भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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७२६ आनन्दरामायण [सर्ग १६


नासाग्रं मे सदा पातु सुमित्रानन्दवर्धनः । रामवक्त्रेक्षणः पातु सदा नेत्रे भुवि ममैव ॥१०॥ सीतावाक्यकरः पातु मम वाणीं सदाऽत्र हि । सौम्यरूपः पातु जिह्वामाननं पातु मे द्विजान् ॥११॥ चिबुकं पातु रक्षोघ्नः कण्ठं पात्वसुरान्तकः । स्कन्धौ पातु जितारिर्भुजौ पङ्कजलोचनः ॥१२॥ करौ कङ्कणधारी च नखान् रक्तनखोऽवतु । कुक्षिं पातु जितेन्द्रारिर्मे वक्षः पातु जितेन्द्रियः ॥१३॥ पार्श्वं गरुडपृष्ठस्थः पृष्ठदेशं मनोज्ञपः । नाभिं गम्भीरनाभिस्तु कटिं च रूपवान्सदा ॥१४॥ गुह्यं पातु महासक्तः पातु लिंगं हरिप्रियः । ऊरू पातु विष्णुभक्तः समुद्गाढान्तु जानुनी ॥१५॥ नागेन्द्रः पातु मे जङ्घे गुल्फौ तूर्णार्चनक्षमः । पादपद्मद्वयोऽप्यत्र पादाङ्गानि सुलोचनः ॥१६॥ चित्रकेतुपिता पातु मम पादाङ्गुलीः सदा । शेषांगि मे सदा पातु मूर्धानं शम्भुसुद्रवः ॥१७॥ दशरथसुतः पातु निशायां मम सादरम् । सुगोलोऽव्यान्मां पातु दिवसे दिवसे सदा ॥१८॥ सर्वकालेषु सौमित्रिजित्वाऽवतु सर्वदा । एवं सौमित्रिकवचं सुतीक्ष्ण कथितं मया ॥१९॥ इदं प्रातः समुत्थाय यः पठेन्मन्त्र मानवः । न जन्माश्रमतो लोके तस्यैव सफलो भवः ॥२०॥ सौमित्रेः कवचस्यास्य पठनान्निःसंदेहं हि । पुत्रार्थी लभते पुत्रान धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥२१॥ पत्नीकामो लभेत्पत्नीं गोधनाथी तु गोधनम् । धान्यार्थी प्राप्नुयाद्धान्यं राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात् ॥२२॥ पठित्वा रामकवचं सौमित्रिकवचं विना । घृतं दुग्धे नोपेन तद्वत्स्यात् निष्फलं न तत्फलम् ॥२३॥ केवलं रामकवच पाठेन मानवैर्दि त्वपाठ्यः । सुसन्तुष्टा न स्याद्रघुनन्दनः ॥२४॥ अतः प्रयत्नतश्चेदं सौमित्रिकवचं नृभिः । पठनीयं प्रयत्नेन सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥२५॥


तन, रक्षाकरा उर्मिलानाथ दोनों बाणस धनुधारी और औघाड सुमित्रानन्दन रक्षा करें ॥ ९॥ कमलकी शभामय्या सदा रक्षा करत हैं जो कभी वा उस पदमका सुगंधी पाइन करनेवाले लक्ष्मणजी रक्षा करते रहें ॥ २ । सुमित्र जी आनन्द बढ़ानेवाले नग पातक अपने प्राणों को सावर । रामका अग निहारते हुए लक्ष्मण सर्वदा मेरे मुखकी रक्षा करैं ॥ १०॥ सदा आशाका पालन करनेवाले लक्ष्मणजी सर्वदा मेरी वाणीकी रक्षा करें । सौम्यरूपवाले जि... की तथा प्रसन्नतावाली मेरी आनन दाँत की रक्षा करें ॥ ११ । राक्षसोंके संधकारी मेरे चिबुककी रक्षा करें असुरोंका नाश करनेवाले कण्ठका रक्षा करें, शत्रुओं जीतने वाले मेरे स्कन्धोंकी रक्षा करें और कमल सदृश नेत्रवाले दोनों भुजायोंकी रक्षा करें ॥ १२ । कङ्कणको धारण करनेवाले हाथकी रक्षा करें, लाल नखवाले नखोंकी रक्षा करें, शत्रुको जीतनेवाले लक्ष्मणजी मेरी कोखकी रक्षा करें और जितेन्द्रिय लक्ष्मणजी मेरे वक्षस्थल की रक्षा करें ॥ १३॥ रामचन्द्रजीके पीछे बैठनेवाले लक्ष्मणजी मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें, गम्भीर नाभिवाले नाभिस्थूल सुगन्धमय मरुत्त्वाद् मेरे मेरी कमरकी रक्षा करें ॥ १४ ॥ कृपालुपाल लक्ष्मण गुह्येन्द्रिय रक्षा करें, लक्ष्मण भगलिंगकी रक्षा करें विष्णुके सदृश रूपवाले लक्ष्मणजी पुट्ठों की तथा सुन्दर रूपवाले मेरे जानुभागकी रक्षा करें ॥ १५ ॥ सर्पोंके राजा मेरी जंघाओंकी घुंघुरवाले पैर घुटनोंकी, अङ्गुष्ठवान मेरे पैरोंकी तथा सुन्दर आँखोंवाले लक्ष्मणजी मेरे समस्त अङ्गोंकी रक्षा करें ॥ १६ ॥ चित्रकेतुके पिता मेरे पैरकी उँगलियों तथा मूर्धाभाग उत्पन्न इत्यादिक लक्ष्मण मेरे गात्रकी रक्षा करें ॥ १७ ॥ रात्रि के समय दशरथके पुत्र भली करें और दिनके समय भूपाल- धारी लक्ष्मणजी मेरी रक्षा करते रहें ॥ १८ ॥ इन्द्रजित् मेघनाद का मारनेवाले सबदा मेरी रक्षा करत रहें। हे सुतीक्ष्ण, इस तरह मैंने तुम्हें लक्ष्मणकवच कह सुनाया ॥ १९ ॥ जो लोग सवेरे उठकर इस कवचका पाठ करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं और उनका जन्म सफल है ॥ २० ॥ लक्ष्मणजीके इस कवचका पाठ करनेसे पुत्रार्थी पुत्र तथा धनार्थी धन पाता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ २१ ॥ पत्नीका कामनावाला प्राणों प्यारी, गोधन चाहनेवाला गोधन, धान्यका इच्छुक धान्य और राज्यकी इच्छा रखनेवाला राज्य पाता है ॥ २२ । बिना लक्ष्मणकवचका पठितव्य रामकवचका पाठ उसतरह व्यर्थ जाता है, जिस तरह घारु विना नेवेद्य लगाया जाय ॥ २३ । केवल रामकवचका पाठ करनेसे रामचन्द्रजी विशेष प्रसन्न नहीं होते। २४ ॥ इसलिए