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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५९

सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५९

तेषां वै स्मृतयो नाम ... केचिद्वैदिकेषु कर्मस्वधिकृताः पराः ॥९१॥
अवैदिकेषु मन्त्रेषु केचिद्यज्ञरता भुवि। अवैदिकेण मन्त्रेण नाधिकारो भवेत्क्वचित् ॥९२॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा। यथोक्तं कर्म कुर्वीत विप्राणां यच्च यद्विशेषतः ॥९३॥
कदा कुत्र कथं कर्म केन कार्यमिति स्फुटम्। यच्छास्त्रं न विजानात्यथा दोषभाग्भवेत् ॥९४॥
अदेशे यत्कृतं व्यङ्गकालवेलाविहितं च यत्। प्रत्येकं बहुवक्तव्यं प्रमादेनोदितं भवेत् ॥९५॥
तस्मादावश्यकं तत्र विप्राणां च विशेषतः। स्मृत्यर्थं ज्ञानतो वापि वेदार्थज्ञानतोऽधिकम् ॥९६॥
ऋग्वेदस्योपवेदः स्यादायुर्वेदश्च हि वैदिकः। परोपकारार्थमथ स्वस्यारोग्यार्थमेव वा ॥९७॥
जीविकार्थमप्यसौ हि पठितव्यो द्विजातिभिः। श्रह्मणं रोगिणं संप्रमुपचारेण जीवयेत् ॥९८॥
अद्यान्यभावं पापं तस्य नश्यति वै ध्रुवम्। परस्य च कृतो पुण्यं चरःकृच्छ्रमनुत्तमम् ॥९९॥
एवं पुण्यं भवेत्तस्य ... यत्नं कृतेऽपि रोगार्तः प्रायश्चापुनः शयात् ॥१००॥
सोऽप्यर्धफलभाग्नेति नात्र संशयो भवेत्। जीविकार्थे ... कथं दृष्टं विद्याचतुष्टयम् ॥१०१॥
इह लोके फलं तस्य परलोके न विद्यते। ... मानवः ॥१०२॥
कस्मात्त्वं कुरुते धर्मः का वा पूजा न मानिता। ... ॥१०३॥
गतश्रीश्च गतायुश्च ब्रह्मणाश्च द्विजो मृषाः। गान्धर्वशास्त्रमधीयानो रामग्रे यश्च गायति ॥१०४॥
तद्धन्तिकुलको लभते गांधर्वं सम्मुखे हरेः। चतुर्विधा जना... तु जीविका ॥१०५॥
क्षत्रियाणां तु सा प्रोक्ता दृष्टमुभयतः। ब्राह्मणेषु परेषु पुण्यं श्रुतानुगमनः ॥१०६॥

रहता है। वह ... । जिनमें तांत्रिक प्रकारके कर्मोंका आविष्कार हुआ है। उनमेंसे कुछ लोग वैदिक कर्मोंके अधिकृत हैं। कुछ तांत्रिकपद्धतिसे सब कर्म करते हैं और कुछ बिल्कुल पशुओंकी तरह ... भी अधिकार नहीं दिया गया है ततः ... मिश्रित धर्म माने गये हैं ॥ ९३ ॥ कब कहां और कर्म करना चाहिए वे सब बात यथार्थशास्त्र के निर्णय से जानी जा सकती हैं। यदि उनसे निर्णय किये बिना कोई कर्म किया जाय तो उसका भागी बनना पड़ता है ॥ ९४ ॥ जो कर्म अदेशार्थ, अङ्गरहित, बिना समयके अथवा ... जाता है, वह सब व्यर्थ होता है और पुण्यके स्थानमें पाप ही होता ... निर्णय कर लेना आवश्यक है। तिसमें भी ब्राह्मणको तो ... आज्ञा और स्मृतिसे भी वेदकी आज्ञा विशेष मानना है ॥ ९६ ॥ ... आयुर्वेद है। उसे परोपकारके लिए अथवा अपनी आरोग्यताके लिए या ... द्विजातियोंको अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण रोगी होनेके कारण दरिद्र हो तो उसका कष्ट बढ़ाकर देना चाहिए ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ ऐसा करनेसे दवा देनेवालेके ... हो जाता है। यही उसे चार कृच्छ्रव्रतप्रायश्चित्त करनेके पुण्यकी प्राप्ति होती है ॥ ९९ ॥ इस ... पुण्य होता है। यदि यत्न करने पर भी कोई रोगी आयु पूर्ण हो जानेके कारण बच न सके तो भी दवा देनेवालेको आधा पुण्य होता ही है। इसमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो मनुष्य अपनी जीविका चलानेके लिए चारों उपविद्याओंका उपयोग करता है उसे इस लोकमें अवश्य फल मिलता है, किन्तु परलोकमें कुछ भी नहीं मिलता। जो मनुष्य रोगरूपी समुद्रमें डूबे हुए निर्धनी मनुष्यका उद्धार करता है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ उसने कौन-सा धर्म नहीं कर लिया और कौन-सी पूजा नहीं की। अर्थात् उसने सब कुछ कर लिया। जिस प्राणीकी श्री नष्ट हो जाती है, वह ज्योतिर्विदोंसे द्वेष करता है। जिसकी आयु क्षीण हो जाती है वह वैद्योंसे द्वेष करता है। गतश्री एवं गतायु ये दोनों प्राणी बहुतसा द्वेष किया करते हैं। जो मनुष्य गान्धर्वविद्या (संगीत) का अध्ययन करके रामचन्द्रजीके सम्मुख गाता है, उसे उत्तम गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है,

६६०आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

विवेकस्तस्य कर्तव्यो द्रव्यदाने विशेषतः । यस्त्वन्नस्य क्षुधितः पात्रं पानीयस्य पिपासितः ॥१०७॥
द्रव्यदाने तु कर्तव्यं विशेषात्पात्रपरीक्षणम् । गवां गतं पयो दुग्धं नागानां पयसो विषम् ॥१०८॥
पात्रापात्रविचारण मन्वाग्रे दानमुत्तमम् । यत्तु युक्तं तथा पात्रं तथा दानं फलाधिकम् ॥१०९॥
ज्ञानाधिक्यात्तपोध्याधिक्यात्पात्रं श्रेष्ठं हि जायते । रामभक्त्य... सर्वैः संमान्यो न सर्वथा ॥११०॥
रामद्वेषी वर्जनीयो दर्शनालापनादिषु । सोऽद्य चेत्पुण्डरीकाक्षं मान्यो नान्यथा ॥१११॥
पञ्चांशेनाधिकं द्रव्याद्दानं तद्विशिष्यते । वित्तादर्थेन यद्दानं न तद्दानं स्मृतं बुधैः ॥११२॥
देशकालविशेषेण पात्रपात्रविशेषतः । दानस्य फलमृद्धिश्चाधिकं न्यूनमेव च ॥११३॥
विप्रशुल्कं तु यो मूढो न दद्याच्छक्तिसंभवम् । विष्ठाकृमिर्भवत्येव मुनीनां च संमत्या ॥११४॥
दिव्यवर्षाणि नैवात्र त्वया कार्यस्तु संशयः । यत्तु ज्ञानवता कर्म क्रियते पुण्यदायकम् ॥११५॥
अधिकं तत्फलं प्रोक्तमज्ञानिकृतकर्मणः । यथा यथाधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा ॥११६॥
यत्तु ज्ञानरतः कर्म क्रियते पापकारकम् । तन्न्यूनफलदं ज्ञेयमज्ञानीकृतपातकात् ॥११७॥
यथा यथाऽधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा । यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते क्षणात् ॥११८॥
ज्ञानाग्निर्दग्धकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा । यथाधिक्यं यथा हेम्नो वह्निसंगेन जायते ॥११९॥
पुण्याधिक्यं तथा शिष्य ह्यग्निसंगेन जायते । पुण्ये न वर्द्धते पुण्यं पापं न्यूनं च जायते ॥१२०॥
पापेन पापवृद्धिस्तु पुण्यं स्वल्पं च जायते । अयं सूक्ष्मो विचारोऽयं दुर्ज्ञेयः स्थूलदृष्टिभिः ॥१२१॥
तथाप्येष विचार्यो स्यात्तज्ज्ञानानुसारतः । यस्तु सन्त्यधिकारेऽपि ज्ञाने वा पठनेऽपि वा ॥१२२॥

धनुर्वेद और दण्डनीति, ये दोनों ब्राह्मणको अविहित हैं ॥१०३-१०५॥ किन्तु क्षत्रियोंको वे वेदके उक्त फल देते हैं। ऊपर बतलायी हुई सब बातोंमें ज्ञानके अनुसार ही पुण्य होता है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि विशेष करके द्रव्यदानके विषयमें विचार करें, भूखको अन्नदान और प्यासेको पानी पिलाना श्रेष्ठ धर्म है ॥१०६। १०७। द्रव्यदान देते समय पात्रका विचार करना आवश्यक है क्योंकि दुष्ट गोमें भी दूध होता है और सर्पके पेटमें दूध जानकर दूध का विष बन जाता है ॥१०८॥ इस तरह पात्र और अपात्रका विचार करके सन्यासम दान देना अच्छा है। दानका पात्र जितना ही अच्छा होगा, उतना ही अधिक पुण्य होगा ॥१०९॥ इस पात्र और अपात्रका विचार ज्ञानकी अधिकता, पुण्यकी अधिकता तथा परिश्रमकी अधिकता देखकर किया जाता है। जो मनुष्य रामका भक्त है, वही पात्र है और जो रामभक्तिसे रहित है, उसीको अपात्र जानना चाहिए। जो मनुष्य रामसे द्वेष रखता हो, उसका दर्शन और उससे सम्भाषण आदि कदापि न करें। जो मनुष्य भक्तिका मार्ग करता है, वह अपवित्र मनुष्य भी पवित्र हो जाता है ॥११०। १११॥ अपनी शक्तिसे अधिक जो दान दिया जाता है वही दान दान है और कंजूसीके साथ जो दान दिया जाता है, वह दान दान नहीं है ॥११२॥ देश, काल एवं पात्र अपात्रका विशेषताके अनुसार अधिक या न्यून फल कहा गया है ॥११३॥ जो मनुष्य ब्राह्मणको पारिश्रमिक नहीं देता, वह उन पैसोंकी संख्याके अनुसार दिव्य वर्षों तक विष्टाका क्रिमि बना रहता है। इसमे किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिये। ज्ञानवान् मनुष्य जिन पवित्र कर्मोंको करता है अज्ञानियों की अपेक्षा उसे अधिक फल मिलता है जैसे-जैसे ज्ञानकी मात्रा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उसके पाप नष्ट होने लगते है ॥११४-११६॥ ज्ञानी मनुष्य यदि कोई पाप करता है तो अज्ञानियों द्वारा किये पातकोंकी अपेक्षा उस पापका भी न्यून ही कुफल मिलता है ॥११७॥ जैसे जैसे ज्ञान होता जाता है वैसे-वैसे पाप अपने आप नष्ट होते जाते हैं। जिस तरह जलती हुई अग्नि लकड़ियोंको जलाती है, उसी तरह ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोको भस्म कर डालती है। जिस तरह अग्निके संयोगसे कंचनकी कान्ति अधिक हो जाती है, उसी तरह अनियोंका भस्म करनेसे पुण्यकी मात्रा बढ़ती जाती है। पुण्यसे पुण्य बढ़ता है और पाप कम होता जाता है ॥११८-१२०॥ पापसे पापकी वृद्धि होती है और पुण्य कम होता जाता है यह बड़ा ही सूक्ष्म विचार है और स्थूलदृष्टिवालोंके लिए तो और

सर्गः ९] मनोहरकाण्डम् ६६१


प्रयत्नं नैव कुर्वीत न नरो जायते पशुः । ज्ञातव्यमर्थं मतिमान् स्वयमेव विचारयेत् ॥ १२३॥
इति संक्षेपतः प्रोक्तमेतत्ते पृष्टमेव यत् । मया तदर्थं चावधार्य स्वयं निश्चयमाप्नुयात् ॥ १२४॥
धर्मास्तु बहवः सन्ति तथा पापानि भूरिशः । विविधानि च पापानि प्रायश्चित्तानि यानि वै ॥ १२५॥
कर्तव्यानि जनैस्तानि सम्यग्बुद्ध्या विचार्य च । सर्वधर्माणां सारश्च रहस्यं तु मयोदितम् ॥ १२६॥
ग्रहणीयं प्रयत्नेन न ह्यभक्ताय दीयताम् । शुश्रूषवे साधवे च रामभक्ताय दीयताम् ॥ १२७॥

इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतायां श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥८॥
सर्वदा दर्शनात्फलश्रुतिर्नाम नवमः सर्गः ।


