श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
७२८ आनन्दरामायणे [सर्ग १६
शिरश्मत्पिता पातु भालं पातु हरिप्रियः। भ्रुवोर्मध्यं जनकजादत्तकंकणपत्यवतु ॥३६॥
पातु जनकजामाता मम नेत्रे मदाऽव हि। कपोले मण्डलीकान्तः कर्णमूले स्मिताननः ॥३७॥
नासाग्रं मे सदा पातु कैकेयीतोषवर्धनः। ओष्ठौ च सुमुखे पातु पातु प्राज्ञां जटाधरः ॥३८॥
पातु पुष्करनानेत्रो मे जिह्वां दन्तान् प्रथामयः। चिबुकं रत्नसद्भूषः कंठे पातु वराननः ॥३९॥
स्कन्धौ पातु जिताशनिसुतो शत्रुघ्नवंदितः। करौ कवचधारी च नखान खड्गगोऽवतु ॥४०॥
कुक्षौ रामानुजः पातु वक्षः श्रीरामवल्लभः। पार्श्वे सधनुषाम्रेड्यः पातु पृष्ठं शुभाषणः ॥४१॥
जठरं च धनुर्द्धारी नाभिं शङ्खगोवदतु। कटिं पट्टाम्बरः पातु गुह्यं रमैकमानसः ॥४२॥
राममित्रः पातु लिंगमूहं श्रीरामसेवकः। नादग्रामस्थितः पातु जानुनी मम सर्वदा ॥४३॥
श्रीरामपादुकाधारी पातु जंघे सदा मम। गुल्फौ श्रीरामचरणमुखः पादौ पातु सुगर्वितः ॥४४॥
रामाज्ञापालकः पातु सर्वाङ्गान्यान सर्वदा। मम पादांगुलीः पातु रघूत्तंसांशभूषणः ॥४५॥
रोमाणि पातु मे राम्यः पातु रात्रीं सुधार्य्यम। तूणीरधृग दिवसे दिक्षतु मम सर्वदा ॥४६॥
सर्वकालेषु मां पातु पाञ्चजन्यः सदा भुवि। एवं श्रीभरतस्येदं सुतीक्ष्ण कवचं शुभम् ॥४७॥
मया प्रोक्तं तवाग्रे हि मदार्थगरुकामदम्। स्तोत्राणामुत्तमं स्तोत्रमिदं ज्ञेयं सपुण्यदम् ॥४८॥
पठनीयं सदा भक्त्या रामचन्द्रस्य हर्षदम्। पठित्वा भरतस्येदं कवचं रघुनन्दनः ॥४९॥
यथा याति परं तोषं तथा स्वकवचेन न। तस्मादेतत्सदा जप्यं कवचानमनुत्तमम् ॥५०॥
अभ्यासं पठनान्मर्त्यः सर्वान्कामानवाप्नुयात्। विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रकामो लभेत्सुतम् ॥५१॥
पत्नीकामो लभेत्पत्नीं धनार्थी धनमाप्नुयात्। यद्यन्मनोऽभिलषितं तत्तत्कवचपाठकः ॥५२॥
भरत मेरा रक्षा कर ॥ ३५ ॥ तक्षक पिता मर मस्तकका रक्षा करे हरप्रिय मस्तकका रक्षा करे जानकीको आज्ञाप्रनार रहनेवाले भरतजी थोड़के मध्यभागकी रक्षा करें । ३६॥ साताको माताके समान माननेवाले भरतजी मेरा आँखोंकी रक्षा करें। मण्डलीक निसतम मेर कपालोंकी रक्षा करें मुसकान मुख-मण्डलवाले भरतजी म० कर्णमुलक रक्षा कर ॥ ३७ ॥ कैकेयीके आनन्दको वढानेवाले मेर नासाग्रको, उग्र अङ्गुष्ठाने मुखकी और अगाध धी भरत मेरी वाणोका रक्षा कर ॥ ३८ ॥ तक्षकके पिता जिह्वाकी, अशामय दाँतोंकी, वल्कलधारी चिबुककी और सुन्दर मुखवाले कन्ठे र कण्ठक रक्षा कर ॥३९॥ शत्रुको जीतनेवाले मेर कन्धोंकी, शत्रुघ्नवन्दित भुजाओंकी, कवचधारी हाथोंकी ओर खड्गधारी नखोकी रक्षा करें ॥ ४० । रामके छोटे भाता उदरकी, श्रीरामवल्लभ वक्षस्थलकी, शरासनधारी पीठकी और सुन्दर भाषण करनेवाले पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ४१ ॥ धनुर्धारी जठरकी ङ्खकर न भिकी, कमठके समान नेत्रोंवाले कमरकी और एकमात्र रामनामका स्मरण करनेवाले मेरे गुह्यभागकी रक्षा करें ॥ ४२ । रामके मित्र लिंगकी रक्षा करें, श्रीरामके सेवक ऊरुभागकी और नन्दिग्राममें रहनेवाले भरत सर्वदा मेर जानुभागकी रक्षा करें ॥४३॥ श्रीरामकी पादुकाको धारणकरनेवाले मेरी जंघाओंकी, श्रीरामकथ दानी गुल्फभागका तथा सुगर्वित भरतजी मेरे पगकी रक्षा करें ॥ ४४ ॥ रामकी आज्ञा पालन करनेवाले सर्वदा मेर सत्र अंगोंकी और रघुवंशके उत्तम भूषण मेरे पैरकी उँगलियोंकी रक्षा कर ॥ ४५ ॥ रम्य नगुधारी भरतजी मेर चित्र रोमांकी, रात्रि के समय सुन्दर बुद्धिवाले और तूणीरधारी भरत दिनके समय सब दिशाओंकी रक्षा करें । ४६॥ पाञ्चजन्य सब समय मेर रक्षा करते रहैं। हे सुतीक्ष्ण ! इस प्रकार मैने तुम्हें श्रीभरतजीका कवच कह सुनाया । यह बड़ा मङ्गलकारी, सब स्तोत्रोंमें उत्तम और भली भाँति पुण्यदाता है । ४७ । ४८ ॥ लोगोंको चाहिए कि वे रामचन्द्रजीको आनन्द देनेवाले इस भरत-कवचका पाठ करके ही रामकवचका पाठ किया करें। इस कवचके पढ़नेसे रामचन्द्र जितने प्रसन्न होते हैं, उतने अपने कवच अर्थात् रामकवचका पाठ सुनकर बहो प्रसन्न होते; इस कारण लोगोंको चाहिये कि सब कवचोंमें श्रेष्ठ इस कवचका पाठ अवश्य करें ॥ ४६ ॥ ५० ॥ इस कवचका पाठ करनेसे प्राणी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। विद्याकी कामनावाला विद्या, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुत्र, पत्नी चाहनेवाला पत्नी और
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७२९
लभन्ते मानवैरत्र सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । तस्मात्सदा जपेनीयं रामोपासकमानवैः ॥५३॥
अथ शत्रुघ्नकवचम्
अथ शत्रुघ्नकवचं सुतीक्ष्ण शृणु सादरम् । सर्वकामप्रदं व्यर्थं रामभक्तिविवर्द्धनम् ॥५४॥
शत्रुघ्नं धृतकार्मुकं धृतमहातूणीरबाणोत्तमं प श्चे श्रीरामचन्द्रनस्य विनयाद्वामे स्थितं सुन्दरम् ।
रामं स्वीयकरेण तालदलजं धुन्वन्निमित्रं वरं सूर्य्यभ व्यजनं सभास्थितमहं तं वीजयन्तं भजे ॥५५॥
ॐ अस्य श्रीशत्रुघ्नकवचमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः श्रीशत्रुघ्नो देवता । अनुष्टुप्छन्दः । सुदर्शन इति बीजम् । कैकेयीनन्दन इति शक्तिः । श्रीभरतानुज इति कीलकम् । भरतमंत्रीत्यस्त्रम् । श्रीरामदास इति कवचम् । लक्ष्मणांशज इति मंत्रः । श्रीशत्रुघ्नप्रीत्यर्थे सकलमनःकामनासिद्धयर्थे जपे विनियोगः । अथांगुलिन्यासः । ॐ शत्रुघ्नाय अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ सुदर्शनाय तर्जनीभ्यां नमः । ॐ कैकेंयीनदनाय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ भरतानुजाय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ भरतमंत्रिणे कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ श्रीरामदासाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिन्यासः । लक्ष्मणांशजेति दिग्बंधः ।
अथ ध्यानम्
रामस्य संस्थितं वामे पार्श्वे विनयपूर्वकम् । कैकेयीनन्दनं सौम्यं मुकुटेनाविरजितम् ॥५६॥
रत्नकंकणकेयूरवनमालाविराजितम् । रशनाकुंडलधरं रत्नहारमनू पुरम् ॥५७॥
व्यजनेन वीजयतं जानकीकांतमादरात् । रामन्पश्नेक्षणं वीर कैकेयीतोषवर्द्धनम् ॥५८॥
द्विभुजं कंजनयनं दिव्यपीतांबरान्वितम् । सुभुजं सुंदरं मेघश्यामलं सुन्दराननम् ॥५९॥
रामवाक्ये दत्तकर्णं रक्षोघ्नं खङ्गधारिणम् । धनुर्वाणधरं श्रेष्ठं धृततूणीरमुत्तमम् ॥६०॥
सभायां संस्थितं रम्यं कस्तूरीतिलकांकितम् । मुकुटस्थावतंसेन शोभितं च स्मिताननम् ॥६१॥
रविवंशोद्भवं दिव्यरूपं दशरथात्मजम् । मथुरावासिनं देवं लवणासुरमर्दनम् ॥६२॥
एवं ध्यात्वा तु शत्रुघ्नं रामपादेक्षणं हृदि । पठनीयं वरं चेदं कवचं तस्य पावनम् ॥६३॥
पूर्वे स्ववतु शत्रुघ्नः पातु वायव्ये सुदर्शनः । कैकेयीनन्दनः पातु प्रतीच्यां सर्वदा मम ॥६४॥
धनार्थी धन प्राप्त करता है । इस तरह उसे जिस किसी वस्तुकी इच्छा होती है, वे सब इस कवचके पाठसे प्राप्त हो जाते हैं । ५१ ।। ५२ । यह बात मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ—झूठ कुछ भी नहीं । रामकी उपासना करनेवालोंको चाहिए कि सदा इस कवचका पाठ किया करें । ५३ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! अब मैं तुम्हें शत्रुघ्नकवच बताऊँगा, तुम आदरपूर्वक सुनो । यह शत्रुघ्नकवच भी सब कामनायें पूर्ण करने और रामकी सद्भाक्त बढ़ानेवाला है ॥ ५४ ॥ धनुष धारण करनेवाले बड़ा-सा तरकस धारण किये, श्रीरामचन्द्रजीके पास वामभागमें खड़े, अपने हाथसे ताड़का पंखा झलते हुए, सूर्यके समान अतिशय विचित्र उस पंखेकी दीप्ति है, ऐसे शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५५ ॥ 'अस्य श्री०' से लेकर "लक्ष्मणांशजेति दिग्बन्धः" तक अङ्ग-न्यास आदिकी विधि बतलायी गयी है इसके आगे ध्यान है - रामके पास वामभागमें विनयपूर्वक खड़े कैकेयीके आनन्ददाता, सौम्यस्वरूप, मुकुटसे अतिशोभित, रत्नजटित कंकण, केयूर तथा वनमालासे अलंकृत सिकड़ी और कुण्डल धारण किये रत्नहार तथा सुन्दर नूपुर पहने, आदरपूर्वक रामचन्द्रजीको पंखा झलते और रामकी ओर निहारत हुए कैकेयीका आनन्द बढ़ानेवाले वीर, जिनके दो भुजायें हैं, कमल जैसे नेत्र हैं, दिव्य पीताम्बर पहने, सुन्दर भुजावाले, मेघके सदृश श्यामल तथा सुन्दर मुखवाले, रामकी बातोंमें कान लगाये, राक्षसोंको मारनेवाले, खड्ग धारण किये, धनुष और बाणसे सुसज्जित बड़ा सा तूणीर धारण किये, सभामें स्थित, रम्य, कस्तूरीका तिलक लगाये, मुकुट और कुण्डलोंसे सुशोभित, मुसकराते मुखवाले, सूर्यवंशमें जायमान, दिव्यरूपधारी, दशरथके पुत्र, मथुरा निवासी लवणासुरका मर्दन करनेवाले और श्रीरामके चरणोंमें
| ७३० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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शार्दूलोग्र्यो रामबन्धुः पश्चिमे भरतानुजः । रविवंशोद्भवश्चोर्ध्वं मध्ये दशरथात्मजः ॥६५॥ सर्वतः पातु मामत्र कैकेयीतोषवर्धनः । श्यामलांगः शिरः पातु भालं श्रीलक्ष्मणाग्रजः ॥६६॥ भ्रुवोर्मध्ये सदा पातु सुमुखोऽश्विनीसुते । श्रुतकीर्तिपतिर्नेत्रे कपोले पातु राघवः ॥६७॥ कर्णौ कुण्डलकर्णोऽव्यान्नासाग्रं नृपवंशजः । मुखं मम युधा पातु वाणीं पातु स्फुटस्वरः ॥६८॥ जिह्वां सुबाहुतातोऽव्याद्यूपकेतुपिता द्विजान् । चिबुकं रम्यचिबुकः कण्ठं पातु सुभाषणः ॥६९॥ स्कन्धौ पातु महातेजा भुजौ गन्धर्ववाक्यकृत् । करे मे कङ्कणधरः पातु खड्गं नखं मम ॥७०॥ कुक्षिं रामप्रियः पातु पातु वक्षो रघूत्तमः । पार्श्वे सुरार्चितः पातु पातु पृष्ठं वराननः ॥७१॥ जठरं पातु रक्षोघ्नः पातु नाभिं सुलोचनः । कटिं भरतमन्त्री च गुह्यं श्रीरामसेवकः ॥७२॥ समर्पितमनाः पातु लिङ्गमूरू द्विषान्तकः । कोदण्डपाणिः पात्वत्र जानुनी मम सर्वदा ॥७३॥ राममित्रः पातु जंघे गुल्फौ पातु सुनूपुरः । पादौ नृपतिपूज्योऽव्यान्श्रीमान्पादाङ्गुलीर्मम ॥७४॥ धान्यङ्गानि समस्तानि ह्युदारांगः सदा मम । रोमाणि रमणीयेऽङ्गस्याद्रामौ पातु सुधार्मिकः ॥७५॥ दिवसे सत्यसंधोऽव्यादा भोजने शरमत्करः । गमने कनकङ्केतोऽव्यान्र्सर्वदा लवणान्तकः ॥७६॥ एवं शत्रुघ्नकवचं मया ते समुदीरितम् । यः पठति नरः सम्यग् नरः सौख्यभागिनः ॥७७॥ शत्रुघ्नस्य वरं चेदं कवचं मङ्गलप्रदम् । पठनं यं नरेणैन्त्या पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ॥७८॥ अस्य स्तोत्रस्य पाठेन यं यं कामं नरोऽर्थयेत् । तं तं लभेन्निश्चयेन सत्यमेतद्वचो मम ॥७९॥ पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इच्छत्कामं तु कामार्थी प्राप्नुयात्पठनादिना ॥८०॥ कवचस्यास्य भूम्यां हि शत्रुघ्नस्य विनिश्चयात् । तस्मादेतत्सदा भक्त्या पठनीयं नरैः शुभम् ॥८१॥
