भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 761

७४४ आनन्दरामायणे [ सर्ग १७


श्रीरामचन्द्र उवाच
नव लक्षाणि काण्डानि शतकोटिमिते द्विज ॥१५॥
सर्गा नवतिलक्षाश्च ज्ञातव्या मुनिकीर्तिताः । कोटीनां च शत श्लोकमानं ज्ञेयं विचक्षणैः ॥१६॥

विष्णुदास उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि यत्त्वां श्रीरामवेण हि । उपदिष्ट मदर्यं हि साररामायणं शुभम् ॥१६॥
नवोत्तरशतश्लोकपरिमितं च मनोहरम् । तन्मे वदामृता पूर्ण परं कौतूहलं मम ॥१७॥

श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । साररामायणं तेऽद्य प्रोच्यते गणकीर्तितम् ॥१८॥
आविर्भूत्वा पूजनांते मऽग्रे भ्रातृभिः श्रिया । मां प्रोवाच मुहुर्यश्च प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥१९॥

( अथ साररामायणम् )
श्रीरामचन्द्र उवाच
रामदास शृणुष्वाद्य यन्मां प्रोचुश्चने त्व । चरित्रं सकलं स्वीयं शपा तस्य भविस्तरम् ॥ १ ॥
विष्णुदासाय शिष्याय मद्भक्तिनिरताय च । कथयस्व यथाऽन्यच्च ज्ञानाद्दृष्टं यथाश्रुतम् ॥ २ ॥
यथा भारतखंडान्तर्मार्गे वापि त्वयेक्षितम् । स्मरणार्थं त्वहं किञ्चित्तद्व वक्ष्यामि सादरम् ॥ ३ ॥
पार्वतीशिवसंवादः सूर्यवंशार्थापार्थिवः । मन्वित्रोहिरणं लङ्कां रावणेन विसर्जनम् ॥ ४ ॥
दशरथविवाहश्च कैकेय्यै द्विवरार्पणम् । कैकेय्यै द्विजशापश्च वरदानकराय च ॥ ५॥
राज्ञः शापो वैश्यहत्या शृङ्गशृङ्गाश्रमोद्यमः । ऋष्यशृङ्गमनेत्रेतःप्रताशाद्वहिनाऽर्पितम् । ६ ॥
पायसं तद्विभक्ते च गृध्री भागं गिरौ नयत् । अंतर्गर्भा नृपान्यन्त्यासामासन्नदोहदाः ॥ ७॥
स्ततो भूम्या ब्रह्मणा ये प्रार्थनं मथराजिना चैत्रे मासि ममोत्पत्तिर्वधुमिश्र हनुमता ॥ ८॥
वालक्रीडा मन्कृता च व्रतवद्यनतो मम । वेदाभ्यासो वशिष्ठाच्च तीर्थयात्रा च वधुभिः ॥ ९ ॥


करनेसे ही बहुत-सी बातें याद आ गई थीं। उन्हींका रामका आज्ञासे मैंने तुम्हें सुनाया है ॥१२ । १३। विष्णुदासने पूछा उस शतकोटिसंख्यात्मक रामायणमें कितने काण्ड और कितने सर्ग हैं? सो कृपा करके हमें बतलाइए । श्रीरामदासने कहा—हे द्विज ! सौ करोड़ संख्यात्मक रामायणमें कुल नौ लाख काण्ड तथा नब्बे लाख सर्ग हैं ॥ १४ ॥ कुल मिलाकर उस रामायणन सौ करोड़ श्लोक हैं १५। विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! अब मैं आपसे वह रामायण सुनना चाहता हूँ, जिसे स्वयं रामचन्द्रजीने आपको बतलाया था ॥ १६ ॥ जिसमें एक सौ नौ श्लोक हैं । कृपया अब मुझे वह सुनाइए । रसके सुननेके लिए मर हृदयमे बड़ा कौतूहल है । १७॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो । आज मैं तुम्हें वह साररामायण सुनाऊँगा, जिसे श्रीरामचन्द्रजान मुझसे कहा था । १८॥ एक दिन जब कि मेरा पूजन समाप्त हो गया था, तब भगवान अपने तीनों भाताओंके साथ मेरे समक्ष आये । उन्होंने प्रसन्न होकर यही साररामायण कहा था ॥ १९ । श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे रामदास ! मेरे चरित्रोंका जो सार अंश है सो तुमसे कह रहा हूँ। इसे विस्मृतक्षयसे तुम विष्णुदास नामके अपन शिष्यको सुनाना । क्योंकि वह मेरी भक्तिमे निमग्न है। इन चरित्रोंके अतिरिक्त तुमने अपन ज्ञानसे जो कुछ देखा सुना हो या भारतखंडमे देखा हो, वह सब भी उसे सुना देना, स्मरण रखनेके लिए कुछ चरित्र म तुम्हें बतला रहा हूँ । १-३ । शिव पार्वती-संवाद, आधे सूर्यवंशज राजाओका चरित्र, मेरे माता-पिताका हरण रावण द्वारा उनका लंका भेजा जाना, दशरथविवाह, कैकेयीको दो वरदान देना कैकेयीके लिए ब्राह्मणका शाप, वरदान देनेवाले विप्रको राजाका शाप, वैश्यहत्या, ऋष्यशृङ्गका ले लेका उद्यम, शृङ्गशृङ्कके प्रेम वसे अग्निद्वारा महार ज दशरथको पायस मिलना ॥ ४-६ । उसके हिस्से लगानेपर उनका एक भाग एक गृद्धीका पर्वतपर लेकर चली जाना, रानियोंका गर्भिणी होना, भूमिके साथ ब्रह्माका आकर मेरी स्तुति करना, मंथराकी उत्पत्ति, चैत्रमासमे अपने सब भाइयौँ तथा हनुमान्जीके साथ मेरी उत्पत्ति, मेरी की हुई बाललीलायें, मेरा यज्ञोपवीतसंस्कार, वसिष्ठके पास वेदाध्ययन