भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 757

७४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १६

सुग्रीवो वीरभद्रोऽयं शम्भुरेव स्मृतो नलः । विद्धि दाशरथे नूनं गिरिशो नील एव च ॥१७॥ महाद्यशाः सुषेणोऽयं जांबवांश्चाप्यजैकपात् । अहिर्बुध्न्यश्चगवदोऽप्यदधिवक्त्रः पिनाकधृक् ॥१८॥ अयुताजिद्वयं तारः स्थाणुश्च तरलो यमः । मैंदो भर्गस्तनुः साक्षान् हनुमान् भगवान् स्मृतः॥१९॥ अवतीर्णा महारुद्रास्त्वदर्थे रघुनन्दन अग्रतस् सर्वदेशेषु नानापर्वतसङ्घतः ॥२०॥ धृत्वा च कपिरूपाणि अवतेरुर्महातले । सर्वेऽपि कपितां प्राप्ताः कारणं तद्व्रवीमि ते ॥२१॥ पुरा देवासुरैः क्षिप्तोर्मथिता द्याधयोऽभवन् । नानापीडाकराः मर्त्या लूताविस्फोटकादयः ॥२२॥ तैरेव व्याधिभिः सर्वं पीडितं जगतीतलेम् । ऋषयोऽपि नृपालाश्च ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥२३॥ ऊचुश्च जगतां नाथ ब्रह्माणं कमलासनम् । त्राहि त्राहि जगन्नाथ व्याधिभ्यो जगतीमिमाम् ॥२४॥ पीडितां दारुणैर्दोषैर्ज्वररोगैश्च महोल्बणैः । त्रिदोषैर्जर्जरोभूतां विभ्रमैर्व्याकुलाकृताम् ॥२५॥ औषधानि न सिद्ध्यन्ति मंत्रयंत्राणि चैव हि । पीडयन्ति महारोगा मन्वानांनाशकारिणः ॥२६॥ एतत्ते कथितं सर्वं ब्रह्मन्त्वत्पुरतः सुधीः ॥२७॥ तत्तेषां वचनं श्रुत्वा रुद्रान्संप्रार्थयद्विधिः । तेऽपि श्रुत्वा ब्रह्मवाक्यं रुद्रा एकादशामलाः ॥२८॥ समाश्वास्य विरिंचि ते वीरभद्रादयः कपिः । बभूवु वानरस्तत्र सूर्य्यपुत्राद्या इमे । २९। पर्यटन् पर्वताग्राणि मण्डलानि च सर्वतः । नदन्तो जगतीं सु सुकौः सुदारुणैः । ३०॥ स्वेदितैः क्रीडनैस्तेषां व्याधयो नाशमान्नुयुः तन्तु सकलां दृष्ट्वा वानरैर्व्याप्तां भुवम् । ३१॥ तुतोष भगवान्ब्रह्मा ददौ तेभ्यो वरान् बहून् ।

ब्रह्मोवाच

युष्मास्वपि च मुद्राऽस्तु मृतसंजीवनी कला ॥३२। आज्ञाऽस्तु सर्वजगति वेगोऽस्त्व तु मनः समः । युष्मत्प्रम्मान्ति ये मर्त्याः पूजयन्ति ममत्तनुम्॥३३॥


हैं, श्रीसीताजी लक्ष्मी, लक्ष्मण शेष भगवान्, ये सब वानर महारुद्रांश सम्भव व रघुनन्दन और नल साक्षात् शिव-जीके अंशज शंभु हैं । हे दाशरथे ये नील भी साक्षात् शिव हैं । इत्यादि महायशस्वी सुषेण महायशा, जाम्बवान् अजैकपात, अहिर्बुध्न्य गवद, दधिवक्त्र पिनाकधृक्, तार, अयुताजित्, तरल स्थाणु, मैंद भर्गस्तनु और हनुमानजी साक्षात् शिव हैं ॥ १६-१९ । ये ११ ग्यारह रुद्र आपके लिए एकत्र होकर सब देशोंमें अनेक पर्वतोंपर रहते थे । २० । किन्तु अब वानरका रूप धारण करके इस भूमण्डलपर आये हैं । ये सब वानर क्यों हुए, इसका कारण भी मैं आपकी बतला रहा हूँ ॥ २१ ॥ एक समय देवताओ तथा दैत्योंने मिलकर समुद्रका मन्थन किया, उससे अनेक दुःख देनेवाले तथा और विस्फोट आदि बहुतसे रोग उत्पन्न हुए ॥ २२ । उन रोगोंसे तीनों लोक संकटमें पड़ गये । ऐसी अवस्थामें बहुतसे ऋषि और देवता एकत्र होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये और कहने लगे- हे जगन्नाथ ! इन दारुण व्याधियोंसे इस विश्वकी रक्षा करिए ॥ २३ ॥ २४ ॥ संसारके प्राणियोको ज्वर आदि महाघोर रोगों और वात, पित्त तथा कफ इन तीन दोषोंने घेर लिया है। इनकी शान्तिके लिए जिस किसी औषध तथा यंत्र मंत्र आदिका प्रयोग किया जाता है, वह भी सफल नहीं हो पाता । मनुष्योंका नाश करनेवाले रोग सदैव उन्हें सताते रहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥ हे ब्रह्मन् ! इस तरह मैंने लोगोने कष्ट आपके सन्मुख सुनाया ॥ २७ ॥ उनकी ऐसी बात सुनकर ब्रह्माजीने रुद्रोंसे प्रार्थना की । ब्रह्मवाक्य सुनकर व वीरभद्र आदि एकादश रुद्रगण ब्रह्माको सान्त्वना देकर सुग्रीव प्रभृति वानर होकर बड़े बड़े पर्वतों तथा भूमण्डलोमे मण्डल बाँधकर घूमते हुए अपने दारुण शब्द तथा क्रीड़ासे उन व्याधियोको नष्ट करने लगे ॥ २८-३० । इसके बाद समस्त पृथ्वीको वानरोसे वेष्टित देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए और बहुतसे वरदान दिये । ब्रह्माजीने कहा कि तुम लोगोंकी मुद्राओंमें अमृत संजीवनी नामकी कला विद्यमान रहेगी । १३१ ॥ १३२ ॥ तुम्हारा वेग मनके समान होगा । जो लोग तुम्हारे