नवमः सर्गः

रामकाण्डस्य पूजाविधिः

गुरोऽन्यद्रामचन्द्रस्य विशेषेण च पूजनम् । कस्मिन्काले प्रकर्तव्यं तं कालं वदस्व माम् ॥ १ ॥
श्रीरामदास उवाच -
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि कालं पुण्यतमं शुभम् । रामचन्द्रस्य पूजार्थं विशेषतः ॥ २ ॥
माघस्य शुक्लपक्षस्य या तु पञ्चमी तिथिः । श्रीपञ्चमीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ३ ॥
तदारभ्य साधनामादयं रामं महोत्सवैः । पूजयेत्सर्वदा यावद्वैशाखे कृष्णपञ्चमीम् ॥ ४ ॥
माघकृष्णचतुर्थ्याश्च नवमीं मधुशुक्लजाम् । यावत्केवलफलाहारैः चतुरशीति दिनानि हि ॥ ५ ॥
सीतारामस्य नित्यं हि केचित्कुर्वन्ति पूजनम् । पूर्णिमान्ताः स्मृताश्चात्र मासाः सर्वत्र भो द्विज ॥ ६ ॥
प्रत्यहं वाहना रूढं कृत्वा रामं महोत्सवैः । भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्महावाद्यपुरःसरैः ॥ ७ ॥


नां कठिन है ॥ १२१ ॥ यह सब होते हुए भी तत्वज्ञानके अनुसार इसका विचार करना ही चाहिए। जो मनुष्य अधिकारी होता हुआ भी ज्ञानके लिए प्रयत्न नहीं करता, वह पशुयोनिमें जन्म पाता है। ज्ञान अथवा अध्ययनका विप्रका पुण्य कहना हुआ ॥ १२२, १२३ ॥ हे अनघ ! तुमने जो कुछ पूछा, मैंने उसे संक्षेपमें कह सुनाया; लोगोंको चाहिए कि इसका भलीभाँति विचारपूर्वक निश्चय कर लिया करे । १२४ ॥ पुण्य और पाप ये दोनों बहुत प्रकारके हैं । पाण्डवोंको यदुपतिने पापके प्रायश्चित्त बतलाये हैं । १२५ ॥ लोगोंको चाहिए, कि उनका अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह विचार करें । सब धर्मोंका सार एवं रहस्य मैंने तुम्हारे आगे कह सुनाया । इसे यत्नके साथ ग्रहण करना चाहिए। इस भक्तिविहीन प्राणीको न देकर उसे देना चाहिए, जो शुश्रूषु, साधु एवं रामभक्त हो । १२६, १२७ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्द-रामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिराभाटीकासहित मनोहरकाण्डे अष्टम सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीविष्णुदासने कहा—हे गुरो ! रामचन्द्रजीका विशेष पूजन किस समय करना चाहिए । वह समय आप मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! सुनो, मैं तुम्हें रामकी पूजाका परम पुनीत समय बतलाता हूँ। रामचन्द्रजीका पूजन करनेके लिय वह समय बहुत ही उपयोगी होता है । माघमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथि बड़ी ही पवित्र तिथि है । श्रीपञ्चमी उसका नाम है । इसी नामसे वह तीनों लोकमें विख्यात है ॥ २ ॥ ३ ॥ तबसे लेकर जबतक वैशाखके कृष्णपक्षकी पञ्चमी न आ जाय अर्थात् ढाई महीनेतक महान् उत्सवोंके साथ रामचन्द्रजीका पूजन करे ॥ ४ ॥ माघके कृष्णपक्षकी चतुर्थीसे चैत्रके शुक्लपक्षकी नवमी तक अर्थात् इक्यासी दिन केवल फलाहार करके रहे ॥ ५ ॥ जो लोग नित्य सीतारामका पूजन करते हैं, उनके लिए पूर्णिमान्त ही मास माना जाता है ॥ ६ ॥ प्रतिदिन वाहनपर बैठे हुए रामको भेरी-दुन्दुभी आदि बाजे-गाजे, वेश्याओंके नृत्य, छत्र, चमर, तोरण, विविध प्रकारकी पुष्पवर्षा, नाना प्रकारके स्तोत्रपाठ, तरह-तरहके सुगन्धित

६६२आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

वारस्त्रीणां नृत्यगीतैश्छत्रचामरदर्पणैः । नानाकुसुमवर्षाद्यैर्नानास्तोत्रादिपाठतः ॥८॥
नानापरिमलद्रव्याञ्जलीनां मोचनादिभिः । नानामांगल्यवस्तूनामञ्जलीभिः सुशोभनैः ॥९॥
नानाकुसुमगन्धानां तैलानां च परस्परम् । सेचनैश्च वारनार्यश्च जलयन्त्रैः करे धृतैः ॥१०॥
मुहुर्मुहुः सिञ्चनाद्यैस्तथा वाजां सुगायनैः । द्विजानां वेदघोषैश्च धूपैर्नीराजनदिभिः ॥११॥
सहकाराराममध्ये नीत्वैवं परमोत्सवः । सहकारवृक्षबद्धदोलके तं निवेशयेत् ॥१२॥
नागेन वा पुष्पकेण शेषयानेन दन्तिना । रथेन गरुडेनापि तथा सिंहासनेन च ॥१३॥
तथा शिविकया वापि वायुपुत्रेण वा तथा । रामं सर्वोत्सवैर्नित्यं सदा नेयो रघूत्तमः ॥१४॥
आम्रवृक्षाराममध्ये वल्लीपुष्पवनाश्रिते । अवनिं चन्दनैर्लिप्त्वा विकीर्य कुसुमानि च ॥१५॥
आच्छाद्य नानावस्त्रैश्च शोभनायाऽऽलिभिः शुभां । हेमसिंहासनंश्चैव कृत्वा दोलकमुत्तमम् ॥१६॥
चूतवृक्षस्य शाखायां तं बद्ध्वा शृङ्खलादिभिः । तत्र श्रीरामतो भद्रे रामचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥१७॥
नानाविधैर्भिः पुष्पैः षोडशोपचारकैः । भार्यया भ्रातृभिः पश्चात्सुग्रीवाद्यैः समान्वितम् ॥१८॥
आंदोलयेद्दोलकं तं शिशुबालकवच्छनैः । नर्त्तयित्वा वारयोषित्सदाऽग्रे शनकैर्मुदा ॥१९॥
गायनीया गायकांश्च नर्त्तयित्वा नटांस्तथा । वादनीयानि वाद्यानि ज्वालनीयाः सुधूपकाः ॥२०॥
वीजनीयाश्चामराद्यैः सीतया रघुनन्दनः । नटैश्च कीर्तनांश्चैव कारयित्वा महोत्सवैः ॥२१॥
पुनः पूज्य पूर्ववच्च समानीतो गृहं प्रति । मङ्गलनीयः श्रीरामः कुमदारार्णिकदादिभिः ॥२२॥
एवं नित्यं सार्धमासद्वयं रामं प्रपूजयन् । चूतवृक्षतले नीत्वा पूजयेच्च सविस्तरम् ॥२३॥
यदा रामश्च सीता च वहिर्नेया निजगृहात् । तदा तयार्नयनाधः कस्तूर्यांगुलिनाऽसिताः ॥२४॥
देयाश्च बिंदवो यस्मात्पग्दुर्दृष्टिनोभनाः । एवं दोलापूजनं च शिष्य ते कथितं मया ॥२५॥
विशेषं शृणु तत्रापि कथ्यते यो मयाऽधुना । वसंतपूजनात्पूर्वदिवसे गणनायकम् ॥२६॥
माघशुक्लचतुर्थ्या हि पूजयेद्विघ्ननाशनम् । माघशुक्लचतुर्थ्यां तु नक्तव्रतपरायणः ॥२७॥


द्रव्योंका अंजलीदान, विविध प्रकारक पुष्पोंकी वर्षा, रंग से परस्पर वेश्याओंके पिचकारी छोड़ने, स्त्रियोंके सुन्दर गायन, ब्राह्मणोंके वेदघोष, धूप नीराजन आदि करता हुआ आम्रके बगीचाम ले जाय और वहां भगवान्को आम्रवृक्षमें पड़े हिंडोलेपर बिठावे ॥ ८-१२ ॥ हाथी से, पुष्पकसे, शेषकी सवारीसे, घोड़ेसे, रथसे, गरुडसे, सिंहासनसे, शिविका द्वारा तथा वायुपुत्र द्वारा इन सब सवारियोंपर रामको ले जाना चाहिए ॥ १३ ॥ १४ ॥ आम्रवृक्षके बगीचे जिसमें कि वल्लरियों तथा पुष्पोंके वृक्ष लग हों, पृथ्वीको चन्दनसे लीपकर फूल बिखरे । १५ ॥ नाना प्रकारके वस्त्रोंसे ढंककर उस पृथ्वाको श्रृंगार करे । सुवर्णका सिंहासन बनाकर श्रृंखला आदि-के द्वारा आमके वृक्षमें झूला डालकर रामको बिठावे और सर्वतोभद्र बनाकर उनकी पूजा करे ॥ १६ ॥ १७ ॥ तदनन्तर विविध तथा नौ प्रकारके फूलों एवं षोडश उपचारोंसे सीता, बन्धु तथा सुग्रीव आदि मित्रोंके साथ भगवान्का पूजन करके बच्चोंकी तरह उस झूलेको धीरे-धीरे रस्सी खींचकर झुलाये । उनके आगे सैकड़ों वेश्यायें नचायें, गायकोंसे गाने गवाये, नटोंसे नृत्य करायें, विविध प्रकारके बाजे बजवाये और नाना प्रकारके धूपदीप आदि जलाये ॥ १८-२० ॥ सीता तथा रामपर चमर आदि ढाँके और रामभक्तोंको बुलाकर कीर्तन आदि कराये ॥ २१ ॥ इसके बाद पूर्वोक्त विधिके अनुसार फिर पूजन करके रामचन्द्रजीको घरपर ले आये । घर पहुंचनेके बाद भी कलश, दीप तथा आरती आदिसे रामकी पूजा करे ॥ २२ ॥ इस तरह प्रतिदिन ढाई महीने तक आम्रवृक्षके नीचे भगवान् रामका पूजन करे ॥ २३ ॥ जब राम और सीताको घरसे बाहर जाना हो तो उनकी आंखोके नीचे कस्तूरीकी काली बिन्दी लगा दे ॥ २४ ॥ इसको लगानेसे लोगोंकी दुर्दृष्टि उनपर नहीं पड़ेगी । हे शिष्य ! इस प्रकार मैंने तुम्हें दोलापूजनका प्रकार बतलाया । २५ ॥ इसमें भी जो

सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् १६१


ये ढुंढिं पूजयिष्यन्ति तेऽर्च्याः स्युःसुरपुंगवन्। माधवाग्रे चतुर्थी तु तस्मिन्काल उपोषितः ॥२८॥
अर्चयित्वा विघ्नराजं यात्रां तत्र कारयेत्। चतुर्थी कुन्दनाम्नीयं कुन्दपुष्पैः प्रपूजयेत् ॥२९॥
माघशुक्लपंचमी सा ज्ञेया धीवरैर्परा शुभा । तस्यां तीर्थं रघुनाथमर्चयेद् गंधचंदनैः ॥३०॥
माघशुक्लचतुर्थ्यां तु वरमागत्य च श्रिया । पञ्चम्यां कुन्दकुसुमैः पूजां कुर्यात्ससृद्धये ॥३१॥
नीत्वा रामं चूतवृक्षमूले दोलस्थमीश्वरम्। सीतारामं पूजये च गेहे चाऽथ प्रपूजयेत् ॥३२॥
प्रवृत्ते मधुमासे तु प्रतिपद्दिने रवौ। कृत्वा चावश्यकार्याणि संतर्प्य पितृदेवताः ॥३३॥
वंदयेद्दोलिकाभूमिं... भूरिद्रुतोपशांतये यदिच्छसि सुखेंद्रेण बहुधा सुकृतेन च ॥३४॥
अतस्त्वं पाहि मां देवि भूते भूतिप्रदा भव। चैत्र मसि महापुण्य पुण्ये तु प्रतिपद्दिने ॥३५॥
यस्तत्र श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानं कुर्यान्नरोत्तमः। न तस्य दुरितं किंचिन्नाधयोव्याधयो नृप ॥३६॥
वृत्ते तुषारसमये सितपञ्चदश्याः प्रातर्वसन्तसमये मधुप्रारंभने च ।
प्राश्याय चूतकुसुमं सह चंदनेन नित्यं हि विप्रपुरुषोऽथ समाः सुखी स्यात् ॥३७॥
चूतमग्रं वसंतस्य माकरं कुसुमं नवं मन्मदनं विवृण्वन् सर्वकामार्थसिद्धये ॥३८॥
पञ्चम्यां माधवस्यापि चूतपुष्पं सचन्दनम् प्राशयेन्नरोऽपि वा गलकंठो भविष्यति ॥३९॥
चूतपुष्पप्राशनेन कोकिलास्वादवन्म्रुदुः भविष्यति मानवानां कलकंठो मनोरमः ॥४०॥
सीताराम मधूपूवैस्तथा कोमलपल्लवैः पूजयेत्त्वन्वहं भक्त्या दोलोत्सव महोत्सवैः ॥४१॥
चैत्रकृष्णप्रतिपदि चूतपुष्पं सचन्दनम् पीत्वा मनोरमं ज्ञेयं सीतारामं प्रपूजयन् ॥४२॥


