भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 749, कुल 811 में से

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पृष्ठ 749

७१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६

रामजयेति चोक्त्वा तु द्विवारं चाथ सुस्वरम्। रामेति द्वेऽक्षरे त्वन्ते सोक्त्वा वीणास्वरेण च ॥९९। चतुर्दशाक्षराख्यं कीर्तनार्थं मयोदितः ॥१००॥ राम जय राम जय राम जय राम इति मनुः। मंत्रशास्त्रेषु ये मंत्रास्ते जपार्थं प्रकीर्तिताः। इमे मंत्राः कीर्तनार्थं तावद्गीया मानवोत्तमैः ॥१०१। एतेषामपि चेद्भक्त्या मंत्राणां च जपः कृतः। तदा भस्मीभवन्त्येति तेषां पापानि वै क्षणात् ॥१०२॥ अन्यान् मंत्रान् प्रवक्ष्यामि तान् शृणुष्व द्विजोत्तम, राजीवलोचनेत्युक्त्वा मेघश्याममिति वै ततः ॥१०३। तथा सीतारञ्जनेति राजारामेति वै ततः। एकोनविंशद्वर्णश्च राममंत्रस्त्वयं स्मृतः ॥१०४। राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम इति मन्त्रः। अयं मंत्रः सुस्वरेण कीर्तनाद्यो मुहुर्मुहुः। वीणास्वरेण सयुक्तश्चासने गमनेऽपि च ॥१०५॥ श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम्। त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपं निहन्त्याशु द्विजकोटिहत्याः ॥१०६॥ त्रयोदशाक्षराख्यं राममंत्रः शुभावहः। जपनीयः कीर्तनीयः सर्वदाऽयं मुहुर्मुहुः ॥१०७। श्रीराम जय राम जय जय राम इति मनुः। अयं मंत्रः सुस्वरेण तथा वीणाम्बगादिना। कीर्तनीयो मुदा मर्यैर्मंत्रशास्त्रेऽप्ययं स्मृतः ॥१०८। तस्मात्सदा जपनीयः सर्वसिद्धिप्रदायकः। अष्टादशाक्षर मंत्र त्वन्य शृणु शुभावहम् ॥१०९। उक्त्वा सीतारञ्जनेति मेघश्यामेति वै ततः, कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ राजारामेति वै ततः ॥११० सीतारञ्जन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम इति मनुः। अष्टादशाक्षराख्य कीर्तनीयो महामनुः। वीणास्वरमनुश्च कलकण्ठ सुस्वरः ॥१११। रविकुलजातं वन्दे चेति प्रकीर्त्य च। सुरभूसुरेन्युक्त्वान्तेऽग्रे गीतं चेति ततः परम् ॥११२।

मन्त्रका जप करते समय न्यास आदि करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसी तरह आगे बतलाये जानेवाले मन्त्रोंके भी विषयमें जानना चाहिए ॥९८॥ 'रामजय' ऐसा तीन बार कहकर वीणाके स्वरसे "राम" इस दो अक्षरोंका उच्चारण करना चाहिये। यह चौदह अक्षरोंवाला मन्त्र मनोंको कीर्तन करनेके लिए बतलाया है। "राम जय राम जय राम जय जय राम" यह मन्त्र है। मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जप करनेके लिए हैं। किन्तु ये मन्त्र कीर्तन करनेके लिए भी लिखे गये हैं ॥९९-१०१॥ यदि भक्तिपूर्वक इनका जप भी किया जाय तो क्षणभरमें जप करनेवालेके सारे पातक जल जायेंगे ॥१०२॥ हे द्विजोत्तम ! तुम्हें मैं और भी बहुतसे मन्त्र बतलाऊँगा। 'राजीवलोचन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' तथा 'सीतारञ्जन' और 'राजाराम' ऐसा कहे। यह उन्नीस अक्षरोंका मन्त्र है ॥१०३॥१०४॥ राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम' यह मन्त्र है। अच्छी तरह मीठे स्वरसे बारम्बार इस मन्त्रका कीर्तन करता रहे। चलते फिरते उठते बैठते सदा इस मन्त्रका कीर्तन करे ॥ १०५॥ आदिमें 'श्री' उसके बाद 'जय' फिर दो जयके बीचमें 'राम' इक्कीस बार नाम जपनेवाला मनुष्य करोड़ों ब्रह्महत्याके पातक नष्ट कर देता है ॥ १०६॥ यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र बड़ा कल्याणदायक है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि बारम्बार इस मन्त्रका जप और कीर्तन करते रहें ॥१०७॥ 'श्रीराम जय राम जय जय राम' यह मन्त्र है। लोगोंका उचित है कि इस मन्त्रको वीणा आदिके स्वरके साथ साथ प्रीतिपूर्वक कीर्तन करें। मन्त्रशास्त्रमें भी इस मंत्रका उल्लेख है ॥ १०८॥ इसलिए सर्वदा इस मंत्रका जप भी करना चाहिए। क्योंकि यह सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला है। अब मैं एक और अष्टादशाक्षर मंत्र बतला रहा हूँ वह भी बड़ा मान्यकारी है ॥ १०९ ॥ 'सीतारंजन' ऐसा कहकर "मेघश्याम" फिर "कौसल्यासुत" कहकर 'राजाराम' कहना चाहिए ॥११०॥ "सीतारंजन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम" यह मन्त्र है। इस अष्टादशाक्षर महामन्त्रका कीर्तन करना चाहिए। कीर्तन वीणाके स्वर-के साथ तथा कोकिलके समान मीठे स्वरोंमें होनेसे विशेष लाभदायक होता है॥ १११॥ "रविवरकुलजातं

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