श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 747, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७३० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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शार्दूलोग्र्यो रामबन्धुः पश्चिमे भरतानुजः । रविवंशोद्भवश्चोर्ध्वं मध्ये दशरथात्मजः ॥६५॥ सर्वतः पातु मामत्र कैकेयीतोषवर्धनः । श्यामलांगः शिरः पातु भालं श्रीलक्ष्मणाग्रजः ॥६६॥ भ्रुवोर्मध्ये सदा पातु सुमुखोऽश्विनीसुते । श्रुतकीर्तिपतिर्नेत्रे कपोले पातु राघवः ॥६७॥ कर्णौ कुण्डलकर्णोऽव्यान्नासाग्रं नृपवंशजः । मुखं मम युधा पातु वाणीं पातु स्फुटस्वरः ॥६८॥ जिह्वां सुबाहुतातोऽव्याद्यूपकेतुपिता द्विजान् । चिबुकं रम्यचिबुकः कण्ठं पातु सुभाषणः ॥६९॥ स्कन्धौ पातु महातेजा भुजौ गन्धर्ववाक्यकृत् । करे मे कङ्कणधरः पातु खड्गं नखं मम ॥७०॥ कुक्षिं रामप्रियः पातु पातु वक्षो रघूत्तमः । पार्श्वे सुरार्चितः पातु पातु पृष्ठं वराननः ॥७१॥ जठरं पातु रक्षोघ्नः पातु नाभिं सुलोचनः । कटिं भरतमन्त्री च गुह्यं श्रीरामसेवकः ॥७२॥ समर्पितमनाः पातु लिङ्गमूरू द्विषान्तकः । कोदण्डपाणिः पात्वत्र जानुनी मम सर्वदा ॥७३॥ राममित्रः पातु जंघे गुल्फौ पातु सुनूपुरः । पादौ नृपतिपूज्योऽव्यान्श्रीमान्पादाङ्गुलीर्मम ॥७४॥ धान्यङ्गानि समस्तानि ह्युदारांगः सदा मम । रोमाणि रमणीयेऽङ्गस्याद्रामौ पातु सुधार्मिकः ॥७५॥ दिवसे सत्यसंधोऽव्यादा भोजने शरमत्करः । गमने कनकङ्केतोऽव्यान्र्सर्वदा लवणान्तकः ॥७६॥ एवं शत्रुघ्नकवचं मया ते समुदीरितम् । यः पठति नरः सम्यग् नरः सौख्यभागिनः ॥७७॥ शत्रुघ्नस्य वरं चेदं कवचं मङ्गलप्रदम् । पठनं यं नरेणैन्त्या पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ॥७८॥ अस्य स्तोत्रस्य पाठेन यं यं कामं नरोऽर्थयेत् । तं तं लभेन्निश्चयेन सत्यमेतद्वचो मम ॥७९॥ पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इच्छत्कामं तु कामार्थी प्राप्नुयात्पठनादिना ॥८०॥ कवचस्यास्य भूम्यां हि शत्रुघ्नस्य विनिश्चयात् । तस्मादेतत्सदा भक्त्या पठनीयं नरैः शुभम् ॥८१॥
नेत्र लगाये हुए शत्रुघ्नजीका ध्यान करके इस उत्तम शत्रुघ्नकवचका पाठ करना चाहिए ॥५६-६३॥ पूर्वकी ओर शत्रुघ्न, दक्षिण तरफ सुदर्शन और पश्चिम ओर कैकेयीनन्दन हमारी रक्षा करें । ६४ । उत्तरमें रामबन्धु, नीचे भरतके छोटे भ्राता, ऊपर सूर्यराज और मध्यमें दशरथात्मज मेरी रक्षा करें ॥ ६५ ॥ कैकेयीको आनन्द देने-वाले मेरी चारो ओर रक्षा करें । श्यामल अङ्गवाले शत्रुघ्न मस्तकका और लक्ष्मणके अग्रज मेरे ललाटकी रक्षा करें ॥ ६६ ॥ सुन्दर मुखवाले सदा मेरे भौंहोंके मध्यभागकी, श्रुतकीर्तिके पति नेत्रोंका तथा राघव दोनों कपोलोंकी रक्षा करें ॥ ६७ ॥ कानोंमें कुण्डल धारण करनेवाले मेरे कानोंका, नृपवंशज नासिकाके अग्रभागकी, युद्धापहारी शत्रुघ्न मेरे मुखकी एवं स्फुट अक्षर बोलनेवाले मेरी वाणी की रक्षा करें । ६८ । सुबाहुके पिता कण्ठोंकी, यूपकेतुके पिता दाँतोंकी, सुन्दर चिबुकवाले मेरे चिबुकका और सुन्दर बातें करनेवाले मेरे कण्ठकी रक्षा करें ॥ ६९ ॥ महातेजस्वी कन्धाकी रामका आज्ञा पालन करनेवाले भुज का, कङ्कणधारी मेरे हाथोंकी और खड्गको धारण करनेवाले शत्रुघ्न नखोंकी रक्षा करें ॥ ७० । रामके प्रिय मेरे उदरकी, रघूत्तम वक्षस्थलकी, सुरार्चित पार्श्वभागकी और वरानन पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ७१ ॥ रक्षोघ्न जठरको, सुलोचन नाभिको, भरतके मंत्री कटिभागकी और श्रीरामसेवक गुह्यप्रदेशकी रक्षा करें ॥ ७२ । जिन्होंने अपना मन रामको अर्पित कर दिया है वे शत्रुघ्न लिङ्गकी मुखवाले द्विषान्तकका और हाथोंपे धनुष धारण करनेवाले सर्वदा मेरे जानुओंकी रक्षा करें ॥ ७३ ॥ राममित्र जाँघोंकी, सुन्दर नूपुर पहननेवाले गुल्फकी, नृपतिपूज्य पैरोंकी और श्रीमान् मेरी उँगलियोंकी रक्षा करें ॥ ७४ ॥ उदार अङ्गवाले शत्रुघ्न सदा मेरे समस्त अङ्गोंकी रक्षा करें । रमणीय आकृतिवाले मेरे रोमोंकी, रात्रिके समय सुधारमिक, दिवसके समय सत्यसंध, भोजनके समय सुन्दर बाण धारण करनेवाले, गमनके समय सुन्दर बाणोंके चलानेवाले और सब समय लवणामुरको मारनेवाले शत्रुघ्न मेरी रक्षा करें ॥ ७५॥ ७६ ॥ इस तरह मैंने तुम्हे शत्रुघ्नकवच कह सुनाया । जो लोग भक्तिपूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे सुखभागी होते हैं ॥ ७७ । यह कवच बड़ा सुन्दर, मङ्गलप्रद तथा पुत्र-पौत्र बढ़ानेवाला है ॥ ७८ ॥ इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला प्राणी जो-जो वस्तुयें चाहता है, उन्हें अवश्य पाता है । मेरी बात सत्य मानो । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ७९ ॥ पुत्र चाहनेवाला पुत्र, धन चाहनेवाला धन तथा जो प्राणी जो