विशेष बात है, उन्हें बतला रहा हूं। वसन्तऋतु में एक दिन आकर गणेशजीका पूजन करे ॥२५॥२६॥ माघशुक्ल चतुर्थीको गणपति का पूजन तथा उपवास करना चाहिये। ... ... ... अन्न और गणपतिको पूजन करता है, वह प्राणी देवताओं तथा असुरोंका भी पूज्य होता है ॥२७॥२८॥ शास्त्रोंका विधि है कि माघशुक्ल की चतुर्थीको उपवास करके गणेशजी का पूजन और ... ... करना चाहिये। इसका नाम 'कुन्द चतुर्थी' है। इसलिये इस दिन कुन्दके पुष्पसे गणेशजीका पूजन करना चाहिये ॥२९॥ माघशुक्लकी पञ्चमीको 'श्रीयञ्चमी' समझकर उस रोज रामचन्द्रजीका श्वेत चन्दन करना चाहिए। इससे यह मतलब निकला कि माघ शुक्ल चतुर्थीको श्रीसे पूजन करके पञ्चमीको कुन्दके फूलसे अपनी समृद्धिके लिये पूजन करे ॥३०॥३१॥ विशेष अच्छा तो यह हो कि रामचन्द्रजीको आम्रवृक्षके नीचे ले जाय और झूलेमें बिठाकर पूजन करे। यदि ऐसा न कर सके तो घर ही में पूजन कर ले ॥३२॥ चैत्रमास लगते ही प्रतिपदाको सूर्योदयके समय आवश्यक कामोसे निपटकर पितरोंका तर्पण करे और सब प्रकारके दुःखोंकी शान्तिके निमित्त होलिकाभूमिकी वन्दना करना चाहिये। हे देवि ! ब्रह्मा तथा विष्णुजीने आपकी वन्दना की है॥३३॥३४॥ अतएव हे देवि ! तुम मेरे लिये भी विभूतिदात्री बन जाओ। परम पवित्र चैत्रके महीने में पुण्य नक्षत्र और प्रतिपदाको जो मनुष्य श्वपच (चाण्डाल) को छूकर स्नान करता है, उसे न किसी प्रकारका पातक लगता है और न किसी प्रकारके आधि व्याधि ही सताती है ॥३५॥३६॥ जाड़ेके दिन बीत जाने और बसन्त ऋतुके अन्दर वसन्तपञ्चमीके पूर्णिमाको प्रातःकाल चन्दनके साथ आमका बौर चटे तो हे विप्र ! वह प्राणी साल भर बहुत सुखमें रहता है ॥३७॥ बौरको चाटते समय 'चूतमग्रं वसन्तस्य' यह मन्त्र पढ़ना जाय, जिसका मतलब होता है कि हे सहकार वृक्ष ! मैं वसन्तऋतुके अग्रिम भागमें तुम्हारा फूल चन्दनके साथ इस वास्ते चाट रहा हूं कि मेरी सब अभिलषित कामनायें पूर्ण हो जायें ॥३८॥ माधवमासकी बसन्ती पञ्चमीको भी चन्दनके साथ बौर चाटना चाहिये। ऐसा करनेसे उसका स्वर कोकिलके समान मीठा हो जाता है ॥३९॥ उस दिन आम्रपुष्पका प्राशन करनेसे प्रत्येक मनुष्यका स्वर कोयलके स्वरकी तरह मीठा हो सकता है ॥४०॥ प्रतिदिन नूतन म्रुग अथवा वस्त्रको झूलेमें बिछाकर बादामके बौर तथा कोमल पल्लवोंसे सीतासह पूजन करे ॥४१॥ चैत्रकृष्णाकी प्रतिपदाको चन्दनके साथ आम्रका

६६४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ९

एवं त्रयश्च दिनं नीत्वा ततश्चैवोपरिष्टात् । ततोऽप्यायुर्विवृद्ध्यर्थं दीनानां चैव दत्तः परम् ॥४३॥ पञ्चम्यन्तं चोपरिष्टादपि श्रीराघवार्चनम् । स्नात्वा केशालवालैस्तु कस्तूर्याद्यैः सुभावितैः ॥४४॥ विचित्रवस्त्रं च परिधाय गन्धादिना सुशोभनम् । ततोऽप्यायुर्विवृद्ध्यर्थं नृपतिर्वस्त्राणि ॥४५॥ जनस्यै रामचन्द्राय दत्त्वा परिधाय पुनः । केव दत्त्वा गजैश्च वासांसि विचित्रानि हि ॥४६॥ दत्त्वा राजाय सीतायै ततो गच्छन् नृपोटजे । सर्वमङ्गलपूर्वेण नानामङ्गलपूर्वकम् ॥४७॥ नानादानानि देयानि स्वशक्त्या च प्रयत्नतः । नानारङ्गाणि संहृत्य गृहीत्वा च परस्परम् ॥४८॥ एकोऽपि विचित्राणि भक्ष्यपेयानि खादयेत् । मित्रादिभिर्युतोऽद्यान् स्वयं वापि मुहुर्मुहुः ॥४९॥ आक्रव्य तु वसन्तौ पञ्चम्यां मानवैरित्थं मुदान् । वसन्तपञ्चमी नाम्नी महापुण्यात्मिका स्मृता ॥५०॥ पक्षे पक्षे तु पञ्चम्यामर्चयेत् माधवमन्दिरे । एवं गमं पञ्चमेव यावद्वैशाखपञ्चमी ॥५१॥ विशेषेण नावर्च्चां के पक्षे दक्षे प्रपूजयेत् । अथवा पादशुक्लायां कृष्णायां चैत्रमासि वै ॥५२॥ कृष्णायां माधवे चापि पञ्चम्यन्तं प्रपूजयेत् । महोत्सवेन श्रीरामं दोलास्थोऽपि स्थितस्ततः ॥५३॥ ततश्चैव शुक्लपक्षे प्रतिपदि मधोर्नराः । तैलाभ्यङ्गं स्वयं कृत्वा रामस्याप्युद्वर्तनं चरेत् ॥५४॥ पञ्चम्यन्तमेतच्च न यावत्स्यान्नवमी तिथिः । उत्तमाङ्गं न तैलेन मर्दयेन्नरो नरकं व्रजेत् ॥५५॥ तैनाभ्यङ्गमकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते । अथ नैऋतकोणे नामि प्रदे चैत्रे महोत्सवे ॥५६॥ पुण्येऽह्नि विप्रकथिते प्रपादानं समारभेत् । ततस्तु सर्वप्राण्यर्थं प्रपादानं समाचरेत् ॥५७॥ अरण्ये निर्जले देशे पथि ग्रामेऽथवा गृहात् । ततस्तैर्नामान्याहूतैः प्रपादानं समाचरेत् ॥५८॥ अस्याः प्रदानात्पितरस्तृप्यन्तु हि पितृभिः सह । ततो मासद्वयं देयं जलं मासचतुष्टयम् ॥५९॥ देवालयेषु विप्रार्थं देयं स्याच्छयनासनेति । पङ्के दानुशक्तेन विशेषान्मधर्ममीप्सुता ॥६०॥

और फांकर सीताजीका पूजा करना चाहिये। ... ३ दिन तथा आगेवाले तीन दिन बिताकर आगेवाले तीन दिन विविध प्रकारके दान-पुण्य करना चाहिये। तदनन्तर केशक्षालन वस्तुओंको मांगलिक सौभाग्याद्रव्योंके साथ स्नान करके कस्तूरी चन्दन लगाकर तरह-तरहके कपडे पहने और नाना प्रकारके बाजोंके साथ सुगन्धि रस अभिलाषापूर्वक भगवान् का विधिवत्पूर्वक सर्वस्नान कराके चित्र-विचित्र वस्त्र पहनाये। इसके अनन्तर वसन्तके फूलोंसे विधिवत् पूजन करे और अपने कल्याणके निमित्त नाना प्रकारके दान दे। इसके अनन्तर नाना प्रकारके गन्धित द्रव्योंसहित जलोंको लेकर लोग परस्पर एक दूसरेपर छोड़े। अच्छे-अच्छे पदार्थ खाए और भोजन करावे तथा अपने मित्रोंके साथ भोजन करें ॥ ४३-४९ ॥ यह वसन्त पञ्चमी बड़ी पवित्र तिथि कही है। इसलिये सबको चाहिए कि इस रोज अच्छे-अच्छे पदार्थ बनाकर स्वयं खायँ और अपने सगे-सम्बन्धियों को भी खिलावें ॥ ५० ॥ इस तरह माघ मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमीसे लेकर सितपञ्चमी पर्यन्त पूजा करनी चाहिये ॥ ५१ ॥ विशेषकर प्रत्येक पक्षकी नवमीको पूजन करे अथवा माघके शुक्लपक्षसे लेकर कृष्णपक्ष और वैशाखकी भी कृष्णपक्षकी रामचन्द्रजीको पालनेमें बैठाकर भक्तिपूर्वक और उत्साहके साथ पूजन करे ॥ ५२ । ५३ । इसके बाद चैत्र शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको स्वयं अपने शरीरमें उबटन लगाये ॥ ५४ ॥ इस तरह नौ रात्रि पर्यन्त अर्थात् जबतक नवमी तिथि न आये, तबतक संवत्सरके अष्टम दिन भी कभी तैल-उबटन नहीं लगाना, वह नरकगामी होता है। फाल्गुनमासकी समाप्ति और चैत्रमासके प्रारम्भके किसी पवित्र दिन अथवा ब्राह्मण जो दिन बतला दे उस रोजसे पौशालह बैठाकर जलदान प्रारम्भ करे। विद्वान् मनुष्योंको चाहिए कि प्रपादानके प्रारम्भमें 'अरण्ये प्रान्तर' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण कर लिया करे ॥ ५५-५७ ॥ अरण्य, निर्जल प्रदेश, रास्ता अथवा ग्राममें सर्वसाधारणके लिए इस पौसलेकी स्थापना कर रहा हूँ। इसके दानसे मेरे पिता-पितामह आदि पितर तृप्त हों। इस प्रकार उसकी स्थापना करके चार महीने तक निरन्तर जलदान करे ॥ ५८ । ५९ । यदि कोई प्राणी प्रपादानका पुण्य प्राप्त करना चाहता हो और उसमें दान करनेकी सामर्थ्य न हो तो उसे चाहिए वह शिवालयमें जिनसिलापर

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६१५

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६१५

प्रत्यहं धर्मघटको वस्त्रसंवेष्टिताननः । ब्राह्मणस्य गृहे देयः शीतलामलजलः शुचिः ॥६१॥ ताम्बूलफलवान्द्रव्यैश्च दक्षिणाभिः समन्वितः । एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ॥६२॥ अस्य प्रदानात्सफलाः सर्वे सन्तु मनोरथाः । अनेन विधिना यस्तु धर्मकुम्भं प्रयच्छति ॥६३॥ गयादानफलं सोऽपि प्राप्नोर्नाह न संशयः । तृतीयायां चैत्रशुक्ले सीतारामौ प्रपूजयेत् ॥६४॥ कुंकुमागुरुकर्पूरमणिवस्त्रसुगन्धकैः । स्रग्गंधैर्धूपदीपैश्च दमनेन विशेषतः ॥६५॥ आदोलयेत्ततः सीतारामौ च दोलकस्थितौ । वसन्तमभ्यासाद्य तृतीयायां द्विजोत्तम ॥६६॥ सौभाग्याय तथा स्त्रीभिः सौभाग्यशयनव्रतम् । कार्यं महोत्सवेनैव सुख पुत्रसुखेप्सुभिः ॥६७॥ विशेष चात्र वक्ष्यामि तृतीयायां द्विजोत्तम । तृतीयायां तु नारीभिः शुक्लपक्षे मधौ शुभे ॥६८॥ स्नात्वा मृण्मयदुर्गं हि कार्यं चित्रविचित्रितम् । तत्राष्टादश धान्यानि वापयेत्तदनन्तरम् ॥६९॥ पुष्पवृक्षांस्तृभांश्चैव वापयेत्सर्वतस्ततः । जयन्त्राणि ह्यपाराणि चित्राण्यपि विलेखयेत् । ७०॥ तूर्वद्द्वाराणि कार्याणि पूर्ववन्मण्डपादिकम् । यथा श्रागमपूजायामुक्तं तद्वत्प्रकारयेत् ॥७१॥ दुर्गोपरि घटं स्थाप्य सजलं पुष्पगन्धितम् । दोलकं च ततो न्यस्य घटपृष्ठे महच्छुभम् ।७२॥ कार्या राजती मूर्तिः सीतायाः परिकल्प्य च । रामस्यापि शुभां मूर्तिं कृत्वा तौ पूजयेत्ततः । ७३॥ दोलकोपरि संस्थाप्य मासमेकं प्रपूजयेत् । केचिच्छिवस्य पार्वत्या शिवेन च प्रपूजनम् ॥७४॥ वदन्ति ह्यत्रयस्तत्र निर्णयं शृणु वक्ष्यते । रामस्य हृदयं शंभुः श्रीरामो हृदयं स्मृतः ॥७५॥ शंकरस्य तथा गौरीहृदयं जानकी स्मृता । जानक्या हृदयं गौरी द्विधा नैवास्ति कर्हिचित् ।७६॥ रामस्य च शिवस्यापि सीतागिरिजयोस्तथा । ये मानयति वै भेदं तेषां वासस्तु रौरवे ॥७७॥ अतश्चैत्रतृतीयायां सीतारामौ प्रपूजयेत् । अशक्तौ ताम्रजे मूर्ती कार्ये वा काष्ठनिर्मिते । ७८॥


