्राद्यानि देव्याः कृतानि हि । पूजनादीनि कर्माणि तानि ज्ञेयानि मानवैः ॥९१।


और रामकी दो मूर्ति रख और पाद्यप्रचारसे उनका पूजा करे ॥ ७४ ॥ मूर्तियोंमे नौ मासे सुवर्णसे रामकी और आठ मासे सुवर्णसे सीताकी मूर्ति बनवावे । यदि ऐसा न हो सके तो अपनी शक्ति अनुसार चाँदी-की दो प्रतिमाएं बनवा ले ॥ ७५ ॥ इसके अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा आठ प्रकारके वस्त्र आदि सीताको अर्पण करे ॥ ७६॥ इसके बाद वस्त्र-अलंकार आदि वस्तुय तथा कुमकुम आदिके साथ विविध प्रकारके बायन दे ॥ ७७॥ तदनन्तर तरह-तरहके पक्वान्नसे भरकर तेतीस, आठ अथवा तीन कांस्यपात्र अपण करे ॥ ७८ ॥ इसके बाद तेतीस बाह्मणदम्पती, आठ ब्राह्मण अथवा जैसी अपनी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार ब्राह्मणदम्पतियोंको भोजन कराये । ७९ ॥ रात्रिभर गीत-वाद्य आदि मङ्गलमय कार्य करता हुआ जागरण करे । तृतीयाको प्रातःकाल स्नान करके जानकीजीका पूजन करे और तिल, घो तथा खीरसे आठ ब्राह्मणोंके साथ सीतामन्त्रसे होम करे ॥ ८० ॥ ८१ ॥ मूंगको छोड़कर अन्य नौ प्रकारके अन्न सीताजीको बहुत प्रिय हैं यदि हो सके तो उन्होंसे हवन करे ॥ ८२ । इसके बाद अपने हित मित्रोदिके साथ सुखपूर्वक भोजन करे । इस तरह उद्यापनविधि मैने तुमसे कही ॥ ८३ । श्रीरामदासने कहा-तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैने यह सब बातें कह दीं, जो सुनीथजीको अगस्त्यजीने बतलायी थीं ॥ ८४ । विष्णुदासने कहा कि जब स्त्रियां पूजन करने लगें तो रमारामक भद्रकी रचना किस प्रकार करें । वह आप हमें विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ ८५ ॥ श्रीरामदासने कहा-पहले मैने जो रामतोभद्र रचनाकी विधि बतायी है, ठीक उसी तरह रमारामतोभद्रकी भी रचना होगी ॥ ८६ ॥ ८७॥ इसकी मुद्रामें थोड़ासो विशेषता है । सो मैं तुमको बताये देता हूँ, सुनो । वकार और मकार ये दोनों पहलेकी ही तरह निचले भागमें बनावे ॥ ८८ ॥ ऊपर रना इन दो अक्षरोंको भी पहले ही की तरह रचना करे। ऐसा कर लेनेके बाद रमा इस नामका भद्रके इर्दत भागम उथड़ा देखे । ८६ ॥ देवी आदिकी पूजाके अवसरपर अथवा और-और प्रकारके शुभ कर्ममे प्रयत्न करके इस रमानामनो भद्र-

७२४आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

अकृतान्यत्र तस्माद्धि कर्तव्यं यत्नतस्त्विदम् । कृत्वा रमानामतभद्रं या पूजा मानवर्भुवि ॥९२॥ सा देव्यै तोषदा ज्ञेया तस्मान्कार्या प्रयत्नतः । पूर्वोक्तानि दैवतानि तान्येवात्र विचिन्तयेत् ॥९३॥ आवाहयेच्च मुद्रार्यां जानकीं रघुनन्दनम् । अन्यच्चशृणुष्व भो शिष्य सीतारामप्रपूजने ॥९४॥ रमानामतौभद्रं च कार्यं वा मानवर्भुवि । तच्चापि पूर्ववत्सर्वं कर्तव्यं मानवैर्धिया ॥९५॥ इदं सीतारामयोश्च पूजनाथं प्रकल्पयेत् रामनाम्ना रमानाम्ना इदं भद्रं महच्छुभम् ।९६॥ यत्र द्वयोर्नामनी च रमा रामेति चोभभे । रमागभतो भद्रं च तस्माच्छ्रेष्ठं प्रकल्पयेत् । ९७ । रामभद्रोक्तान्त्येव दैवतान्यत्र विनितेयेत् एवं शिष्य त्वया पृष्ट यद्यत्तसन्मयोदितम् । ९८॥ का तेऽन्यास्ति स्पृहा श्रोतुं वद तां तद्वदाम्यहम् ।

विष्णुदास उवाच
कवचं लक्ष्मणस्यापि पठनीयमिति स्मृतम् ॥९९ ।
पुरा गुरो त्वया तच्च मां वदश्व मविस्तरात् । भरतस्यापि कवचं शत्रुघ्नस्य तथा वद ॥१००॥

श्रीरामदास उवाच
एवमेव सुतीक्ष्णेन पृष्टं च कुंभजन्मना । पुरा तद्विस्तरेणाद्य तवाग्रे कथयाम्यहम् ॥१०१॥

सुतीक्ष्ण उवाच
गुरो त्वया पुरा प्रोक्तं कवचं लक्ष्मणस्य च । पठनीयं जनैश्चेति तन्मामद्य प्रकाशय ॥१०२।
भरतस्यापि कवचं शत्रुघ्नस्य तथा वद ।

अगस्तिरुवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । आदौ सौमित्रिकवचं कथ्यतेऽद्य मया शुभम् ॥१०३।

इति श्रीशतकोटिकामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे सीतारामकवचादिनिरूपणं नाम चतुर्दश सर्गः ॥ १४ ॥


की रचना करें ॥ ९०॥ बिना रमानामतभद्रक दैवपूजन आदि जितना भी कृत्य किया जाता है, वह सब व्यर्थ हो जाया करता है। अतएव रमानामतभद्रकी स्थापना अवश्य करनी चाहिये। रमानामताभद्रमें लग जो पूजन आदि करते हैं, वह सफल होता है ॥९१॥९२। इससे देवी प्रसन्न होती हैं। इस कारण यत्नपूर्वक ऐसा करना चाहिए। पूर्वम जितने देवता कह आये हैं, वे सब इस भद्रमे भी रहेंगे ॥९३॥ हाँ, यह बात अवश्य है कि इस भद्रमे राम और सीताका आवाहन करे। हे शिष्य ! सीतारामके पूजनके विषयम और भी कुछ विशेष बातें हैं। उन्ह कहता हूँ सुनो ॥ ९४ । कोई भी पूजन करते समय रमानामतभद्रकी स्थापना अवश्य करे। उस भद्रमे पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही सब बातें रहेंगी ॥९५॥ सीता और रामकी पूजाके निमित्त इसको स्थापना की जाती है और केवल रामतातोभद्र अथवा केवल रामतोभद्रसे यह भद्र श्रेष्ठ है ॥ ९६॥ इस भद्रमें रमा और राम इन दोनोंके नाम आ जाते हैं इसीलिए यह भद्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है ॥ ९७ ॥ रामतोभद्रमें कहे हुए ही देवता इस भद्रमें रहेंगे इस तरह हे शिष्य ! तुमने हमसे जो पूछा, वह मैने तुमसे कहा ॥ ९८ । अब क्या सुननेका इच्छा है सो बताओ, मै कहूँ। विष्णुदास बोले-आपने कहा था कि लक्ष्मणके कवचका भी पाठ करना चाहिए। सो उसे भी बताइए ॥९६.११००' श्रीरामदासने कहा कि इस तरह सुतीक्ष्णने भी अगस्त्यजीसे प्रश्न किया था तो उन्होंने सुतीक्ष्णसे जो कुछ कहा था, यहा मै तुमसे कह रहा हूँ ॥ १०१ ॥ सुतीक्ष्णने कहा हे गुरो ! आपने एक बार हमसे कहा था कि लोगोंको लक्ष्मणकवचका भी पाठ करना चाहिए सो कृपा करके आप हमें लक्ष्मणकवच बताइए। उसके साथ साथ भरत तथा शत्रुघ्नकवच भी बतला दीजिए। अगस्त्यने कहा-हे वत्स ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो। पहले मै लक्ष्मणकवचका ही वर्णन कर रहा हूँ ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे चतुर्दशः सर्गः । १४ ॥

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७२५


पञ्चदशः सर्गः

(लक्ष्मण-भरत तथा शत्रुघ्नकवच)

