श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 742, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७२५
पञ्चदशः सर्गः
(लक्ष्मण-भरत तथा शत्रुघ्नकवच)
सौमित्रिं रघुनायकस्य चरणद्वन्द्वेक्षणं श्यामलं बिभ्रन्तं स्वकरेण रामशिरसि छत्रं विचित्रं वरम् ।
बिभ्रतं रघुनायकस्य सुमहत्कोदण्डवामे करे वन्दे रत्नसलक्षणं जनकजावाक्ये सदा तत्परम् ॥ १ ॥
ॐ अस्य श्रीलक्ष्मणकवचमन्त्रस्य। अगस्त्यऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। श्रीलक्ष्मणो देवता। शेष इति बीजम्। सुमित्रानन्दन इति शक्तिः। रामानुज इति कीलकम्। रामदास इत्यस्त्रम्। रघुवंशज इति कवचम्। सौमित्रिरिति मन्त्रः। श्रीलक्ष्मणप्रीत्यर्थं सकलमनोऽभिलषितसिद्धयर्थं जपे विनियोगः। अथाङ्गुलिन्यासः। ॐ लक्ष्मणाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ शेषाय तर्जनीभ्यां नमः। ॐ सुमित्रानन्दनाय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ रामानुजाय अनामिकाभ्यां नमः। ॐ रामदासाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ रघुवंशजाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः। ॐ लक्ष्मणाय हृदयाय नमः। ॐ शेषाय शिरसे स्वाहा। ॐ सौमित्राय शिखायै वषट्। रामानुजाय कवचाय हुम्। रामदासाय नेत्रत्रयाय वौषट्। रघुवंशजाय अस्त्राय फट्। ॐ सौमित्रये इति दिग्बन्धः।
अथ सध्यानं लक्ष्मणकवचम्
रामपृष्ठस्थितं रम्यं रत्नकुण्डलधारिणम्। नीलोत्पलदलश्यामं रत्नकङ्कणमण्डितम् ॥ २ ॥
रामस्य मस्तके दिव्यं बिभ्रतं छत्रमुत्तमम्। वीरं पीताम्बरधरं मुकुटेनातिशोभितम् ॥ ३ ॥
तूणीरे कार्मुके चापि बिभ्रन्तं च स्मितवाननम्। रत्नमालाधरं दिव्यं पुष्पमालाविराजितम् ॥ ४ ॥
एवं ध्यात्वा लक्ष्मणं च रामचन्द्रनलोचनम्। कवचं जपनीयं हि ततो भक्त्याऽथ मानवः ॥ ५ ॥
लक्ष्मणः पातु मे पूर्वं दक्षिणं राघवानुजः। प्रतीच्यां पातु सौमित्रिः पातूदीच्यां रघूत्तमः ॥ ६ ॥
अधः पातु महारथीश्चोर्ध्वं पातु नृपात्मजः। मध्ये पातु रामदासः सर्वतः सत्यपालकः ॥ ७ ॥
स्मिताननः शिरः पातु भालं पातुर्मितात्मजः। भ्रुवोर्मध्ये धनुर्धारी सुमित्रानन्दनोऽक्षिणी ॥ ८ ॥
कपोले राममन्त्री च सर्वदा पातु वै मम। कर्णमूले सदा पातु कवचप्रज्वलत्तनः ॥ ९ ॥
अगस्त्यजीने कहा—मैं उन लक्ष्मणजीकी वन्दना करता हूँ, जो सदा रघुनाथजीके दोनों चरणकमल देखा करते हैं, जो अपने हाथसे रामचन्द्रजीके शिरपर छत्रकी छाया किये रहते हैं। जो कन्धेपर रामचन्द्रजीका धनुष धारण किये रहते हैं। जो सर्वदा जानकीजीकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर रहते हैं और कमलके समान जिनकी आँखें हैं ॥ १ ॥ "अस्य श्री" से लेकर "ॐ सौमित्रये इति दिग्बन्धः" यहां तक विनियोग और अङ्गन्यासकी विधि बतलायी गयी है। उसके आगे लक्ष्मणजीका ध्यान है—जो रामचन्द्रजीके पीछे बैठे हैं, जिनका मनोहर स्वरूप है, रत्नजड़ित कुण्डल जिनके कानोंमें झलक रहे हैं, नील कमलके समान जिनके मुखकी आभा है और जिनके हाथमें रत्नजड़ित कङ्कण पड़े हैं ॥ २ ॥ वीर लक्ष्मण रामके ऊपर दिव्य छत्र लगाये हुए हैं, सुन्दर पीताम्बर पहने हैं और मुकुटसे जो अतिशय शोभायमान दीख रहे हैं ॥ ३ ॥ जो तूणीर तथा धनुष धारण किये हैं, मुसकाता हुआ जिनका मुखारविन्द है, रत्नोंकी माला जिनके गलेमें पड़ी है, जिनका दिव्य वेष है और जो फूलोंकी मालाओंसे और भी सुन्दर दीख रहे हैं ॥ ४ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीपर दृष्टि लगाये लक्ष्मणजीका ध्यान करके लोगोंको चाहिए कि भक्तिपूर्वक लक्ष्मणकवचका पाठ करें ॥ ५ ॥ लक्ष्मणजी मेरे पूर्वभागकी रक्षा करें और दक्षिणभागमें राघवानुज पश्चिम ओर सौमित्रि तथा उत्तर भागकी रघूत्तम रक्षा करें ॥ ६ ॥ निचले भागमें रघुवीर, ऊपर नृपात्मज मध्यमें रामदास और चारों ओर सत्यपालक रक्षा करें ॥ ७ ॥ जिसकी स्मिता-