श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 750, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७३३
सप्तदशसुवर्णश्च राममन्त्रस्त्वयं शुभः। कीर्त्तनीयः सुस्वरं हि वीणावाद्यध्वनादिना ॥११३॥
रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम् इति मनुः।
विष्णोदासशृणुष्वन्यान् राममंत्रान् शुभप्रदान्। येषां स्मरणमात्रेण महन्पापं लयं व्रजेत् ॥११४॥
कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ रामेति द्वयक्षरे तथा तथा सीताराजनेति मेघश्यामेति वै ततः ॥११५॥
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः शुभावहः। वीणास्वाद्यपूर्वकञ्च कलकण्ठेन सुस्वरः ॥११६॥
कौसल्यासुतराम सीताराजन मेघश्याम इति मनुः।
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा नरैः। सर्वपापक्षयकरः सर्ववांछितदायकः ॥११७॥
दशरथनन्दनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम्। मेघश्याममिति वै चोक्त्वा सीतेति द्वयक्षरे ततः ॥११८॥
राजनेति ततोक्त्वा राजारामेति वै ततः। विंशाक्षरपद्युभायं महापातकनाशनः ॥११९॥
दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम इति मनुः।
अयं विंशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयः सुखप्रदः। वीणास्वरसमेतश्च महापुण्यप्रदः स्मृतः ॥१२०॥
वन्दे रघुपतीरमिति चोक्त्वा चैत्र ततः परम्। उक्त्वा सीताकान्तमिति रणधीरमितिक्रमात् ॥१२१॥
चतुर्दशाक्षराश्रयं राममंत्रः शुभावहः। कीर्तनीयो जनैर्भक्त्या महामङ्गलकारकः ॥१२२॥
वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम् इति मनुः।
जय राम जय राम संकीर्त्य सुस्वरं ततः। जय जयोत्र संकीर्त्य रामेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२३॥
चतुर्दशाक्षराश्राय तृतीयः कथितो मनुः। कीर्तनीयो जनैर्नित्यं महापातकनाशनः ॥१२४॥
जय राम जय राम जय जय राम इति मनुः।
मनुः सीतामाधवेति पंचवर्णात्मकः स्मृतः। जपनीयः कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२५॥
सीतामाधव इति मनुः
वन्दे' इसका उच्चारण करके "सुरगुरु" ऐसा कहकर 'जात' का उच्चारण करे ॥११२॥ सत्रह सुन्दर वर्णों-
से इस शुभ राममन्त्रका रचना की गयी है। लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे
इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ ११३॥ 'रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम्' यह मन्त्रका स्वरूप है। राम-
दास कहते हैं कि हे विष्णुदास ! अब मैं और बहुतसे शुभ मन्त्र तुझसे बता रहा हूँ, सुनो। जिनके
स्मरणमात्रसे बड़े बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ११४ ॥ 'कौसल्यासुत' ऐसा कहकर 'राम' इसका उच्चारण
करे। तदनन्तर 'सीताराजन' और उसके बाद 'मेघश्याम' कहे ॥ ११५ ॥ यह षोडशाक्षर मंत्र बड़ा शुभ है।
इसीलिये लोगोंको चाहिए कि भली आवाज़से बाजा आदि वाद्योंके साथ-साथ इसका कीर्तन करे ॥ ११६ ॥
'कौसल्यासुत राम सीताराजन मेघश्याम' यहो मंत्रका स्वरूप है। इस षोडशाक्षर मन्त्रका लोग सर्वदा कीर्तन
करें। क्योंकि यह समस्त पापोंका नाशक और सब प्रकारका अभिलषित कामनाओंको पूर्ण करनेवाला महामंत्र
है ॥ ११७ ॥ "दशरथनन्दन" ऐसा कहकर पहले 'मेघश्याम" और उसके बाद "सीता" इन दो अक्षरोंको
कहकर 'राजन" ऐसा कहते हुए 'राजाराम' कहे। यह बीस अक्षरोंवाला राममंत्र बड़े-बड़े पातकोंका
नाशक है ॥ ११८॥ ११९॥ 'दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम' यही इस मन्त्रका स्वरूप है।
जनोंको चाहिए कि सब प्रकारका सुख देनेवाले इस विंशाक्षर मन्त्रका मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके
साथ कीर्तन करें। क्योंकि यह बड़ा पुण्यदायक मन्त्र है ॥१२०॥ "वन्द बारं रघुवारम्' ऐसा कहकर "सीताकान्तम्"
तथा 'रणधीरम्' ये वाक्य कहे ॥ १२१ ॥ यह परम फलदायक चतुर्दशाक्षरात्मक राममंत्र है। लोगोंको उचित
है कि महामंगल करनेवाले इस मन्त्रका भक्तिपूर्वक कीर्तन करें ॥ १२२ ॥ 'वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम्'
यह इस मंत्रका स्वरूप है। 'जय राम जय राम' ऐसा कहकर "जयजय" ऐसा कहते हुए 'राम' के दो
अक्षर कहें। 'जय राम जय राम जय जय राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। चतुर्दशाक्षर मंत्रोंमें यह तीसरा
मंत्र है। लोगोंको चाहिए कि महापातकोंका नाश करनेवाले इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ १२३ । १२४॥