सौमित्रिं रघुनायकस्य चरणद्वन्द्वेक्षणं श्यामलं बिभ्रन्तं स्वकरेण रामशिरसि छत्रं विचित्रं वरम् ।
बिभ्रतं रघुनायकस्य सुमहत्कोदण्डवामे करे वन्दे रत्नसलक्षणं जनकजावाक्ये सदा तत्परम् ॥ १ ॥

ॐ अस्य श्रीलक्ष्मणकवचमन्त्रस्य। अगस्त्यऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। श्रीलक्ष्मणो देवता। शेष इति बीजम्। सुमित्रानन्दन इति शक्तिः। रामानुज इति कीलकम्। रामदास इत्यस्त्रम्। रघुवंशज इति कवचम्। सौमित्रिरिति मन्त्रः। श्रीलक्ष्मणप्रीत्यर्थं सकलमनोऽभिलषितसिद्धयर्थं जपे विनियोगः। अथाङ्गुलिन्यासः। ॐ लक्ष्मणाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ शेषाय तर्जनीभ्यां नमः। ॐ सुमित्रानन्दनाय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ रामानुजाय अनामिकाभ्यां नमः। ॐ रामदासाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ रघुवंशजाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः। ॐ लक्ष्मणाय हृदयाय नमः। ॐ शेषाय शिरसे स्वाहा। ॐ सौमित्राय शिखायै वषट्। रामानुजाय कवचाय हुम्। रामदासाय नेत्रत्रयाय वौषट्। रघुवंशजाय अस्त्राय फट्। ॐ सौमित्रये इति दिग्बन्धः।

अथ सध्यानं लक्ष्मणकवचम्

रामपृष्ठस्थितं रम्यं रत्नकुण्डलधारिणम्। नीलोत्पलदलश्यामं रत्नकङ्कणमण्डितम् ॥ २ ॥
रामस्य मस्तके दिव्यं बिभ्रतं छत्रमुत्तमम्। वीरं पीताम्बरधरं मुकुटेनातिशोभितम् ॥ ३ ॥
तूणीरे कार्मुके चापि बिभ्रन्तं च स्मितवाननम्। रत्नमालाधरं दिव्यं पुष्पमालाविराजितम् ॥ ४ ॥
एवं ध्यात्वा लक्ष्मणं च रामचन्द्रनलोचनम्। कवचं जपनीयं हि ततो भक्त्याऽथ मानवः ॥ ५ ॥
लक्ष्मणः पातु मे पूर्वं दक्षिणं राघवानुजः। प्रतीच्यां पातु सौमित्रिः पातूदीच्यां रघूत्तमः ॥ ६ ॥
अधः पातु महारथीश्चोर्ध्वं पातु नृपात्मजः। मध्ये पातु रामदासः सर्वतः सत्यपालकः ॥ ७ ॥
स्मिताननः शिरः पातु भालं पातुर्मितात्मजः। भ्रुवोर्मध्ये धनुर्धारी सुमित्रानन्दनोऽक्षिणी ॥ ८ ॥
कपोले राममन्त्री च सर्वदा पातु वै मम। कर्णमूले सदा पातु कवचप्रज्वलत्तनः ॥ ९ ॥


अगस्त्यजीने कहा—मैं उन लक्ष्मणजीकी वन्दना करता हूँ, जो सदा रघुनाथजीके दोनों चरणकमल देखा करते हैं, जो अपने हाथसे रामचन्द्रजीके शिरपर छत्रकी छाया किये रहते हैं। जो कन्धेपर रामचन्द्रजीका धनुष धारण किये रहते हैं। जो सर्वदा जानकीजीकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर रहते हैं और कमलके समान जिनकी आँखें हैं ॥ १ ॥ "अस्य श्री" से लेकर "ॐ सौमित्रये इति दिग्बन्धः" यहां तक विनियोग और अङ्गन्यासकी विधि बतलायी गयी है। उसके आगे लक्ष्मणजीका ध्यान है—जो रामचन्द्रजीके पीछे बैठे हैं, जिनका मनोहर स्वरूप है, रत्नजड़ित कुण्डल जिनके कानोंमें झलक रहे हैं, नील कमलके समान जिनके मुखकी आभा है और जिनके हाथमें रत्नजड़ित कङ्कण पड़े हैं ॥ २ ॥ वीर लक्ष्मण रामके ऊपर दिव्य छत्र लगाये हुए हैं, सुन्दर पीताम्बर पहने हैं और मुकुटसे जो अतिशय शोभायमान दीख रहे हैं ॥ ३ ॥ जो तूणीर तथा धनुष धारण किये हैं, मुसकाता हुआ जिनका मुखारविन्द है, रत्नोंकी माला जिनके गलेमें पड़ी है, जिनका दिव्य वेष है और जो फूलोंकी मालाओंसे और भी सुन्दर दीख रहे हैं ॥ ४ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीपर दृष्टि लगाये लक्ष्मणजीका ध्यान करके लोगोंको चाहिए कि भक्तिपूर्वक लक्ष्मणकवचका पाठ करें ॥ ५ ॥ लक्ष्मणजी मेरे पूर्वभागकी रक्षा करें और दक्षिणभागमें राघवानुज पश्चिम ओर सौमित्रि तथा उत्तर भागकी रघूत्तम रक्षा करें ॥ ६ ॥ निचले भागमें रघुवीर, ऊपर नृपात्मज मध्यमें रामदास और चारों ओर सत्यपालक रक्षा करें ॥ ७ ॥ जिसकी स्मिता-

७२६ आनन्दरामायण [सर्ग १६


नासाग्रं मे सदा पातु सुमित्रानन्दवर्धनः । रामवक्त्रेक्षणः पातु सदा नेत्रे भुवि ममैव ॥१०॥ सीतावाक्यकरः पातु मम वाणीं सदाऽत्र हि । सौम्यरूपः पातु जिह्वामाननं पातु मे द्विजान् ॥११॥ चिबुकं पातु रक्षोघ्नः कण्ठं पात्वसुरान्तकः । स्कन्धौ पातु जितारिर्भुजौ पङ्कजलोचनः ॥१२॥ करौ कङ्कणधारी च नखान् रक्तनखोऽवतु । कुक्षिं पातु जितेन्द्रारिर्मे वक्षः पातु जितेन्द्रियः ॥१३॥ पार्श्वं गरुडपृष्ठस्थः पृष्ठदेशं मनोज्ञपः । नाभिं गम्भीरनाभिस्तु कटिं च रूपवान्सदा ॥१४॥ गुह्यं पातु महासक्तः पातु लिंगं हरिप्रियः । ऊरू पातु विष्णुभक्तः समुद्गाढान्तु जानुनी ॥१५॥ नागेन्द्रः पातु मे जङ्घे गुल्फौ तूर्णार्चनक्षमः । पादपद्मद्वयोऽप्यत्र पादाङ्गानि सुलोचनः ॥१६॥ चित्रकेतुपिता पातु मम पादाङ्गुलीः सदा । शेषांगि मे सदा पातु मूर्धानं शम्भुसुद्रवः ॥१७॥ दशरथसुतः पातु निशायां मम सादरम् । सुगोलोऽव्यान्मां पातु दिवसे दिवसे सदा ॥१८॥ सर्वकालेषु सौमित्रिजित्वाऽवतु सर्वदा । एवं सौमित्रिकवचं सुतीक्ष्ण कथितं मया ॥१९॥ इदं प्रातः समुत्थाय यः पठेन्मन्त्र मानवः । न जन्माश्रमतो लोके तस्यैव सफलो भवः ॥२०॥ सौमित्रेः कवचस्यास्य पठनान्निःसंदेहं हि । पुत्रार्थी लभते पुत्रान धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥२१॥ पत्नीकामो लभेत्पत्नीं गोधनाथी तु गोधनम् । धान्यार्थी प्राप्नुयाद्धान्यं राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात् ॥२२॥ पठित्वा रामकवचं सौमित्रिकवचं विना । घृतं दुग्धे नोपेन तद्वत्स्यात् निष्फलं न तत्फलम् ॥२३॥ केवलं रामकवच पाठेन मानवैर्दि त्वपाठ्यः । सुसन्तुष्टा न स्याद्रघुनन्दनः ॥२४॥ अतः प्रयत्नतश्चेदं सौमित्रिकवचं नृभिः । पठनीयं प्रयत्नेन सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥२५॥