घड़ा बाँधकर जलधारा देनेका प्रबन्ध करे ॥ ६० ॥ उन दिनों प्रतिदिन एक घड़ेमे ठण्डा और निर्मल जल भरके उसका मुंह कपड़ेके बाँधकर ताम्बूल, फल, द्रव्य तथा दक्षिणा आदिके साथ किसी सुपात्र ब्राह्मणके घर दे आया करे। यह कहा। 'विष्णुशिवमयं घटदान करमम मेद सब मनोरथ सफल हो जायें। दान करते समय यह कहना नाय । जा प्राणी इस रीतिम धर्मकुम्भका दान करता है, उस गयादानका फल प्राप्त होता है। इसमे कुछ संशय नहीं है ॥ ६१-६४ ॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीयाको कुमकुम, अगरु, कर्पूर, मणि, वस्त्र तथा सुगन्धित मालाश्री विशेषकर दमनकक फूलसे सातरामका पूजन करे ॥ ६५.। इसके बाद झूलेपर बिठाल-कर झूला झुलावे। जिनका पुत्रसुख आदि पाना हो, व स्त्रियां वसन्तमासमे लेकर तृतीया तक एक महात् उत्सवके साथ सौभाग्यशयन व्रत करे ॥ ६६ ॥ तृतीयाम कुछ विशेषतायें है, सो तुम्हे बतलाता हूँ। उस चंतशुक्लकी तृतीयाको स्नान करक मिट्टीका एक चित्र-विचित्र दुर्ग बनावे । उसम अट्ठारह प्रकारके धान्य बोये। वहींपर अच्छे-अच्छे फूलोंके वृक्ष लगाय और उसम नाना प्रकारके उपयन्त्रोंकी रचना करे । ६७-७० ॥ उस दुर्गमें पहलेकी तरह मण्डप आदि बनाये। जैसा कि पहले श्रीरामपूजाके प्रकरणम बतला आये हैं ॥ ७१ । उस दुर्गके ऊपर जलसे पूर्ण और पुष्पसे गुम्फित घटका स्थापन करे। घटके पाछे झूला रखकर सुवर्ण या चांदो-की सीताजीको मूर्ति बनवाये और रामचन्द्रजीकी भी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर दोनोंकी पूजा करे। इस प्रकार झूलेपर बिठालकर एक मास तक पूजन करे । हे शिष्य पार्वताजीके साथ शिवजीकी पूजा करे, कुछ लोग ऐसा कहते हैं। अब इस विषयका निर्णय मुझसे सुनता हूँ। रामचन्द्रजी शिवजीके हृदय है और शिवजी राम-के हृदय है ॥ ७२-७५ ॥ उसी तरह गौरी सीताजीका हृदय है और सीताजी गौरीका हृदय हैं। इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ७६ ॥ राम, शिव और सीता तथा गिरिजामे जो लोग किसी प्रकारका भेदभाव मानते हैं, वे रौरव नरकमें बास करते हैं ॥ ७७ ॥ इसीलिये चैत्रकी तृतीयाको सीतारामका पूजन करना चाहिए । यदि सामर्थ्य न हो तो सुवर्ण या चाँदीकी प्रतिमा न बनवाकर ताम्र अथवा काष्ठकी बनवाये ॥ ७८ ॥

३६६आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

पाषाणनिर्मिते चापि मूर्तौ कार्यं यथामुखम् । प्रत्यहं मङ्गलद्रव्यैः सर्वैस्त्रीभिः प्रपूजनम् ॥७९॥
मासमेकं तु नारीभिः स्नानं वै शीतलाभिधम् । अवश्यमेव कर्तव्यं सीतातीर्थे विशेषतः ॥८०॥
यत्र यत्र रामतीर्थं तस्य वामेऽवनिस्तले सीतातीर्थं तत्र तत्र ज्ञेयं सीताकृतं शुभम् ॥८१॥
चैत्रशुक्लतृतीयायामारभ्य सम्यगङ्गना । यावत्तृतीया वैशाखशुक्ला तावन्निरन्तरम् ॥८२॥
शीतलामन्त्रक स्नानं स्त्रीभिः सीताप्रेमचरेत् चैत्रशुक्लतृतीयायामक्षयायां तथापि च ।८३।
तृतीयायां तु नारीभिस्स्नानस्य प्रशस्तस्तत् अन्यत्र दिवसे स्त्रीभिस्स्नानौघं न शस्यते ।८४।
प्रत्यहं चोत्सवाः कार्याः सीतातार्थे पुनः शुभैः सुवासिनीपूजनं च कार्यं भक्त्या दिने दिने । ८५ ।
सुवासिनीनां देयानि वायनानि शुभानि च । निरन्तर पूजनाथै यदि शक्तिर्न विद्यते ८६
तदा कार्यं चैकदिने सुभगार्ना प्रपूजनम् । सुवासिनीनां देयं हि प्रत्यहं भोजनं परम् ॥८७
नानापक्वान्नसंयुक्तं घृतपायससंयुतम् अलङ्कारश्च वस्त्राणि रुच्यर्थादि च यत्सुखम् ॥८८
भर्तुरायुरभिवृद्ध्यर्थं नारीभिर्देयमुत्तमम् । एवं मासन्तु यान्यास्ते शीतलास्नानमुत्तमम् ॥८९
अक्षयायां तृतीयायां पूजयित्वा विशेषतः त्रिंशत्सुवासिनीभ्यश्च दद्याद्भोजनादिकम् ९०॥
सुरुपन्नि निजां पूज्य दत्त्वे वस्त्रं विमर्जनम् एष मासो वरः प्रोक्तः प्रशस्तश्च द्विजोत्तम । ९१।
अन्वीदृक्षं च तत्सर्वं मयाग्रे शृणु चेतसम् । अथातः कुल कामिस्तु चैत्रशुक्लष्टमीदिने ९२।
सीतारामा प्रजार्यन्त्वा महासंतपतारकम् अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबंति पुनर्वभौ ॥९३।
चैत्रे मासि सिताष्टम्यां न ते शोकमवाप्नुयुः । त्वामशोककराभीष्टं मधुमाससमुद्भवम् ९४।
पिबामि शोकमंदमो मामशोकं सदा कुरु। पुनर्वसुयुधोपेता चैत्र मासि मिताष्टमीम् ॥९५॥

आवश्यकता पड़नेपर पत्थरकी प्रतिमा बनवाया जा सकता है । उस तरह मूर्ति बनाकर गुप्तपूर्वक विचित्र मङ्गलमय द्रव्योंसे स्त्रियोंके साथ पूजन करे ॥७९॥ एक महीना स्त्रियोंके साथ शीतला नामक स्नान करे । और माहात्म्यीय जानकर स्नान करे तो विशेष अच्छा है ॥८०॥ जहाँ जहाँ रामतीर्थ है वहाँ-वहाँके रामके वामभागमें सीताका स्थान सनातन से ही विद्यमान रहता है ॥८१॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया-से लेकर जबतक वैशाखका अक्षय तृतीया न आये, तबतक निरन्तर सीतातीर्थमें जाकर शीतलास्नान करे ॥८२॥ स्त्रियोंको चाहिये कि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिए स्नान करे । चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया तथा अक्षय तृतीयाको स्त्रियोंको नाके स्नानका नेमधारण करना चाहिए । इसके सिवाय और किसी रोज स्त्रियोंके साथ बैठके स्नानका विधान नहीं है ॥८३ ॥८४॥ प्रतिदिन स्नानके साथ-साथ सीताके स्तुति तरह-तरहके उत्सव करना चाहिए । नित्य भक्तिपूर्वक स्त्रियोंका पूजन करना भी श्रेयस्कर है ॥८५॥ सुहागिन स्त्रियोंको इन दिनोंमें वायना देना भी उचित है । यदि निरन्तर पूजन करनेकी सामर्थ्य न हो तो केवल एक ही दिन सोहागिन स्त्रियोंका पूजन करे और बहु विविध पक्वान्न युक्त अच्छा-अच्छा भोजन कराये ॥८६॥८७॥ नाना प्रकारके वस्त्र आभूषण आदि भी वे स्त्रियाँ अवश्य दिना करें, जो अपने पतिकी आयुवृद्धि करना चाहती हों । इस तरह एक महीना शीतलास्नान करनेके बाद अक्षय तृतीयाको विशेष रीतिसे पूजन करके तीस सुहागिन स्त्रियोंको नाना प्रकारके भोजन अन्य आदि दे ॥८८-९०॥ इसके बाद अपने गुरुकी पत्नीका पूजन करके उसे भी वस्त्र-आभूषण आदि प्रदान करे । हे द्विजोत्तम ! इस तरह मैंने तुम्ह स्त्रियोंके लिए एक मासका व्रत बतलाया । ९१॥ अब मैं कुछ विशेष बातें बतलाता हूँ, सो सुनो। चैत्रशुक्ल अष्टमीको अशोककी कलियोंसे सीता और रामका पूजन करके जो लोग आठ अशोककी कली पीसकर पुनर्वसु नामक नक्षत्रमें पीते हैं, उन्हें कभी किसी प्रकारका शोक नहीं करना पड़ता । उस कलीका पान करते समय "त्वामशोककराभीष्ट" इस मन्त्रका पाठ करते रहना चाहिए । मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है- हे अशोक ! तुम्हारा जैसा नाम है, उसी प्रकार तुम लोगोंको शोकरहित भी करते हो । इसी कारण चैत्रमासमें उत्पन्न तुम्हारी कलिकाका मैं पी रहा हूँ। तुम मुझे सदा शोकरहित किये रहना । जो लोग पुनर्वसु नक्षत्र तथा

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६६७

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६६७

प्रातस्तु विधिवन्स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् । चैत्रे नवम्यां प्राक्पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ ॥९६॥ उद्गते गुरुगौरांशोः स्वोच्चस्थे ग्रहपंचके । मेषे पूषणि संप्राप्ते लग्ने कर्कटकाह्वये ॥९७॥ आविरासीन्महाविष्णुः कौसल्यायां परः पुमान् । तस्मिन्दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतं नरैः ॥९८॥ तत्र जागरणं कुर्याद्रघुनाथपुरे जनैः । चैत्रशुद्धा तु नवमी पुनर्वसुयुता यदि ॥९९॥ सैवं मध्याह्नयोगेन महापुण्यतमा भवेत् । केवलापि प्रदोष्टव्या नवमीशब्दसंग्रहात् ॥१००॥ तस्मान्मध्याह्नयुक्ता सर्वैः कार्ये वै नवमीव्रतम् । श्रीरामनवमी प्रोक्ता कोटिसूर्यग्रहाधिका ॥१०१॥ उपोषशं जागरणं पितृनुद्दिश्य तर्पणम् । तस्मिन् दिने तु कर्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः ॥१०२॥ सर्वेषामप्ययं धर्मो भुक्तिमुक्तिफैकसाधनः । अपुत्रोऽपि पवित्रः कुन्वेदं व्रतमुत्तमम् ॥१०३॥ पूज्यः स्यात्सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः । यस्तु रामनवम्यां वै भुंक्ते मोहान् मूढधीः ॥१०४॥ कुंभीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः । अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वव्रतोत्तमम् ॥१०५॥ अन्यान्यव्रतानि कुरुते न तेषां फलभाग्भवेत् । आचार्यं चैव संपूज्य शृणुयात्प्रार्थयेन्निशि ॥१०६॥ श्रीरामप्रतिमादानं करिष्येऽहं द्विजोत्तम भक्त्या सर्वथा प्रीतो श्रीरामोऽस्तित्वमेव च ॥१०७॥ स्वगृहे चोत्तमे देशे दारुग्योऽज्ज्वलमंडपम् शंखचक्रहनुमद्भिः प्राग्द्वारे समलंकृतम् ॥१०८॥ गरुत्मच्छ ङ्गशार्ङ्गश्च दक्षिणे समलंकृतम् । गदाखड्गाद्यदंश्च पश्चिमे सुविभूषितम् ॥१०९॥ पद्मस्वस्तिकैर्लिंगैश्च कौवेरे समलंकृतम् मध्यमे ह्यनन्तपुष्पाणां वेदिकामुक्तमायतम् ॥११०॥ अष्टोत्तरसहस्रैश्च शालिग्रामक गुस्तैर् । अष्टपत्रं समालिख्य वेदिकायोगनुत्तमम् ॥१११॥ ततः संकल्पयेद्वै राममेव स्मरन् द्विज । अद्य रामनवम्यां च रामाराधनतत्परः ॥११२॥

