श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 744, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७२७
अतः परं भरतस्य कवचं ते वदाम्यहम् । सर्वपापहरं पुण्यं सदा श्रीरामभक्तिदम् ॥ २६॥
कैकेयीतनयं सदा रघुपतेर्नेत्रेक्षणं श्यामलं सप्तद्वीपपतेर्विदेहतनयाकान्तस्य वक्ये रतम्
श्रीसीताधवलातपत्ननिकटे स्थित्वा वरं चामरं धृत्वा दक्षिण करेण भरतं संवीजयन्तं भजे ॥२७॥
ॐ अस्य श्रीभरतकवचमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः । श्री भरतो देवता अनुष्टुप्छन्दः । शंख इति बीजम् । कैकेयीनन्दन इति शक्तिः । भरतखण्डेश्वर इति कीलकम् । रामानुज इत्यस्त्रम् । सप्तद्वीपेश्वराज्ञाम इति कवचम् रामांशज इति मन्त्रः श्रीभरतप्रीत्यर्थे सकलमनोरथसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । अथाङ्गन्यासः ॐ भरताय अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ कैकेयीनन्दनाय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ भरतखण्डेश्वराय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ रामानुजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॐ शंखाय शिरसे स्वाहा ॐ कैकेयीनन्दनाय शिखायै वषट् । ॐ भरतखण्डेश्वराय कवचाय हुम् । ॐ रामानुजाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ सप्तद्वीपेश्वराज्ञाय अस्त्राय फट् । रामांशजाय चेति दिग्बन्धः ।
अथ सध्यानं भरतकवचम्
रामचन्द्रसव्यपार्श्वे स्थितं कैकेयीसमुद्भवम् । रामाय चामरेणैव वीजयन्तं मनोहरम् ॥ २८॥
रत्नकुण्डलकेयूरकंकणादिविभूषितम् । पीताम्बरपरीधानं वनमालाविराजितम् ॥ २९॥
मांडवीशौतचरणं रशनानूपुरान्वितम् । नीलोत्पलदलश्यामं द्विजराजसमाननम् ॥३०॥
आजानुबाहुं भरतखंडस्य प्रतिपालकम् । रामानुजं स्मितास्यं च शत्रुघ्नपरिवन्दितम् ॥३१॥
रामम्यस्तेक्षणं सौम्यं विद्युत्पुञ्जसमप्रभम् । रामभक्तं महावीरं वन्दे तं भरतं शुभम् ॥३२॥
एवं ध्यात्वा तु भरतं रामपादेश्वण हृदि । कवचं पठनीयं हि भरतस्येदमुत्तमम् ॥३३॥
पूर्वतः भरतः पातु दक्षिणे कैकयीसुतः । नृपात्मजः प्रतीच्यां हि पातूदीच्यां रघूत्तमः ॥३४॥
अधः पातु श्यामलांगश्चोर्ध्वं दशरथात्मजः । मध्ये भारतवर्षेशः सर्वतः सूर्यवंशजः ॥३५॥
लोगोंको चाहिए कि प्रयत्न करके सब प्रकारकी कामना पूर्ण करनेवाले इस लक्ष्मणकवचका पाठ अवश्य करें ॥ २५ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! अब मैं तुम्हें श्रीभरतजीका कवच बताऊंगा, जो पापोंको हरनेवाला, पवित्र एवं श्रीरामचन्द्रके प्रति देनेवाला है ॥ २६ .. मैं उन भरतजीकी बन्दना करता हूँ, जो श्रीरामचन्द्रजीकी ओर निहार रहे हैं। जिनका श्याम स्वरूप है। जो सातों द्वीपोंके अधिपति रामचन्द्रजीकी आज्ञामें तत्पर रहते हैं। जो रामकी दाहिनी ओर बैठकर दाहिने हाथसे सुन्दर चमर हाँक रहे हैं। उन भरतजीका मैं ध्यान करता हूँ । २७ ॥ "अस्यश्री" से लेकर "रामांशजाय चेति दिग्बन्ध" तक अंगन्यास आदिकी विधि बतलायी गयी है। इसके बाद ध्यान है-श्रीरामचन्द्रजीकी दाहिनी ओर बैठकर रामपर चमर चलाते हुए सुन्दर रत्नजडित कुण्डल, केयूर तथा कंकण आदिसे विभूषित, पीताम्बर धारण किये, वनमालासे अलंकृत, जिनके चरण मांडवी धोती हैं, रशना और नूपुरसे विराजित, नील कमलके समान श्यामस्वरूप एवं चन्द्रमाके समान मुखवाले ॥ २८-३० ॥ जानुपर्यन्त भुजाओवाले, भरतखण्डके प्रतिपालक, रामके छोटे भ्राता, शत्रुघ्नसे परिवन्दित, मुस्कुराहटयुक्त मुखवाले, रामकी ओर दृष्टि लगाये हुए, सौम्यस्वरूप, विद्युत्पुंजके समान प्रभावशाली, रामभक्त एवं महापराक्रमी भरतजीका ध्यान करके थोड़ी देरतक रामचन्द्रजीके चरणोंका स्मरण करें उसके बाद इस भरतकवचका पाठ करे । ३१ ३२ । पूर्वकी ओर भरत मेरी रक्षा करें, दक्षिणकी तरफ कैकेयीसुत ओर पश्चिमकी ओर नृपात्मज मेरी रक्षा करें। उत्तरकी ओर रघूत्तम मेरी रक्षा करें ॥ ३४ ॥ नीचे श्यामल अङ्गोंवाले, ऊपर दशरथात्मज, मध्यमें भारतवर्षके प्रभु चारों ओर सूर्यवंशमें उत्पन्न होनेवाले