तन, रक्षाकरा उर्मिलानाथ दोनों बाणस धनुधारी और औघाड सुमित्रानन्दन रक्षा करें ॥ ९॥ कमलकी शभामय्या सदा रक्षा करत हैं जो कभी वा उस पदमका सुगंधी पाइन करनेवाले लक्ष्मणजी रक्षा करते रहें ॥ २ । सुमित्र जी आनन्द बढ़ानेवाले नग पातक अपने प्राणों को सावर । रामका अग निहारते हुए लक्ष्मण सर्वदा मेरे मुखकी रक्षा करैं ॥ १०॥ सदा आशाका पालन करनेवाले लक्ष्मणजी सर्वदा मेरी वाणीकी रक्षा करें । सौम्यरूपवाले जि... की तथा प्रसन्नतावाली मेरी आनन दाँत की रक्षा करें ॥ ११ । राक्षसोंके संधकारी मेरे चिबुककी रक्षा करें असुरोंका नाश करनेवाले कण्ठका रक्षा करें, शत्रुओं जीतने वाले मेरे स्कन्धोंकी रक्षा करें और कमल सदृश नेत्रवाले दोनों भुजायोंकी रक्षा करें ॥ १२ । कङ्कणको धारण करनेवाले हाथकी रक्षा करें, लाल नखवाले नखोंकी रक्षा करें, शत्रुको जीतनेवाले लक्ष्मणजी मेरी कोखकी रक्षा करें और जितेन्द्रिय लक्ष्मणजी मेरे वक्षस्थल की रक्षा करें ॥ १३॥ रामचन्द्रजीके पीछे बैठनेवाले लक्ष्मणजी मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें, गम्भीर नाभिवाले नाभिस्थूल सुगन्धमय मरुत्त्वाद् मेरे मेरी कमरकी रक्षा करें ॥ १४ ॥ कृपालुपाल लक्ष्मण गुह्येन्द्रिय रक्षा करें, लक्ष्मण भगलिंगकी रक्षा करें विष्णुके सदृश रूपवाले लक्ष्मणजी पुट्ठों की तथा सुन्दर रूपवाले मेरे जानुभागकी रक्षा करें ॥ १५ ॥ सर्पोंके राजा मेरी जंघाओंकी घुंघुरवाले पैर घुटनोंकी, अङ्गुष्ठवान मेरे पैरोंकी तथा सुन्दर आँखोंवाले लक्ष्मणजी मेरे समस्त अङ्गोंकी रक्षा करें ॥ १६ ॥ चित्रकेतुके पिता मेरे पैरकी उँगलियों तथा मूर्धाभाग उत्पन्न इत्यादिक लक्ष्मण मेरे गात्रकी रक्षा करें ॥ १७ ॥ रात्रि के समय दशरथके पुत्र भली करें और दिनके समय भूपाल- धारी लक्ष्मणजी मेरी रक्षा करते रहें ॥ १८ ॥ इन्द्रजित् मेघनाद का मारनेवाले सबदा मेरी रक्षा करत रहें। हे सुतीक्ष्ण, इस तरह मैंने तुम्हें लक्ष्मणकवच कह सुनाया ॥ १९ ॥ जो लोग सवेरे उठकर इस कवचका पाठ करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं और उनका जन्म सफल है ॥ २० ॥ लक्ष्मणजीके इस कवचका पाठ करनेसे पुत्रार्थी पुत्र तथा धनार्थी धन पाता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ २१ ॥ पत्नीका कामनावाला प्राणों प्यारी, गोधन चाहनेवाला गोधन, धान्यका इच्छुक धान्य और राज्यकी इच्छा रखनेवाला राज्य पाता है ॥ २२ । बिना लक्ष्मणकवचका पठितव्य रामकवचका पाठ उसतरह व्यर्थ जाता है, जिस तरह घारु विना नेवेद्य लगाया जाय ॥ २३ । केवल रामकवचका पाठ करनेसे रामचन्द्रजी विशेष प्रसन्न नहीं होते। २४ ॥ इसलिए

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७२७

अतः परं भरतस्य कवचं ते वदाम्यहम् । सर्वपापहरं पुण्यं सदा श्रीरामभक्तिदम् ॥ २६॥
कैकेयीतनयं सदा रघुपतेर्नेत्रेक्षणं श्यामलं सप्तद्वीपपतेर्विदेहतनयाकान्तस्य वक्ये रतम्
श्रीसीताधवलातपत्ननिकटे स्थित्वा वरं चामरं धृत्वा दक्षिण करेण भरतं संवीजयन्तं भजे ॥२७॥

ॐ अस्य श्रीभरतकवचमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः । श्री भरतो देवता अनुष्टुप्छन्दः । शंख इति बीजम् । कैकेयीनन्दन इति शक्तिः । भरतखण्‍डेश्वर इति कीलकम् । रामानुज इत्यस्त्रम् । सप्तद्वीपेश्वराज्ञाम इति कवचम् रामांशज इति मन्त्रः श्रीभरतप्रीत्यर्थे सकलमनोरथसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । अथाङ्गन्यासः ॐ भरताय अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ कैकेयीनन्दनाय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ भरतखण्‍डेश्वराय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ रामानुजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॐ शंखाय शिरसे स्वाहा ॐ कैकेयीनन्दनाय शिखायै वषट् । ॐ भरतखण्‍डेश्वराय कवचाय हुम् । ॐ रामानुजाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ सप्तद्वीपेश्वराज्ञाय अस्त्राय फट् । रामांशजाय चेति दिग्बन्धः ।

अथ सध्यानं भरतकवचम्

रामचन्द्रसव्यपार्श्वे स्थितं कैकेयीसमुद्भवम् । रामाय चामरेणैव वीजयन्तं मनोहरम् ॥ २८॥
रत्नकुण्डलकेयूरकंकणादिविभूषितम् । पीताम्बरपरीधानं वनमालाविराजितम् ॥ २९॥
मांडवीशौतचरणं रशनानूपुरान्वितम् । नीलोत्पलदलश्यामं द्विजराजसमाननम् ॥३०॥
आजानुबाहुं भरतखंडस्य प्रतिपालकम् । रामानुजं स्मितास्यं च शत्रुघ्नपरिवन्दितम् ॥३१॥
रामम्यस्तेक्षणं सौम्यं विद्युत्पुञ्जसमप्रभम् । रामभक्तं महावीरं वन्दे तं भरतं शुभम् ॥३२॥
एवं ध्यात्वा तु भरतं रामपादेश्वण हृदि । कवचं पठनीयं हि भरतस्येदमुत्तमम् ॥३३॥
पूर्वतः भरतः पातु दक्षिणे कैकयीसुतः । नृपात्मजः प्रतीच्यां हि पातूदीच्यां रघूत्तमः ॥३४॥
अधः पातु श्यामलांगश्चोर्ध्वं दशरथात्मजः । मध्ये भारतवर्षेशः सर्वतः सूर्यवंशजः ॥३५॥


लोगोंको चाहिए कि प्रयत्न करके सब प्रकारकी कामना पूर्ण करनेवाले इस लक्ष्मणकवचका पाठ अवश्य करें ॥ २५ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! अब मैं तुम्हें श्रीभरतजीका कवच बताऊंगा, जो पापोंको हरनेवाला, पवित्र एवं श्रीरामचन्द्रके प्रति देनेवाला है ॥ २६ .. मैं उन भरतजीकी बन्दना करता हूँ, जो श्रीरामचन्द्रजीकी ओर निहार रहे हैं। जिनका श्याम स्वरूप है। जो सातों द्वीपोंके अधिपति रामचन्द्रजीकी आज्ञामें तत्पर रहते हैं। जो रामकी दाहिनी ओर बैठकर दाहिने हाथसे सुन्दर चमर हाँक रहे हैं। उन भरतजीका मैं ध्यान करता हूँ । २७ ॥ "अस्यश्री" से लेकर "रामांशजाय चेति दिग्बन्ध" तक अंगन्यास आदिकी विधि बतलायी गयी है। इसके बाद ध्यान है-श्रीरामचन्द्रजीकी दाहिनी ओर बैठकर रामपर चमर चलाते हुए सुन्दर रत्नजडित कुण्डल, केयूर तथा कंकण आदिसे विभूषित, पीताम्बर धारण किये, वनमालासे अलंकृत, जिनके चरण मांडवी धोती हैं, रशना और नूपुरसे विराजित, नील कमलके समान श्यामस्वरूप एवं चन्द्रमाके समान मुखवाले ॥ २८-३० ॥ जानुपर्यन्त भुजाओवाले, भरतखण्डके प्रतिपालक, रामके छोटे भ्राता, शत्रुघ्नसे परिवन्दित, मुस्कुराहटयुक्त मुखवाले, रामकी ओर दृष्टि लगाये हुए, सौम्यस्वरूप, विद्युत्पुंजके समान प्रभावशाली, रामभक्त एवं महापराक्रमी भरतजीका ध्यान करके थोड़ी देरतक रामचन्द्रजीके चरणोंका स्मरण करें उसके बाद इस भरतकवचका पाठ करे । ३१ ३२ । पूर्वकी ओर भरत मेरी रक्षा करें, दक्षिणकी तरफ कैकेयीसुत ओर पश्चिमकी ओर नृपात्मज मेरी रक्षा करें। उत्तरकी ओर रघूत्तम मेरी रक्षा करें ॥ ३४ ॥ नीचे श्यामल अङ्गोंवाले, ऊपर दशरथात्मज, मध्यमें भारतवर्षके प्रभु चारों ओर सूर्यवंशमें उत्पन्न होनेवाले