युतप्रातः युक्त चैत्रशुक्लकी अष्टमीका व्रत करनेसे वाजपेय यज्ञका फल प्राप्त होता है। चैत्रशुक्लकी नवमीका जब कि पुनर्वसु नक्षत्र था उदित बृहस्पति तथा चन्द्रमाके साथ-साथ पाँच ग्रह उच्च स्थानमें बैठे थे, सूर्य मेष पर स्थित थे, कर्क लग्न थी, उस समय महाविष्णु भगवान् राम कौशल्यासे उत्पन्न हुए थे। इसलिए लोगोंको उस रोज उपवास करना चाहिए ॥९२-९०॥ अर्थात् उचित है कि इस तिथिको अयोध्यापुरमें जाकर रात्रिभर जागरण करे। चैत्रशुक्ला नवमी यदि पुनर्वसु नक्षत्रसे युक्त हो तो वह महापुण्यवती मानी जाती है । यदि मध्याह्न नक्षत्रीयुक्त नवमी न हो तो भी व्रत करना ही चाहिए क्योंकि सर्वत्र नवमी इस शब्दका ही संग्रह किया गया है, ९९ ॥ १००॥ इसलिए सब लोगोंको अच्छी तरह नवमीका व्रत करना चाहिए। यह रामनवमी कोटि सूर्यग्रहणसे भी अधिक पुण्यप्रद मानी जाती है ॥ १०१ ॥ जिन लोगोंको ब्रह्मप्राप्तिकी इच्छा हो, उन्हें चाहिए कि उस दिन उपवास, जागरण तथा पितरोंको तृप्त करनेके लिए तर्पण अवश्य करे ॥ १०२ ॥ क्योंकि सब लोगोंके लिए यह धर्म मुक्ति और मुक्तिका साधक है। यदि कोई मनुष्य अपवित्र या पापी हो तो इस व्रतको करनेसे वह उसी प्रकार सब प्राणियोंका पूज्य हो जाता है, जैसे रामचन्द्रजी स्वयं सबके आराध्यदेव हैं। जो मूढ़ रामनवमीको भोजन करता है ॥ १०३ ॥ १०४ ॥ वह बहुत समय तक कुम्भीपाक आदि घोर नरकोंमें पड़कर सड़ता है। सब उत्तम व्रत इस रामनवमीका व्रत न करके जो प्राणी और और व्रतोंको करता है, उस व्रतको करनेका फल नहीं मिलता। व्रतके दिन रात्रिको ब्राह्मणकी पूजा करके प्रार्थना करे — हे द्विजोत्तम ! आज मैं भक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीकी प्रतिमाका दान करूँगा। हे आचार्य ! आप मुझ ऊपर प्रसन्न हों ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ १०७ ॥ तदनन्तर अपने घरके किसी उत्तम स्थानपर बढ़िया मण्डप बनावे । उसके पूर्वद्वारपर शंख चक्र एवं हनुमज्जीको स्थापना करे । १०८ ॥ दक्षिण द्वारपर गरुड़ धनुष तथा बाणको स्थापित करे । उत्तर दिशामें कमल तथा स्वस्तिककी स्थापना करके उस अलंकृत करे । बीचमें चार हाथकी लम्बी-चौड़ी वेदी बनावे । वेदीपर अष्टोत्तरसहस्र शालिग्रामक रामचन्द्रकी रचना करे ॥ १०९-१११॥ इसके अनन्तर हे द्विज ! श्रीरामचन्द्रका स्मरण करता हुआ संकल्प करे कि इस रामनवमीको श्रीरामचन्द्रजीकी आराधनामें तत्पर

६६८आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

उपोष्याष्टसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि । इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां च प्रयत्नतः ॥११३॥
श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते । प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुवहूनि मे ॥११४॥
अनेकजन्मसम्विद्धान्यभ्यस्तानि मदोर्जितैः च ततः स्वर्णमयीं रामप्रतिमां पलमानतः ॥११५॥
निर्मितां द्विभुजां दिव्यां वामांकस्थितजानकीम् बिभ्रतीं दक्षिणकरे ज्ञानमुद्रां मनोरमाम् ॥११६॥
वामेनाधःकरेणाप्यर्हदेवीमालिङ्ग्य संस्थिताम् सिंहासने राजते च पलद्वयविनिर्मिते ॥११७॥
अशक्तो यो महानत्र स तु वित्तानुसारतः । पलेन वा तदर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः ॥११८॥
सौवर्णं राजतं वापि कारयेद्रघुनन्दनम् पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ धृतच्छत्रकराङ्कितौ ॥११९॥
चापद्वयसमायुक्तं लक्ष्मणं चापि कारयेत् मातुरङ्गगतं राममिन्द्रनीलसमप्रभम् ॥१२०॥
पञ्चामृतस्नानपूर्वं सम्पूज्य विधिवत्ततः अथांककुसुमैर्युक्तमर्घ्यं दद्याद्विचक्षणः ॥१२१॥
दशाननवधार्थाय धर्मसंस्थापनाय च । राक्षसानां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च ॥१२२॥
परित्राणाय साधूना जातो रामः स्वयं हरिः । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥१२३॥
इत्येवं विधिवत्कृत्वा रात्रौ जागरणं चरेत् ततः प्रातः समुत्थाय स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः ॥१२४॥
समाप्य विधिवद्रामं पूजयेद्विधिवत्सुने ततो होमं प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥१२५॥
पूर्वोक्तमण्डपे कुण्डे स्थण्डिले वा समाहितः लौकिकाग्नौ विधानेन शतमष्टात्तरं हुनेः ॥१२६॥
साज्येन पायसेनेव स्मरन् राममनन्यधीः । ततो भक्त्या सुसन्तोष्य ह्याचार्यं पूजयेद्द्विजः ॥१२७॥
ततो रामं स्मरन् दद्याद्देवं मन्त्रमुदीरयन् । इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलंकृताम् ॥१२८॥
चित्रवस्त्रयुगच्छन्नां रामोऽहं राघवाय ते श्रीरामप्रीतये दास्ये तुष्टो भवतु राघवः ॥१२९॥
इति दत्त्वा विधानेन दद्याद्वै दक्षिणां शुभाम् । ब्रह्महत्यादियापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥१३०॥


होकर मैं आठ पहरत क उपवास करके यह स्वर्णमयी प्रतिमा रामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये किसी बुद्धिमान् रामभक्तको दूंगा जिससे श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्न हों और मेरे उन महान् पापोंको हर लें, जो मैंने अनेक जन्मोंके अभ्यासवश किये हों । तदनन्तर एक पल सुवर्णकी बनी रामकी प्रतिमा, जिसमें दो भुजायें बनी हों, वाम-भागमें सीताजी और दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा विराजमान हो । ११३-११६ ॥ वे बायें हाथसे देवीका आलिङ्गन किये हों। पल चांदीकी बनी चौकीपर बैठे हों । ११७॥ जो प्राणी सर्वथा असमर्थ हों वह अपने वित्तानुसार एक पल, आधा पल अथवा आधेका भी आधा पल सुवर्ण या चाँदीकी प्रतिमा बनवाये । रामके पास ही छत्र और चमर लिये भरत तथा शत्रुघ्न खड़े हों और दो धनुष धारण किये लक्ष्मणजीकी प्रतिमा बनाये । मातुलुंग गोदीमें विराजमान इन्द्रनीलमणिकी प्रभाके समान प्रभावशाली रामको पंचामृतसे स्नान कराकर विधिवत् पूजन करे और बर्णांक पुष्पयुक्त अर्घ्य प्रदान करें । अर्घ्य देते समय 'दशाननवधार्थाय' आदि मंत्र पढ़ना जाय । जिसका अर्थ इस प्रकार है ॥ ११८-१२१ ॥ रावणको मारने, धर्मका स्थापन, राक्षसोंका विनाश और साधुओंकी रक्षाके लिए स्वयं विष्णु भगवान्‌ने अवतार लिया था । सब भ्राताओंके साथ आप मेरे इस अर्घ्यको स्वीकार करिए ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ यह सब विधि दिवाके दिनको करके रात्रिभर जागरण करे । सबेरे उठकर स्नान संध्या आदि क्रियायें करके विधिवत् पूजन करें। फिर मन्त्रको जाननेवाला यजमान हवनरूपी होम करे ॥ १२४, १२५ ॥ यह हवनविधि पूर्वोक्त मण्डपमें अथवा स्थण्डिल में किया जाय और लौकिक अग्निमे विधानपूर्वक एक सौ आठ आहुतियां खीर-घीसे दी जायें। इसका सामग्रीम घृत और खीरका रहना आवश्यक है । हवन करते समय अपने चित्तको इधर उधर न दौड़ाकर रामका स्मरण करना रहना चाहिए । १२६ ॥ १२७ ॥ तदनन्तर 'इमां स्वर्णमयी' इस मन्त्रका उच्चारण करता हुआ प्रतिज्ञा करे कि सब तरहसे अलंकृत यह सुवर्णमयी रामकी प्रतिमा श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्न करनेके हेतु मैं दान करूंगा । इससे श्रीरामजी प्रसन्न हों ॥ १२८ ॥ १२९ ॥ इस

सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् ६६९


एवं दत्त्वा चैत्रमासे नवम्यां भूसुराय हि । दानं देयं प्रयत्नेन रामसंतुष्टिहेतवे ॥१३१॥
अन्यद्विशेषं वक्ष्यामि चैत्रे मासि शृणुष्व तत् । चैत्रस्य शुक्लपक्षेऽथ दोलकर्म शृणूत्तमम् ॥१३२॥
पूजयेन्मारुतीं भक्त्या आम्रवृक्षतले स्थितम् । चैत्रमप्युभयशुक्लपामपेकादश्यां तु वैष्णवैः ॥१३३॥
आंदोलनीयो देवेशः सलक्ष्मीको महोत्सवैः । द्वाभ्यां चैत्रमासस्य शुक्लाभ्यां दमनोत्सवः ॥१३४॥
बोधायनादिभि प्रोक्तः कर्तव्यः प्रतिवत्सरम् ।
ऊर्जे व्रतं मधौ दोला श्रावणे तंतुसूत्रकम्, चैत्रे च दमनाख्यमङ्कुरार्पणं विवर्जयेत् ॥१३५॥
वह्निविरिंचो गिरिजा गणेशाः फणी विशाखो दिनकृन्महेशः ।
दुर्गाऽन्तको विधहरिः स्मरश्च शर्वः शशी वै तिथिषु प्रपूज्याः ॥१३६॥
अथ चैत्रपौर्णिमायां भक्त्या रामं प्रपूजयेत्

६७४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९ ]

निशायां च प्रकर्तव्यमधिरामनमुत्तमम् । शुचौ देशे मण्डपादि कृत्वा पूर्वोक्तवस्तुभिः ॥ १४५ ॥
रामलिंगान्तके भद्रे धान्यराशीं महत्तमम् । सजलं कलशं स्थाप्य ताम्रपात्रं तु तन्मुखे ॥ १४६ ॥
स्थाप्य वस्त्रं दोलक्स्थं रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । हैमी वाराजतो वापि दोलकाधिपतेः स्मृताः ॥ १४७ ॥
हैमीं पलमितां राममूर्तिः कार्या मनोरमा । तावन्मिता रौप्यमयीः सीतायाश्चापि कारयेत् ॥ १४८ ॥
नानोपचारैः संपूज्य रात्रौ जागरणं चरेत् । नृत्यगीतमंगलाद्यैः पुराणश्रवणादिभिः । १४९ ।
प्रभाते चं पुनः पूज्य रामं सीताराममन्त्रितम् । मष्टम हवनं कार्यं तिलाज्यपायसादिभिः । १५० ॥
तर्पणं राममंत्रेण क्षीरेणैव प्रकारयेत् । ततो गुरुं सपत्नीक संपूज्य वसनादिभिः ॥ १५१ ॥
रामाय प्रार्थयेद्भक्त्या प्रबद्धकरसम्पुटः । सार्द्धमामद्वयं राम वसन्ते तव पूजनम् ॥ १५२ ॥
दोलकस्थस्य जानक्या यथाशक्त्या मया कृतम् । प्रसादात्तेन श्रीराम मामुद्धर भवार्णवात् ॥ १५३ ॥
एवं संप्रार्थ्य श्रीराम ताम्रवीं मूर्त्तिमुत्तमाम् । दद्यान्नत्वागुरवे भक्त्या तं प्रणम्य पुनः पुनः ॥ १५४ ॥
पंचसप्तवियुग्मानि ह्यष्टविंशन्नितानि वा । तदर्द्धांन्यथवा भक्त्या भोजयेद्गुरुणा सुधीः ॥ १५५ ॥
हतः स्वञ्च सुतृन्मित्रैः कार्यं च भोजनं सुताम् । आंडोऽपि यथाशक्त्या वसंतेऽतु सदा ॥ १५६ ॥
करोतु रामतुष्ट्यर्थं वसंतपूजन वरम् । इदं शिष्य त्वया पृष्टं विशेषं च पूजनम् १५७ ॥
सीतारामस्य तत्सर्वं द आख्यातय ते मया ।
विष्णु उवाच
गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि यत्त्वं वद मतिमान् । १५८ ।
कया कामनया कस्य कार्यं पूजनमुत्तमम् । तन्मयं कथयस्तद्य मयि कृत्वा परां कृपाम् । १५९॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । ब्रह्मवर्चसकामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् । १६० ॥
इंद्रमिंद्रियकामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् । देवीं मार्ग तु श्रीकामस्तेजस्कामो विभावसुम् ॥ १६१ ॥