नेत्र लगाये हुए शत्रुघ्नजीका ध्यान करके इस उत्तम शत्रुघ्नकवचका पाठ करना चाहिए ॥५६-६३॥ पूर्वकी ओर शत्रुघ्न, दक्षिण तरफ सुदर्शन और पश्चिम ओर कैकेयीनन्दन हमारी रक्षा करें । ६४ । उत्तरमें रामबन्धु, नीचे भरतके छोटे भ्राता, ऊपर सूर्यराज और मध्यमें दशरथात्मज मेरी रक्षा करें ॥ ६५ ॥ कैकेयीको आनन्द देने-वाले मेरी चारो ओर रक्षा करें । श्यामल अङ्गवाले शत्रुघ्न मस्तकका और लक्ष्मणके अग्रज मेरे ललाटकी रक्षा करें ॥ ६६ ॥ सुन्दर मुखवाले सदा मेरे भौंहोंके मध्यभागकी, श्रुतकीर्तिके पति नेत्रोंका तथा राघव दोनों कपोलोंकी रक्षा करें ॥ ६७ ॥ कानोंमें कुण्डल धारण करनेवाले मेरे कानोंका, नृपवंशज नासिकाके अग्रभागकी, युद्धापहारी शत्रुघ्न मेरे मुखकी एवं स्फुट अक्षर बोलनेवाले मेरी वाणी की रक्षा करें । ६८ । सुबाहुके पिता कण्ठोंकी, यूपकेतुके पिता दाँतोंकी, सुन्दर चिबुकवाले मेरे चिबुकका और सुन्दर बातें करनेवाले मेरे कण्ठकी रक्षा करें ॥ ६९ ॥ महातेजस्वी कन्धाकी रामका आज्ञा पालन करनेवाले भुज का, कङ्कणधारी मेरे हाथोंकी और खड्गको धारण करनेवाले शत्रुघ्न नखोंकी रक्षा करें ॥ ७० । रामके प्रिय मेरे उदरकी, रघूत्तम वक्षस्थलकी, सुरार्चित पार्श्वभागकी और वरानन पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ७१ ॥ रक्षोघ्न जठरको, सुलोचन नाभिको, भरतके मंत्री कटिभागकी और श्रीरामसेवक गुह्यप्रदेशकी रक्षा करें ॥ ७२ । जिन्होंने अपना मन रामको अर्पित कर दिया है वे शत्रुघ्न लिङ्गकी मुखवाले द्विषान्तकका और हाथोंपे धनुष धारण करनेवाले सर्वदा मेरे जानुओंकी रक्षा करें ॥ ७३ ॥ राममित्र जाँघोंकी, सुन्दर नूपुर पहननेवाले गुल्फकी, नृपतिपूज्य पैरोंकी और श्रीमान् मेरी उँगलियोंकी रक्षा करें ॥ ७४ ॥ उदार अङ्गवाले शत्रुघ्न सदा मेरे समस्त अङ्गोंकी रक्षा करें । रमणीय आकृतिवाले मेरे रोमोंकी, रात्रिके समय सुधारमिक, दिवसके समय सत्यसंध, भोजनके समय सुन्दर बाण धारण करनेवाले, गमनके समय सुन्दर बाणोंके चलानेवाले और सब समय लवणामुरको मारनेवाले शत्रुघ्न मेरी रक्षा करें ॥ ७५॥ ७६ ॥ इस तरह मैंने तुम्हे शत्रुघ्नकवच कह सुनाया । जो लोग भक्तिपूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे सुखभागी होते हैं ॥ ७७ । यह कवच बड़ा सुन्दर, मङ्गलप्रद तथा पुत्र-पौत्र बढ़ानेवाला है ॥ ७८ ॥ इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला प्राणी जो-जो वस्तुयें चाहता है, उन्हें अवश्य पाता है । मेरी बात सत्य मानो । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ७९ ॥ पुत्र चाहनेवाला पुत्र, धन चाहनेवाला धन तथा जो प्राणी जो
सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३१
सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३१
आदौ नरैर्मारुतेश्च पठित्वा कवचं शुभम् । ततः शत्रुघ्नकवचं पठनीयमिदं शुभम् ॥८२॥
पठनीयं भरतस्य कवचं परमं ततः । ततः सौमित्रिकवचं पठनीयं सदा नरैः ॥८३॥
पठनीयं ततः सीताकवचं भाग्यवर्द्धनम् । ततः श्रीरामचन्द्रस्य कवचं सर्वशोभनम् ॥८४॥
पठनीयं नरैर्भक्त्या सर्ववांछितदायकम् । एवं षट् कवचान्यत्र पठनीयानि सर्वदा ॥८५॥
पठनं षट्कवचानां श्रेष्ठ मोक्षैकसाधनम् । ज्ञात्वाऽत्र मानवैलैक्त्या कार्य यः पठनं सदा ॥८६॥
अशक्तेनात्र चत्वारि पठनीयानि सादरम् । मारुतेश्च सौमित्रेः सीताया राघवस्य च ॥८७॥
इमानि पठनीयानि चत्वारि कवचानि हि । चतुर्णां कवचानां च पठने मानवस्य च । ८८।
न यद्यत्रावकाशश्चेत्तदा त्रीणि पठेन्नरः । मारुतेश्चाथ सीतायास्तथा श्रीरामकस्य च ॥८९॥
त्रयाणां कवचानां च न पाठावसरो यदा । पठनार्थं मानवस्य तदा द्वे कवचे स्मृते ॥९०॥
मारुतेश्चाथ रामस्य सीताया राघवस्य वा । नैकमेव पठेच्चात्र श्रीरामकवचं शुभम् ॥९१॥
अवकाशे कवचानां षट्कमेव सदा नरैः । पठनीयं क्रमेणैव कर्त्तव्यो नालसः कदा ॥९२॥
यदाऽवकाशो नास्त्येव तदा तेषां सुखप्रदे । मया विशेषः प्रोक्तोऽयं न सर्वेषां मयेरितः ॥९३॥
इति शत्रुघ्नकवचम् ।
श्रीरामदास उवाच
एवं शिष्य त्वया यद्यत्पृष्टं तत्तन्मयोदितम् । अन्यत्किंचित्प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्वाद्य सादरम् ॥९४॥
गीतैः प्रनृत्यैः श्रीरामः सदा गेयोऽत्र मानवैः । वीणावाद्यादिभिर्भक्त्या नृत्त्यन्त्यापि समाचरेत् ॥९५॥
दशरथनंदनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम् । मेघश्यामेति वै चोक्त्वा तथा रविकुलेति च ॥९६॥
मंडनराजारामेति ह्यतिप्रीत्याऽन्वहं जपन् । मनुः सदा जपनीयो वीणावाद्येन सुस्वरम् ॥९७॥
दशरथनंदन मेघश्याम रविकुलमंडन राजाराम इति मनुः ।
कीर्तनेऽस्य मनोर्नैव कार्यों न्यासो जपे स्मृतः । एवं सर्वेषु मंत्रेषु बोद्धव्यं मानवैर्भुवि ॥९८॥
जो चाहता है, सो उसे मिलता है ॥ ८० ॥ इस भूमण्डलमें शत्रुघ्नकवच बड़ा उत्तम है। अतएव मनुष्यको अवश्य इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८१ ॥ लोगोंको चाहिए कि पहले हनुमत्कवचका पाठ करके इस शत्रुघ्न-कवचका पाठ करें । ८२ ॥ इसके बाद भरतकवच और भरतकवचके बाद सौमित्रकवचका पाठ करें ॥ ८३ ॥ इसके बाद भाग्यको बढ़ानेवाले सीताकवचका पाठ करके श्रीरामकवचका पाठ करें ॥ ८४ । इस तरह सब वांच्छित फल देनेवाले ६ कवचोंका प्रतिदिन पाठ करते रहें ॥ ८५ ॥ इन छहों कवचांका पाठ श्रेष्ठ और मोक्षका साधन है। ऐसा समझकर लोगोंको सर्वदा इनका पाठ करते रहना चाहिए ॥ ८६ ॥ यदि ऐसा न कर सकें तो हनुमत्जी, लक्ष्मण, सीता तथा रामके कवचका पाठ करें । यदि इन चारोके पाठ करनेका समय किसी प्राणीको न मिले तो हनुमत्जी, सीता तथा रामके कवचका ही पाठ करें ॥ ८७-८८ ॥ यदि तीन कवचके पाठ करनेका भी अवसर न मिल सके तो हनुमान तथा राम इन दोनों कवचोंका ही पाठ करे। किन्तु इतना अवश्य ध्यान रक्खे कि ऊपर बतलाये कवचोंमेंसे किसी एकका अथवा रामकवचका ही पाठ करके न रह जाय ॥ ९० ॥ ९१ ॥ जब समय मिले, तब छहों कवचोंका क्रमशः पाठ करे । आलस्यवश टाल न दे ॥ ९२ । यदि किसी विशेष अडचनके कारण कुछ भी समय न मिल सके, तबके लिए यह परिहार बतलाया गया है। यह सब समय और सबके लिए लागू नहीं है ॥ ९३ ॥ रामदासने कहा-हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो पूछा, वह सुनाया । अब और कुछ बाते बतला रहा हूँ, उन्हें आदरपूर्वक सुनो ॥ ९४ । लोगोंको यह भी चाहिए कि सदा गीत-कविता आदिसे रामचन्द्रजीका गुण गान करें और वीणा आदि बजाकर साथ भक्तिपूर्वक नाचें ॥ ९५ ॥ पहले 'दशरथनन्दन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' फिर 'रविकुलमण्डन' ऐसा कहकर 'राजाराम' कहते हुए "दशरथनन्दन मेघश्याम रविकुलमण्डन राजाराम" इस मन्त्रका कीर्तन और जप किया करें ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ इस
७१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६
रामजयेति चोक्त्वा तु द्विवारं चाथ सुस्वरम्। रामेति द्वेऽक्षरे त्वन्ते सोक्त्वा वीणास्वरेण च ॥९९। चतुर्दशाक्षराख्यं कीर्तनार्थं मयोदितः ॥१००॥ राम जय राम जय राम जय राम इति मनुः। मंत्रशास्त्रेषु ये मंत्रास्ते जपार्थं प्रकीर्तिताः। इमे मंत्राः कीर्तनार्थं तावद्गीया मानवोत्तमैः ॥१०१। एतेषामपि चेद्भक्त्या मंत्राणां च जपः कृतः। तदा भस्मीभवन्त्येति तेषां पापानि वै क्षणात् ॥१०२॥ अन्यान् मंत्रान् प्रवक्ष्यामि तान् शृणुष्व द्विजोत्तम, राजीवलोचनेत्युक्त्वा मेघश्याममिति वै ततः ॥१०३। तथा सीतारञ्जनेति राजारामेति वै ततः। एकोनविंशद्वर्णश्च राममंत्रस्त्वयं स्मृतः ॥१०४। राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम इति मन्त्रः। अयं मंत्रः सुस्वरेण कीर्तनाद्यो मुहुर्मुहुः। वीणास्वरेण सयुक्तश्चासने गमनेऽपि च ॥१०५॥ श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम्। त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपं निहन्त्याशु द्विजकोटिहत्याः ॥१०६॥ त्रयोदशाक्षराख्यं राममंत्रः शुभावहः। जपनीयः कीर्तनीयः सर्वदाऽयं मुहुर्मुहुः ॥१०७। श्रीराम जय राम जय जय राम इति मनुः। अयं मंत्रः सुस्वरेण तथा वीणाम्बगादिना। कीर्तनीयो मुदा मर्यैर्मंत्रशास्त्रेऽप्ययं स्मृतः ॥१०८। तस्मात्सदा जपनीयः सर्वसिद्धिप्रदायकः। अष्टादशाक्षर मंत्र त्वन्य शृणु शुभावहम् ॥१०९। उक्त्वा सीतारञ्जनेति मेघश्यामेति वै ततः, कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ राजारामेति वै ततः ॥११० सीतारञ्जन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम इति मनुः। अष्टादशाक्षराख्य कीर्तनीयो महामनुः। वीणास्वरमनुश्च कलकण्ठ सुस्वरः ॥१११। रविकुलजातं वन्दे चेति प्रकीर्त्य च। सुरभूसुरेन्युक्त्वान्तेऽग्रे गीतं चेति ततः परम् ॥११२।