७२८ आनन्दरामायणे [सर्ग १६


शिरश्मत्पिता पातु भालं पातु हरिप्रियः। भ्रुवोर्मध्यं जनकजादत्तकंकणपत्यवतु ॥३६॥
पातु जनकजामाता मम नेत्रे मदाऽव हि। कपोले मण्डलीकान्तः कर्णमूले स्मिताननः ॥३७॥
नासाग्रं मे सदा पातु कैकेयीतोषवर्धनः। ओष्ठौ च सुमुखे पातु पातु प्राज्ञां जटाधरः ॥३८॥
पातु पुष्करनानेत्रो मे जिह्वां दन्तान् प्रथामयः। चिबुकं रत्नसद्भूषः कंठे पातु वराननः ॥३९॥
स्कन्धौ पातु जिताशनिसुतो शत्रुघ्नवंदितः। करौ कवचधारी च नखान खड्गगोऽवतु ॥४०॥
कुक्षौ रामानुजः पातु वक्षः श्रीरामवल्लभः। पार्श्वे सधनुषाम्रेड्यः पातु पृष्ठं शुभाषणः ॥४१॥
जठरं च धनुर्द्धारी नाभिं शङ्खगोवदतु। कटिं पट्टाम्बरः पातु गुह्यं रमैकमानसः ॥४२॥
राममित्रः पातु लिंगमूहं श्रीरामसेवकः। नादग्रामस्थितः पातु जानुनी मम सर्वदा ॥४३॥
श्रीरामपादुकाधारी पातु जंघे सदा मम। गुल्फौ श्रीरामचरणमुखः पादौ पातु सुगर्वितः ॥४४॥
रामाज्ञापालकः पातु सर्वाङ्गान्यान सर्वदा। मम पादांगुलीः पातु रघूत्तंसांशभूषणः ॥४५॥
रोमाणि पातु मे राम्यः पातु रात्रीं सुधार्य्यम। तूणीरधृग दिवसे दिक्षतु मम सर्वदा ॥४६॥
सर्वकालेषु मां पातु पाञ्चजन्यः सदा भुवि। एवं श्रीभरतस्येदं सुतीक्ष्ण कवचं शुभम् ॥४७॥
मया प्रोक्तं तवाग्रे हि मदार्थगरुकामदम्। स्तोत्राणामुत्तमं स्तोत्रमिदं ज्ञेयं सपुण्यदम् ॥४८॥
पठनीयं सदा भक्त्या रामचन्द्रस्य हर्षदम्। पठित्वा भरतस्येदं कवचं रघुनन्दनः ॥४९॥
यथा याति परं तोषं तथा स्वकवचेन न। तस्मादेतत्सदा जप्यं कवचानमनुत्तमम् ॥५०॥
अभ्यासं पठनान्मर्त्यः सर्वान्कामानवाप्नुयात्। विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रकामो लभेत्सुतम् ॥५१॥
पत्नीकामो लभेत्पत्नीं धनार्थी धनमाप्नुयात्। यद्यन्मनोऽभिलषितं तत्तत्कवचपाठकः ॥५२॥

भरत मेरा रक्षा कर ॥ ३५ ॥ तक्षक पिता मर मस्तकका रक्षा करे हरप्रिय मस्तकका रक्षा करे जानकीको आज्ञाप्रनार रहनेवाले भरतजी थोड़के मध्यभागकी रक्षा करें । ३६॥ साताको माताके समान माननेवाले भरतजी मेरा आँखोंकी रक्षा करें। मण्डलीक निसतम मेर कपालोंकी रक्षा करें मुसकान मुख-मण्डलवाले भरतजी म० कर्णमुलक रक्षा कर ॥ ३७ ॥ कैकेयीके आनन्दको वढानेवाले मेर नासाग्रको, उग्र अङ्गुष्ठाने मुखकी और अगाध धी भरत मेरी वाणोका रक्षा कर ॥ ३८ ॥ तक्षकके पिता जिह्वाकी, अशामय दाँतोंकी, वल्कलधारी चिबुककी और सुन्दर मुखवाले कन्ठे र कण्ठक रक्षा कर ॥३९॥ शत्रुको जीतनेवाले मेर कन्धोंकी, शत्रुघ्नवन्दित भुजाओंकी, कवचधारी हाथोंकी ओर खड्गधारी नखोकी रक्षा करें ॥ ४० । रामके छोटे भाता उदरकी, श्रीरामवल्लभ वक्षस्थलकी, शरासनधारी पीठकी और सुन्दर भाषण करनेवाले पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ४१ ॥ धनुर्धारी जठरकी ङ्खकर न भिकी, कमठके समान नेत्रोंवाले कमरकी और एकमात्र रामनामका स्मरण करनेवाले मेरे गुह्यभागकी रक्षा करें ॥ ४२ । रामके मित्र लिंगकी रक्षा करें, श्रीरामके सेवक ऊरुभागकी और नन्दिग्राममें रहनेवाले भरत सर्वदा मेर जानुभागकी रक्षा करें ॥४३॥ श्रीरामकी पादुकाको धारणकरनेवाले मेरी जंघाओंकी, श्रीरामकथ दानी गुल्फभागका तथा सुगर्वित भरतजी मेरे पगकी रक्षा करें ॥ ४४ ॥ रामकी आज्ञा पालन करनेवाले सर्वदा मेर सत्र अंगोंकी और रघुवंशके उत्तम भूषण मेरे पैरकी उँगलियोंकी रक्षा कर ॥ ४५ ॥ रम्य नगुधारी भरतजी मेर चित्र रोमांकी, रात्रि के समय सुन्दर बुद्धिवाले और तूणीरधारी भरत दिनके समय सब दिशाओंकी रक्षा करें । ४६॥ पाञ्चजन्य सब समय मेर रक्षा करते रहैं। हे सुतीक्ष्ण ! इस प्रकार मैने तुम्हें श्रीभरतजीका कवच कह सुनाया । यह बड़ा मङ्गलकारी, सब स्तोत्रोंमें उत्तम और भली भाँति पुण्यदाता है । ४७ । ४८ ॥ लोगोंको चाहिए कि वे रामचन्द्रजीको आनन्द देनेवाले इस भरत-कवचका पाठ करके ही रामकवचका पाठ किया करें। इस कवचके पढ़नेसे रामचन्द्र जितने प्रसन्न होते हैं, उतने अपने कवच अर्थात् रामकवचका पाठ सुनकर बहो प्रसन्न होते; इस कारण लोगोंको चाहिये कि सब कवचोंमें श्रेष्ठ इस कवचका पाठ अवश्य करें ॥ ४६ ॥ ५० ॥ इस कवचका पाठ करनेसे प्राणी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। विद्याकी कामनावाला विद्या, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुत्र, पत्नी चाहनेवाला पत्नी और

सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७२९

लभन्ते मानवैरत्र सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । तस्मात्सदा जपेनीयं रामोपासकमानवैः ॥५३॥

अथ शत्रुघ्नकवचम्

अथ शत्रुघ्नकवचं सुतीक्ष्ण शृणु सादरम् । सर्वकामप्रदं व्यर्थं रामभक्तिविवर्द्धनम् ॥५४॥
शत्रुघ्नं धृतकार्मुकं धृतमहातूणीरबाणोत्तमं प श्चे श्रीरामचन्द्रनस्य विनयाद्वामे स्थितं सुन्दरम् ।
रामं स्वीयकरेण तालदलजं धुन्वन्निमित्रं वरं सूर्य्यभ व्यजनं सभास्थितमहं तं वीजयन्तं भजे ॥५५॥