अथ एक द १ भारी धान्यराशिका स्थापन करके उसपर सजल कलश रक्खे और उसके मुखपर एक ताम्बेका पात्र धरें । फिर झूलपर कपड़ा बिछाकर रामजीको बैठावे और उनका पूजा करे वह झूला चाहे सोनेका अथवा चाँदी का हो सकता था । कमसे कम पलभर परिमाण प्रमाणवाली सोने की रामजीकी और उतनेही वजनके सोने अथवा चाँदीकी प्रतिमा भी बनाना चाहिये । १४५–१४८ ॥ इसके अनन्तर नानाप्रकारके उपचारोंसे पूजन करके रातभर जागरण और उस समय नाच गान आदि मंगलकार्य करे । १४९ । सबेरे फिर रामकी पूजा करके तिल, घृत तथा खीर मात्रसे विधिवत् हवन और राममन्त्रसे क्षीरद्वारा तर्पण करता हुआ पूजन समाप्त करे । तत्पश्चात् सपत्नीक गुरुको वस्त्रभूषण आदि देवे ॥ १५०-१५१ ॥ इसके बाद हाथ जोड़कर रामकी प्रार्थना करता हुआ कहे–हे राम ! मैंने बड़े सद्भावसे वसन्त ऋतुमें जानकीके साथ आपकी पूजा की है। मेरे इस कार्यसे आप प्रसन्न हों और भवसागरसे मेरा उद्धार करें ॥ १५२–१५३ ॥ इस तरह प्रार्थना करनेके अनन्तर प्रतिमा समेत वह पूजायोग्य अपने गुरुको दे दे और उन्हें बार बार प्रणाम करे ॥ १५४ ॥ इसके बाद डेढ़ सौ, अड़तालीस अथवा छब्बीस धार्मिक ब्राह्मणोंको इसमें अर्धसंख्यक ब्राह्मणोंको भोजन करावे । १५५ । इसके पश्चात् अपने सम्बन्धीवर्ग और मित्रोंके साथ-साथ स्वयं भी भोजन करे । कोई प्राणी यदि अशक्त हो तो उन अपनी शक्तिके अनुसार ही यह व्रत और वसन्तऋतुमें रामचन्द्रजीका पूजन करना चाहिए । हे शिष्य ! तुमने मुझसे रामकी पूजाके विषयमें जो प्रश्न किया था । सो मैंने दोलस्थ राम तथा साङ्ग पूजनके विषयकी सब बात कह सुनायी । विष्णुशर्मने कहा—हे गुरो ! मैं आपसे कुछ और पूछना चाहता हूँ । वह आप विस्तारपूर्वक हमें बतलाइए । यदि आप ऐसा करेंगे तो बड़ी कृपा होगी । दया करके आप हमें यह बतलाइए कि किस कामनासे किस देवताका पूजन करना चाहिए ?–१५९ ॥ श्रीरामदासने कहा–हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । सावधान मनसे सुनो । ही अपना ब्रह्मतेज बढ़ाना हो, उसे ब्रह्मणस्पतिका पूजन करना चाहिए ॥ १६० ॥ इन्द्रियकी कोई

सर्गः ९ ]

सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् ६७१


वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्यकामोऽथ वीर्यवान् । अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान् ॥१६२॥
विद्वान् वेदान् राज्यकामः साध्यान्मंत्रांश्च विश्रुतम् ।
आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम इलां यजेत् ॥१६३॥
प्रतिष्ठाकामः पुरुषो रोदसी लोकमातरौ । रूपाभिकामो गंधर्वांस्त्रीं कामोऽप्सर उद्भिताम् ॥१६४॥
आधिपत्यकामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् । यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् ॥१६५॥
विद्याकामस्तु गिरिशं दांपत्यार्थमुमां सतीम् । धर्मार्थं उत्तमश्लोकं तंतुं तन्वन पितॄन् यजेत् ॥१६६॥
रक्षार्थामः पुण्यजनांस्तेजस्कामो मरुद्गणान् राज्यकामो मनून्देवान् निर्ऋतिं त्वभिचर्यजेत् ॥१६७॥
कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् । अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ॥१६८॥
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत रघुनन्दनम् । रामेण सदृशो देवो न भूतो न भविष्यति ॥१६९॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । तस्याद्यवर्णसामर्थ्याद्यद्वस्तुचव रादिकम् ॥१७०॥
परं श्रेष्ठतमञ्चात्र विस्तारेण वदाम्यहम् । रुक्मं रत्नं रथो रामा रक्षसो रजतं रजः ॥१७१॥
रक्षा रणो रमा रक्तं रजको रागरामठौ, राजं रोगो रवि रात्री राज्यं रजस्वला तथा । १७२।
एवमादीन्यनेकानि श्रेष्ठान्येवात्र भो द्विज । रुक्मं पीतं महार्हं च रत्नं रम्यं सुदुर्लभम् ॥१७३॥
रथो यानं श्रेष्ठेषु च रामा यस्या इदं जगत् । राक्षसो देवत्रस्तो रजतं तन्मुदुर्लभम् ॥१७४॥
रजः साक्षात्परमाणुर्नित्यः सोऽत्र प्रकीर्त्यते । रक्षा रक्षाकरी ज्ञेया रणो जयकरः स्मृतः ॥१७५॥


कामना पूर्ण करनेकी अभिलाषा हो तो इन्द्रकी, सन्तानकी इच्छा हो तो प्रजापतिकी, श्रीवृद्धिकी इच्छा हो तो मायादेवीकी तेजवृद्धिकी अभिलाषा हो तो सूर्याभगवतीकी, धनवृद्धिकी इच्छा हो तो आठो वसुओकी, पराक्रमकी अभिलाषा हो तो रुद्रभगवान्की, अन्न आदिकी इच्छा हो तो अदितिकी, स्वर्गकी इच्छा हो तो अदितिके पुत्रों अर्थात् देवताओंका ॥ १६१ । १६२ ॥ राज्यकी इच्छा हो तो इलाको, प्रतिष्ठा चाहनेवालेको लोकमताओको, सौन्दर्यकी अभिलाषा हो तो गन्धर्वोको, स्त्रीकी कामना हा तो उर्वशी आदि अप्सराओंकी और आधिपत्यकी इच्छा हो तो सब देवताओंका पूजा करे । जिसे यश पानेकी इच्छा हो उसे यज्ञ करना चाहिये । कोषकी इच्छा हो तो वरुणकी, विद्याकी इच्छा हो तो शिवका दम्पत्यसुखकी इच्छा हो तो पार्वती जीकी, धर्मकी अभिलाषा हो तो उत्तमश्लोक (विष्णु भगवान्) की और वंशविस्तारकी इच्छा हो तो पितरोंकी पूजा करनी चाहिए १६३-१६६। आत्मरक्षाकी इच्छा हो तो पुण्यजनोंकी तेजोट्रद्धिकी अभिलाषा हो तो मरुद्गणोंकी राज्यकी इच्छा हो तो चौदह मनुओका आभिचारिककी दिश करनी हा तो राक्षसों-की, अभीष्टविषयिउ काम पूर्तिरी इच्छा हो तो चन्द्रमाका, निष्काम होनेकी अभिलाषा हो तो परम पुरुष परमेश्वरकी, अकाम या सकामभावसे मोक्षकी कामना रखता हो तो उसे चाहिए कि तीव्र भक्तियोगसे रघुनन्दन रामचन्द्रकी पूजा करे । रामचन्द्रजीके समान न कोई देवता हुआ है और न होना ॥ १६७-१६९ ॥ अतएव हर तरह प्रयत्न करके रामचन्द्रर्ज पूजा करे । उनके नामके आदिम वर्ण 'र' की सामर्थ्यसे संसारमें जितनी वस्तुएं रकारादि हैं, वे सब अतिशय श्रेष्ठ मानी गया हैं। उन वस्तुओंको अब मै विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। जैसे-रुक्म (सुवर्ण), रत्न, रथ, रामा (स्त्री), राक्षस (विद्याधर आदि), रजत (चाँदी), रज (धूलि), रक्षा, रण, रमा (लक्ष्मी), रक्त, रजक (धोबी), राग, रामठ (हींग), राजा, रोग, रवि (सूर्य), रात्रि, राज्य, रजस्वला आदि अनेक नाम श्रेष्ठ मान गये हैं। ऊपर बताया हुआ रुक्म (सुवर्ण) पीतवर्णको बहुमूल्य धातु है। रत्न देखनेमें सुन्दर लगता है और कठिनाईसे प्राप्त होता है। रथ एक श्रेष्ठ सवारी है! रामा (स्त्री) वह वस्तु है, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ है। राक्षस ऐसे भयानक होते हैं, जिनसे देवता भी भयभीत रहा करते हैं। रजत (चाँदी) भी एक दुर्लभ वस्तु है। रज (धूलि) साक्षात् परमाणु और नित्य है, रक्षा रक्षाकारी है। रण (संग्राम) विजयदायक होता है ॥ १७०-१७५ ॥

६७२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

रमा सा दुर्लभा मत्र्ये रन्तेऽस्मिन् रक्तता परा । रजको निर्मलकरो रागः प्रीतिः सुखप्रदा ॥१७६॥ रामठः शुद्धिदोऽन्नस्य रुचिश्च प्रकीर्तितः । राज्यं सौख्यकरं श्रेष्ठं पुत्रदा सा रजस्वला ॥१७७॥ एवं यद्यद्रराद्यं तत्तच्छ्रेष्ठं भुवि स्मृतम् । रामाद्यवर्णसाम्यैर्वा द्विजपुत्राय मयेरितम् ॥१७८॥ अन्यच्चाथ शृणुष्व त्वं यन्मया कथ्यते तव । यथा प्रेम्णाऽमनाममुद्रा तव मया शुभा ॥१७९॥ वैशी नान्यस्य देवस्य नाममुद्रा प्रजायते । रामनाम विना नाममुद्रिकातो स्फुटाक्षरम् ॥१८०॥ न रुटा रुटाने स्पष्टमेतच्च महदद्भुतम् । अत्र प्रभावो रामस्य न्व सिद्धि द्विजपुत्रत्र ॥१८१॥ अतएव रामनाम काश्यां विश्वेश्वरः सदा । स्वयं जन्तोपदिशति जन्तूनां मुक्तिहेतवे ॥१८२॥ म अर्णवममग्नं नरं यस्तारयेन्मनुः । स एव तारकस्तत्र राममन्त्रः प्रकथ्यते ॥१८३॥ तारकाख्यस्त्वयं रामनाममन्त्रो न चेतरः । अत एवान्तकालेऽपि मनुकामानरम्य च ॥१८४॥ कर्णे सर्वत्र देवेशरामनामोपदिश्यते । अन्तकाले नृणां रामस्मरणं च मुहुर्मुहुः ॥१८५॥ इति कुर्वन्त्युपदेश मानवा मुक्तिहेतवं । अन्येष्वपि शववाहैं सदा लोकैर्मुहुर्मुहुः ॥१८६॥ रामनामेव मुख्यस्थं शवस्य पथि कीर्त्यते । रामनाम्नः परो मंत्रो न भूतो न भविष्यति ॥१८७॥ रामनाम्ना जपो नित्यं क्रियते शंभुनापि च । पार्वत्या नारदेनापि वायुपुत्रादिभिः सदा ॥१८८॥ रमयदि जनान् रामो रमते न मदात्मनि । राक्षसानां मारणाद्वा रामनाम महन्महत् ॥१८९॥ रमाल्हादकारो हि त्वकारोऽवनि संभवः । मर्हलोकान्मकारश्च त्रिवर्णात्मकमुच्यते ॥१९०। रकारेण निजं भक्तं भवाब्धेः परिरक्षति । अकारेणानिमाँख्यं हि स्वस्वरूपं करोतियत् ॥१९१॥ मनोरथान्मकारेण ददाति भ्वजनस्य यत् अथवा निजभक्तस्य मरणादि मुहुर्मुहुः ॥१९२॥