मन्त्रका जप करते समय न्यास आदि करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसी तरह आगे बतलाये जानेवाले मन्त्रोंके भी विषयमें जानना चाहिए ॥९८॥ 'रामजय' ऐसा तीन बार कहकर वीणाके स्वरसे "राम" इस दो अक्षरोंका उच्चारण करना चाहिये। यह चौदह अक्षरोंवाला मन्त्र मनोंको कीर्तन करनेके लिए बतलाया है। "राम जय राम जय राम जय जय राम" यह मन्त्र है। मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जप करनेके लिए हैं। किन्तु ये मन्त्र कीर्तन करनेके लिए भी लिखे गये हैं ॥९९-१०१॥ यदि भक्तिपूर्वक इनका जप भी किया जाय तो क्षणभरमें जप करनेवालेके सारे पातक जल जायेंगे ॥१०२॥ हे द्विजोत्तम ! तुम्हें मैं और भी बहुतसे मन्त्र बतलाऊँगा। 'राजीवलोचन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' तथा 'सीतारञ्जन' और 'राजाराम' ऐसा कहे। यह उन्नीस अक्षरोंका मन्त्र है ॥१०३॥१०४॥ राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम' यह मन्त्र है। अच्छी तरह मीठे स्वरसे बारम्बार इस मन्त्रका कीर्तन करता रहे। चलते फिरते उठते बैठते सदा इस मन्त्रका कीर्तन करे ॥ १०५॥ आदिमें 'श्री' उसके बाद 'जय' फिर दो जयके बीचमें 'राम' इक्कीस बार नाम जपनेवाला मनुष्य करोड़ों ब्रह्महत्याके पातक नष्ट कर देता है ॥ १०६॥ यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र बड़ा कल्याणदायक है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि बारम्बार इस मन्त्रका जप और कीर्तन करते रहें ॥१०७॥ 'श्रीराम जय राम जय जय राम' यह मन्त्र है। लोगोंका उचित है कि इस मन्त्रको वीणा आदिके स्वरके साथ साथ प्रीतिपूर्वक कीर्तन करें। मन्त्रशास्त्रमें भी इस मंत्रका उल्लेख है ॥ १०८॥ इसलिए सर्वदा इस मंत्रका जप भी करना चाहिए। क्योंकि यह सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला है। अब मैं एक और अष्टादशाक्षर मंत्र बतला रहा हूँ वह भी बड़ा मान्यकारी है ॥ १०९ ॥ 'सीतारंजन' ऐसा कहकर "मेघश्याम" फिर "कौसल्यासुत" कहकर 'राजाराम' कहना चाहिए ॥११०॥ "सीतारंजन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम" यह मन्त्र है। इस अष्टादशाक्षर महामन्त्रका कीर्तन करना चाहिए। कीर्तन वीणाके स्वर-के साथ तथा कोकिलके समान मीठे स्वरोंमें होनेसे विशेष लाभदायक होता है॥ १११॥ "रविवरकुलजातं
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७३३
सप्तदशसुवर्णश्च राममन्त्रस्त्वयं शुभः। कीर्त्तनीयः सुस्वरं हि वीणावाद्यध्वनादिना ॥११३॥
रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम् इति मनुः।
विष्णोदासशृणुष्वन्यान् राममंत्रान् शुभप्रदान्। येषां स्मरणमात्रेण महन्पापं लयं व्रजेत् ॥११४॥
कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ रामेति द्वयक्षरे तथा तथा सीताराजनेति मेघश्यामेति वै ततः ॥११५॥
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः शुभावहः। वीणास्वाद्यपूर्वकञ्च कलकण्ठेन सुस्वरः ॥११६॥
कौसल्यासुतराम सीताराजन मेघश्याम इति मनुः।
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा नरैः। सर्वपापक्षयकरः सर्ववांछितदायकः ॥११७॥
दशरथनन्दनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम्। मेघश्याममिति वै चोक्त्वा सीतेति द्वयक्षरे ततः ॥११८॥
राजनेति ततोक्त्वा राजारामेति वै ततः। विंशाक्षरपद्युभायं महापातकनाशनः ॥११९॥
दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम इति मनुः।
अयं विंशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयः सुखप्रदः। वीणास्वरसमेतश्च महापुण्यप्रदः स्मृतः ॥१२०॥
वन्दे रघुपतीरमिति चोक्त्वा चैत्र ततः परम्। उक्त्वा सीताकान्तमिति रणधीरमितिक्रमात् ॥१२१॥
चतुर्दशाक्षराश्रयं राममंत्रः शुभावहः। कीर्तनीयो जनैर्भक्त्या महामङ्गलकारकः ॥१२२॥
वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम् इति मनुः।
जय राम जय राम संकीर्त्य सुस्वरं ततः। जय जयोत्र संकीर्त्य रामेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२३॥
चतुर्दशाक्षराश्राय तृतीयः कथितो मनुः। कीर्तनीयो जनैर्नित्यं महापातकनाशनः ॥१२४॥
जय राम जय राम जय जय राम इति मनुः।
मनुः सीतामाधवेति पंचवर्णात्मकः स्मृतः। जपनीयः कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२५॥
सीतामाधव इति मनुः
वन्दे' इसका उच्चारण करके "सुरगुरु" ऐसा कहकर 'जात' का उच्चारण करे ॥११२॥ सत्रह सुन्दर वर्णों-
से इस शुभ राममन्त्रका रचना की गयी है। लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे
इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ ११३॥ 'रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम्' यह मन्त्रका स्वरूप है। राम-
दास कहते हैं कि हे विष्णुदास ! अब मैं और बहुतसे शुभ मन्त्र तुझसे बता रहा हूँ, सुनो। जिनके
स्मरणमात्रसे बड़े बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ११४ ॥ 'कौसल्यासुत' ऐसा कहकर 'राम' इसका उच्चारण
करे। तदनन्तर 'सीताराजन' और उसके बाद 'मेघश्याम' कहे ॥ ११५ ॥ यह षोडशाक्षर मंत्र बड़ा शुभ है।
इसीलिये लोगोंको चाहिए कि भली आवाज़से बाजा आदि वाद्योंके साथ-साथ इसका कीर्तन करे ॥ ११६ ॥
'कौसल्यासुत राम सीताराजन मेघश्याम' यहो मंत्रका स्वरूप है। इस षोडशाक्षर मन्त्रका लोग सर्वदा कीर्तन
करें। क्योंकि यह समस्त पापोंका नाशक और सब प्रकारका अभिलषित कामनाओंको पूर्ण करनेवाला महामंत्र
है ॥ ११७ ॥ "दशरथनन्दन" ऐसा कहकर पहले 'मेघश्याम" और उसके बाद "सीता" इन दो अक्षरोंको
कहकर 'राजन" ऐसा कहते हुए 'राजाराम' कहे। यह बीस अक्षरोंवाला राममंत्र बड़े-बड़े पातकोंका
नाशक है ॥ ११८॥ ११९॥ 'दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम' यही इस मन्त्रका स्वरूप है।
जनोंको चाहिए कि सब प्रकारका सुख देनेवाले इस विंशाक्षर मन्त्रका मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके
साथ कीर्तन करें। क्योंकि यह बड़ा पुण्यदायक मन्त्र है ॥१२०॥ "वन्द बारं रघुवारम्' ऐसा कहकर "सीताकान्तम्"
तथा 'रणधीरम्' ये वाक्य कहे ॥ १२१ ॥ यह परम फलदायक चतुर्दशाक्षरात्मक राममंत्र है। लोगोंको उचित
है कि महामंगल करनेवाले इस मन्त्रका भक्तिपूर्वक कीर्तन करें ॥ १२२ ॥ 'वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम्'
यह इस मंत्रका स्वरूप है। 'जय राम जय राम' ऐसा कहकर "जयजय" ऐसा कहते हुए 'राम' के दो
अक्षर कहें। 'जय राम जय राम जय जय राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। चतुर्दशाक्षर मंत्रोंमें यह तीसरा
मंत्र है। लोगोंको चाहिए कि महापातकोंका नाश करनेवाले इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ १२३ । १२४॥
| ७३४ | आनन्दरामायणम् | [ सर्गः १५ |
|---|
भजेति द्व्यक्षरे पूर्वं सीताराममिति क्रमात् । मानसेति ततश्चोक्त्वा भजेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२६॥
ततो राजाराम इति मंत्रः पञ्चदशाक्षरः । कीर्तनीयो मनुष्याय वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२७॥ भज सीताराम मानस भज राजारामम् इति मनुः ।
श्रीसीताराममित्युक्त्वा वन्दे चोक्त्वा ततः पुनः । श्रीराजाराममिति च कीर्तयेत्सुस्वरं मुहुः ॥१२८॥
द्वादशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा जनैः । वीणावाद्यादिना पुण्यः सर्ववांछितदायकः ॥१२९॥ श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम् इति मनुः ।
रावणमर्दनत्युक्त्वा रामेत्युक्त्वा ततः परम् । राघवति ततश्चोक्त्वा वाली चेति ततः क्रमात् ॥१३०॥
मर्दनेति पुनश्चोक्त्वा रमाठ द्व्यक्षरे पुनः । स्मृतोऽष्टादशवर्णोऽथ द्वितीयोऽथ मनुः शुभः ॥१३१॥ रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन रामेति मनुः ।
अयं मंत्रः कीर्तनीयः सर्वदा मानवोत्तमैः । श्रीसीताराममिति च मानसेति ततः परम् ॥१३२॥
भजेति द्व्यक्षरे चोक्त्वा रामेति द्व्यक्षरं पुनः । राममिति द्व्यक्षरे च मंत्रोऽयं परमः शुभः ॥१३३॥
चतुर्दशाक्षरश्चायं चतुर्थश्च प्रयोगतः । कीर्तनीयः सुस्वरेण वीणावाद्यपुरःसरः ॥१३४॥ श्रीसीताराम मानस भज राजाराम् इति मनुः ।
सीताराम जयेत्युक्त्वा राजरामेति वै ततः । अयं दशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयोऽथ सुस्वरः ॥१३५॥ सीताराम जय राजाराम इति मनुः ।
श्रीसीताराममिति च वन्दे राममिति क्रमात् । जय रामं ततश्चैव त्रयोदशाक्षरो मनुः ॥१३६॥
कीर्तनीयः सदा मर्त्यैः सर्वपातकनाशनः । वीणावाद्यादिना नित्यं द्वितीयोऽथ मनुः स्मृतः ॥१३७॥ श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम् इति मनुः ।
मां पाहीति चोक्त्वादौ दीनं राघव चेति हि । त्वत्पदयुगलीनं वै चेत्येष षोडशाक्षरः ॥१३८॥
'सीताराघव' यह पंचवर्णात्मक राममंत्र है। सुस्वर मीठे स्वर और वीणा आदि वाद्योंके साथ इस मंत्रका कीर्तन और जप करे ॥१२५॥ "सीताराघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'भज' यह शब्द कहकर 'सीतारामम्' कहे। उसके बाद "मानस" यह शब्द कहकर 'भज राजारामम्' ऐसा कहे। यह पंचदशाक्षरात्मक राममंत्र है। इसे भी जप या मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन करे ॥१२६-१२७॥ "मन्त्र सीताराम मानस भज राजारामम्" यह इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'श्रीसीतारामम्' ऐसा कहकर 'वन्दे' कहे और उसके बाद 'श्रीराजारामम्' कहकर इस मंत्रका कीर्तन करे यह द्वादशाक्षरात्मक मंत्र है । 'श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम्' यह इस मंत्रका स्वरूप है। लोगोंको उचित है कि सब प्रकारकी कामनायें पूर्ण करनेवाले इस मंत्रका जप और कीर्तन करें ॥१२८-१२९॥ पहले 'रावणमर्दन' फिर 'राम' उसके बाद "राघव" फिर 'वालीमर्दन' तदनन्तर 'राम' ऐसा कहे। अष्टादशाक्षर मंत्रोंमें यह दूसरा मंत्र है। 'रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन राम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। सज्जनोंको चाहिए कि सर्वदा इस मन्त्रका जप किया करें। पहले 'सीतारामम्' उसके बाद 'मानस' फिर 'भज' और उसके पश्चात् 'राजारामम्' ऐसा कहें। यह बड़ा पवित्र मन्त्र है॥ १३०-१३४॥ चतुर्दशाक्षरात्मक मंत्रोंमें यह चौथा मन्त्र है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन तथा जप करना चाहिए। 'श्रीसीताराम मानस भज राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीताराम जय' फिर 'राजाराम' ऐसा कहे। यह दशाक्षर राममंत्र है। लोगोंको चाहिए कि मीठे स्वरसे इस मंत्रका भी कीर्तन किया करें। ॥१३५॥ 'सीताराम जय राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीतारामम्' फिर 'वन्दे रामम्' और इसके बाद 'जय राम' ऐसा कहे। यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र है। संसारके प्राणियोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ नित्य इस मन्त्रका कीर्तन करें । १३६ ॥ १३७ ॥ 'श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम्' यह मंत्रका स्वरूप है। पहले 'मा पाहि इति'
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तो मंत्रो वै षोडशाक्षरः । १४०॥
सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
कीर्तनीयो मनुर्मर्त्यैः सर्वपातककृन्तनः। वीणावाद्यस्वरेणोच्चैः कलकंठेने सुस्वरः ॥१३९॥
मां पाह्यतिदीनं राघव त्वत्पदयुगलीन्मिति ।
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तो मंत्रो वै षोडशाक्षरः । १४०॥
जय जयेति वै चोक्त्वा राघवेति ततः परम् मप्ताक्षग्मनुश्चायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४१॥
जय जय राघव इति मनुः ।
जयजयेति संकीर्त्य तथा रघुवरेति च । अष्टाक्षरमनुश्चायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४२॥
जय जय रघुवर इति मनुः ।
त्वं मां पालयेत्युक्त्वा सीतारामेति वै पुनः । नवाक्षरमनुश्चामनुधायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४३॥
वीणावाद्यस्वरेणैव महापातकनाशनः । १४४॥
त्वं मां पालय सीताराम इति मनुः
सीताराम जयेत्युक्त्वा मनुः षडक्षरः स्मृतः कीर्तनीयः सदा मर्त्यैर्वीणावाद्येन सुस्वरः । १४५॥
सीताराम जय इति मनुः ।
श्रीसीतारामेति मनुर्ज्ञेयः पञ्चाक्षरः शुभः । कीर्तनीयः सदा मर्त्यैर्वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१४६॥
श्रीसीताराम इति मनुः ।
सीतारामेति मनुश्चतुर्वर्णात्मकः स्मृतः ।
सीताराम इति मनुः ।
श्रीरामेति त्र्यक्षरश्च रामेति द्व्यक्षरो मनुः ॥१४७॥
श्रीराम इति मनुः । राम इति मनुः ।
राकारो बिंदुना युक्तश्चैकवर्णात्मको मनुः । अयं सदा जपनीयः कीर्तनीयो न वै कदा ॥१४८॥
रां इति मनुः ।
रामजयेति चोक्त्वाऽऽदौ सीतारामेति वै ततः । राघवेति ततोऽप्यन्वा मंत्रस्त्वेकादशाक्षरः ॥१४९॥
फिर 'दीनं राघव' इसके बाद 'त्वत्पदयुग्मलीनम्' ऐसा कहे। यह षोडशाक्षर मन्त्र सब प्रकारके पापोंको काटनेवाला है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि बाजों और कोकिला जैसे मीठे तथा ऊँचे स्वरसे इस मन्त्रका कीर्तन करें ।। १३८ ॥ १३९ ॥ 'मां पाह्यतिदीनं राघव त्वत्पदयुग्मलीनम्' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। षोडशाक्षर मन्त्रोंमें यह दूसरा मन्त्र है । १४०।। पहले 'जय जय' ऐसा कहकर 'राघव' कहे । यह सप्ताक्षर मन्त्र है। लोगोंको इसका भी कीर्तन करते रहना चाहिए ।। १४१ ।। 'जय जय राघव' यह इस मन्त्र-का स्वरूप है। 'जय जय' कहकर 'रघुवर' कहे यह अष्टाक्षर मन्त्र है। लोगोंको इसका भी जप करते रहना चाहिए ।। १४२ ।। "जय जय रघुवर" यह इस मंत्रका स्वरूप है । "त्वं मां पालय" ऐसा कहकर "सीताराम" ऐसा कहे। यह नवाक्षर मन्त्र है। लोगोंको इस मन्त्रका भी जप तथा कीर्तन करते रहना चाहिये । क्योंकि यह बड़े बड़े पापोंका नाशक है ।। १४३ ।। १४४ ।। "त्वं मां पालय सीताराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। "सीताराम जय" यह षडक्षर राममन्त्र है। संसारके लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ इस मन्त्रका भी कीर्तन करें । "सीताराम जय' यह मन्त्रका स्वरूप है। "श्रीसीताराम" यह पञ्चाक्षर राम-मन्त्र है। यह भी महान् पातकोंका नाशक है। इसलिए लोगोंको इसका जप तथा कीर्तन करते रहना चाहिए ।। १४५ ।। १४६ ।। 'श्रीसीताराम' यह मन्त्रका स्वरूप है। "सीताराम" यह चतुर्वर्णात्मक राममन्त्र है। "श्रीराम" यह त्र्यक्षर राममन्त्र है। "राम" यह द्व्यक्षर मन्त्र कहा गया है ।। १४७ ।। 'श्रीराम' और 'राम' यह मन्त्रका स्वरूप है। राकारको बिन्दुयुक्त (रां) कर देनेसे एकाक्षर राममन्त्र हो जाता है। लोगोंको
| ७१६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १५ |
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राम जय सीताराम राघवेति मनुः।
दशरथनदनेति रघुकुलेति वै ततः भूषणेति ततश्चोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥ १५०॥
विश्रामेति ततश्चोक्त्वा पंकजलोचनेति च रामेति द्व्यक्षरे चापि ह्यष्टाविंशाक्षरो मनुः ॥ १५१॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः प्रोक्तः पातकविध्वंसी सर्वकामप्रदायकः ॥ १५२॥
दशरथनंदन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन रामेति मनुः
सीताराम जयेत्युक्त्वा राघवेति ततः परम्। रामेति द्व्यक्षरे चापि मन्त्रस्त्वेकादशाक्षरः ॥ १५३॥
कीर्तनीयः सुस्वरेणैयं मन्त्रो वीणास्वरेण च। महापातकहन्त्रीकः सर्ववांछितदायकः ॥ १५४॥
सीताराम जय राघव रामेति मनुः।
एकादशाक्षराश्चायं मंत्रः प्रोक्तो मयाऽथ हि द्वितीयः परमो श्रेष्ठो महापातकनाशनः ॥ १५५॥
पञ्चवटीस्थितेत्युक्त्वा रामजयजयेति च दशरथानन्दनेति रामेति द्व्यक्षरे तथा ॥ १५६॥
एकविंशाक्षराश्चायं कीर्तनीयो महामनुः। कलकण्ठेन मर्त्यैश्च महापातकनाशनः ॥ १५७॥
पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनंदन रामेति मनुः।
दशरथसुतेत्युक्त्वा बालं वन्दे त्विति क्रमात् रामं घननीलमिति मत्रोऽयं षोडशाक्षरः ॥ १५८॥
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तः कीर्तनीयो मनोरमः वीणावाद्यस्वरेणैव वदापुण्यविवर्द्धनः ॥ १५९॥
दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलमिति मनुः।
कोदंडखंडनेत्युक्त्वा दशशिरोमर्दनेति च। कौसल्यासुतं रामेति सीतारामजन पेति वै। १६०॥
राजारामेति वै चोक्त्वा एकोनत्रिंशवर्णकः। कीर्तनीयो मनुश्चायं वीणावाद्येन सुस्वरः ॥ १६१॥
कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारामजन राजारामेति मनुः।
चाहिए कि इस एकाक्षर मन्त्रका केवल जप करे, कीर्तन नहीं ॥ १४८॥ 'रां' यह एकाक्षर मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'राम जय' कहकर 'सीताराम' और इसके बाद 'राघव' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षरात्मक राममन्त्र है ॥ १४९॥ "राम जय सीताराम राघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले "दशरथनन्दन" फिर 'रघुकुल' फिर 'भूषण' फिर 'कौसल्याविश्राम' फिर 'पंकजलोचन' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह अट्ठाईस अक्षरोंका राममन्त्र है ॥ १५० ॥ १५१ । लोगोंको वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे सदा इस मन्त्रका जप और कीर्तन करना चाहिए, क्योंकि यह सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला और अभीष्ट कामनाओंका पूर्ण करनेवाला मन्त्र है। 'दशरथनन्दन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'सीताराम जय' ऐसा कहकर 'राघव' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षर मन्त्र है ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ यह भी सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला है। 'सीताराम जय राघव राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है इसलिए लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे इसका जप और कीर्तन करे । क्योंकि सब प्रकारकी कामनाएं इससे पूर्ण हो जाती हैं ॥ १५४ ॥ 'पञ्चवटीस्थित' ऐसा कहकर "राम जय जय" और उसके बाद 'दशरथनन्दन राम' ऐसा कहे। यह एकविंशाक्षर राममहामन्त्र है। इसका भी मीठे स्वरसे कीर्तन करना चाहिए। क्योंकि यह महामन्त्र बड़े-बड़े पापकोंको नष्ट कर देता है। १५५ ॥ १५६ ॥ 'पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनन्दन राम" यह इस एकविंशाक्षर राममन्त्रका स्वरूप है। "दशरथसुत" ऐसा कहकर "बालं वन्दे और इसके बाद "रामं घननीलम्' यह कहे। यह षोडशाक्षर राममन्त्र है । षोडशाक्षर मन्त्रोंम यह बड़े-बड़े पातकोंको नष्ट करनेवाला महामन्त्र है । इसे भी वीणा आदि बाजाके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए क्योंकि यह अतिशय पुण्यवर्धन कारी मंत्र है ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ "दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलम्" यह इस मन्त्रका स्वरूप है । 'कोदण्डखण्डन' ऐसा कहकर 'दशशिरोमर्दन' इसके बाद "कौसल्यासुत राम सीतारामजन" और "राजाराम" कहे। यह मन्त्र एकानत्रिंशाक्षरात्मक है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे
सर्ग १७] मनोहरकाण्डम् ७३७
कोदण्डभंजनेत्युक्त्वा रावणमर्दनेति च । कौसल्येति तथोक्त्वा विश्रामेति ततः परम् ॥१६२॥
सीतारंजनेति ततो राजारामेति वै ततः । सप्तविंशाक्षराख्यं मनु प्रोक्तः शुभप्रदः ॥१६३॥
कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
कोदण्डखंडनेत्युक्त्वा वालीताडन चेति वै । लङ्कादहनेति ततः पाषाणतारणेति च । १६४।
रावणमर्दनेत्युक्त्वा रविकुलेति वै ततः । भूपेति तथोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥१६५॥
विश्रामेति तथोक्त्वा सीतारंजन चेति वै । राजारामेति चोक्त्वा पञ्चाशदक्षरो मनुः । १६६॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः । मन्त्रोऽयं हि नृणांऽत्रत्यं महापातकनाशनः ॥१६७॥
कोदण्डखंडन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
एवं नानाविधा मंत्राः सन्ति शिष्य सहस्रशः । सहस्रवर्षपर्यन्तं कस्तान् वक्तुं भवेत् क्षमः । १६८॥
एते सर्वे कीर्तनाया वीणावाद्येन सुस्वराः । इदं चान्यज्जानीया न ज्ञेया मान्त्रगोत्तमाः । १६९॥
मंत्रशास्त्रेषु ये प्रोक्तास्ते जपाय एव मन्त्रिणे । नैयतः कीर्तनायान्यैः कीर्तनीयास्त्विमे स्मृताः १७०॥
एतान् मन्त्रान् पुरस्कृत्य प्रबन्धा विविधाः शुभाः । रचनीया बुधैश्च कुर्वाणैर्नामानि पाथिगद्गतान् ॥१७१।
ये ये नोक्ता मया मन्त्रास्तान् पुरस्कृत्य गद्यपद्यैः । बन्धने नैव दोषोऽस्ति तेनोष्टो जायते हरिः ॥१७२॥
मन्त्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च स्तुतिभिः कीर्तनादिभिः । प्राचीनैर्वा कविनूतैः रामो गेयः सदा नरैः ॥१७३॥
येन केन प्रकारेण कार्यं राघवचिन्तनम् । पापराशिः क्षयं दृष्ट्वा श्रीरामाच्चितनेन हि ॥
अवश्यत्र न संदेहः पावकेन यथा कुटी ॥१७४।
दंभेन वातिभक्त्या वा निष्कामाद्वा सकामतः । यद्यत्र राघवो गीतस्तेन पापं हुतं भवेत् ॥१७५॥