ॐ अस्य श्रीशत्रुघ्नकवचमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः श्रीशत्रुघ्नो देवता । अनुष्टुप्छन्दः । सुदर्शन इति बीजम् । कैकेयीनन्दन इति शक्तिः । श्रीभरतानुज इति कीलकम् । भरतमंत्रीत्यस्त्रम् । श्रीरामदास इति कवचम् । लक्ष्मणांशज इति मंत्रः । श्रीशत्रुघ्नप्रीत्यर्थे सकलमनःकामनासिद्धयर्थे जपे विनियोगः । अथांगुलिन्यासः । ॐ शत्रुघ्नाय अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ सुदर्शनाय तर्जनीभ्यां नमः । ॐ कैकेंयीनदनाय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ भरतानुजाय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ भरतमंत्रिणे कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ श्रीरामदासाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिन्यासः । लक्ष्मणांशजेति दिग्बंधः ।

अथ ध्यानम्

रामस्य संस्थितं वामे पार्श्वे विनयपूर्वकम् । कैकेयीनन्दनं सौम्यं मुकुटेनाविरजितम् ॥५६॥
रत्नकंकणकेयूरवनमालाविराजितम् । रशनाकुंडलधरं रत्नहारमनू पुरम् ॥५७॥
व्यजनेन वीजयतं जानकीकांतमादरात् । रामन्पश्नेक्षणं वीर कैकेयीतोषवर्द्धनम् ॥५८॥
द्विभुजं कंजनयनं दिव्यपीतांबरान्वितम् । सुभुजं सुंदरं मेघश्यामलं सुन्दराननम् ॥५९॥
रामवाक्ये दत्तकर्णं रक्षोघ्नं खङ्गधारिणम् । धनुर्वाणधरं श्रेष्ठं धृततूणीरमुत्तमम् ॥६०॥
सभायां संस्थितं रम्यं कस्तूरीतिलकांकितम् । मुकुटस्थावतंसेन शोभितं च स्मिताननम् ॥६१॥
रविवंशोद्भवं दिव्यरूपं दशरथात्मजम् । मथुरावासिनं देवं लवणासुरमर्दनम् ॥६२॥
एवं ध्यात्वा तु शत्रुघ्नं रामपादेक्षणं हृदि । पठनीयं वरं चेदं कवचं तस्य पावनम् ॥६३॥
पूर्वे स्ववतु शत्रुघ्नः पातु वायव्ये सुदर्शनः । कैकेयीनन्दनः पातु प्रतीच्यां सर्वदा मम ॥६४॥

धनार्थी धन प्राप्त करता है । इस तरह उसे जिस किसी वस्तुकी इच्छा होती है, वे सब इस कवचके पाठसे प्राप्त हो जाते हैं । ५१ ।। ५२ । यह बात मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ—झूठ कुछ भी नहीं । रामकी उपासना करनेवालोंको चाहिए कि सदा इस कवचका पाठ किया करें । ५३ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! अब मैं तुम्हें शत्रुघ्नकवच बताऊँगा, तुम आदरपूर्वक सुनो । यह शत्रुघ्नकवच भी सब कामनायें पूर्ण करने और रामकी सद्भाक्त बढ़ानेवाला है ॥ ५४ ॥ धनुष धारण करनेवाले बड़ा-सा तरकस धारण किये, श्रीरामचन्द्रजीके पास वामभागमें खड़े, अपने हाथसे ताड़का पंखा झलते हुए, सूर्यके समान अतिशय विचित्र उस पंखेकी दीप्ति है, ऐसे शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५५ ॥ 'अस्य श्री०' से लेकर "लक्ष्मणांशजेति दिग्बन्धः" तक अङ्ग-न्यास आदिकी विधि बतलायी गयी है इसके आगे ध्यान है - रामके पास वामभागमें विनयपूर्वक खड़े कैकेयीके आनन्ददाता, सौम्यस्वरूप, मुकुटसे अतिशोभित, रत्नजटित कंकण, केयूर तथा वनमालासे अलंकृत सिकड़ी और कुण्डल धारण किये रत्नहार तथा सुन्दर नूपुर पहने, आदरपूर्वक रामचन्द्रजीको पंखा झलते और रामकी ओर निहारत हुए कैकेयीका आनन्द बढ़ानेवाले वीर, जिनके दो भुजायें हैं, कमल जैसे नेत्र हैं, दिव्य पीताम्बर पहने, सुन्दर भुजावाले, मेघके सदृश श्यामल तथा सुन्दर मुखवाले, रामकी बातोंमें कान लगाये, राक्षसोंको मारनेवाले, खड्ग धारण किये, धनुष और बाणसे सुसज्जित बड़ा सा तूणीर धारण किये, सभामें स्थित, रम्य, कस्तूरीका तिलक लगाये, मुकुट और कुण्डलोंसे सुशोभित, मुसकराते मुखवाले, सूर्यवंशमें जायमान, दिव्यरूपधारी, दशरथके पुत्र, मथुरा निवासी लवणासुरका मर्दन करनेवाले और श्रीरामके चरणोंमें

७३०आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

शार्दूलोग्र्यो रामबन्धुः पश्चिमे भरतानुजः । रविवंशोद्भवश्चोर्ध्वं मध्ये दशरथात्मजः ॥६५॥ सर्वतः पातु मामत्र कैकेयीतोषवर्धनः । श्यामलांगः शिरः पातु भालं श्रीलक्ष्मणाग्रजः ॥६६॥ भ्रुवोर्मध्ये सदा पातु सुमुखोऽश्विनीसुते । श्रुतकीर्तिपतिर्नेत्रे कपोले पातु राघवः ॥६७॥ कर्णौ कुण्डलकर्णोऽव्यान्नासाग्रं नृपवंशजः । मुखं मम युधा पातु वाणीं पातु स्फुटस्वरः ॥६८॥ जिह्वां सुबाहुतातोऽव्याद्यूपकेतुपिता द्विजान् । चिबुकं रम्यचिबुकः कण्ठं पातु सुभाषणः ॥६९॥ स्कन्धौ पातु महातेजा भुजौ गन्धर्ववाक्यकृत् । करे मे कङ्कणधरः पातु खड्गं नखं मम ॥७०॥ कुक्षिं रामप्रियः पातु पातु वक्षो रघूत्तमः । पार्श्वे सुरार्चितः पातु पातु पृष्ठं वराननः ॥७१॥ जठरं पातु रक्षोघ्नः पातु नाभिं सुलोचनः । कटिं भरतमन्त्री च गुह्यं श्रीरामसेवकः ॥७२॥ समर्पितमनाः पातु लिङ्गमूरू द्विषान्तकः । कोदण्डपाणिः पात्वत्र जानुनी मम सर्वदा ॥७३॥ राममित्रः पातु जंघे गुल्फौ पातु सुनूपुरः । पादौ नृपतिपूज्योऽव्यान्श्रीमान्पादाङ्गुलीर्मम ॥७४॥ धान्यङ्गानि समस्तानि ह्युदारांगः सदा मम । रोमाणि रमणीयेऽङ्गस्याद्रामौ पातु सुधार्मिकः ॥७५॥ दिवसे सत्यसंधोऽव्यादा भोजने शरमत्करः । गमने कनकङ्केतोऽव्यान्र्सर्वदा लवणान्तकः ॥७६॥ एवं शत्रुघ्नकवचं मया ते समुदीरितम् । यः पठति नरः सम्यग् नरः सौख्यभागिनः ॥७७॥ शत्रुघ्नस्य वरं चेदं कवचं मङ्गलप्रदम् । पठनं यं नरेणैन्त्या पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ॥७८॥ अस्य स्तोत्रस्य पाठेन यं यं कामं नरोऽर्थयेत् । तं तं लभेन्निश्चयेन सत्यमेतद्वचो मम ॥७९॥ पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इच्छत्कामं तु कामार्थी प्राप्नुयात्पठनादिना ॥८०॥ कवचस्यास्य भूम्यां हि शत्रुघ्नस्य विनिश्चयात् । तस्मादेतत्सदा भक्त्या पठनीयं नरैः शुभम् ॥८१॥


