भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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७२८ आनन्दरामायणे [सर्ग १६


शिरश्मत्पिता पातु भालं पातु हरिप्रियः। भ्रुवोर्मध्यं जनकजादत्तकंकणपत्यवतु ॥३६॥
पातु जनकजामाता मम नेत्रे मदाऽव हि। कपोले मण्डलीकान्तः कर्णमूले स्मिताननः ॥३७॥
नासाग्रं मे सदा पातु कैकेयीतोषवर्धनः। ओष्ठौ च सुमुखे पातु पातु प्राज्ञां जटाधरः ॥३८॥
पातु पुष्करनानेत्रो मे जिह्वां दन्तान् प्रथामयः। चिबुकं रत्नसद्भूषः कंठे पातु वराननः ॥३९॥
स्कन्धौ पातु जिताशनिसुतो शत्रुघ्नवंदितः। करौ कवचधारी च नखान खड्गगोऽवतु ॥४०॥
कुक्षौ रामानुजः पातु वक्षः श्रीरामवल्लभः। पार्श्वे सधनुषाम्रेड्यः पातु पृष्ठं शुभाषणः ॥४१॥
जठरं च धनुर्द्धारी नाभिं शङ्खगोवदतु। कटिं पट्टाम्बरः पातु गुह्यं रमैकमानसः ॥४२॥
राममित्रः पातु लिंगमूहं श्रीरामसेवकः। नादग्रामस्थितः पातु जानुनी मम सर्वदा ॥४३॥
श्रीरामपादुकाधारी पातु जंघे सदा मम। गुल्फौ श्रीरामचरणमुखः पादौ पातु सुगर्वितः ॥४४॥
रामाज्ञापालकः पातु सर्वाङ्गान्यान सर्वदा। मम पादांगुलीः पातु रघूत्तंसांशभूषणः ॥४५॥
रोमाणि पातु मे राम्यः पातु रात्रीं सुधार्य्यम। तूणीरधृग दिवसे दिक्षतु मम सर्वदा ॥४६॥
सर्वकालेषु मां पातु पाञ्चजन्यः सदा भुवि। एवं श्रीभरतस्येदं सुतीक्ष्ण कवचं शुभम् ॥४७॥
मया प्रोक्तं तवाग्रे हि मदार्थगरुकामदम्। स्तोत्राणामुत्तमं स्तोत्रमिदं ज्ञेयं सपुण्यदम् ॥४८॥
पठनीयं सदा भक्त्या रामचन्द्रस्य हर्षदम्। पठित्वा भरतस्येदं कवचं रघुनन्दनः ॥४९॥
यथा याति परं तोषं तथा स्वकवचेन न। तस्मादेतत्सदा जप्यं कवचानमनुत्तमम् ॥५०॥
अभ्यासं पठनान्मर्त्यः सर्वान्कामानवाप्नुयात्। विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रकामो लभेत्सुतम् ॥५१॥
पत्नीकामो लभेत्पत्नीं धनार्थी धनमाप्नुयात्। यद्यन्मनोऽभिलषितं तत्तत्कवचपाठकः ॥५२॥

भरत मेरा रक्षा कर ॥ ३५ ॥ तक्षक पिता मर मस्तकका रक्षा करे हरप्रिय मस्तकका रक्षा करे जानकीको आज्ञाप्रनार रहनेवाले भरतजी थोड़के मध्यभागकी रक्षा करें । ३६॥ साताको माताके समान माननेवाले भरतजी मेरा आँखोंकी रक्षा करें। मण्डलीक निसतम मेर कपालोंकी रक्षा करें मुसकान मुख-मण्डलवाले भरतजी म० कर्णमुलक रक्षा कर ॥ ३७ ॥ कैकेयीके आनन्दको वढानेवाले मेर नासाग्रको, उग्र अङ्गुष्ठाने मुखकी और अगाध धी भरत मेरी वाणोका रक्षा कर ॥ ३८ ॥ तक्षकके पिता जिह्वाकी, अशामय दाँतोंकी, वल्कलधारी चिबुककी और सुन्दर मुखवाले कन्ठे र कण्ठक रक्षा कर ॥३९॥ शत्रुको जीतनेवाले मेर कन्धोंकी, शत्रुघ्नवन्दित भुजाओंकी, कवचधारी हाथोंकी ओर खड्गधारी नखोकी रक्षा करें ॥ ४० । रामके छोटे भाता उदरकी, श्रीरामवल्लभ वक्षस्थलकी, शरासनधारी पीठकी और सुन्दर भाषण करनेवाले पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ४१ ॥ धनुर्धारी जठरकी ङ्खकर न भिकी, कमठके समान नेत्रोंवाले कमरकी और एकमात्र रामनामका स्मरण करनेवाले मेरे गुह्यभागकी रक्षा करें ॥ ४२ । रामके मित्र लिंगकी रक्षा करें, श्रीरामके सेवक ऊरुभागकी और नन्दिग्राममें रहनेवाले भरत सर्वदा मेर जानुभागकी रक्षा करें ॥४३॥ श्रीरामकी पादुकाको धारणकरनेवाले मेरी जंघाओंकी, श्रीरामकथ दानी गुल्फभागका तथा सुगर्वित भरतजी मेरे पगकी रक्षा करें ॥ ४४ ॥ रामकी आज्ञा पालन करनेवाले सर्वदा मेर सत्र अंगोंकी और रघुवंशके उत्तम भूषण मेरे पैरकी उँगलियोंकी रक्षा कर ॥ ४५ ॥ रम्य नगुधारी भरतजी मेर चित्र रोमांकी, रात्रि के समय सुन्दर बुद्धिवाले और तूणीरधारी भरत दिनके समय सब दिशाओंकी रक्षा करें । ४६॥ पाञ्चजन्य सब समय मेर रक्षा करते रहैं। हे सुतीक्ष्ण ! इस प्रकार मैने तुम्हें श्रीभरतजीका कवच कह सुनाया । यह बड़ा मङ्गलकारी, सब स्तोत्रोंमें उत्तम और भली भाँति पुण्यदाता है । ४७ । ४८ ॥ लोगोंको चाहिए कि वे रामचन्द्रजीको आनन्द देनेवाले इस भरत-कवचका पाठ करके ही रामकवचका पाठ किया करें। इस कवचके पढ़नेसे रामचन्द्र जितने प्रसन्न होते हैं, उतने अपने कवच अर्थात् रामकवचका पाठ सुनकर बहो प्रसन्न होते; इस कारण लोगोंको चाहिये कि सब कवचोंमें श्रेष्ठ इस कवचका पाठ अवश्य करें ॥ ४६ ॥ ५० ॥ इस कवचका पाठ करनेसे प्राणी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। विद्याकी कामनावाला विद्या, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुत्र, पत्नी चाहनेवाला पत्नी और