श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 758, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
पताका विविधाः कृत्वा चित्रतोरणसंयुताः । भक्ष्यभोज्यानि साद्यानि लेह्यपेय च सर्वशः ॥३४॥ युष्मदुद्दिश्य ये मर्त्या जुह्वन्ति हि हुताशने । वृत्तिः पुण्यतमं रुद्रांस्तेषां सिद्धिर्न संशयः । ३५॥ पायसेनेव साज्येन तथैव तिलसर्पिषा । यजन्ति भवतां शुद्धं ते यान्ति परमं पदम् ॥३६॥ एवं वै रुद्रमखिलं माया वैश्वानरीस्तथा । मानस्तोकेति वा मन्त्रो मनोज्योतिर्धथापि वा । ३७॥ भवतां यजनं चात्र गायत्र्या वा प्रकीर्तितम् एवं ये मानवा लोके विधानं परिकुर्वते ३८॥ व्याधिं मुक्त्वा सुखासीनास्तेऽन्ते यान्त्यक्षयं पदम् ।
गरुड उवाच इति राम पुरातवृत्तं कपीनां कथितं मया ॥३९॥ एषु रुद्रेषु सर्वेषु हनुमान्द्रनायकः ॥४०॥ विधानं तत्र कर्तव्यं यत्रास्ते हनुमान्प्रभुः । गोपुरे हनुमन्मूर्तिः शिलायां च प्रतिष्ठिता ॥४१॥ तत्र सर्वं प्रकर्तव्यं विधानं सुरसत्तमः ।
श्रीराम उवाच केन केन प्रकारेण क्रियते कपिपूजनम् ॥४२॥ पताकाः कीदृशीस्तत्र कदि कार्या द्विजेश्वर । हवनं कति सङ्ख्याकं किं द्रव्यं को जपोऽत्र वै । ४३। किं दानं केन विधिना तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ।
गरुड उवाच जनमारे समुत्पन्ने ग्रामे वा पत्तनेऽपि वा ॥४४॥ प्रभवन्त्यौषधं नैव मणिमन्त्रपुरःक्रियाः । विधानं तत्र कर्तव्यमेकादश्यां तिथौ नृप ॥४५॥ प्रातःकाले समुत्थाय कृतशौचो द्विजोत्तमः । स्नात्वा गङ्गाजले पुण्ये तिलामलकसंस्कृतः ॥४६॥ एकादश द्विजान् श्रेष्ठानुपवासान्निमन्त्रयेत् । जागरस्तैस्तु कर्तव्यः सर्वोपस्करसयुतः । [४७]॥ आदौ तु मण्डपं कृत्वा सर्वत्रापि सुशोभितम् । पुष्पमण्डपिकामध्ये मण्डपे स्थापयेद्गगन् । ४८॥
शरीरकी पूजा और स्मरण करेंगे। विविध रङ्गकी पताकाये, चित्र विचित्र तोरण, तरह तरह के भक्ष्य भोज्य तथा पेय पदार्थ आपके उद्देशसे जो आगमें हवन करेंगे उनको रुद्रसिद्धि प्राप्त होगी । इसमें कई संशय नहीं है ॥ ३३-३५ ॥ जो लोग घी मिलाकर खीरका हवन करते है उनका परम पद प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार "एवं वै रुद्रमखिलं" इस मन्त्रसे अथवा 'वैश्वानर" या "मानस्तोके' इस मन्त्र तथा "मनोज्योति" इस मन्त्र अथवा गायत्रामन्त्रसे आपके लिए हवन करनेका विधान है। जो लोग संसारमें इस विधिक्रा पालन करते हैं, वे सब प्रकारकी व्याधियोसे मुक्त होकर अक्षय पद प्राप्त करते हैं। गरुडजीने कहा हे राम ! यह मैने बानरोंका एक प्राचीन इतिहास कह सुनाया ॥ ३७ ३८ । इन ग्यारह रुद्रोंमें हनुमानजी सबके मुखिया हैं। इसलिए ऊपर बतलाये हुए सब विधान उसी स्थानपर करने चाहिए, जहाँ कि हनुमान्जीकी मूर्ति विद्यमान हो । अथवा गोपुर या किसी पत्थरके फलकपर हनुमान्जीकी मूर्ति स्थापित करके पूर्वलिखित विधिसे पूजन करे । श्रीरामचन्द्रजाने पूछा-हे पक्षिराज ! किस-किस प्रकारसे कपिपूजन करना चाहिए ॥ ४०-४२ ॥ उनकी पूजामें कैसी पताका बनवाये, कितनी आहुतियां दे, किस मन्त्रका जप करे और किस-किस विधिसे क्या दान करे ? हे सुव्रत ! ये सब बाते हमे बतलाइए । गरुडने कहा हे प्रभो ! जिस समय ग्रामीण या नागरिक मनुष्योपर महामारी जैसी विपत्ति आ पड़े । मणि-मन्त्र आदिका प्रभाव कोई काम न करे तो एकादशी तिथिको यह विधान सम्पन्न करे। ४३-४५ ॥ किसी उत्तम ब्राह्मणको चाहिए कि वह प्रातःकाल उठे। शरीरमें तिल और आंवले लगाकर पवित्र जलसे स्नान करें। इसके अनन्तर उपवास किये हुए ग्यारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और सब सामग्रिये एकत्रित करके उन लोगोके साथ रातभर जागरण करे ॥ ४६॥ ४७ ॥ पहले चारों ओरसे सुशोभित मंडप तैयार करवाये और उसमें फूलोंका एक छोटा-सा मन्दिर बनाकर बीचमें