नेत्र लगाये हुए शत्रुघ्नजीका ध्यान करके इस उत्तम शत्रुघ्नकवचका पाठ करना चाहिए ॥५६-६३॥ पूर्वकी ओर शत्रुघ्न, दक्षिण तरफ सुदर्शन और पश्चिम ओर कैकेयीनन्दन हमारी रक्षा करें । ६४ । उत्तरमें रामबन्धु, नीचे भरतके छोटे भ्राता, ऊपर सूर्यराज और मध्यमें दशरथात्मज मेरी रक्षा करें ॥ ६५ ॥ कैकेयीको आनन्द देने-वाले मेरी चारो ओर रक्षा करें । श्यामल अङ्गवाले शत्रुघ्न मस्तकका और लक्ष्मणके अग्रज मेरे ललाटकी रक्षा करें ॥ ६६ ॥ सुन्दर मुखवाले सदा मेरे भौंहोंके मध्यभागकी, श्रुतकीर्तिके पति नेत्रोंका तथा राघव दोनों कपोलोंकी रक्षा करें ॥ ६७ ॥ कानोंमें कुण्डल धारण करनेवाले मेरे कानोंका, नृपवंशज नासिकाके अग्रभागकी, युद्धापहारी शत्रुघ्न मेरे मुखकी एवं स्फुट अक्षर बोलनेवाले मेरी वाणी की रक्षा करें । ६८ । सुबाहुके पिता कण्ठोंकी, यूपकेतुके पिता दाँतोंकी, सुन्दर चिबुकवाले मेरे चिबुकका और सुन्दर बातें करनेवाले मेरे कण्ठकी रक्षा करें ॥ ६९ ॥ महातेजस्वी कन्धाकी रामका आज्ञा पालन करनेवाले भुज का, कङ्कणधारी मेरे हाथोंकी और खड्गको धारण करनेवाले शत्रुघ्न नखोंकी रक्षा करें ॥ ७० । रामके प्रिय मेरे उदरकी, रघूत्तम वक्षस्थलकी, सुरार्चित पार्श्वभागकी और वरानन पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ७१ ॥ रक्षोघ्न जठरको, सुलोचन नाभिको, भरतके मंत्री कटिभागकी और श्रीरामसेवक गुह्यप्रदेशकी रक्षा करें ॥ ७२ । जिन्होंने अपना मन रामको अर्पित कर दिया है वे शत्रुघ्न लिङ्गकी मुखवाले द्विषान्तकका और हाथोंपे धनुष धारण करनेवाले सर्वदा मेरे जानुओंकी रक्षा करें ॥ ७३ ॥ राममित्र जाँघोंकी, सुन्दर नूपुर पहननेवाले गुल्फकी, नृपतिपूज्य पैरोंकी और श्रीमान् मेरी उँगलियोंकी रक्षा करें ॥ ७४ ॥ उदार अङ्गवाले शत्रुघ्न सदा मेरे समस्त अङ्गोंकी रक्षा करें । रमणीय आकृतिवाले मेरे रोमोंकी, रात्रिके समय सुधारमिक, दिवसके समय सत्यसंध, भोजनके समय सुन्दर बाण धारण करनेवाले, गमनके समय सुन्दर बाणोंके चलानेवाले और सब समय लवणामुरको मारनेवाले शत्रुघ्न मेरी रक्षा करें ॥ ७५॥ ७६ ॥ इस तरह मैंने तुम्हे शत्रुघ्नकवच कह सुनाया । जो लोग भक्तिपूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे सुखभागी होते हैं ॥ ७७ । यह कवच बड़ा सुन्दर, मङ्गलप्रद तथा पुत्र-पौत्र बढ़ानेवाला है ॥ ७८ ॥ इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला प्राणी जो-जो वस्तुयें चाहता है, उन्हें अवश्य पाता है । मेरी बात सत्य मानो । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ७९ ॥ पुत्र चाहनेवाला पुत्र, धन चाहनेवाला धन तथा जो प्राणी जो

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३१

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३१


आदौ नरैर्मारुतेश्च पठित्वा कवचं शुभम् । ततः शत्रुघ्नकवचं पठनीयमिदं शुभम् ॥८२॥
पठनीयं भरतस्य कवचं परमं ततः । ततः सौमित्रिकवचं पठनीयं सदा नरैः ॥८३॥
पठनीयं ततः सीताकवचं भाग्यवर्द्धनम् । ततः श्रीरामचन्द्रस्य कवचं सर्वशोभनम् ॥८४॥
पठनीयं नरैर्भक्त्या सर्ववांछितदायकम् । एवं षट् कवचान्यत्र पठनीयानि सर्वदा ॥८५॥
पठनं षट्कवचानां श्रेष्ठ मोक्षैकसाधनम् । ज्ञात्वाऽत्र मानवैलैक्त्या कार्य यः पठनं सदा ॥८६॥
अशक्तेनात्र चत्वारि पठनीयानि सादरम् । मारुतेश्च सौमित्रेः सीताया राघवस्य च ॥८७॥
इमानि पठनीयानि चत्वारि कवचानि हि । चतुर्णां कवचानां च पठने मानवस्य च । ८८।
न यद्यत्रावकाशश्चेत्तदा त्रीणि पठेन्नरः । मारुतेश्चाथ सीतायास्तथा श्रीरामकस्य च ॥८९॥
त्रयाणां कवचानां च न पाठावसरो यदा । पठनार्थं मानवस्य तदा द्वे कवचे स्मृते ॥९०॥
मारुतेश्चाथ रामस्य सीताया राघवस्य वा । नैकमेव पठेच्चात्र श्रीरामकवचं शुभम् ॥९१॥
अवकाशे कवचानां षट्कमेव सदा नरैः । पठनीयं क्रमेणैव कर्त्तव्यो नालसः कदा ॥९२॥
यदाऽवकाशो नास्त्येव तदा तेषां सुखप्रदे । मया विशेषः प्रोक्तोऽयं न सर्वेषां मयेरितः ॥९३॥

इति शत्रुघ्नकवचम् ।

श्रीरामदास उवाच

एवं शिष्य त्वया यद्यत्पृष्टं तत्तन्मयोदितम् । अन्यत्किंचित्प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्वाद्य सादरम् ॥९४॥
गीतैः प्रनृत्यैः श्रीरामः सदा गेयोऽत्र मानवैः । वीणावाद्यादिभिर्भक्त्या नृत्त्यन्त्यापि समाचरेत् ॥९५॥
दशरथनंदनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम् । मेघश्यामेति वै चोक्त्वा तथा रविकुलेति च ॥९६॥
मंडनराजारामेति ह्यतिप्रीत्याऽन्वहं जपन् । मनुः सदा जपनीयो वीणावाद्येन सुस्वरम् ॥९७॥

दशरथनंदन मेघश्याम रविकुलमंडन राजाराम इति मनुः ।

कीर्तनेऽस्य मनोर्नैव कार्यों न्यासो जपे स्मृतः । एवं सर्वेषु मंत्रेषु बोद्धव्यं मानवैर्भुवि ॥९८॥


जो चाहता है, सो उसे मिलता है ॥ ८० ॥ इस भूमण्डलमें शत्रुघ्नकवच बड़ा उत्तम है। अतएव मनुष्यको अवश्य इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८१ ॥ लोगोंको चाहिए कि पहले हनुमत्कवचका पाठ करके इस शत्रुघ्न-कवचका पाठ करें । ८२ ॥ इसके बाद भरतकवच और भरतकवचके बाद सौमित्रकवचका पाठ करें ॥ ८३ ॥ इसके बाद भाग्यको बढ़ानेवाले सीताकवचका पाठ करके श्रीरामकवचका पाठ करें ॥ ८४ । इस तरह सब वांच्छित फल देनेवाले ६ कवचोंका प्रतिदिन पाठ करते रहें ॥ ८५ ॥ इन छहों कवचांका पाठ श्रेष्ठ और मोक्षका साधन है। ऐसा समझकर लोगोंको सर्वदा इनका पाठ करते रहना चाहिए ॥ ८६ ॥ यदि ऐसा न कर सकें तो हनुमत्जी, लक्ष्मण, सीता तथा रामके कवचका पाठ करें । यदि इन चारोके पाठ करनेका समय किसी प्राणीको न मिले तो हनुमत्जी, सीता तथा रामके कवचका ही पाठ करें ॥ ८७-८८ ॥ यदि तीन कवचके पाठ करनेका भी अवसर न मिल सके तो हनुमान तथा राम इन दोनों कवचोंका ही पाठ करे। किन्तु इतना अवश्य ध्यान रक्खे कि ऊपर बतलाये कवचोंमेंसे किसी एकका अथवा रामकवचका ही पाठ करके न रह जाय ॥ ९० ॥ ९१ ॥ जब समय मिले, तब छहों कवचोंका क्रमशः पाठ करे । आलस्यवश टाल न दे ॥ ९२ । यदि किसी विशेष अडचनके कारण कुछ भी समय न मिल सके, तबके लिए यह परिहार बतलाया गया है। यह सब समय और सबके लिए लागू नहीं है ॥ ९३ ॥ रामदासने कहा-हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो पूछा, वह सुनाया । अब और कुछ बाते बतला रहा हूँ, उन्हें आदरपूर्वक सुनो ॥ ९४ । लोगोंको यह भी चाहिए कि सदा गीत-कविता आदिसे रामचन्द्रजीका गुण गान करें और वीणा आदि बजाकर साथ भक्तिपूर्वक नाचें ॥ ९५ ॥ पहले 'दशरथनन्दन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' फिर 'रविकुलमण्डन' ऐसा कहकर 'राजाराम' कहते हुए "दशरथनन्दन मेघश्याम रविकुलमण्डन राजाराम" इस मन्त्रका कीर्तन और जप किया करें ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ इस

