भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 746

सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७२९

लभन्ते मानवैरत्र सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । तस्मात्सदा जपेनीयं रामोपासकमानवैः ॥५३॥

अथ शत्रुघ्नकवचम्

अथ शत्रुघ्नकवचं सुतीक्ष्ण शृणु सादरम् । सर्वकामप्रदं व्यर्थं रामभक्तिविवर्द्धनम् ॥५४॥
शत्रुघ्नं धृतकार्मुकं धृतमहातूणीरबाणोत्तमं प श्चे श्रीरामचन्द्रनस्य विनयाद्वामे स्थितं सुन्दरम् ।
रामं स्वीयकरेण तालदलजं धुन्वन्निमित्रं वरं सूर्य्यभ व्यजनं सभास्थितमहं तं वीजयन्तं भजे ॥५५॥

ॐ अस्य श्रीशत्रुघ्नकवचमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः श्रीशत्रुघ्नो देवता । अनुष्टुप्छन्दः । सुदर्शन इति बीजम् । कैकेयीनन्दन इति शक्तिः । श्रीभरतानुज इति कीलकम् । भरतमंत्रीत्यस्त्रम् । श्रीरामदास इति कवचम् । लक्ष्मणांशज इति मंत्रः । श्रीशत्रुघ्नप्रीत्यर्थे सकलमनःकामनासिद्धयर्थे जपे विनियोगः । अथांगुलिन्यासः । ॐ शत्रुघ्नाय अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ सुदर्शनाय तर्जनीभ्यां नमः । ॐ कैकेंयीनदनाय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ भरतानुजाय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ भरतमंत्रिणे कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ श्रीरामदासाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिन्यासः । लक्ष्मणांशजेति दिग्बंधः ।

अथ ध्यानम्

रामस्य संस्थितं वामे पार्श्वे विनयपूर्वकम् । कैकेयीनन्दनं सौम्यं मुकुटेनाविरजितम् ॥५६॥
रत्नकंकणकेयूरवनमालाविराजितम् । रशनाकुंडलधरं रत्नहारमनू पुरम् ॥५७॥
व्यजनेन वीजयतं जानकीकांतमादरात् । रामन्पश्नेक्षणं वीर कैकेयीतोषवर्द्धनम् ॥५८॥
द्विभुजं कंजनयनं दिव्यपीतांबरान्वितम् । सुभुजं सुंदरं मेघश्यामलं सुन्दराननम् ॥५९॥
रामवाक्ये दत्तकर्णं रक्षोघ्नं खङ्गधारिणम् । धनुर्वाणधरं श्रेष्ठं धृततूणीरमुत्तमम् ॥६०॥
सभायां संस्थितं रम्यं कस्तूरीतिलकांकितम् । मुकुटस्थावतंसेन शोभितं च स्मिताननम् ॥६१॥
रविवंशोद्भवं दिव्यरूपं दशरथात्मजम् । मथुरावासिनं देवं लवणासुरमर्दनम् ॥६२॥
एवं ध्यात्वा तु शत्रुघ्नं रामपादेक्षणं हृदि । पठनीयं वरं चेदं कवचं तस्य पावनम् ॥६३॥
पूर्वे स्ववतु शत्रुघ्नः पातु वायव्ये सुदर्शनः । कैकेयीनन्दनः पातु प्रतीच्यां सर्वदा मम ॥६४॥

धनार्थी धन प्राप्त करता है । इस तरह उसे जिस किसी वस्तुकी इच्छा होती है, वे सब इस कवचके पाठसे प्राप्त हो जाते हैं । ५१ ।। ५२ । यह बात मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ—झूठ कुछ भी नहीं । रामकी उपासना करनेवालोंको चाहिए कि सदा इस कवचका पाठ किया करें । ५३ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! अब मैं तुम्हें शत्रुघ्नकवच बताऊँगा, तुम आदरपूर्वक सुनो । यह शत्रुघ्नकवच भी सब कामनायें पूर्ण करने और रामकी सद्भाक्त बढ़ानेवाला है ॥ ५४ ॥ धनुष धारण करनेवाले बड़ा-सा तरकस धारण किये, श्रीरामचन्द्रजीके पास वामभागमें खड़े, अपने हाथसे ताड़का पंखा झलते हुए, सूर्यके समान अतिशय विचित्र उस पंखेकी दीप्ति है, ऐसे शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५५ ॥ 'अस्य श्री०' से लेकर "लक्ष्मणांशजेति दिग्बन्धः" तक अङ्ग-न्यास आदिकी विधि बतलायी गयी है इसके आगे ध्यान है - रामके पास वामभागमें विनयपूर्वक खड़े कैकेयीके आनन्ददाता, सौम्यस्वरूप, मुकुटसे अतिशोभित, रत्नजटित कंकण, केयूर तथा वनमालासे अलंकृत सिकड़ी और कुण्डल धारण किये रत्नहार तथा सुन्दर नूपुर पहने, आदरपूर्वक रामचन्द्रजीको पंखा झलते और रामकी ओर निहारत हुए कैकेयीका आनन्द बढ़ानेवाले वीर, जिनके दो भुजायें हैं, कमल जैसे नेत्र हैं, दिव्य पीताम्बर पहने, सुन्दर भुजावाले, मेघके सदृश श्यामल तथा सुन्दर मुखवाले, रामकी बातोंमें कान लगाये, राक्षसोंको मारनेवाले, खड्ग धारण किये, धनुष और बाणसे सुसज्जित बड़ा सा तूणीर धारण किये, सभामें स्थित, रम्य, कस्तूरीका तिलक लगाये, मुकुट और कुण्डलोंसे सुशोभित, मुसकराते मुखवाले, सूर्यवंशमें जायमान, दिव्यरूपधारी, दशरथके पुत्र, मथुरा निवासी लवणासुरका मर्दन करनेवाले और श्रीरामके चरणोंमें