स्वरसे कीर्तन करना चाहिए ॥ १६० । १६० ॥ 'कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारंजन राजाराम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है 'कोदण्डभंजन कहकर 'रावणमर्दन' इसके बाद 'कौसल्याविश्राम' और 'सीतारंजन राजाराम' कहे । यह सताईसअक्षरात्मक शुभ राममन्त्र है ॥ १६१ । १६२ ॥ "कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'कोदण्डखण्डन' कहकर "वालीताडन" और इसके बाद क्रमशः लङ्कादहन पाषाणतारण "रावणमर्दन" "रविकुलभूषण" "कौसल्याविश्राम" और 'सीतारंजन राजाराम' ऐसा कह । यह पञ्चाशदक्षरात्मक राममन्त्र है, इसे भी वीणा आदि बाजोंके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए । यह मन्त्र सब राममन्त्रोंमें श्रेष्ठ है और बडे बडे पातक नष्ट कर देता है ॥ १६३-१६६॥ 'कोदण्डखण्डन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। हे शिष्य ! इस प्रकार हजारों राममन्त्र हैं। जिन्हें कोई हजारों वर्ष तक कहता जाय, फिर भी पूरी तौरसे नहीं कह सकता । १६७॥ ऊपर बतलाये सब मन्त्रोंको वीणा आदि वाद्यके साथ मीठे स्वरसे गान चाहिए। श्रेष्ठ मनुष्योंको यह भी जान लेना चाहिए कि ये सब मन्त्र जपके लिए नहीं बल्कि गान करनेके लिए हैं। इसके अतिरिक्त मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जपनेके लिए हैं, गान करनेके लिए नहीं। बुद्धिमान् कवियोंको चाहिए कि इन्हीं मन्त्रोंके आधारपर विविध भाषाओंमें विविध प्रकारके प्रबन्धोंकी रचना करें ॥ १६८-१७० ॥ मैंने जिन जिन मन्त्रोंको नहीं बतलाया है उन्हें भी बुद्धिमान् लोग गद्य वा पद्यके रूपमें ला सकते हैं। उस ग्रन्थोंकी रचना करनेमें कोई दोष नहीं होता, बल्कि ऐसा करनेसे भगवान् प्रसन्न होते हैं । १७१॥ मन्त्र, प्रबन्ध, काव्य, स्तुति, कीर्तन ये सब प्राचीन हों या अपना ग्रीष्म नये बनाये गए हों, उनका कीर्तन करना चाहिए। किसी भी प्रकारसे रामका स्मरण करना जरूरी है। क्योंकि रामका ध्यान करनेपर सारी पापराशि उसी तरह क्षणभरमें जल जाती है। जैसे फूसकी कुटीमें आग लगते ही क्षणभरमें उसे जलाकर भस्म कर देता है । १७२-१७४ ॥ दम्भसे, भक्तिसे, निष्काम या सकाम जिस किसी तरह भी रामनामका कीर्तन करनेपर पाप जल जाता है ।१७५॥
| ७३८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १६ |
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यथा वह्निस्तूलराशिं स्पर्शित्वाः कापनां विना । कामेन वा दहेत्येव क्षणात्तद्वन्न संशयः ॥१७६॥
मंत्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च नानाचारित्रवर्णनैः
अत्यशुद्धैः स्तुतो रामः कल्पितैरपि स्वेच्छया । तैश्च तुष्टो भवत्यत्र श्रीरामो नात्र संशयः ॥१७७।
विनाश्रयेण रामस्य यत्कृतं स्तवनादिकम् । तेनापि तुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः ॥१७८॥
आश्रयेणापि या निन्दा कृता श्रीराघवस्य च । सा भवेन्नरकायैव नात्र कार्या विचारणा ॥१७९।
किं शास्त्रैश्च पुराणैश्च पठितैः पाठितैरपि । यदि रामे रतिर्नास्ति तैर्भवेन्मानवस्य किम् ॥१८०॥
रामप्रीतिद्युतस्यात्र मूर्खस्यापि नरस्य च । तद्भाषाकृतस्तुत्याद्यैः प्रसन्नो जायते हरिः ॥१८१।
रामचन्द्रस्य प्राप्त्यर्थं यत्कृतं मानवैर्भुवि । तेनातितुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः । १८२।
रामो गेयश्चिन्तनीयोऽत्र रामः स्तव्यो रामः सेवानीयोऽत्र रामः ।
ध्येयो रामो वंदनीयोऽत्र रामो दृश्यो रामः सर्वभूतान्तरेषु ॥१८३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतं श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
लक्ष्मणादीनां कवचादिनिरूपणं नाम पञ्चदशः सर्गः । १५ ।
षोडशः सर्गः
( हनुमत्पताकारोपण व्रत )
श्रीरामदास उवाच
एवं यद्यत्त्वया पृष्टं तन्मया परिवर्णितम् । किमन्यच्छ्रोतुकामस्त्वं तद्वदस्व वदामि ते ॥ १ ॥
विष्णुदास उवाच
रामायणं नरः श्रुत्वा किं विधानं समाचरेत् । तच्च वद महाभाग यद्यस्ति तत्सविस्तरम् ॥ २ ॥
श्रीरामदास उवाच
रामायणे श्रुते दद्याद्रथं हेममयं सुधीः । चतुर्भिर्वाजिभिर्युक्तं तथा क्षौमपताकया ॥ ३ ॥
जिस तरह बड़ीसे बड़ी रूईकी राशिको अग्नि जला डालती है, उसी तरह किसी कामनासे या बिना कामना होके रामका कीर्तन तत्क्षण पापराशिको भस्म कर देता है । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १७६ ॥ मन्त्र प्रबन्ध तथा विविध प्रकारके चरित्रोंसे पूर्ण काव्योंसे या अपने बनाये अतिअशुद्ध पदोंसे ही रामका कीर्तन क्या जाता है तो भी भगवान् प्रसन्न होते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १७७ । बिना किसी आधारके भ बने काव्योंसे रामकी स्तुति करनेसे रामचन्द्रजी प्रसन्न होते हैं । यदि रामका आधार लेकर काव्य बनाया जाय और उसमें भगवान्की निन्दा की जाय तो वह नरकका ही साधन होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है । १७८ ॥ १७९ । यदि राममें प्रीति नहीं है तो बहुतेरे शास्त्रों और पुराणोंके पठन-पाठनसे कुछ भी लाभ नहीं होता ॥ १८० ॥ राममें प्रीति रखनेवाला मनुष्य चाहे मूर्ख ही हो किन्तु वह यदि अपनी टूटी-फूटी भाषामें भगवान्का गुण गाता है तो उससे भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १८१ ॥ इनके अतिरिक्त रामचन्द्रजीकी प्राप्तिके लिए जो कुछ भी उपाय किये जाते हैं, उनसे भगवान् अतिशय प्रसन्न होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १८२ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा रामका गुण गायें, उनका स्मरण करें, सेवा करें, ध्यान करें, और संसारके प्रत्येक प्राणीमें भगवान्की अलौकिक ज्योतिका दर्शन करें ॥ १८३ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे पञ्चदशः सर्गः। १५ ॥
श्रीरामदास बोले— हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, सो मैने कह सुनाया । अब क्या सुनना चाहते हो, सो कहूँ ॥ १ ॥ विष्णुदासने कहा— आनन्दरामायण सुननेके अनन्तर लोगोंको क्या-क्या विधान करना चाहिए, सो आप विस्तारपूर्वक हमें बतलाइए ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा—इस रामायणको सुननेके अनन्तर
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
एतैश्चैव समायुक्तं किंकिणीनादनादितम् । संपादितेश्च सम्यग्वै धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ॥ ४ ॥
ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात् शतमष्टोत्तरं सुधीः । एवं कृते विधाने तन्महाकाव्यं फलप्रदम् ॥ ५ ॥
रामायणं भवेन्नूनं नात्र कार्या विचारणा । यस्मिन् रामस्य संस्थानं रामायणमथोच्यते ॥ ६ ॥
एवं त्वया यथा पृष्टं मया सर्वं निवेदितम् ।
विष्णुदास उवाच
किञ्चिद्व्रतं हनुमतस्त्वं मां वक्तुमिहार्हसि ॥ ७ ॥
श्रीरामदास उवाच
यदा रामस्त्रिकूटाद्रौ नागपाशैस्तु पीडितः । नारदस्य वचः श्रुत्वा सस्मार विनतासुतम् ॥ ८ ॥
तदाऽसौ काश्यपो वीरः समागम्य रणांगणे । प्रणाममकरोत्स्मै रामायामिततेजसे । ९ ॥
निवार्य यक्षणास्त्रं तन्मेघनादसमीरितम् । तुष्टाव रघुवीरं तं ससैन्यं च सलक्ष्मणम् ॥ १० ॥
उवाच प्रणिपत्याथ रामभद्रं खगेश्वरः ।
गरुड़ उवाच
आश्चर्यमिदमत्यन्तं यद्भवान्स्मरद्धि माम् । ११॥
सति वीरे महारुद्रे सगगे श्रीहनूमति सुग्रीवे च नले नीले सुषेणे जाम्बवत्यपि । १२।
अङ्गदे दधिवक्त्रे च तारे च साले तथा । मैंदे मनि महावीर्ये किं मेऽत्रास्ति प्रयोजनम् ॥ १३।
श्रीराम उवाच
भवद्भीतिमुपागम्य विद्रुताश्च भुजङ्गमाः एतेषु सत्सु वीरेषु किमु सैन्यमपीडयन् ॥ १४॥
गरुड़ उवाच
रामदेव महाबाहो कपीनां चरितं शृणु । आत्मनोऽपि समाविष्टान्मा कुरुध्वात्र गर्हणम् ॥ १५।
साक्षात्त्वं भगवान्विष्णुर्लक्ष्मीस्तु जनकात्मजा । सौमित्रिः फणिराजोऽयं रुद्राश्च कपयः स्मृताः ॥ १६।
बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह ४ । धोड़ो जुते और रेशमी पताकासे सुशोभित रथ कथावाचक के हाथको दान दे । विविध प्रकारसे अलंकृत गौका दान करे । इसके बाद एक सौ आठ ब्राह्मणोंको भोजन करावे । जो प्राणी आनन्दरामायण सुनकर ऐसा करता है, उसे इस महाकाव्यके श्रवण करनेका फल प्राप्त होता है । इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए । जिसमें श्री रामचन्द्रजीका निवास हो, वही रामायण है अथवा जिसमें राम विद्यमान रहें, वह रामायण है । ३-६ । इस तरह तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया, मैंने उसका उत्तर दे दिया । विष्णुदासने कहा—हे गुरो! अब मुझे हनुमत्पुत्रका भी कुछ वृत्त बतला दीजिए ॥ ७ । श्रीरामदासने कहा—जिस समय राम त्रिकूट पर्वतपर नागपाशमें बँध गये थे, उस समय उन्होंने नारदके कथनानुसार गरुडका स्मरण किया । उसी समय गरुडजी वहाँ जा पहुंचे और उन्होंने संग्रामभूमिम भगवान्को प्रणाम किया ॥ ८ । ९ । तदनन्तर मेघनाद द्वारा प्रेरित नागपाशका निवारण करके समस्त सेना और लक्ष्मण सहित रामकी स्तुति की । फिर प्रणाम करके गरुडजी भगवान् रामचन्द्रजीसे कहने लगे—हे प्रभो ! यह सोचकर मुझे आश्चर्य होता है कि श्रीहनुमान्जीके रहते हुए भी मुझ दासको आपने स्मरण किया ॥ १० ॥ ११॥ हनुमान्जीके अतिरिक्त सुग्रीव, नल, नील, सुषेण, जाम्बवान्, अङ्गद, दधिवक्त्र, तार, तरल, मैंद आदि वीर थे। इन वीरोंके रहते हुए श्रीमान्को मुझे स्मरण करनेकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? । १२ ॥ १३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा—आपके भयसे सब सर्प भाग गये, किन्तु ये लोग यहाँ रहकर भी स्वयं उनके पाशम बँध गये थे ॥ १४ ॥ गरुडजी बोले—मैं आपको वानरोंका चरित्र सुनाता हूं, सुनिए। यद्यपि यहाँ बहुतसे आत्मीय बानर बैठे हैं फिर भी मैं कहूँगा। इन लोगोंको चाहिए कि मेरी बातको अपनी निन्दाके रूपमें न मानें ॥ १५ ॥ आप साक्षात् विष्णु भगवान्
७४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १६
