श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 760, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
सप्तदशः सर्गः
( श्रीरामचन्द्रोपदिष्ट साररामायण )
श्रीरामदास उवाच
विष्णुदास त्वया यद्यत्पृष्टं तत्तन्मयोदितम् । रामाज्ञया तव प्रीत्याऽऽनन्दचारित्रमुत्तमम् ॥ १ ॥
रामेणैव ममास्येन त्ववोपदिष्टमादरात् । त्वय्यस्ति रामसंप्रीतिस्तस्माद्रामेण मे द्विज ॥ २ ॥
आज्ञापितं पूजनांते पुरा तव तपोबलात् आनन्दरामचरितं ममेदं मंगलप्रदम् ॥ ३ ॥
विष्णुदासाय विप्राय कथयस्वेति वै मुहुः । त्वदर्थे पूजनांते मे दर्शनं दत्तवान्निजम् ॥ ४ ॥
नवोत्तरशतश्लोकसाररामायणेन च पुरा मे ग्रथितेनात्र रामेण स्मारितोऽप्यहम् ॥ ५ ॥
श्रीराघवोपदिष्टेन महामंगलदेन च नवाधिकशतश्लोकसाररामायणेन च । ६ ।।
यद्यन्मया विस्मृतं च श्रुतं पूर्वकथानकम् यम तत्तच्चापि स्मारितं वाल्मीकिमुखनिर्गतम् । ७ ।।
तदौ मया विष्णुदास राघवस्य तृषा तव । शब्दे विमिस्राद्रामचरितन्मविविच्य च । ८ ।।
सारं सारं च कथितं महामंगलकारकम् ।
विष्णुदास उवाच
त्वथैतत्कथितं चेदमानन्दमंगलं मम ॥ ९ ॥
श्रीरामचरितं रम्यं मम तोषार्थमुत्तमम् । शतकोटिमितत्तत्किं कथितं च विविच्य च । १०॥
अथवा भारतखंडांर्तर्भागादुक्तं वदस्व तत् ।
श्रीरामदास उवाच
शतकोटिमितं कृत्स्नं मया रामायणं शुभम् ॥११॥
विविच्य ज्ञानदृष्ट्याऽत्र तवेदमुपदेशितम् । विदेपान्स्मारितं चापि साररामायणश्रवात् ॥१२.।
रामोपदेशिवाद्राम्यात्तत्तस्ते कथितं मया ।
विष्णुदास उवाच
शतकोटिमिते रामचरिते पाषकापहे ॥ १३॥
कति काण्डानि सर्गाश्च तन्मां वक्तुं त्वमर्हसि ।
श्रीरामदास कहा हे विष्णुदास ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, सो मैंने कह सुनाया। यह समस्त आनन्दरामायण रामचन्द्रजीकी आज्ञासे अथवा यों कहो कि साक्षात् रामचन्द्रजीने ही मेरे मुखसे कहा है। तुम्हारे हृदयमें रामकी भक्ति है। इसलिये उस दिन पूजनके अन्तमें तुम्हारे तपोबलसे प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे तुमको आनन्दरामायण सुनानेकी आज्ञा दी थी। उन्होंने कहा था -यह आनन्दरामायण महा मंगलकारी ग्रन्थ है, तुम इसे विष्णुदासको सुनाओ तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर ही मैं पूजनके अन्तमे तुम्हें अपना दर्शन दे रहा हूँ। १-४ ॥ रामचन्द्रजीके स्मरण करानेपर ही मैंने एक सौ नौ श्लोकोंमें रामायणका सार सुनाया था। जिन-जिन कथानकोंको मैं भूल गयाथा। वे भी वाल्मीकिजीके मुखसे निकले रामायण द्वारा स्मरण होते गये ॥ ५-७॥ इसके बाद मैंने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे रामायणके मुख्य-मुख्य अंश लेकर कहा है। विष्णुदास बोले कि आपने मुझे आनन्द देनेके लिये यह रम्य आनन्दरामायण कहा है तो कृपा करके अब यह भी बतलाइए कि सौ करोड़ सङ्ख्यात्मक रामायणसे आपने कहाँ कहाँसे क्या-क्या अंश लेकर कहा है? ॥८-१०॥ अथवा भारतखण्डसे कौन-कौन अंश लिये हैं ? श्रीरामदास कहने लगे-पूरी रामायण सौ करोड़ श्लोकोंकी है ॥ ११ ॥ ज्ञानकी दृष्टिसे विवेचना करके मैंने तुम्हें इसका उपदेश दिया है। हमें तो रामायणके सारका श्रवण