श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 751, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७३४ | आनन्दरामायणम् | [ सर्गः १५ |
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भजेति द्व्यक्षरे पूर्वं सीताराममिति क्रमात् । मानसेति ततश्चोक्त्वा भजेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२६॥
ततो राजाराम इति मंत्रः पञ्चदशाक्षरः । कीर्तनीयो मनुष्याय वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२७॥ भज सीताराम मानस भज राजारामम् इति मनुः ।
श्रीसीताराममित्युक्त्वा वन्दे चोक्त्वा ततः पुनः । श्रीराजाराममिति च कीर्तयेत्सुस्वरं मुहुः ॥१२८॥
द्वादशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा जनैः । वीणावाद्यादिना पुण्यः सर्ववांछितदायकः ॥१२९॥ श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम् इति मनुः ।
रावणमर्दनत्युक्त्वा रामेत्युक्त्वा ततः परम् । राघवति ततश्चोक्त्वा वाली चेति ततः क्रमात् ॥१३०॥
मर्दनेति पुनश्चोक्त्वा रमाठ द्व्यक्षरे पुनः । स्मृतोऽष्टादशवर्णोऽथ द्वितीयोऽथ मनुः शुभः ॥१३१॥ रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन रामेति मनुः ।
अयं मंत्रः कीर्तनीयः सर्वदा मानवोत्तमैः । श्रीसीताराममिति च मानसेति ततः परम् ॥१३२॥
भजेति द्व्यक्षरे चोक्त्वा रामेति द्व्यक्षरं पुनः । राममिति द्व्यक्षरे च मंत्रोऽयं परमः शुभः ॥१३३॥
चतुर्दशाक्षरश्चायं चतुर्थश्च प्रयोगतः । कीर्तनीयः सुस्वरेण वीणावाद्यपुरःसरः ॥१३४॥ श्रीसीताराम मानस भज राजाराम् इति मनुः ।
सीताराम जयेत्युक्त्वा राजरामेति वै ततः । अयं दशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयोऽथ सुस्वरः ॥१३५॥ सीताराम जय राजाराम इति मनुः ।
श्रीसीताराममिति च वन्दे राममिति क्रमात् । जय रामं ततश्चैव त्रयोदशाक्षरो मनुः ॥१३६॥
कीर्तनीयः सदा मर्त्यैः सर्वपातकनाशनः । वीणावाद्यादिना नित्यं द्वितीयोऽथ मनुः स्मृतः ॥१३७॥ श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम् इति मनुः ।
मां पाहीति चोक्त्वादौ दीनं राघव चेति हि । त्वत्पदयुगलीनं वै चेत्येष षोडशाक्षरः ॥१३८॥
'सीताराघव' यह पंचवर्णात्मक राममंत्र है। सुस्वर मीठे स्वर और वीणा आदि वाद्योंके साथ इस मंत्रका कीर्तन और जप करे ॥१२५॥ "सीताराघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'भज' यह शब्द कहकर 'सीतारामम्' कहे। उसके बाद "मानस" यह शब्द कहकर 'भज राजारामम्' ऐसा कहे। यह पंचदशाक्षरात्मक राममंत्र है। इसे भी जप या मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन करे ॥१२६-१२७॥ "मन्त्र सीताराम मानस भज राजारामम्" यह इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'श्रीसीतारामम्' ऐसा कहकर 'वन्दे' कहे और उसके बाद 'श्रीराजारामम्' कहकर इस मंत्रका कीर्तन करे यह द्वादशाक्षरात्मक मंत्र है । 'श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम्' यह इस मंत्रका स्वरूप है। लोगोंको उचित है कि सब प्रकारकी कामनायें पूर्ण करनेवाले इस मंत्रका जप और कीर्तन करें ॥१२८-१२९॥ पहले 'रावणमर्दन' फिर 'राम' उसके बाद "राघव" फिर 'वालीमर्दन' तदनन्तर 'राम' ऐसा कहे। अष्टादशाक्षर मंत्रोंमें यह दूसरा मंत्र है। 'रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन राम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। सज्जनोंको चाहिए कि सर्वदा इस मन्त्रका जप किया करें। पहले 'सीतारामम्' उसके बाद 'मानस' फिर 'भज' और उसके पश्चात् 'राजारामम्' ऐसा कहें। यह बड़ा पवित्र मन्त्र है॥ १३०-१३४॥ चतुर्दशाक्षरात्मक मंत्रोंमें यह चौथा मन्त्र है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन तथा जप करना चाहिए। 'श्रीसीताराम मानस भज राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीताराम जय' फिर 'राजाराम' ऐसा कहे। यह दशाक्षर राममंत्र है। लोगोंको चाहिए कि मीठे स्वरसे इस मंत्रका भी कीर्तन किया करें। ॥१३५॥ 'सीताराम जय राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीतारामम्' फिर 'वन्दे रामम्' और इसके बाद 'जय राम' ऐसा कहे। यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र है। संसारके प्राणियोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ नित्य इस मन्त्रका कीर्तन करें । १३६ ॥ १३७ ॥ 'श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम्' यह मंत्रका स्वरूप है। पहले 'मा पाहि इति'