सुग्रीवो वीरभद्रोऽयं शम्भुरेव स्मृतो नलः । विद्धि दाशरथे नूनं गिरिशो नील एव च ॥१७॥ महाद्यशाः सुषेणोऽयं जांबवांश्चाप्यजैकपात् । अहिर्बुध्न्यश्चगवदोऽप्यदधिवक्त्रः पिनाकधृक् ॥१८॥ अयुताजिद्वयं तारः स्थाणुश्च तरलो यमः । मैंदो भर्गस्तनुः साक्षान् हनुमान् भगवान् स्मृतः॥१९॥ अवतीर्णा महारुद्रास्त्वदर्थे रघुनन्दन अग्रतस् सर्वदेशेषु नानापर्वतसङ्घतः ॥२०॥ धृत्वा च कपिरूपाणि अवतेरुर्महातले । सर्वेऽपि कपितां प्राप्ताः कारणं तद्व्रवीमि ते ॥२१॥ पुरा देवासुरैः क्षिप्तोर्मथिता द्याधयोऽभवन् । नानापीडाकराः मर्त्या लूताविस्फोटकादयः ॥२२॥ तैरेव व्याधिभिः सर्वं पीडितं जगतीतलेम् । ऋषयोऽपि नृपालाश्च ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥२३॥ ऊचुश्च जगतां नाथ ब्रह्माणं कमलासनम् । त्राहि त्राहि जगन्नाथ व्याधिभ्यो जगतीमिमाम् ॥२४॥ पीडितां दारुणैर्दोषैर्ज्वररोगैश्च महोल्बणैः । त्रिदोषैर्जर्जरोभूतां विभ्रमैर्व्याकुलाकृताम् ॥२५॥ औषधानि न सिद्ध्यन्ति मंत्रयंत्राणि चैव हि । पीडयन्ति महारोगा मन्वानांनाशकारिणः ॥२६॥ एतत्ते कथितं सर्वं ब्रह्मन्त्वत्पुरतः सुधीः ॥२७॥ तत्तेषां वचनं श्रुत्वा रुद्रान्संप्रार्थयद्विधिः । तेऽपि श्रुत्वा ब्रह्मवाक्यं रुद्रा एकादशामलाः ॥२८॥ समाश्वास्य विरिंचि ते वीरभद्रादयः कपिः । बभूवु वानरस्तत्र सूर्य्यपुत्राद्या इमे । २९। पर्यटन् पर्वताग्राणि मण्डलानि च सर्वतः । नदन्तो जगतीं सु सुकौः सुदारुणैः । ३०॥ स्वेदितैः क्रीडनैस्तेषां व्याधयो नाशमान्नुयुः तन्तु सकलां दृष्ट्वा वानरैर्व्याप्तां भुवम् । ३१॥ तुतोष भगवान्ब्रह्मा ददौ तेभ्यो वरान् बहून् ।
ब्रह्मोवाच
युष्मास्वपि च मुद्राऽस्तु मृतसंजीवनी कला ॥३२। आज्ञाऽस्तु सर्वजगति वेगोऽस्त्व तु मनः समः । युष्मत्प्रम्मान्ति ये मर्त्याः पूजयन्ति ममत्तनुम्॥३३॥
हैं, श्रीसीताजी लक्ष्मी, लक्ष्मण शेष भगवान्, ये सब वानर महारुद्रांश सम्भव व रघुनन्दन और नल साक्षात् शिव-जीके अंशज शंभु हैं । हे दाशरथे ये नील भी साक्षात् शिव हैं । इत्यादि महायशस्वी सुषेण महायशा, जाम्बवान् अजैकपात, अहिर्बुध्न्य गवद, दधिवक्त्र पिनाकधृक्, तार, अयुताजित्, तरल स्थाणु, मैंद भर्गस्तनु और हनुमानजी साक्षात् शिव हैं ॥ १६-१९ । ये ११ ग्यारह रुद्र आपके लिए एकत्र होकर सब देशोंमें अनेक पर्वतोंपर रहते थे । २० । किन्तु अब वानरका रूप धारण करके इस भूमण्डलपर आये हैं । ये सब वानर क्यों हुए, इसका कारण भी मैं आपकी बतला रहा हूँ ॥ २१ ॥ एक समय देवताओ तथा दैत्योंने मिलकर समुद्रका मन्थन किया, उससे अनेक दुःख देनेवाले तथा और विस्फोट आदि बहुतसे रोग उत्पन्न हुए ॥ २२ । उन रोगोंसे तीनों लोक संकटमें पड़ गये । ऐसी अवस्थामें बहुतसे ऋषि और देवता एकत्र होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये और कहने लगे- हे जगन्नाथ ! इन दारुण व्याधियोंसे इस विश्वकी रक्षा करिए ॥ २३ ॥ २४ ॥ संसारके प्राणियोको ज्वर आदि महाघोर रोगों और वात, पित्त तथा कफ इन तीन दोषोंने घेर लिया है। इनकी शान्तिके लिए जिस किसी औषध तथा यंत्र मंत्र आदिका प्रयोग किया जाता है, वह भी सफल नहीं हो पाता । मनुष्योंका नाश करनेवाले रोग सदैव उन्हें सताते रहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥ हे ब्रह्मन् ! इस तरह मैंने लोगोने कष्ट आपके सन्मुख सुनाया ॥ २७ ॥ उनकी ऐसी बात सुनकर ब्रह्माजीने रुद्रोंसे प्रार्थना की । ब्रह्मवाक्य सुनकर व वीरभद्र आदि एकादश रुद्रगण ब्रह्माको सान्त्वना देकर सुग्रीव प्रभृति वानर होकर बड़े बड़े पर्वतों तथा भूमण्डलोमे मण्डल बाँधकर घूमते हुए अपने दारुण शब्द तथा क्रीड़ासे उन व्याधियोको नष्ट करने लगे ॥ २८-३० । इसके बाद समस्त पृथ्वीको वानरोसे वेष्टित देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए और बहुतसे वरदान दिये । ब्रह्माजीने कहा कि तुम लोगोंकी मुद्राओंमें अमृत संजीवनी नामकी कला विद्यमान रहेगी । १३१ ॥ १३२ ॥ तुम्हारा वेग मनके समान होगा । जो लोग तुम्हारे
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
पताका विविधाः कृत्वा चित्रतोरणसंयुताः । भक्ष्यभोज्यानि साद्यानि लेह्यपेय च सर्वशः ॥३४॥ युष्मदुद्दिश्य ये मर्त्या जुह्वन्ति हि हुताशने । वृत्तिः पुण्यतमं रुद्रांस्तेषां सिद्धिर्न संशयः । ३५॥ पायसेनेव साज्येन तथैव तिलसर्पिषा । यजन्ति भवतां शुद्धं ते यान्ति परमं पदम् ॥३६॥ एवं वै रुद्रमखिलं माया वैश्वानरीस्तथा । मानस्तोकेति वा मन्त्रो मनोज्योतिर्धथापि वा । ३७॥ भवतां यजनं चात्र गायत्र्या वा प्रकीर्तितम् एवं ये मानवा लोके विधानं परिकुर्वते ३८॥ व्याधिं मुक्त्वा सुखासीनास्तेऽन्ते यान्त्यक्षयं पदम् ।
गरुड उवाच इति राम पुरातवृत्तं कपीनां कथितं मया ॥३९॥ एषु रुद्रेषु सर्वेषु हनुमान्द्रनायकः ॥४०॥ विधानं तत्र कर्तव्यं यत्रास्ते हनुमान्प्रभुः । गोपुरे हनुमन्मूर्तिः शिलायां च प्रतिष्ठिता ॥४१॥ तत्र सर्वं प्रकर्तव्यं विधानं सुरसत्तमः ।
श्रीराम उवाच केन केन प्रकारेण क्रियते कपिपूजनम् ॥४२॥ पताकाः कीदृशीस्तत्र कदि कार्या द्विजेश्वर । हवनं कति सङ्ख्याकं किं द्रव्यं को जपोऽत्र वै । ४३। किं दानं केन विधिना तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ।
गरुड उवाच जनमारे समुत्पन्ने ग्रामे वा पत्तनेऽपि वा ॥४४॥ प्रभवन्त्यौषधं नैव मणिमन्त्रपुरःक्रियाः । विधानं तत्र कर्तव्यमेकादश्यां तिथौ नृप ॥४५॥ प्रातःकाले समुत्थाय कृतशौचो द्विजोत्तमः । स्नात्वा गङ्गाजले पुण्ये तिलामलकसंस्कृतः ॥४६॥ एकादश द्विजान् श्रेष्ठानुपवासान्निमन्त्रयेत् । जागरस्तैस्तु कर्तव्यः सर्वोपस्करसयुतः । [४७]॥ आदौ तु मण्डपं कृत्वा सर्वत्रापि सुशोभितम् । पुष्पमण्डपिकामध्ये मण्डपे स्थापयेद्गगन् । ४८॥
शरीरकी पूजा और स्मरण करेंगे। विविध रङ्गकी पताकाये, चित्र विचित्र तोरण, तरह तरह के भक्ष्य भोज्य तथा पेय पदार्थ आपके उद्देशसे जो आगमें हवन करेंगे उनको रुद्रसिद्धि प्राप्त होगी । इसमें कई संशय नहीं है ॥ ३३-३५ ॥ जो लोग घी मिलाकर खीरका हवन करते है उनका परम पद प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार "एवं वै रुद्रमखिलं" इस मन्त्रसे अथवा 'वैश्वानर" या "मानस्तोके' इस मन्त्र तथा "मनोज्योति" इस मन्त्र अथवा गायत्रामन्त्रसे आपके लिए हवन करनेका विधान है। जो लोग संसारमें इस विधिक्रा पालन करते हैं, वे सब प्रकारकी व्याधियोसे मुक्त होकर अक्षय पद प्राप्त करते हैं। गरुडजीने कहा हे राम ! यह मैने बानरोंका एक प्राचीन इतिहास कह सुनाया ॥ ३७ ३८ । इन ग्यारह रुद्रोंमें हनुमानजी सबके मुखिया हैं। इसलिए ऊपर बतलाये हुए सब विधान उसी स्थानपर करने चाहिए, जहाँ कि हनुमान्जीकी मूर्ति विद्यमान हो । अथवा गोपुर या किसी पत्थरके फलकपर हनुमान्जीकी मूर्ति स्थापित करके पूर्वलिखित विधिसे पूजन करे । श्रीरामचन्द्रजाने पूछा-हे पक्षिराज ! किस-किस प्रकारसे कपिपूजन करना चाहिए ॥ ४०-४२ ॥ उनकी पूजामें कैसी पताका बनवाये, कितनी आहुतियां दे, किस मन्त्रका जप करे और किस-किस विधिसे क्या दान करे ? हे सुव्रत ! ये सब बाते हमे बतलाइए । गरुडने कहा हे प्रभो ! जिस समय ग्रामीण या नागरिक मनुष्योपर महामारी जैसी विपत्ति आ पड़े । मणि-मन्त्र आदिका प्रभाव कोई काम न करे तो एकादशी तिथिको यह विधान सम्पन्न करे। ४३-४५ ॥ किसी उत्तम ब्राह्मणको चाहिए कि वह प्रातःकाल उठे। शरीरमें तिल और आंवले लगाकर पवित्र जलसे स्नान करें। इसके अनन्तर उपवास किये हुए ग्यारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और सब सामग्रिये एकत्रित करके उन लोगोके साथ रातभर जागरण करे ॥ ४६॥ ४७ ॥ पहले चारों ओरसे सुशोभित मंडप तैयार करवाये और उसमें फूलोंका एक छोटा-सा मन्दिर बनाकर बीचमें
७४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६
पञ्चामृतैस्तु संस्नाप्य रुद्रांश्याः परिकल्पयेत् । ततस्तु कुसुमैः पूजा शतपत्रादिभिः शुभैः ॥४९॥ चन्दनं च सकर्पूरं रुद्रेभ्यो लेपनं वरम् । दशांगधूपमाद्यञ्च दीपनीराजयैत्ततः ॥५०॥ नैवेद्यं विविधं दद्यात्ताम्बूलैर्नैव संयुतम् । एकादश पताकास्तु पटैः सुपरिकल्पयेत् ॥५१॥ या या यस्मै समुद्दिष्टा पताका च सुशोभना । तस्य तस्यैव रूपं तु तस्यामेव प्रकल्पयेत् ॥५२॥ एवं कृते विधाने च सुपताकासुशोभनैः । प्रातःकाले तु राजेन्द्र जागरंवि द्विजोत्तमः ॥५३॥ कृतस्नानो नदीतोये होमं कुर्यात्समाहितः । पयसेन तु साज्येन तथैव तिलसर्पिषा ॥५४॥ अयुतं हवनं कृत्वा पुनः पूजां प्रकल्पयन् । पताका हनुमद्द्वारे तस्यैव च निधापयेत् ॥५५॥ राजद्वारे तु संप्रोक्तौ गोपेन्द्रोपापणे न्यसेत् । नलनोलस्तथा के च शिवद्वारे तु विन्यसेत् ॥५६॥ तारस्य सत्वराद्यादि मैन्दस्य त्रातडस्य च । ग्रामद्वाह्येषुदिक्षु मार्गेषु स्थापयेद्बुधः ॥५७॥ जलस्थाने जाम्बवतो दधिवक्त्रो चतुष्पथे । श्वपचन्वरगां दिव्यां महावाद्यादिमंगलीः ॥५८॥ द्वारदेशे जनानां च रुद्रमूर्त्तिं विलेपयेत् विचित्रौ पश्चरंगैश्च ग्राममूर्तेश्च वेष्टयेत् ॥५९॥ प्रत्यहं कारयेद्विद्वान् भक्त्या ब्राह्मणभोजनम् । द्विजेभ्य स्त्रिऋत्विग्भ्यो मालकाराणि भूरिशः ॥६०॥ छत्राणि कारयेच्च पादुकाश्च त्रिदोषनः । धेनुं पयस्विनीं दद्यादाचार्याय सवत्सकाम् ॥६१॥ सदक्षिणां सुवस्त्रां च मालकार्या गुणान्विताम् । द्विजाय महिषीं दद्यात्तथैव पृथगीरने ॥६२॥ अन्येभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च मन्न धान्यानि भूरिशः । लवणं मधुरं देयं तैलं च सगुडं तथा ॥६३॥ शय्यादानानि भूरिणि छत्राणि विविधानि च । एतत्कृत्वा विधानं च राजा क्षेममवाप्नुयात् ॥६४॥ रुद्र एवात्र निर्दिष्टो जपः सर्वैः सुखप्रदः । अथवा द्वान शाम्नं मानवशोक इति स्फुटम् ॥६५॥
इति हनुमत्पताकाभिधानं व्रतम् ।
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे हनुमत्पताकापन्न नाम षोडश सर्गः ॥ १६ ॥