७१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६

रामजयेति चोक्त्वा तु द्विवारं चाथ सुस्वरम्। रामेति द्वेऽक्षरे त्वन्ते सोक्त्वा वीणास्वरेण च ॥९९। चतुर्दशाक्षराख्यं कीर्तनार्थं मयोदितः ॥१००॥ राम जय राम जय राम जय राम इति मनुः। मंत्रशास्त्रेषु ये मंत्रास्ते जपार्थं प्रकीर्तिताः। इमे मंत्राः कीर्तनार्थं तावद्गीया मानवोत्तमैः ॥१०१। एतेषामपि चेद्भक्त्या मंत्राणां च जपः कृतः। तदा भस्मीभवन्त्येति तेषां पापानि वै क्षणात् ॥१०२॥ अन्यान् मंत्रान् प्रवक्ष्यामि तान् शृणुष्व द्विजोत्तम, राजीवलोचनेत्युक्त्वा मेघश्याममिति वै ततः ॥१०३। तथा सीतारञ्जनेति राजारामेति वै ततः। एकोनविंशद्वर्णश्च राममंत्रस्त्वयं स्मृतः ॥१०४। राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम इति मन्त्रः। अयं मंत्रः सुस्वरेण कीर्तनाद्यो मुहुर्मुहुः। वीणास्वरेण सयुक्तश्चासने गमनेऽपि च ॥१०५॥ श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम्। त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपं निहन्त्याशु द्विजकोटिहत्याः ॥१०६॥ त्रयोदशाक्षराख्यं राममंत्रः शुभावहः। जपनीयः कीर्तनीयः सर्वदाऽयं मुहुर्मुहुः ॥१०७। श्रीराम जय राम जय जय राम इति मनुः। अयं मंत्रः सुस्वरेण तथा वीणाम्बगादिना। कीर्तनीयो मुदा मर्यैर्मंत्रशास्त्रेऽप्ययं स्मृतः ॥१०८। तस्मात्सदा जपनीयः सर्वसिद्धिप्रदायकः। अष्टादशाक्षर मंत्र त्वन्य शृणु शुभावहम् ॥१०९। उक्त्वा सीतारञ्जनेति मेघश्यामेति वै ततः, कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ राजारामेति वै ततः ॥११० सीतारञ्जन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम इति मनुः। अष्टादशाक्षराख्य कीर्तनीयो महामनुः। वीणास्वरमनुश्च कलकण्ठ सुस्वरः ॥१११। रविकुलजातं वन्दे चेति प्रकीर्त्य च। सुरभूसुरेन्युक्त्वान्तेऽग्रे गीतं चेति ततः परम् ॥११२।

मन्त्रका जप करते समय न्यास आदि करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसी तरह आगे बतलाये जानेवाले मन्त्रोंके भी विषयमें जानना चाहिए ॥९८॥ 'रामजय' ऐसा तीन बार कहकर वीणाके स्वरसे "राम" इस दो अक्षरोंका उच्चारण करना चाहिये। यह चौदह अक्षरोंवाला मन्त्र मनोंको कीर्तन करनेके लिए बतलाया है। "राम जय राम जय राम जय जय राम" यह मन्त्र है। मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जप करनेके लिए हैं। किन्तु ये मन्त्र कीर्तन करनेके लिए भी लिखे गये हैं ॥९९-१०१॥ यदि भक्तिपूर्वक इनका जप भी किया जाय तो क्षणभरमें जप करनेवालेके सारे पातक जल जायेंगे ॥१०२॥ हे द्विजोत्तम ! तुम्हें मैं और भी बहुतसे मन्त्र बतलाऊँगा। 'राजीवलोचन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' तथा 'सीतारञ्जन' और 'राजाराम' ऐसा कहे। यह उन्नीस अक्षरोंका मन्त्र है ॥१०३॥१०४॥ राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम' यह मन्त्र है। अच्छी तरह मीठे स्वरसे बारम्बार इस मन्त्रका कीर्तन करता रहे। चलते फिरते उठते बैठते सदा इस मन्त्रका कीर्तन करे ॥ १०५॥ आदिमें 'श्री' उसके बाद 'जय' फिर दो जयके बीचमें 'राम' इक्कीस बार नाम जपनेवाला मनुष्य करोड़ों ब्रह्महत्याके पातक नष्ट कर देता है ॥ १०६॥ यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र बड़ा कल्याणदायक है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि बारम्बार इस मन्त्रका जप और कीर्तन करते रहें ॥१०७॥ 'श्रीराम जय राम जय जय राम' यह मन्त्र है। लोगोंका उचित है कि इस मन्त्रको वीणा आदिके स्वरके साथ साथ प्रीतिपूर्वक कीर्तन करें। मन्त्रशास्त्रमें भी इस मंत्रका उल्लेख है ॥ १०८॥ इसलिए सर्वदा इस मंत्रका जप भी करना चाहिए। क्योंकि यह सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला है। अब मैं एक और अष्टादशाक्षर मंत्र बतला रहा हूँ वह भी बड़ा मान्यकारी है ॥ १०९ ॥ 'सीतारंजन' ऐसा कहकर "मेघश्याम" फिर "कौसल्यासुत" कहकर 'राजाराम' कहना चाहिए ॥११०॥ "सीतारंजन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम" यह मन्त्र है। इस अष्टादशाक्षर महामन्त्रका कीर्तन करना चाहिए। कीर्तन वीणाके स्वर-के साथ तथा कोकिलके समान मीठे स्वरोंमें होनेसे विशेष लाभदायक होता है॥ १११॥ "रविवरकुलजातं

सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७३३


सप्तदशसुवर्णश्च राममन्त्रस्त्वयं शुभः। कीर्त्तनीयः सुस्वरं हि वीणावाद्यध्वनादिना ॥११३॥
रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम् इति मनुः।
विष्णोदासशृणुष्वन्यान् राममंत्रान् शुभप्रदान्। येषां स्मरणमात्रेण महन्पापं लयं व्रजेत् ॥११४॥
कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ रामेति द्वयक्षरे तथा तथा सीताराजनेति मेघश्यामेति वै ततः ॥११५॥
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः शुभावहः। वीणास्वाद्यपूर्वकञ्च कलकण्ठेन सुस्वरः ॥११६॥
कौसल्यासुतराम सीताराजन मेघश्याम इति मनुः।
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा नरैः। सर्वपापक्षयकरः सर्ववांछितदायकः ॥११७॥
दशरथनन्दनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम्। मेघश्याममिति वै चोक्त्वा सीतेति द्वयक्षरे ततः ॥११८॥
राजनेति ततोक्त्वा राजारामेति वै ततः। विंशाक्षरपद्युभायं महापातकनाशनः ॥११९॥
दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम इति मनुः।
अयं विंशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयः सुखप्रदः। वीणास्वरसमेतश्च महापुण्यप्रदः स्मृतः ॥१२०॥
वन्दे रघुपतीरमिति चोक्त्वा चैत्र ततः परम्। उक्त्वा सीताकान्तमिति रणधीरमितिक्रमात् ॥१२१॥
चतुर्दशाक्षराश्रयं राममंत्रः शुभावहः। कीर्तनीयो जनैर्भक्त्या महामङ्गलकारकः ॥१२२॥
वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम् इति मनुः।
जय राम जय राम संकीर्त्य सुस्वरं ततः। जय जयोत्र संकीर्त्य रामेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२३॥
चतुर्दशाक्षराश्राय तृतीयः कथितो मनुः। कीर्तनीयो जनैर्नित्यं महापातकनाशनः ॥१२४॥
जय राम जय राम जय जय राम इति मनुः।
मनुः सीतामाधवेति पंचवर्णात्मकः स्मृतः। जपनीयः कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२५॥
सीतामाधव इति मनुः


