श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 748, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३१
आदौ नरैर्मारुतेश्च पठित्वा कवचं शुभम् । ततः शत्रुघ्नकवचं पठनीयमिदं शुभम् ॥८२॥
पठनीयं भरतस्य कवचं परमं ततः । ततः सौमित्रिकवचं पठनीयं सदा नरैः ॥८३॥
पठनीयं ततः सीताकवचं भाग्यवर्द्धनम् । ततः श्रीरामचन्द्रस्य कवचं सर्वशोभनम् ॥८४॥
पठनीयं नरैर्भक्त्या सर्ववांछितदायकम् । एवं षट् कवचान्यत्र पठनीयानि सर्वदा ॥८५॥
पठनं षट्कवचानां श्रेष्ठ मोक्षैकसाधनम् । ज्ञात्वाऽत्र मानवैलैक्त्या कार्य यः पठनं सदा ॥८६॥
अशक्तेनात्र चत्वारि पठनीयानि सादरम् । मारुतेश्च सौमित्रेः सीताया राघवस्य च ॥८७॥
इमानि पठनीयानि चत्वारि कवचानि हि । चतुर्णां कवचानां च पठने मानवस्य च । ८८।
न यद्यत्रावकाशश्चेत्तदा त्रीणि पठेन्नरः । मारुतेश्चाथ सीतायास्तथा श्रीरामकस्य च ॥८९॥
त्रयाणां कवचानां च न पाठावसरो यदा । पठनार्थं मानवस्य तदा द्वे कवचे स्मृते ॥९०॥
मारुतेश्चाथ रामस्य सीताया राघवस्य वा । नैकमेव पठेच्चात्र श्रीरामकवचं शुभम् ॥९१॥
अवकाशे कवचानां षट्कमेव सदा नरैः । पठनीयं क्रमेणैव कर्त्तव्यो नालसः कदा ॥९२॥
यदाऽवकाशो नास्त्येव तदा तेषां सुखप्रदे । मया विशेषः प्रोक्तोऽयं न सर्वेषां मयेरितः ॥९३॥
इति शत्रुघ्नकवचम् ।
श्रीरामदास उवाच
एवं शिष्य त्वया यद्यत्पृष्टं तत्तन्मयोदितम् । अन्यत्किंचित्प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्वाद्य सादरम् ॥९४॥
गीतैः प्रनृत्यैः श्रीरामः सदा गेयोऽत्र मानवैः । वीणावाद्यादिभिर्भक्त्या नृत्त्यन्त्यापि समाचरेत् ॥९५॥
दशरथनंदनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम् । मेघश्यामेति वै चोक्त्वा तथा रविकुलेति च ॥९६॥
मंडनराजारामेति ह्यतिप्रीत्याऽन्वहं जपन् । मनुः सदा जपनीयो वीणावाद्येन सुस्वरम् ॥९७॥
दशरथनंदन मेघश्याम रविकुलमंडन राजाराम इति मनुः ।
कीर्तनेऽस्य मनोर्नैव कार्यों न्यासो जपे स्मृतः । एवं सर्वेषु मंत्रेषु बोद्धव्यं मानवैर्भुवि ॥९८॥
जो चाहता है, सो उसे मिलता है ॥ ८० ॥ इस भूमण्डलमें शत्रुघ्नकवच बड़ा उत्तम है। अतएव मनुष्यको अवश्य इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८१ ॥ लोगोंको चाहिए कि पहले हनुमत्कवचका पाठ करके इस शत्रुघ्न-कवचका पाठ करें । ८२ ॥ इसके बाद भरतकवच और भरतकवचके बाद सौमित्रकवचका पाठ करें ॥ ८३ ॥ इसके बाद भाग्यको बढ़ानेवाले सीताकवचका पाठ करके श्रीरामकवचका पाठ करें ॥ ८४ । इस तरह सब वांच्छित फल देनेवाले ६ कवचोंका प्रतिदिन पाठ करते रहें ॥ ८५ ॥ इन छहों कवचांका पाठ श्रेष्ठ और मोक्षका साधन है। ऐसा समझकर लोगोंको सर्वदा इनका पाठ करते रहना चाहिए ॥ ८६ ॥ यदि ऐसा न कर सकें तो हनुमत्जी, लक्ष्मण, सीता तथा रामके कवचका पाठ करें । यदि इन चारोके पाठ करनेका समय किसी प्राणीको न मिले तो हनुमत्जी, सीता तथा रामके कवचका ही पाठ करें ॥ ८७-८८ ॥ यदि तीन कवचके पाठ करनेका भी अवसर न मिल सके तो हनुमान तथा राम इन दोनों कवचोंका ही पाठ करे। किन्तु इतना अवश्य ध्यान रक्खे कि ऊपर बतलाये कवचोंमेंसे किसी एकका अथवा रामकवचका ही पाठ करके न रह जाय ॥ ९० ॥ ९१ ॥ जब समय मिले, तब छहों कवचोंका क्रमशः पाठ करे । आलस्यवश टाल न दे ॥ ९२ । यदि किसी विशेष अडचनके कारण कुछ भी समय न मिल सके, तबके लिए यह परिहार बतलाया गया है। यह सब समय और सबके लिए लागू नहीं है ॥ ९३ ॥ रामदासने कहा-हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो पूछा, वह सुनाया । अब और कुछ बाते बतला रहा हूँ, उन्हें आदरपूर्वक सुनो ॥ ९४ । लोगोंको यह भी चाहिए कि सदा गीत-कविता आदिसे रामचन्द्रजीका गुण गान करें और वीणा आदि बजाकर साथ भक्तिपूर्वक नाचें ॥ ९५ ॥ पहले 'दशरथनन्दन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' फिर 'रविकुलमण्डन' ऐसा कहकर 'राजाराम' कहते हुए "दशरथनन्दन मेघश्याम रविकुलमण्डन राजाराम" इस मन्त्रका कीर्तन और जप किया करें ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ इस