वानरोंको स्थापित करे ॥ ४८ । तदनन्तर उन रुद्रांका पञ्चामृतसे स्नान कराय और शतपत्र आदिके फूलोंसे विधिवत् पूजन करे। कपूर मिले हुए चन्दनका लेप, दशाङ्ग धूपका आघ्राण और नीराजन करे। फिर ताम्बूलके साथ विविध प्रकारके नैवेद्य समर्पित करे और सूक्ष्म वस्त्रसे ग्यारह पताका बनवावे। जो पताका जिस रुद्रके लिए निर्धारित की गयी हो, उसम उसका चित्र बनवावे ॥ ४९–५२ ॥ ये विधियाँ करनेके अनन्तर सुन्दर पताका आदि समर्पित करे। वह ब्राह्मण सवेरे उठे और नदीके जलमें स्नान करके सावध- नतापूर्वक तिल और घी मिले खीरसे अग्निहोत्रमें दस हजार आहुतियाँ दे। इसके बाद फिर उन सबकी पूजा करे। हनुमान्जीके द्वारपर हनुमान्जी की पताका नरेन्द्र या सुग्रीवकी पताका, आपण (बाजार) में शुषेणकी और शिवद्वारपर नल-नीलकी पताका स्थापित करे। ५३–५६॥ तार, तरस, मैन्द और अङ्गदकी पताकाओंको ग्रामके बाहर चारों दिशाओंमें स्थापित करे ।५७। जलस्थानपर जाम्बवान् और चौराहेपर दधिवक्त्रकी पताकाको विविध वाद्यों की ध्वनिके साथ स्थापित करे। मनुष्योंके द्वारदेशपर पाँच रंगोंसे चित्रित रुद्रमूर्ति बनाये और ग्राममूसाम उसे परिवेष्टित करे । ५८ ॥ ५९ ॥ समझदार लोगोंको चाहिए कि प्रतिदिन ब्राह्मणोंको अच्छी तरह भोजन करावें और ऋत्विजोंको विविध आभूषण और वस्त्र दान दे ॥ ६० ॥ छत्र, पादुका तथा दूध देनेवाली सवत्सा गो आचार्यको दे। उस गौके साथ पर्याप्त दक्षिणा, अलंकार, वस्त्र आदि भी दे। उस यज्ञमें जो ब्राह्मण ब्रह्मा बना हो, उसे एक भैंसका दान दे ॥ ६१ । ६२ । इसके अतिरिक्त और जितने ब्राह्मण हों, उन्हें भी शय्यादान और छत्र आदि दे। जो राजा इस विधानसे रुद्रयज्ञ करता है, उसका सब प्रकारसे कल्याण होता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ इस विधानमें रुद्रमन्त्र अथवा "मानस्तोके" यह मन्त्र जपना लाभकारी होता है । ६५ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेज-पाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
सप्तदशः सर्गः
( श्रीरामचन्द्रोपदिष्ट साररामायण )
श्रीरामदास उवाच
विष्णुदास त्वया यद्यत्पृष्टं तत्तन्मयोदितम् । रामाज्ञया तव प्रीत्याऽऽनन्दचारित्रमुत्तमम् ॥ १ ॥
रामेणैव ममास्येन त्ववोपदिष्टमादरात् । त्वय्यस्ति रामसंप्रीतिस्तस्माद्रामेण मे द्विज ॥ २ ॥
आज्ञापितं पूजनांते पुरा तव तपोबलात् आनन्दरामचरितं ममेदं मंगलप्रदम् ॥ ३ ॥
विष्णुदासाय विप्राय कथयस्वेति वै मुहुः । त्वदर्थे पूजनांते मे दर्शनं दत्तवान्निजम् ॥ ४ ॥
नवोत्तरशतश्लोकसाररामायणेन च पुरा मे ग्रथितेनात्र रामेण स्मारितोऽप्यहम् ॥ ५ ॥
श्रीराघवोपदिष्टेन महामंगलदेन च नवाधिकशतश्लोकसाररामायणेन च । ६ ।।
यद्यन्मया विस्मृतं च श्रुतं पूर्वकथानकम् यम तत्तच्चापि स्मारितं वाल्मीकिमुखनिर्गतम् । ७ ।।
तदौ मया विष्णुदास राघवस्य तृषा तव । शब्दे विमिस्राद्रामचरितन्मविविच्य च । ८ ।।
सारं सारं च कथितं महामंगलकारकम् ।
विष्णुदास उवाच
त्वथैतत्कथितं चेदमानन्दमंगलं मम ॥ ९ ॥
श्रीरामचरितं रम्यं मम तोषार्थमुत्तमम् । शतकोटिमितत्तत्किं कथितं च विविच्य च । १०॥
अथवा भारतखंडांर्तर्भागादुक्तं वदस्व तत् ।
श्रीरामदास उवाच
शतकोटिमितं कृत्स्नं मया रामायणं शुभम् ॥११॥
विविच्य ज्ञानदृष्ट्याऽत्र तवेदमुपदेशितम् । विदेपान्स्मारितं चापि साररामायणश्रवात् ॥१२.।
रामोपदेशिवाद्राम्यात्तत्तस्ते कथितं मया ।
विष्णुदास उवाच
शतकोटिमिते रामचरिते पाषकापहे ॥ १३॥
कति काण्डानि सर्गाश्च तन्मां वक्तुं त्वमर्हसि ।
श्रीरामदास कहा हे विष्णुदास ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, सो मैंने कह सुनाया। यह समस्त आनन्दरामायण रामचन्द्रजीकी आज्ञासे अथवा यों कहो कि साक्षात् रामचन्द्रजीने ही मेरे मुखसे कहा है। तुम्हारे हृदयमें रामकी भक्ति है। इसलिये उस दिन पूजनके अन्तमें तुम्हारे तपोबलसे प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे तुमको आनन्दरामायण सुनानेकी आज्ञा दी थी। उन्होंने कहा था -यह आनन्दरामायण महा मंगलकारी ग्रन्थ है, तुम इसे विष्णुदासको सुनाओ तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर ही मैं पूजनके अन्तमे तुम्हें अपना दर्शन दे रहा हूँ। १-४ ॥ रामचन्द्रजीके स्मरण करानेपर ही मैंने एक सौ नौ श्लोकोंमें रामायणका सार सुनाया था। जिन-जिन कथानकोंको मैं भूल गयाथा। वे भी वाल्मीकिजीके मुखसे निकले रामायण द्वारा स्मरण होते गये ॥ ५-७॥ इसके बाद मैंने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे रामायणके मुख्य-मुख्य अंश लेकर कहा है। विष्णुदास बोले कि आपने मुझे आनन्द देनेके लिये यह रम्य आनन्दरामायण कहा है तो कृपा करके अब यह भी बतलाइए कि सौ करोड़ सङ्ख्यात्मक रामायणसे आपने कहाँ कहाँसे क्या-क्या अंश लेकर कहा है? ॥८-१०॥ अथवा भारतखण्डसे कौन-कौन अंश लिये हैं ? श्रीरामदास कहने लगे-पूरी रामायण सौ करोड़ श्लोकोंकी है ॥ ११ ॥ ज्ञानकी दृष्टिसे विवेचना करके मैंने तुम्हें इसका उपदेश दिया है। हमें तो रामायणके सारका श्रवण
७४४ आनन्दरामायणे [ सर्ग १७
श्रीरामचन्द्र उवाच
नव लक्षाणि काण्डानि शतकोटिमिते द्विज ॥१५॥
सर्गा नवतिलक्षाश्च ज्ञातव्या मुनिकीर्तिताः । कोटीनां च शत श्लोकमानं ज्ञेयं विचक्षणैः ॥१६॥
विष्णुदास उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि यत्त्वां श्रीरामवेण हि । उपदिष्ट मदर्यं हि साररामायणं शुभम् ॥१६॥
नवोत्तरशतश्लोकपरिमितं च मनोहरम् । तन्मे वदामृता पूर्ण परं कौतूहलं मम ॥१७॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । साररामायणं तेऽद्य प्रोच्यते गणकीर्तितम् ॥१८॥
आविर्भूत्वा पूजनांते मऽग्रे भ्रातृभिः श्रिया । मां प्रोवाच मुहुर्यश्च प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥१९॥
( अथ साररामायणम् )
श्रीरामचन्द्र उवाच
रामदास शृणुष्वाद्य यन्मां प्रोचुश्चने त्व । चरित्रं सकलं स्वीयं शपा तस्य भविस्तरम् ॥ १ ॥
विष्णुदासाय शिष्याय मद्भक्तिनिरताय च । कथयस्व यथाऽन्यच्च ज्ञानाद्दृष्टं यथाश्रुतम् ॥ २ ॥
यथा भारतखंडान्तर्मार्गे वापि त्वयेक्षितम् । स्मरणार्थं त्वहं किञ्चित्तद्व वक्ष्यामि सादरम् ॥ ३ ॥
पार्वतीशिवसंवादः सूर्यवंशार्थापार्थिवः । मन्वित्रोहिरणं लङ्कां रावणेन विसर्जनम् ॥ ४ ॥
दशरथविवाहश्च कैकेय्यै द्विवरार्पणम् । कैकेय्यै द्विजशापश्च वरदानकराय च ॥ ५॥
राज्ञः शापो वैश्यहत्या शृङ्गशृङ्गाश्रमोद्यमः । ऋष्यशृङ्गमनेत्रेतःप्रताशाद्वहिनाऽर्पितम् । ६ ॥
पायसं तद्विभक्ते च गृध्री भागं गिरौ नयत् । अंतर्गर्भा नृपान्यन्त्यासामासन्नदोहदाः ॥ ७॥
स्ततो भूम्या ब्रह्मणा ये प्रार्थनं मथराजिना चैत्रे मासि ममोत्पत्तिर्वधुमिश्र हनुमता ॥ ८॥
वालक्रीडा मन्कृता च व्रतवद्यनतो मम । वेदाभ्यासो वशिष्ठाच्च तीर्थयात्रा च वधुभिः ॥ ९ ॥
करनेसे ही बहुत-सी बातें याद आ गई थीं। उन्हींका रामका आज्ञासे मैंने तुम्हें सुनाया है ॥१२ । १३। विष्णुदासने पूछा उस शतकोटिसंख्यात्मक रामायणमें कितने काण्ड और कितने सर्ग हैं? सो कृपा करके हमें बतलाइए । श्रीरामदासने कहा—हे द्विज ! सौ करोड़ संख्यात्मक रामायणमें कुल नौ लाख काण्ड तथा नब्बे लाख सर्ग हैं ॥ १४ ॥ कुल मिलाकर उस रामायणन सौ करोड़ श्लोक हैं १५। विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! अब मैं आपसे वह रामायण सुनना चाहता हूँ, जिसे स्वयं रामचन्द्रजीने आपको बतलाया था ॥ १६ ॥ जिसमें एक सौ नौ श्लोक हैं । कृपया अब मुझे वह सुनाइए । रसके सुननेके लिए मर हृदयमे बड़ा कौतूहल है । १७॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो । आज मैं तुम्हें वह साररामायण सुनाऊँगा, जिसे श्रीरामचन्द्रजान मुझसे कहा था । १८॥ एक दिन जब कि मेरा पूजन समाप्त हो गया था, तब भगवान अपने तीनों भाताओंके साथ मेरे समक्ष आये । उन्होंने प्रसन्न होकर यही साररामायण कहा था ॥ १९ । श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे रामदास ! मेरे चरित्रोंका जो सार अंश है सो तुमसे कह रहा हूँ। इसे विस्मृतक्षयसे तुम विष्णुदास नामके अपन शिष्यको सुनाना । क्योंकि वह मेरी भक्तिमे निमग्न है। इन चरित्रोंके अतिरिक्त तुमने अपन ज्ञानसे जो कुछ देखा सुना हो या भारतखंडमे देखा हो, वह सब भी उसे सुना देना, स्मरण रखनेके लिए कुछ चरित्र म तुम्हें बतला रहा हूँ । १-३ । शिव पार्वती-संवाद, आधे सूर्यवंशज राजाओका चरित्र, मेरे माता-पिताका हरण रावण द्वारा उनका लंका भेजा जाना, दशरथविवाह, कैकेयीको दो वरदान देना कैकेयीके लिए ब्राह्मणका शाप, वरदान देनेवाले विप्रको राजाका शाप, वैश्यहत्या, ऋष्यशृङ्गका ले लेका उद्यम, शृङ्गशृङ्कके प्रेम वसे अग्निद्वारा महार ज दशरथको पायस मिलना ॥ ४-६ । उसके हिस्से लगानेपर उनका एक भाग एक गृद्धीका पर्वतपर लेकर चली जाना, रानियोंका गर्भिणी होना, भूमिके साथ ब्रह्माका आकर मेरी स्तुति करना, मंथराकी उत्पत्ति, चैत्रमासमे अपने सब भाइयौँ तथा हनुमान्जीके साथ मेरी उत्पत्ति, मेरी की हुई बाललीलायें, मेरा यज्ञोपवीतसंस्कार, वसिष्ठके पास वेदाध्ययन
सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७४५
विश्वमित्राद्धनुर्विद्या ताटिकामर्दनं वने । प्रारम्भो रणदीक्षायाः सुबाहोर्मर्दनं मखे ॥१०॥
मारीचक्षेपणं चापि ह्यहल्योद्धरणं मया । स्वयंवरं च शापश्च मुनिपत्न्याः सविस्तरम् ॥११॥
नौकापेन हि गङ्गायां मदङ्घ्रिक्षालनं कृतम् । शैवं धनुर्जा मदग्न्यन्यस्तं भग्नं सभागणे ॥१२॥
सीतोत्पत्तिश्च सीताया लङ्कागमननिर्गमौ । भ्रातॄणां मे विवाहश्च जामदग्न्यपराजयः ॥१३॥
दीपावल्युत्सवश्चापि नृपैः पथि महारथः । जीवनं भरतस्यापि मङ्गावि मुनिनेरितम् ॥१४॥
वृन्दाशापः पितुः श्लाघ्यं कैकेयीपूर्वकर्म च । ततो मन्दिनचर्या च गर्भाधानमहोत्सवः ॥१५॥
नारदाग्रे प्रतिज्ञा मे यौवराज्यार्थमुद्यमः । कैकेयीवरदानेन दण्डके गमनं मम ॥१६॥
दर्शनं गुहकस्यापि सीतावाक्यं च जाह्नवीम् । भारद्वाज-प्रमोदयोर्दर्शनं च गिरौ स्थितिः ॥१७॥
काकाक्षिभेदनं चापि राज्ञश्च मरणं दिवि । दर्शनं भरतस्यापि भरतस्य विसर्जनम् ॥१८॥
सीताभालेस्तिलकोऽरण्येऽनसूयाभूषणाऽर्पणम् । विराधमर्दनं मार्गे नानाऽऽश्रमविलोकनम् ॥१९॥
अगस्त्येशाय गुह्यस्य दर्शनं संभ्रमर्दनम् । विरूपणं शूर्पणखायाः खरादीनां प्रमर्दनम् ॥२०॥
सीतादेहविभागश्च मारीचस्य वधो मया । सीताया हरणं लङ्कां संगरश्च जटायुषः ॥२१॥
इन्द्रेण पायसं दत्तं सीतायै गिरिवीक्षणम् कबन्धमर्दनं मार्गे शबर्या पूजितस्त्वहम् । २२।
ततः सख्यं कपीन्द्रेण शिरशः क्षेपणं मया । छेदनं सप्ततालानां सर्पेण मालिका हृता ॥२३॥
बालेर्घातो मया तत्र सीताशुद्ध्यर्थमुद्यमः । हनुमताऽब्धितरणं लङ्कायां जानकीक्षणम् ॥२४॥
मंदोदरीसमुत्पत्तिर्वनपालादिमर्दनम् लङ्कादाहश्च देहान्तं कर्तुं सिद्धोऽभवत्कपिः ॥२५॥
जांबूनद्वृक्षशाखाकथाऽब्धेस्तरणं पुनः बहुमुद्रादर्शनं च सेतुबंधस्ततः परम् ॥२६॥