रमा (लक्ष्मी) इस संसारमें दुर्लभ है । रक्तमें एक असाधारण लालिमा विद्यमान रहा करती है । रजक (धोबी) मलोंको धोकर साफ करता है । राग प्रीतिका नाम है जिसने सारे संसारको अपनी मुट्ठीम कर रक्खा है ॥१७६॥ रामठ (हींग) अन्नकी पवित्र करनेवाली और एक रुचिकर वस्तु है । राज्य सुखकारी होता है। रजस्वला स्त्री पुत्रदायिनी होती है इस तरह जितने भी रकारादि वर्णन नाम हैं, वे सब श्रेष्ठ माने गये हैं। हे द्विजपुत्र ! जैसा मैंने तुम्ह बताया है, इन सबोंके श्रेष्ठ होनेका कारण वही रामके आदिम वर्णकी समानता है । १७७ । १७८ । हे शिष्य, अब दूसरी बात तुमसे कहता हूं, उसे सुनो । जिस तरह पढ़ने में तुम्हें रामनामकी मुद्रा वतन्वा आता है वैसी नाममुद्रा और किस' देवताकी नहीं है । रामनामके बिना किसी नाममुद्राम इस प्रकार र ज(राम) जैसा स्फुट अक्षर नहीं बनता । यह एक अद्भुत बात है । हे द्विजपुत्रत्र ! इसमें तुम रामका ही प्रभाव जानो । १७९-१८१ । इसीलिए काश म विश्वनाथजी राम-नामका जप करक प्राणियोका मुक्त होनेका उपदश म्वय दिया करते हैं ॥ १८२ ॥ जा मन्त्र संसाररूपी समुद्रमें डूबे हुए मनुष्य को तार सके उसी राममन्त्रको तारक सज्ञा है । १८३॥ एकमात्र यह रामका नाम ही तारक है इसीलिए सर्वत्र किसीके मरत समय उसके कानम रामनामका ही उपदेश दिया जाता है । मुमुर्खु प्राणीकी मुक्तिके लिए उससे बार-बार यही कहा जात है कि 'राम' का स्मरण करो । मत्रकों से जानेवाल लोग राम नामका ही कीर्तन करते हैं । रामनामसे श्रेष्ठ कोई मन्त्र न आज तक हुआ है और न होगा ॥ १८४-१८७ । स्वयं शिवजी भी नित्य रामनामका ही जप किया करते हैं। उसी तरह हनुमान्जी, नारद तथा पार्वतीजी भी सदा रामनामका जप करतो हैं ॥ १८८ ॥ भक्तोंके हृदयमे विहार करने या नित्य रमण करन अथवा राक्षसोंका संहार करनेके कारण ही रामनाम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ॥ १८९ ॥ 'राम' इस शब्दमें रकार स्मादक लादसे, मकार भूमण्डळसे एवं मकार महर्लोकस आया है। इसी कारण यह त्रिवर्णात्मक रामनाम है । १९० ॥ वे श्रीरामचन्द्रजी रक रके द्वारा भवसिधुस अपने भक्तकी रक्षा करत हैं। अकारसे निज भक्तोको अतिशय सौख्य प्रदान करत है। मकारस अपने भक्तोंकी कामना पूर्ण करत है अथवा मकारसे बार-बार अपने भक्तोंकी मरण आदि बाधाएँ दूर करते रहते हैं ।

सर्गः १० ] | मनोहरकाण्डम् | ६७१

निवारयति तत् शीघ्रं रामनाम वरं ततः अयमेव सदा जप्यो रामेति द्वयक्षरो मनुः ॥१९३॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे उत्तरार्द्धे विशेषकालपरत्वेन पूजाविस्तारो नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


दशमः सर्गः

( अयोध्यामें चैत्रमासकी महिमाका वर्णन )

श्रीरामदास उवाच

एवं शिष्य त्वया पूर्वं ये ये प्रश्नाः कृताः शुभाः । श्रीरामविषये ते ते मयोक्ताः परसादरात् ॥ १ ॥
इदानीं ते पुनः श्रोतुमिच्छाऽस्ति तां वदस्व माम् । यद्यम्पृच्छसि भो वत्स तत्सर्वं ते वदाम्यहम् ॥२॥

श्रीमहादेव उवाच

एवं गुरोर्वचः श्रुत्वा विष्णुदासोऽब्रवीन्पुनः ।

विष्णुदास उवाच

गुरो त्वयाऽयोध्यायां चैत्रमासफलं महत् ॥३॥
प्रोक्तं तद्विस्तरेणाथ कथयस्व ममांतिकम् । किं दानं किं फलं तत्र कमुद्दिश्य चरेद्व्रतम् ॥४॥
को विधिश्च कदारंभः सर्वं विस्तरतो वद । यत्सरय्वां रामतीर्थे स्नातव्यं चेति कीर्तितम् ॥५॥

श्रीरामदास उवाच

साधु साधु महाप्राज्ञ शुभः प्रश्नः कृतस्त्वया । अधुना चैत्रमासस्य महिमा प्रोच्यते मया ॥६॥
मासानां प्रथमो मासश्चैत्रमासः प्रकीर्त्यते । मातेव सर्वजीवानां सदैवष्टफलप्रदः ॥७॥
दानयज्ञव्रतसमः सर्वपापप्रणाशनः । धर्मसारः क्रियासारस्तपःसारः सदार्चितः ॥८॥
विद्यानां वेदविद्येव मंत्राणां प्रणवो यथा । भूरुहाणां सुरतरुर्धेनूनां कामधेनुवत् ॥९॥


इसलिए रामनाम सर्वश्रेष्ठ मंत्र है । अतएव लोगोंको चाहिए कि 'राम' इस दो अक्षरके मंत्रको सदैव जपते रहें ॥ १९२ ॥ १९३॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

श्रीरामदास बोले—इस तरह हे शिष्य ! अबतक तुमने हमसे रामविषयक जो-जो प्रश्न किये, मैने उनका उत्तर आदरपूर्वक दिया ॥ १ ॥ अब तुम्हें जो कुछ सुनना हो, सो कहो । हे वत्स ! हमसे तुम जो भी पूछोगे, वह सब मैं तुम्हें बतलाऊँगा ॥ २ ॥ श्रीशिवजी बोले—अपने गुरुके इन वचनोंको सुनकर विष्णुदास फिर बोले । विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! आप अयोध्यामे चैत्रमासका बड़ा फल कह आये हैं । अब उसे विस्तारपूर्वक कहिए । उसमें क्या दान करना चाहिए, इसके करनेसे क्या फल होता है और किस उद्देश्यसे वह व्रत किया जाता है। इस व्रतको करनेकी क्या विधि है। इसे कब आरम्भ करना चाहिए। यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइए । सरयूके रामतीर्थमें स्नान करना चाहिए, यह जो आप कह चुके हैं । इसका भी विधि-विधान बता दीजिए ॥ ३-५॥ श्रीरामदासने कहा-ठीक है, हे महाबुद्धिमान् शिष्य ! तुमने बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है। अब मैं चैत्रमासकी महिमा बतला रहा हूँ ॥ ६ ॥ सब मासोंमें चैत्रमास वर्षका सर्वप्रथम मास माना गया है। यह मास सब प्राणियोंका माताके समान हितकारी है और सबका अभीष्ट फल देता है ॥ ७ ॥ यह समस्त दानों यज्ञों और व्रतोंके समान फलदायक है। यह सब धर्मोंका सार, समस्त क्रियाओंका सार और सब प्रकारकी तपस्याओका सार है ॥ ८ ॥ यह मास सब विद्याओंमें (वेदविद्याके समान, सब मन्त्रोंमें प्रणव ( ॐकार ) मन्त्रके समान, वृक्षोंमें पारिजातके समान, गोओमें काम-

६७४आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

श्रेष्ठस्सर्वनागानां पक्षिणां गरुडो यथा । देवानां तु यथा विष्णुर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा ॥१०॥
प्राणश्चप्रियवस्तूनां भार्यैव सुहृदां यथा । आपगानां यथा गंगा तेजसां तु रविर्यथा ॥११॥
आयुधानां यथा वज्रं धातूनां कांचनं यथा । वैष्णवानां यथा रुद्रो रत्नानां कौस्तुभो यथा ॥१२॥
पुण्येषु च यथा धर्म स्सतां मानसं यथा ।
मासानां धर्महेतूनां चैत्रमासस्तथा स्मृतः । नानेन सदृशो लोके विष्णुप्रीतिविधायकः ॥१३॥
चैत्रस्नाने च खिन्ने मीने प्रातर्भूर्योदयात् । लक्ष्मीसहायी भगवान्प्रीतिं तस्मिन्करोत्यलम् ॥१४॥
जन्तूनां प्रीणनं यद्वदन्नेनैव हि जायते । तद्वच्चैत्रे च स्नानेन विष्णुः प्रीणात्यसंशयः ॥१५॥
यश्चैत्रस्नाननिरतान् जनान् दृष्ट्वाऽनुमोदते । तावन्मात्रेऽपि विमुक्ताघो विष्णुलोके महीयते ॥१६॥
सकृत्स्नात्वा मीनगस्थे सूर्ये प्रातः कृतह्निकः । महापातैर्विमुक्तोऽसौ विष्णोःसायुज्यमाप्नुयात् ॥१७॥
स्नानार्थं चैत्रमासे यः पादमेकं चलेद्यदि । सोऽश्वमेधाऽयुतानां च फलं प्राप्नोत्यसंशयः ॥१८॥
अथवा कूटचित्तस्तु कुर्यात्सङ्कल्पमात्रकम् । सोऽपि क्रतुशतं पुण्यं लभत्येव न संशयः ॥१९॥
यो गच्छेद्धनुषांयावत् स्नातुं मीनगते रवौ । सर्वबंधविनिर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ॥२०॥
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि ब्रह्मांडान्तर्गतानि च । तानिसर्वाणि भो शिष्य मयि बाह्येऽनेऽल्पके ॥२१॥
तावंत्तुवन्ति पापानि गर्जन्ति यमशासने । यावन्न कुरुते ऽतुर्थेक्षेत्रे स्नानं जलाल्पप ॥२२॥
तीर्थाधिदेवताः सर्वाश्चैत्रे मयि द्विजोत्तम । बहिर्जले ममाश्रित्य यदा सन्निहिताः शिशो ॥२३॥
सूर्योदयं समारभ्य यावत् षड्घटिकावधि । तिष्ठति चाज्ञया विष्णोस्तद्गणां हितकाम्यया ॥२४॥
तथाप्यकुर्वतां स्नानं शापं दत्त्वा सुदारुणम् । स्वस्थानं यांति भो शिष्य तस्मात्स्नानं समाचरेत् २५॥


श्रेष्ठके समान, सर्पोंमें शेषनागके समान, पक्षियोंमें गरुडके समान, देवताओंमें विष्णुभगवान्के सदृश और वर्णोंमें ब्राह्मणके समान श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ १० । संसारकी प्रिय वस्तुओंमें प्राणकी भांति, मित्रोंमें भार्याकी तरह, नदियोंमें गङ्गाकी तरह, तेजस्वियोंमें सूर्य की नांई, शस्त्रोंमें वज्रकी तरह धातुओंमें सुवर्णकी तरह, वैष्णवोंमें रुद्रभगवान्‌के समान, रत्नोंमें कौस्तुभ मणिकी तरह पुण्योंमें कमलकी तरह मानवोंमें मानकरोक्तकी तरह धर्महेतुक सब मासोंमें यह चैत्रमास सर्वश्रेष्ठ है । भगवान्के प्रति प्रीति बढ़ानेवाला और कोई मास नहीं है ॥ ११-१३ ॥ जब कि मीन लग्नपर सूर्य हो, ऐसे चैत्रमासमें अरुणोदयके पहले स्नान करनेसे लक्ष्मीके साथ-साथ विष्णुभगवान् भी प्रसन्न होते हैं ॥१४॥ जिस तरह संसारके प्राणी अन्नसे तृप्ति तथा प्रसन्न रहते हैं। उसी तरह चैत्रमासमें स्नान करनेसे विष्णुभगवान् तृप्त होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥१५॥ जो मनुष्य किसी-को चैत्रस्नानमें संलग्न देखकर उसका अनुमोदन करता है तो शीघ्र ही उसके सब पाप छूट जाते हैं और वह प्राणी विष्णुलोकमें सम्मान पाता है ॥ १६ ॥ जब कि सूर्य मान राशिपर हों, ऐसे समय केवल एक बार प्रातःकालके समय स्नान और नित्यकर्म करनेवाला प्राणी बड़े बड़े पापोंसे मुक्त होकर विष्णुभगवान्‌की सायुज्य मुक्ति पाता है । १७ ॥ चैत्रमासमें स्नानके निमित्त जो मनुष्य एक पग भी चलता है वह दस हजार अश्वमेध यज्ञका फल पाता है । १८ ॥ जो प्राणी स्थिर चित्तसे चैत्रस्नानका सङ्कल्पमात्र करता है, वह भी सैकड़ों यज्ञ करनेका फल प्राप्त कर लेता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १९ । मीनगत सूर्यके समय जो प्राणी एक धनुष विस्तृत मार्ग भी चैत्रस्नानके लिए चलता है, वह सब बंधनोंसे छूटकर विष्णुकी सायुज्य मुक्ति पाता है ॥ २० ॥ त्रैलोक्य या ब्रह्माण्डके अन्तर्गत जितने भी तीर्थ हैं वे सब उस समय यहाँके थोड़ेसे जलमें विद्यमान रहते हैं ॥ २१ ॥ जब तक प्राणी चैत्रमासमें किसी जलाशयमें स्नान नहीं करता, तभीतक यमराजके आज्ञानुसार सब पातक गरजते हैं । २२ ॥ हे शिशो सब तीर्थ और सब देवता चैत्रमासमें जलके बाहर आकर ठहर जाते हैं । २३ ॥ सूर्योदयसे लेकर छः घडी दिन चढ़े तक विष्णुभगवान्‌के आज्ञानुसार सब देवता मनुष्योंके कल्याणार्थ जलके बाहर बैठे रहते हैं । २४ । उस समय भी यदि कोई स्नान नहीं करता तो

