भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 736

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् [ ७१९

स्मितानना शिरः पातु पातु भालं नृपात्मजा । पद्माऽवतंसाऽधोर्ध्वञ्चे मृगाक्षी नयनेऽवतु ॥१७॥
कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामवल्लभा । नासाग्रं मक्षिका पातु पातु वक्त्रं तु राजसी ॥१८॥
तामसी पातु दन्तानी पातु जिह्वां पतिव्रता । दन्तान् पातु महामाया चिबुकं कनकप्रभा ॥१९॥
पातु कण्ठं सौम्यरूपा स्कंधौ पातु सुगन्धिनी । भुजौ पातु वरारोहा करौ कंकणमण्डिता ॥२०॥
नखान् रक्तनखा पातु कुक्षी पातु लघूदरा । पृष्ठं पातु गदापानी पार्श्व गन्धप्रमोदिनी ॥२१॥
पृष्ठदेशे वह्निगुप्ताऽवतु मां सर्वदैव हि । दिव्यप्रदा पातु नाभिं कटिं राक्षसमोहिनी ॥२२॥
गुह्यं पातु रत्नगुप्ता लिंगं पातु हरिपिया । ऊरू पातु रमेशानी जानुनी विषमप्रभा ॥२३॥
जंघे पातु सदा सुभ्रूर्गुल्फौ चामरवीजिता । पादौ कल्पलता पातु पादांगानि कृशोंदिका ॥२४॥
पादांगुलीः सदा पातु मम नूपुरनिःस्वना । रोमाण्यवतु मे नित्यं पीतकोशेयवासिनी ॥२५॥
रात्रौ पातु कालरूपा दिने दर्शनतत्परा । सर्वकालेषु मां पातु मूलकासुरघातिनी ॥२६॥
एवं सुतीक्ष्ण सीतायाः कवचं ते मयेरितम् । इदं प्रातः समुत्थाय स्नात्वा नित्यं पठेत्तु यः ॥२७॥
जानकीं पूजयित्वा च सर्वान्कामानवाप्नुयात् । धनार्थी प्राप्नुयाद् द्रव्यं पुत्रार्थी पुत्रमवाप्नुयात् ॥२८॥
स्त्रीकामार्थी शुभां नारी सुखार्थी सौख्यमवाप्नुयात् । अष्टवारं जपनीयं सीतायाः कवचं यदा ॥२९॥
अष्टभ्यो विप्रवर्य्येभ्यो नमः प्रीत्याऽर्पयेन्मनः । फलपुष्पादिसहितानि यानि दानि पृथक् पृथक् ॥३०॥
सीतायाः कवचं चेदं पुण्यं पापनाशनम् । ये पठन्ति नरा भक्त्या ते धन्या मानवा भुवि ॥३१॥
पठति रामकवचं सीतायाः कवचं विना । तथा विना लक्ष्मणस्य कवचेन वृथा स्मृतम् ॥३२॥
तस्मात्तु सदा संजप्यं कवचानां चतुष्टयम् । आदौ तु वायुपुत्रस्य लक्ष्मणस्य ततः परम् ॥३३॥
ततः पठेच्च सीतायाः श्रीरामस्य ततः परम् । एवं सदा जाप्यं कवचानां चतुष्टयम् ॥३४॥
इति सीताकवचम् ।


भालको नृपात्मजा, ऊपर पद्मावतंसा, अधोभागको अनतिसुता और मृगी और दृग रक्षा करें ॥ १७ ॥
स्मितानना मुखकी, नृपात्मजा मस्तककी, भौंहोंके बीचमें पद्मा और दृग तथाकी मृगाक्षी रक्षा करे ॥ १७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी प्रेयसी कपोल और कर्णमूलकी रक्षा करे, नासिकाके अग्रभागकी राजसी मुखकी,
तामसी वाणीकी, पतिव्रता जिह्वाकी, महामाया दाँतकी, कनकप्रभा चिबुककी, सौम्यरूपता कण्ठकी, सुगन्धिता
कन्धोंकी, वरारोहा बाहुकी और कंकणमण्डिता हाथोंकी रक्षा करे ॥ १८-२० ॥ रक्तनखा नाखुनोंकी, लघूदरा
कुक्षिकी, गदापाणी पीठकी, पार्श्वभागकी गन्धमोदिनी और वह्निगुप्ता सदा मेरे पृष्ठदेशकी रक्षा करे ।
दिव्यप्रदा मेरी नाभिका और राक्षसमोहिनी कमरकी रक्षा करे ॥ २१-२२ ॥ रत्नगुप्ता गुदाकी और हरिप्रिया
लिंगकी रक्षा करे। रमेशानी दोनों घुटनोंकी और विषमप्रभािणी जानुभागकी रक्षा करे ॥ २३ ॥ सुभ्रू जंघोंकी,
चामरवीजिता गुल्फकी तथा कृशाङ्गिका शरीरके सब अङ्गोंकी रक्षा करे ॥२४॥ कल्पलता पैरोंकी उँगलियों-
की और पीताम्बरधारिणी मेरे रोमांकी रक्षा करे ॥ २५ ॥ रात्रिके समय कालरूपा, दिनको दर्शनतत्परा और
सब समय मूलकासुरघातिनी मेरी रक्षा करे । २६ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सीता कवच सुनाया ।
जो प्राणी सवेरे स्नानाके बाद नित्य इसका पाठ करके जानकीजीका पूजा करता है, वह अपनी सब इच्छायें
पूर्ण कर लेता है। धनको चाहनेवाला धन और पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाला पुत्र पाता है ॥ २७ ॥ २८ ॥
स्त्रीकी कामनावाला सुन्दरी स्त्री और सुख चाहनेवाला सौख्य पाता है। उपासकको चाहिए कि सदा आठ
बार सीता-कवचका जप करे । आठ ब्राह्मणोंको फलपुष्प आदि वस्तुयें पृथक-पृथक् दान दे ॥ २९ ॥ ३० ॥
यह सीतकवच बड़ा पवित्र और पापोंका नाशक है । जो लोग भक्तिपूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे
प्राणी संसारमें धन्य हैं ॥ ३१ ॥ जो लोग सीता तथा लक्ष्मणकवचका पाठ करते हैं, उनका वह पाठ व्यर्थ हो
जाता है ॥ ३२ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा इन चारो कवचोंका पाठ करे । इसका क्रम इस प्रकार है-
पहले हनुमान्जीका, फिर लक्ष्मणका, इसके बाद सीताका, तदनन्तर श्रीरामकवचका पाठ करना चाहिए