विभीषणाभिषेकश्च विश्वनाथकथा शुभा । गंधमादनेशाख्यानं संगरश्च ततः परम् ॥२७॥
आश्रमोंके साथ तीर्थयात्रा, विश्वामित्रसे धनुर्विद्याकी प्राप्ति, ताडकासंहार, रणदीक्षाका प्रारम्भ, यज्ञभूमिमें सुबाहुका मर्दन मारीचका समुद्रपार फेंका जाना, मेरे द्वारा अहल्याका उद्धार, सीतास्वयंवरमें गमन, अहल्याके शापकी विस्तृत कथा ॥७-११॥ गंगामें निषाद द्वारा मेरे पैर धोया जाना, परशुरामजीके द्वारा लाकर रखे हुए शङ्करजीका धनुष मेरे द्वारा तोड़ा जाना, सीताकी उत्पत्ति, सीताका लंका जाना और वहाँसे फिर वापस आना, मेरा तथा मेरे भ्रातओंका विवाह, परशुरामकी पराजय, । १२ ।। १३ ।। दीपावलीका उत्सव, रास्तेमें राजाओंके साथ महान् संग्राम, भरतका पुनर्जीवन, वृन्दाका शाप मेरे पिताकेपुण्य, कैकेयीके पूर्वकर्म, मेरी दिनचर्या गर्भाधानमहोत्सव, ॥ १४ । १५ ।। युवराज न बननेके लिए नारदके समक्ष मेरी प्रतिज्ञा, मुझे युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी तैयारियाँ कैकेयीके वरदानसे दण्डकवनगमन निषादके साथ वार्तालाप, गङ्गाजीके लिए सीताकी कुछ मनौतियां, भारद्वाज और वाल्मीकि ऋषिका दर्शन, चित्रकूट पर्वतपर निवास, जयन्तके नेत्रभेदन, अयोध्यामे महाराज दशरथका मृत्यु, भरतजीका दर्शन और विसर्जन ॥ १६-१८ ॥ वनमें मेरे द्वारा सीताके भालमें तिलक लगाया जाना, अनसूया द्वारा भूषाणार्पण, विराधमर्दन, अनेक आश्रमोंके दर्शन, ॥ १९ ॥ अगस्त्य और गुहके दर्शन सम्भ्रममर्दन, शूर्पणखाका विरूपकरण, खर आदि राक्षसोंका संहार, सीताके शरीरका विभाजन, मेरे द्वारा मारीचका वध, सीताहरण, रावण-जटायुसंग्राम, इन्द्र द्वारा सीताके लिए पायस प्रदान, कबन्धमर्दन, शबरी द्वारा पूजित होकर सुग्रीवके साथ मित्रता, दुन्दुभीके अस्थि-को फेंकना, सात तालोका भेदन सर्पद्वारा मालिकाहरण, मेरे द्वारा बालिका संहार, सीताका पता पानेके उद्योगकी तैयारियाँ, हनुमानजी द्वारा समुद्रलंघन, लंकामे जानकीजीका दर्शन मन्दोदरीकी उत्पत्ति-कथा, अशोकवनमें हनुमानजीके द्वारा राक्षसोंका मारा जाना, लङ्कादहन, हनुमानजीका शरीर त्याग करनेका आयोजन, ॥ २०-२५ ।। जाम्बूनद वृक्षकी शाखाका वृत्तान्त, पुनः सिन्धुसन्तरण, बहुमुद्रादर्शन, सेतुबन्धन, विभीषणका अभिषेक, विश्वनाथकी कथा, गन्धमादन पर्वतस्थ शिवजीका वृत्तान्त, राम-रावणसंग्राम, काल-
७४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १७
कालनेमिवधश्चाथ तथेरावणमर्दनम् । मैरावणमर्दनं च मया मंचकभंजनम् ॥२८॥
कुंभकर्णवधश्चापि मेघनादस्य मर्दनम् । ततो होमस्य विध्वंसस्ततो रावणमर्दनम् ॥२९॥
सीताया दिव्यदानं च स्वपुरीगमनं मम । रणदीक्षासमाप्तिश्च राज्याभिषेचनं मम ॥३०॥
उत्पत्ती शत्रुणादीनामिंद्रजेत्त्वपराक्रमः । मानभंगो रावणस्य बालिसुग्रीवजन्मनी ॥३१॥
वायुपुत्रजन्मकर्म वरदानं हनूमतः । शापोऽपि वायुपुत्राश्च ह्यगस्त्यस्य विसर्जनम् ॥३२॥
इति सारकाण्डम् ॥ १ ॥
गंगायात्रासमुद्योगः सरयूभेदनं ततः । मया स्वबाणरेखा च सीतावाक्यविसर्जनम् ॥३३॥
कुंभोदरस्य वाक्येन पृथ्वीयात्रा मया कृता । कुमारीवरदानं च सुरभी केन मेऽर्पिता ॥३४॥
चिंतामणेः शिवाल्लाभस्ततोऽयोध्याप्रवेशनम् ।
इति यात्राकाण्डम् ॥ २ ॥
आरंभो वाजिमेधस्य पृथ्व्यां वाजी विमोचितः ॥३५॥
तुरगाय ससैन्याय मार्गदानं तु गंगया । पृथ्वीप्रदक्षिणां कृत्वा वाहेरश्वस्य प्रवेशनम् ॥३६॥
तमसातटशाला च कुंभोदरप्रदर्शनम् । अष्टोत्तरशतं नाम्नां मम स्तोत्रं मुनेरितम् ॥३७।
दिनचर्याध्वजारोपावभृथोत्सवो मम । सीतादानं च तन्मुक्ती रामतीर्थादिवर्णनम् ॥३८॥
ततो यज्ञसमाप्तिश्च दश यज्ञा विशेषतः ।
इति यागकाण्डम् ॥ ३ ॥
ततो मम स्तवराजः क्रीडाशालाप्रवर्णनम् ॥३९॥
पक्षिणां नवकं स्तोत्रं जानक्या वर्णनं मया । देहरामायणं पत्न्यै मया कथितमुत्तमम् ॥४०॥
दिनचर्या पुनर्मे हि सीतालंकारवर्णनम् । पक्वान्नानां च विस्तारो जलक्रीडा च सीतया ॥४१॥
मध्याह्निकं भोजनादि मम कर्मप्रवर्णनम् । द्विजपत्न्यै भूषणानां दानं जनकजाकृतम् ॥४२॥
रात्रौ नानास्थलेष्वत्र क्रीडाश्च विविधाः स्त्रियः । हवमषोडशमूर्तीनां श्यामांगं दानमर्पितम् ॥४३।
नेमिवध, ऐरावणमदन, मैरावणवध, मंचभञ्जन, कुम्भकर्णवध, मेघनादमरण, होमविध्वंस तथा रावणवध, ॥ २८-२९ । सीताकी शपथ अयोध्या पुनरागमन, रणदीक्षाकी समाप्ति, मेरा राज्याभिषेक, राक्षस आदि-की उत्पत्ति और मेघनादके पराक्रमकी कथा, रावणका मानभंग, बालि-सुग्रीवके जन्मकी कथा, वायुपुत्रके जन्म कर्मका वृत्तान्त, हनुमत्जीके लिए वरदान, हनुमान्जीके लिए शाप और अगस्त्यऋषिका विसर्जन, इतनी कथायें सारकाण्डमें कही गयी हैं ॥ १ । ३०-३२॥ गंगायात्राकी तैयारी, सरयूभेदन, मेरे द्वारा बाणकी रेखा खिचना, कुम्भोदरके वाक्यसे मेरी पृथ्वीयात्रा, कुमारीको वरदान, मेरे लिए ब्रह्मा द्वारा सुरभी-दानका वृत्तान्त ॥ ३३ ॥ ३४ । शिवजीके पाससे चिन्तामणिकी प्राप्ति और फिर अयोध्या वापस आना, ये इतनी कथायें यात्राकाण्डमें कही गयी हैं ॥ २ ॥ अश्वमेध यज्ञका आरम्भ, पृथ्वीप्रदक्षिणाके लिए घोड़ेका छोड़ा जाना, गंगाजीका मेरी सेना तथा घोड़ेके लिए रास्ता देना, समस्त पृथ्वी घूमकर बांडेका वापस आना, कुम्भोदर द्वारा तमसा-की तटशालाका अवलोकन, कुम्भोदर द्वारा कहा हुआ मेरा शतनामस्तोत्र, ॥ ३५-३७ ॥ मेरी दिनचर्या, ध्वजारोपण अवभृथोत्सव, सीतादान, रामतीर्थ आदिका वर्णन, यज्ञसमाप्ति और दस यज्ञोंका वर्णन, ये इतनी कथायें यागकाण्डमें कही गयी हैं ॥३॥ इसके बाद मेरा स्तवराज क्रीडाशालाका वर्णन, ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ नौ पक्षियोंका स्तोत्र, मेरे द्वारा जानकीकी शोभाका वर्णन, मेरे द्वारा सीताके लिए देहरामायणका वर्णन ॥ ४० ॥ मेरी दिनचर्या, सीताके अलङ्कारोंका वर्णन, पक्वान्नोंका विस्तार और सीताके साथ जलक्रीडा ॥ ४१ । तदनन्तर भोजन आदि मेरे मध्याह्नकालीन कर्मोंका वर्णन, सीताजीके द्वारा विप्रपत्नीके
सर्गः १७] मनोहरकाण्डम् ७४७
ततो निजेष्टपत्न्यै च वरदानं मयाऽर्पितम् । गुणवत्यै वरदानं पिंगलायै वरार्पणम् ॥४४॥
सीतायाः प्रत्ययार्थं च दिव्यदानं मया मुदा । कुरुक्षेत्रेऽगस्त्यपत्नया संवादे जानकीजयः ॥४५॥
इति विलासकाण्डम् ॥ ४ ॥
सीताया दोहदार्थं हि क्रीडाऽऽम्रादिषु कृता । सीमन्तोन्नयनादीनि नानाकर्माणि वै ततः ॥४६॥
विसर्जितश्च जनको वाल्मीकेराश्रमं नया । सीतया द्वे निजे रूपे कृते मद्वाक्यगौरवात् ॥४७॥
अंगुष्ठयोग्ये लिखितः कैकेय्या रावणो महान् । लोकानां रजकस्यापि ऽपवादाद्विदेहजा ॥४८॥
मया त्यक्तोपपुत्रा त्यक्ताऽऽनीताश्च बह्रृचः । गुरुरूपेण पुत्रस्य कृतं गत्वा तु जातकम् ॥४९॥
अश्वया मया गत्वा कृताः क्षोद्रास्त्वनिष्टटे । वाल्मीकिना लवानां च ततः पुत्रः कृत परः ॥५०॥
तयोः कृतं तु मुनिना रामरक्षाभिमंत्रणम् । कमलानां च हरणे लवस्य विजयो महान् ॥५१॥
रामायणस्य श्रवणं पुत्राभ्याञ्च मयाऽध्वरे । युद्धं लवकुशं चाथ बलैस्तस्याभिपवनम् ॥५२॥
मम युद्धं सुतेनाथ सीतायाः शपथस्ततः । सीतया मण्डपं चापि विशन्त्या भूतले पुनः ॥५३॥
ततो ऽश्वमेधमाप्नित्य बन्धुपुत्रजनिस्ततः । बालक्रोडापनयनं वेदानां ग्रहणं क्रमात् ॥५४॥
बालानां शुभचिह्नानि सीतायाः पुत्रलालनम् । सर्वेषां व्रतबन्धाश्च तेषां यात्रास्ततः परम् ॥५५॥
इति जन्मकाण्डम् ॥ ५ ॥
भूरिकीर्तेः पतिंकरण मन्पुर गमनं मम । स्वप्रभाऽऽदीन्पुपुत्रीणां दर्शनार्थं तदा मम ॥५६॥
वन्दितोऽहं नृपैः सर्वैस्तदा राजमन्त्रांगणे । क्रमेण वर्णनं चापि पार्थिवानां हि नदया ॥५७॥
कुशकण्ठे चम्पिकया रत्नमाला विसर्जनम् । क्रमेण वर्णनं चात्र पार्थिवानां सुन्दया ॥५८॥
सुमत्य रत्नमालाया लवकुण्ठे विमर्जनम् । उत्साहोऽथ विवाहस्य नानासम्मानपूर्वकः ॥५९॥
गमनं हि स्नुषाभ्यां च सीतया त्वपुरीं मम । निर्हदो जलदेवीनां बालकानां प्रमोचनम् ॥६०॥
लिए भूषणदान, बहुत-सी स्त्रियोंके साथ रात्रिके समय क्रीड़ा और सुवर्णमयी षोडश स्त्रियोंका दान, देवपत्नियोंके लिए मेरा वरदान, गुणवती और पिङ्गलाके लिए वरदान ॥ ४२-४४ ॥ सीताके विश्वासार्थ मेरी शपथ, कुरुक्षेत्रमें अगस्त्यकी पत्नीके साथ बातचीतमें जानकीकी विजय इतनी कथायें विलासकाण्डमें वर्णित हैं ॥ ४५ ॥ ४ ॥ सीताकी गर्भकालीन इच्छा पूर्ण करनेके लिए बागेच आदिमे विहार, सीमन्तोन्नयन आदि विविध संस्कार, मेरे द्वारा राजा जनकको वाल्मीकिके आश्रमपर भेजा जाना, मेरे कहनेसे सीताका दो रूप धारण करना, ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ सीताके अङ्गुष्ठके अनुसार कैकेयी द्वारा रावणका पूरा स्वरूप बनाया जाना, अपनी प्रजाके कतिपय लोगों और एक धोबीके मुखसे अपनी निन्दा सुनकर मेरे द्वारा सीताका परित्याग और उनकी मुद्रा काटकर मँगवाना, गुरुरूपसे बाल्मीकिके आश्रमपर पहुंचकर । अपनेका जातकर्म संस्कार करना, मङ्गलजाके तटपर मेरे द्वारा सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पादित होना, वाल्मीकि द्वारा जल-बिन्दुओंसे लव नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि होना, फिर उन दोनों बच्चोंका वाल्मीकि द्वारा रामरक्षामन्त्रसे अभिमन्त्रित होना कमलहरण करते समय लवकी एक बड़ी विजय ॥ ४८-५१ ॥ यज्ञभूमिमे लवकुशके मुखसे मेरा रामायणश्रवण, उनके साथ मेरे सैनिकोंका युद्ध और अश्वके बहाने लवको छल कराया जाना, मेरे साथ कुशका संग्राम, सीताकी शपथ, पृथ्वीमे प्रवेश करती हुई सीताको मेरे द्वारा पुनः ग्रहण करना, यज्ञाभिसम्पादन, मेरे भ्राताओंकी पुत्रोत्पत्ति, बच्चोंकी बालक्रीडा, बच्चोंका उपनयनसंस्कार, बच्चोंका वेदाध्ययन, बालकोंके शुभ चिह्नोंका वर्णन, सीता द्वारा पुत्रोंका लालनपालन, सब पुत्रोंका व्रतबंध (उपनयन संस्कार) ॥ ५२-५५ ॥ ये इतनी कथायें जन्मकाण्डमें हैं ॥ ५ ॥ भूरिकीर्तिकी पुत्रीके स्वयंवरका समाचार पाकर मेरा प्रस्थान, उस पुत्रीको स्त्रियोंकी मेरे दर्शनके लिए व्यग्रता, वहाँके सब राजाओंका मेरी वन्दना करना, नन्दा द्वारा सब राजाओंकी शोभा और वैभवका वर्णन, चम्पिकाका कुशके गलेमें रत्नमाला डालना, सुमति द्वारा लवके कण्ठमें माल्यार्पण,
४९ विविध सम्मानपूर्वक विवाहोत्सव, होना और अपनी पुत्रवधुओंके साथ रामका अयोध्याको लौटना, जलदेवी द्वारा