भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 737
७२०आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

परं सुतीक्ष्ण सीतायाः कवचं ते मयेरितम् । अतः परं शृणुष्वान्यन्सीतायाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥३५॥ यस्मिन्नष्टोत्तरशतं सीतानामानि संति हि । अष्टोत्तरशतं सीतासाम्नां स्तोत्रमनुत्तमम् ॥३६॥ ये पठंति नरास्त्वत्र तेषां च सफलो भवः । ते धन्या मानवा लोके ते वैकुंठं व्रजंति हि ॥३७॥ अस्य श्रीसीतानामाष्टोत्तरशतमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । रमेति बीजम् । मातुलुंगीति शक्तिः । पद्माक्षजेति कीलकम् । अवनिजेत्यस्त्रम् । जनकजेति कवचम् । मूलकासुर-मर्दिनीति परमो मन्त्रः । श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे सकलकामनासिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । अथांगुलिन्यासः । ॐसीतायै अंगुष्ठाभ्यां नमः ! ॐरमायै तर्जनीभ्यां नमः । ॐमातुलुङ्ग्यै मध्यमाभ्यां नमः । ॐपद्माक्षजायै अनामिकाभ्यां नमः । ॐअवनिज्ञायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ! ॐजनकजायै करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अथ हृदयादिन्यासः । ॐसीतायै हृदयाय नमः । ॐरमायै शिरसे स्वाहा । ॐमातुलुङ्ग्यै शिखायै वषट् । ॐपद्माक्षजायै नेत्रत्राय वषट् । ॐजनकत्मजायै अस्त्राय फट् । ॐमूलकासुरमर्दिन्यै इति दिग्बन्धः । अथ सीतानामाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् । वामांगे रघुनाथस्य रुचिरे या संस्थिता शोभना या विप्रान्धिव्यान्नगम्यनयना या विप्रपद्मानना । विद्युत्पुंजविराजमानवसना भक्तातिसंखण्डना श्रीमद्राघवपादपद्मयुगलन्यस्तेक्षणा साऽवतु ॥३८॥ श्रीसीता जानकी देवी वैदेही राघवप्रिया । रमाऽवनिसुता रामा राक्षसान्तप्रकारिणी ॥३९॥ रत्नगुप्ता मातुलुङ्गी मैथिली भक्ततोषदा । पद्माक्षजा कंजनेत्रा स्मितास्या नूपुरस्वना ॥४०॥ वैकुंठनिलया मा श्रीर्मुक्तिदा कामपूरणी । नृपात्मजा हेमवर्णा मृद्वङ्गी सुभाषिणी ॥४१॥ कुशांबिका दिव्यदा च लवमाता मनोहरा । हनुमद्वन्दितपदा मुग्धा केयूरधारिणी ॥४२॥ अशोकवनमध्यस्था रावणादिकमोहिनी । विमानमध्यस्था सुभ्रूः सुकेशी रत्ननान्विता ॥४३॥

॥ ३३ । ३४ ॥ अगस्त्यजी कहते हैं—हे सुतीक्ष्ण ! इस तरह मैने तुम्हें सीताकवच सुनाया। इसके अनन्तर सीताजीका एक दूसरा स्तोत्र सुनाता हूँ ॥ ३५ ॥ जिसमें एक सौ आठ सीताके नाम गिनाये गये हैं। इसलिए इसका नाम "सीतानामाष्टोत्तरशतनाम" रखा गया है । ३६। जो मनुष्य इसका पाठ करते हैं, उनका जन्म सफल हो जाता है। वे मनुष्य धन्य हैं और वे अन्तमें वैकुण्ठलोकको जाते हैं ॥ ३७ ॥ "अस्य श्रीः" यहाँसे "मूलकासुरमर्दिन्यै" यहाँ तक विनियोग तथा अङ्गन्यास आदिका विधान बतलाया गया है ॥ अथ ध्यानम् ॥ जो एक सुन्दर सिंहासनपर रामके वामांगमें बैठी हैं, पूणके नेत्रोंकी भाँति जिसके नेत्र हैं, जो चन्द्रवदनी हैं, जो बिजलीके समूहकी तरह चमकनेवाले कपड़े पहने हैं, जो अपने भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेमें कुछ भी कसर नहीं रखतीं, जिनके नेत्र श्रीरामचन्द्रजीके चरणमें लगे हुए हैं, वे सीता हमारी रक्षा करें ॥ ३८ ॥ अब यहनाम शतनाम कहता हूँ। जैसे—(१) श्रीसीता, (२) जानकी (३) देवी, (४) वैदेही अर्थात् विदेह जनककी पुत्री, (५) राघवप्रिया, (६) रमा (७) अवनिसुता (पृथ्वीकी कन्या), (८) रामा, (९) राक्षसान्तप्रकारिणी (राक्षसों- का नाश करनेवाली), (१०) रत्नगुप्ता, (११) मातुलुङ्गी (१२) मैथिली, (१३) भक्ततोषदा (भक्तोंको प्रसन्न करनेवाली) (१४) पद्माक्षजा (पद्माक्षनामक राजाकी कन्या) (१५) कंजनेत्रा (कमलके समान नेत्रोंवाली), (१६) स्मितास्या (जिसका मुस्कराता हुआ मुख है), (१७) नूपुरस्वना, (१८) वैकुण्ठानिलया (वैकुण्ठलोकमें निवास करनेवाली), (१९) मा (२०) श्री, (२१) मुक्तिदा, (२२) कामपूरणी (अपने भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेवाली), (२३) नृपात्मजा, (२४) हेमवर्णा, (२५) मृद्वङ्गी (जिसका कोमल अङ्ग है), (२६) सुभाषिणी ॥ ३९-४१ ॥ (२७) कुशांबिका (कुशकी माता (२८) दिव्या (लंकासे लौटनेपर रामके कटु वाक्य सुनकर शपथ खानेवाली, २९) लवमाता, (३०) मनोहरा, (३१) हनुमद्वन्दितपदा (हनुमान्जीने जिसके चरणोंकी वन्दना की थी), (३२) मुग्धा (३३) केयूरधारिणी, (३४) अशोकवनमध्यस्था (अशोकवनमें निवास करनेवाली