वन्दे' इसका उच्चारण करके "सुरगुरु" ऐसा कहकर 'जात' का उच्चारण करे ॥११२॥ सत्रह सुन्दर वर्णों-
से इस शुभ राममन्त्रका रचना की गयी है। लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे
इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ ११३॥ 'रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम्' यह मन्त्रका स्वरूप है। राम-
दास कहते हैं कि हे विष्णुदास ! अब मैं और बहुतसे शुभ मन्त्र तुझसे बता रहा हूँ, सुनो। जिनके
स्मरणमात्रसे बड़े बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ११४ ॥ 'कौसल्यासुत' ऐसा कहकर 'राम' इसका उच्चारण
करे। तदनन्तर 'सीताराजन' और उसके बाद 'मेघश्याम' कहे ॥ ११५ ॥ यह षोडशाक्षर मंत्र बड़ा शुभ है।
इसीलिये लोगोंको चाहिए कि भली आवाज़से बाजा आदि वाद्योंके साथ-साथ इसका कीर्तन करे ॥ ११६ ॥
'कौसल्यासुत राम सीताराजन मेघश्याम' यहो मंत्रका स्वरूप है। इस षोडशाक्षर मन्त्रका लोग सर्वदा कीर्तन
करें। क्योंकि यह समस्त पापोंका नाशक और सब प्रकारका अभिलषित कामनाओंको पूर्ण करनेवाला महामंत्र
है ॥ ११७ ॥ "दशरथनन्दन" ऐसा कहकर पहले 'मेघश्याम" और उसके बाद "सीता" इन दो अक्षरोंको
कहकर 'राजन" ऐसा कहते हुए 'राजाराम' कहे। यह बीस अक्षरोंवाला राममंत्र बड़े-बड़े पातकोंका
नाशक है ॥ ११८॥ ११९॥ 'दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम' यही इस मन्त्रका स्वरूप है।
जनोंको चाहिए कि सब प्रकारका सुख देनेवाले इस विंशाक्षर मन्त्रका मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके
साथ कीर्तन करें। क्योंकि यह बड़ा पुण्यदायक मन्त्र है ॥१२०॥ "वन्द बारं रघुवारम्' ऐसा कहकर "सीताकान्तम्"
तथा 'रणधीरम्' ये वाक्य कहे ॥ १२१ ॥ यह परम फलदायक चतुर्दशाक्षरात्मक राममंत्र है। लोगोंको उचित
है कि महामंगल करनेवाले इस मन्त्रका भक्तिपूर्वक कीर्तन करें ॥ १२२ ॥ 'वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम्'
यह इस मंत्रका स्वरूप है। 'जय राम जय राम' ऐसा कहकर "जयजय" ऐसा कहते हुए 'राम' के दो
अक्षर कहें। 'जय राम जय राम जय जय राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। चतुर्दशाक्षर मंत्रोंमें यह तीसरा
मंत्र है। लोगोंको चाहिए कि महापातकोंका नाश करनेवाले इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ १२३ । १२४॥

७३४आनन्दरामायणम्[ सर्गः १५

भजेति द्व्यक्षरे पूर्वं सीताराममिति क्रमात् । मानसेति ततश्चोक्त्वा भजेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२६॥

ततो राजाराम इति मंत्रः पञ्चदशाक्षरः । कीर्तनीयो मनुष्याय वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२७॥ भज सीताराम मानस भज राजारामम् इति मनुः ।

श्रीसीताराममित्युक्त्वा वन्दे चोक्त्वा ततः पुनः । श्रीराजाराममिति च कीर्तयेत्सुस्वरं मुहुः ॥१२८॥

द्वादशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा जनैः । वीणावाद्यादिना पुण्यः सर्ववांछितदायकः ॥१२९॥ श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम् इति मनुः ।

रावणमर्दनत्युक्त्वा रामेत्युक्त्वा ततः परम् । राघवति ततश्चोक्त्वा वाली चेति ततः क्रमात् ॥१३०॥

मर्दनेति पुनश्चोक्त्वा रमाठ द्व्यक्षरे पुनः । स्मृतोऽष्टादशवर्णोऽथ द्वितीयोऽथ मनुः शुभः ॥१३१॥ रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन रामेति मनुः ।

अयं मंत्रः कीर्तनीयः सर्वदा मानवोत्तमैः । श्रीसीताराममिति च मानसेति ततः परम् ॥१३२॥

भजेति द्व्यक्षरे चोक्त्वा रामेति द्व्यक्षरं पुनः । राममिति द्व्यक्षरे च मंत्रोऽयं परमः शुभः ॥१३३॥

चतुर्दशाक्षरश्चायं चतुर्थश्च प्रयोगतः । कीर्तनीयः सुस्वरेण वीणावाद्यपुरःसरः ॥१३४॥ श्रीसीताराम मानस भज राजाराम् इति मनुः ।

सीताराम जयेत्युक्त्वा राजरामेति वै ततः । अयं दशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयोऽथ सुस्वरः ॥१३५॥ सीताराम जय राजाराम इति मनुः ।

श्रीसीताराममिति च वन्दे राममिति क्रमात् । जय रामं ततश्चैव त्रयोदशाक्षरो मनुः ॥१३६॥

कीर्तनीयः सदा मर्त्यैः सर्वपातकनाशनः । वीणावाद्यादिना नित्यं द्वितीयोऽथ मनुः स्मृतः ॥१३७॥ श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम् इति मनुः ।

मां पाहीति चोक्त्वादौ दीनं राघव चेति हि । त्वत्पदयुगलीनं वै चेत्येष षोडशाक्षरः ॥१३८॥


'सीताराघव' यह पंचवर्णात्मक राममंत्र है। सुस्वर मीठे स्वर और वीणा आदि वाद्योंके साथ इस मंत्रका कीर्तन और जप करे ॥१२५॥ "सीताराघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'भज' यह शब्द कहकर 'सीतारामम्' कहे। उसके बाद "मानस" यह शब्द कहकर 'भज राजारामम्' ऐसा कहे। यह पंचदशाक्षरात्मक राममंत्र है। इसे भी जप या मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन करे ॥१२६-१२७॥ "मन्त्र सीताराम मानस भज राजारामम्" यह इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'श्रीसीतारामम्' ऐसा कहकर 'वन्दे' कहे और उसके बाद 'श्रीराजारामम्' कहकर इस मंत्रका कीर्तन करे यह द्वादशाक्षरात्मक मंत्र है । 'श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम्' यह इस मंत्रका स्वरूप है। लोगोंको उचित है कि सब प्रकारकी कामनायें पूर्ण करनेवाले इस मंत्रका जप और कीर्तन करें ॥१२८-१२९॥ पहले 'रावणमर्दन' फिर 'राम' उसके बाद "राघव" फिर 'वालीमर्दन' तदनन्तर 'राम' ऐसा कहे। अष्टादशाक्षर मंत्रोंमें यह दूसरा मंत्र है। 'रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन राम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। सज्जनोंको चाहिए कि सर्वदा इस मन्त्रका जप किया करें। पहले 'सीतारामम्' उसके बाद 'मानस' फिर 'भज' और उसके पश्चात् 'राजारामम्' ऐसा कहें। यह बड़ा पवित्र मन्त्र है॥ १३०-१३४॥ चतुर्दशाक्षरात्मक मंत्रोंमें यह चौथा मन्त्र है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन तथा जप करना चाहिए। 'श्रीसीताराम मानस भज राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीताराम जय' फिर 'राजाराम' ऐसा कहे। यह दशाक्षर राममंत्र है। लोगोंको चाहिए कि मीठे स्वरसे इस मंत्रका भी कीर्तन किया करें। ॥१३५॥ 'सीताराम जय राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीतारामम्' फिर 'वन्दे रामम्' और इसके बाद 'जय राम' ऐसा कहे। यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र है। संसारके प्राणियोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ नित्य इस मन्त्रका कीर्तन करें । १३६ ॥ १३७ ॥ 'श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम्' यह मंत्रका स्वरूप है। पहले 'मा पाहि इति'