श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 735, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १४ |
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या जाताऽवनिमतस्ततः स्वतनयारूपेण मन्दारिना पद्माक्षनृपतेः सुता लङ्कां गता या मातुलुङ्गोद्भवा ।
या रत्ने लयम् गता उदधौ नृपगृहे जाता पुनर्या या नामाङ्गलवना शशाङ्कमुखा मां पातु रामप्रिया ॥ ५ ॥
अस्य श्रीसीताकवचमन्त्रस्य अगस्त्य ऋषिः । श्रीरामा देवता । अनुष्टुप्छन्दः । रामेति बीजम् । जनकजेति शक्तिः । अवनिजेति कीलकम् । पद्माक्षनुतेत्यस्त्रम् । मातुलुङ्गीति कवचम् । मूलकणुरुधेति मन्त्रः । श्रीमत्परमचन्द्रान्वयसकलकामदासिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।
अथ अङ्गुलिन्यासः— ॐ ह्रीं सीतायै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं रामायै तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ह्रीं जनकजायै मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं अवनिजेत्यै अनामिकाभ्यां नमः ॐ ह्रां पद्माक्षनुतायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः अः मातुलुङ्गे करपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः कार्यः ।
अथ ध्यानम्
सीतां कमलपत्राक्षीं विद्युत्पुञ्जसमप्रभाम् । द्विभुजां सुकुमाराङ्गीं पीतकौशेयवासिनीम् ॥ ६ ॥
सिंहासने रामचन्द्रवामभागस्थितां वराम् । नानालङ्कारसंयुक्तां कुण्डलद्वयधारिणीम् ॥ ७ ॥
चूडाकङ्कणकेयूररशनादिसुशोभिताम् । श्रीमन्तं रुचिरं बिभ्रतीं तिलकेन च ॥ ८ ॥
मयूराकारनेत्राग्रं मण्डलाग्रं शोभितां शुभाम् । हरिद्रां कज्जलं दिव्यं कुङ्कुमं कुसुमानि च ॥ ९ ॥
बिभ्रतीं सुगन्धिद्रव्यं सुगन्धस्नेहमुत्तमम् । स्मितवदनां गौरवर्णीं मन्दारकुसुमं करे ॥ १० ॥
बिभ्रन्तीमपरं हस्ते मातुलुङ्गमुत्तमम् । रम्यनासां च बिम्बोष्ठीं चन्द्रवाहनलोचनाम् ॥ ११ ॥
कलानाथसमानास्यां कम्बुकण्ठमनोहराम् । मातुलुङ्गोद्भवां देवीं पद्माक्षदुहितां शुभाम् ॥ १२ ॥
मैथिलीं रामदयितां दासीभिः परिवेष्टिताम् । एवं ध्यात्वा जनकराज्ञीं हेमकुम्भपयोधराम् ॥ १३ ॥
सीतायाः कवचं दिव्यं पठनीयं शुभावहम् ॥ १४ ॥
श्रीसीता पूर्वतः पातु दक्षिणेऽवतु जानकी । प्रतापरूपा तु वैदेही पातूदीच्यां च मैथिली ॥ १५ ॥
अधः पातु मातुलुङ्गी ऊर्ध्वं पद्माक्षजाऽवतु । मध्येऽवनिमुता पातु सर्वतः पातु मां रमा ॥ १६ ॥
कहिए ॥ २ ॥ ३ ॥ अगस्त्यजीने कहा—हे वत्स तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान होकर सुनो । पहले मैं सीताजीका कवच सुनाता हूँ ४ । जो सीता पृथ्वीसे उत्पन्न हुईं और मिथिलानरेशके द्वारा पाली-पोसी गयीं, जो मातुलुङ्गीसे उत्पन्न होकर पद्माक्ष नामक राजाकी पुत्री कही गयीं, जो समुद्रके रत्नोंमें लीन हुईं और बार बार लङ्का गयीं, ऐसी मन्दारकी, शूलहस्ता और रामकी प्रेयसी सीता मेरी रक्षा करे ॥ ५ ॥
"अस्य श्री" से लेकर "एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः" यहां तक विनियोग तथा अङ्गन्यासका विधान बतलाया गया है । इसके बाद ध्यान है । जिसका भाव इस प्रकार जानना चाहिए—कमलकी पखुडियोंके समान जिनके नेत्र हैं, विद्युत्पुञ्जके समान जिनकी कान्ति है, जिनके दो भुजाये हैं और जो पीताम्बर पहने हैं । जो सिंहासनपर रामके वामभागमें बैठी हैं, कानोंमें कुंडल पहने हैं कुन्द चूड़ामणि भुजाओंमें केयूर तथा कमरमें करधनी पहने हैं, जिनके समन्ताद्भाग सूर्य-चन्द्रमाके समान आभूषण सुशोभित हो रहे हैं माथेमें तिलक लगा हुआ है नाकमें मयूरके आकारका सुन्दर आभूषण पड़ा है ॥ ६-९ ॥ हरिद्रा, काजल, कुंकुम, विविध प्रकारके फूल तथा तरह तरहके सुगंधित द्रव्य और इत्र आदि चमक रहे हैं, जिनका मुस्कराता हुआ मुखमण्डल है, गौर वर्ण है, जो एक हाथमें मन्दारक फूल लिये हैं, दूसरे हाथमें उत्तम मातुलुङ्ग विराजमान है, जिनकी मृदु मुस्कान है, बिम्बके समान ओष्ठ हैं मृगके नेत्रोंके समान जिनके नेत्र हैं, चन्द्रमाके समान मुख है, शङ्खके समान जिसकी गाढी वाणी है, जो मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) से उत्पन्न होनेवाली पद्माक्ष नृपतिकी पुत्री और रामकी भामिनी हैं, जिन्हें दासियाँ पंखा झल रही हैं, सुवर्णकलशके समान जिनके स्तन हैं, ऐसी सीताका ध्यान करके इस दिव्य सीताकवचका पाठ करना चाहिए ॥ १०-१४ ॥ पूर्वकी ओर सीता मेरी रक्षा करें, दक्षिणकी तरफ जानकी रक्षा करे, पश्चिमकी वैदेही रक्षा करें, उत्तरकी मैथिली रक्षा करें ॥ १५ ॥ निचला