सर्गः १०] मनोहरकाण्डम् १७९

सर्गः १०] मनोहरकाण्डम् १७९

न हि चैत्रसमो मासो न कृतेन समं युगम् । न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम् ॥२६॥ न जलेन समं दानं न सुखं भार्यया समम् । न हि चैत्रसमं लोके पवित्रं कश्यपो विदुः ॥२७॥ तस्मादयं चैत्रमासः शेषशायिप्रियः सदा । अव्रतेन नयेद्यस्तु चांडालत्वं स ऋच्छति ॥२८॥ यथा गृहं सर्वगुणोपपन्नं परिच्छदैर्हीनमशोभने तथा । यथैव कन्या सकलैर्गुणैर्युक्ताप्यलंक्रियाहीनतया न शोभते ॥२९॥ शाकं तु षड्रसयुतेन हीनं न शोभते सर्वगुणोपपन्नम् । यथा ललनामेव विना सभा नैवोत्सवेन हीना ललना न शिष्ये ॥ तथाऽन्यमासेषु कृतो हि धर्मश्चैत्रेण हीनश्च वृथैव याति ॥३०॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन येन केनापि वेदिना । चैत्रमासस्य यो धर्मः कर्तव्य इति निश्चयः ॥३१॥ न नन्दनोः पृथ्व्याम् समो न रामतोऽन्यो वसुदेवसूनुः । अन्य श्चाप्य पुरश्चररूप चैत्रे तु कार्यं विधिवत्प्रपूजनम् ॥३२॥ अजकीर्तिमुद्दिश्य मीनमध्ये दिवाकर । प्रातः स्नात्वा जपेद्राममन्यथा नार्क व्रजेत् ॥३३॥ चैत्रमासो हि सकलः स तारादण्डैवतः । यद्यत्कर्म हि तन्मर्त्य तमुद्दिश्य चरेन्नरः ॥३४॥ जानकीकांत हे राम चैत्रे मीनगते रवौ । प्रातःस्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु राघव ॥३५॥ चैत्रस्य मीनगे भानौ प्रातःस्नानपरायणः । अर्घ्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण रघुनन्दन । ३६ । गङ्गायाः सलिलैः सर्वैर्निर्यान्ति जलदा नदाः । प्रतिगृह्य मया दत्तमर्घ्यं सम्यक् प्रसीदथ ॥३७॥ ब्रह्माद्या देवताः सर्वा ऋषयो ये च वैष्णवाः । ते गृह्णन्तु मया दत्तं प्रसीदन्त्वर्घ्यदानतः ॥३८॥

उसे दण्डरूप रूप देकर बदलता अपने स्थानपर चले जाते हैं । अतएव हे शिष्य ! इस समय अवश्य स्नान करना चाहिए । २५ ॥ चैत्रके समान कोई मास नहीं है, सत्ययुगके समान कोई युग नहीं है, वेदके समान कोई शास्त्र नहीं है, गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं है, जलदानके समान कोई दान नहीं है, भार्याके समान कोई सुख नहीं है, उसी तरह चैत्रके समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसलिए यह चैत्रमास सदा विष्णुरूप भगवान्‌का प्रिय रहा है । जो मनुष्य बिना व्रत किए ही यह मास बिता देता है, वह चांडाल होता है ॥ २८ ॥ जिस तरह कि सर्वसम्पत्तिमय होकर भी बिना छत्रके घर नहीं अच्छा लगता, जिस तरह कि कोई कन्या सब सुलक्षणोंसे युक्त होती हुई वा औपनयिका न हो तो वह नहीं अच्छी मालूम होती, जिस तरह कि नमकके बिना शाक अच्छा नहीं लगता, जिस तरह बिना उत्सवके सभा नहीं अच्छी लगती, बिना वस्त्रविहीन नारी नहीं शोभन होती, उसी तरह और-और मासोमें शुभकार्य करनेका भी कोई लाभ नहीं हुआ अर्थात् वह व्यर्थ ही जाता है ॥ २९ ॥ ३० ॥ अतएव कोई भी मनुष्य हो, उसे चैत्रमासके धर्मका पालन करना ही चाहिए ॥ ३१ ॥ श्रीकृष्णसे पृथक् अगम नहीं है और न श्रीरामसे पृथक् श्रीकृष्ण ही है। इसलिए यह उचित है कि चैत्रमासमें श्रद्धाभक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका विधिवत् पूजन करे ॥ ३२ ॥ जबकि सूर्यदेव मीन राशिपर चले गये हों, उस समय प्रातःस्नान करके रामनामका जप करना चाहिए । जो ऐसा नहीं करता, वह नरकगामी होता है ॥ ३३ ॥ सारे चैत्रमासके देवता राम और सीता ही हैं । अतएव उस समय जो कुछ भी कार्य करे, वह सब उन्हींके उद्देश्यसे करे ॥ ३४ ॥ स्नानके पहिले इस तरह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे जानकीकान्त ! हे राम ! सूर्यके मीन राशिपर जानेके अनन्तर मैं चैत्रमासमें प्रातः- स्नान करूँगा । कृपया मेरे इस पुनीत स्नानकार्यको निर्विघ्न समाप्त होने दीजिए ॥ ३५ ॥ आज सूर्य- देवके मीन राशिपर चले जानेके अनन्तर मैं प्रातःस्नान करके आपको अर्घ्य दूँगा । हे रघुनन्दन ! उसे आप स्वीकार कीजिए । गंगा आदिके सब नदें, सारे तीर्थ, मेघ तथा नद आदिका जल लेकर मैं आपको अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ, इससे आप प्रसन्न हों ॥ ३६ । ३७ ॥ ब्रह्मा आदि देवता, समस्त नदियाँ और सब वैष्णव

६७६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १०


ऋषभः पापिनां शास्ता त्वं नृपं समदर्शनः । गृहाणार्थ्यं मया दत्तं यथोक्तफलदो भव ॥३९॥
इति चार्घ्यं समर्प्याथ पश्चात्स्नानं समाचरेत् । वाससी परिधायाथ कुर्यात् कर्माणि सर्वशः ॥४०॥
जानकीकांतमभ्यर्च्य प्रसूनैर्मधुसंभवैः । श्रुत्वा रामकथां दिव्यामेतन्मासप्रशंसिनीम् ॥४१॥
कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुक्तो मोक्षमवाप्नुयात् । चैत्रे यः कांस्यभोजी हि तथा चाश्रुतसत्कथः ॥४२॥
न स्नानञ्चाप्यदत्ता च नारकानेव विंदति । यथा माघः प्रयागे हि स्नानतः पुण्यमिच्छताम्॥४३॥
कार्तिकोऽपि यथा काश्यां पञ्चगङ्गाजले स्मृतः । द्वारकायां यथा प्रोक्तो वैशाखो माधवप्रियः । ४४॥
अयोध्यायां रामतीर्थे तथा चैत्रे प्रकीर्तितः । प्रयागे मासमात्रेण यत्फलं प्राप्यते नरैः ॥४५॥
अयोध्यायां रामतीर्थे सकृत्स्नानेन तत्फलम् । वैशाखद्वादशभवं पुण्यं यद्गोमतीजले ॥४६॥
तत्पुण्यं सरयूतोयेऽयोध्यायां प्राप्यते नरैः । चैत्रे मयि त्रिभिः स्नानै रामतीर्थे न संशयः ॥४७॥
कार्तिके पंचगङ्गायां यैः स्नां द्वादशाब्दकम् । अयोध्यायां रामतीर्थे चैत्रे पक्षेण तत्फलम् ॥४८॥
अयोध्या दुर्लभा लोके नराणां पापकारिणाम् । तावद्गर्जन्ति पापानि यावद्दृष्टा न सा पुरी ॥४९॥
अयोध्याया यदाऽभावस्तदा रामकृतानि च । जगन्त्यां यानि तीर्थानि तत्र स्नानं विधीयताम्५०॥
यत्रापोध्यापुरी नास्ति स्नानार्थे सरयूर्न च । रामतीर्थं न यत्रास्ति तदा तीर्थेषु कारयेत् ॥५१॥
तैलाभ्यंगं दिवास्वापस्तथा वै कांस्यभोजनम् । खट्वानिद्रा गृहे स्नानं निषिद्धस्य च भक्षणम् ॥५२॥
चैत्रे तु वर्जयेदेतौ द्विरुक्तं नक्तभोजनम् । चैत्रे माघे तु मध्याह्ने श्रान्तानां च द्विजन्मनाम् ॥५३॥
पादावनेजनं कुर्यात्सुव्रतं तु व्रतोत्तमम् । मार्गेऽध्वगानां यो मर्त्यः प्रपादानं च चैत्रके ॥५४।


ऋषि मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करते हुए प्रसन्न हों । ३८ । हे पाषियोंपर शासन करनेवाले यमदेवता ! आप समदर्शी हैं । मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करिए और यथोचित फल दीजिए । ३९ । इस तरह अर्घ्य समर्पण करनेके अनन्तर स्नान करे । तदनन्तर कपडे बदलकर और कोई काम करना चाहिए । ४० ॥ इसके बाद वसन्त ऋतुमें उत्पन्न फूलोंसे जानकीकान्तका पूजन करे और चैत्रमासकी प्रशंसा करनेवाली कथाएं सुने । ४१ ॥ ऐसा करनेसे करोड़ों जन्मके एकत्रित पातक नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य चैत्रमासमें काँसेके पात्रमें भोजन करता है और मन्दो अञ्छा कथाने नहीं सुनता, न किसी पवित्र तीर्थमें स्नान करता है और न दान ही देता है, उसे नरकके सिवाय और किसी गतिकी प्राप्ति नहीं होती । जिस तरह कि पुण्यप्राप्तिके लिए लोग माघमासमें प्रयागस्नान करते हैं ; ४२ ॥ ४३ ॥ जैसे कात्तिकमासमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करते हैं, वैसे वैशाखमासमें द्वारकाजीमें स्नान करते हैं, उसी तरह रामभक्तोंको चाहिए कि चैत्रमासमें अयोध्या-स्नान अवश्य करें । एक महीना प्रयागमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है. वही फल अयोध्याके रामतीर्थमें केवल एक बारके स्नानसे मिल जाता है। बारह बार वैशाखमासमें द्वारकाकी गोमती नदीमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वही फल अयोध्याके सरयूजलमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है। किन्तु यह फल तब मिलता है, जब चैत्र मासमें तीन बार रामतीर्थम स्नान किया जाय ॥ ४४-४७ ॥ बारह बरस तक कात्तिकमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल केवल एक पखतक अयोध्या-की सरयूजीमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है । ४८ ॥ पापियोंके लिए अयोध्या दुर्लभ तीर्थ है; पापगण तभी तक गर्जन करते हैं, जबतक प्राणी अयोध्यापुरीका दर्शन नहीं कर लेता । ४९ । यदि किसी शावक फलकी अयोध्या प्राप्त न हो सके तो रामचन्द्रज ने जिन तीर्थोंका निर्माण किया हो वहाँपर स्नान करे ॥ ५० ॥ जहाँ कि न अयोध्या है, न सरयूजी हैं और न कोई रामतीर्थ ही है। वहाँ जो कोई भी तीर्थ हो, उसीमें स्नान कर ले ॥ ५१ ॥ तेल लगाना, दिनमें सोना, कांस्यपात्रमें भोजन करना, चारपाईपर सोना, घरमें स्नान करना, किसी प्रकारका निषिद्ध भोजन, रात्रिके समय भोजन तथा दिनमें दो बार भोजन इन आठ बातोंको चैत्रमासमें छोड़ देना चाहिए । चैत्रमासमें जो प्राणी दोपहरके समय थके हुए ब्राह्मणोंके पैर धोता है, वह मानो सर्वोत्तम व्रत करता है। जो प्राणी चैत्रमासमें राह चलनेवालोंको जल पिलाता है और रास्तेमें

सर्ग १०] मनोहरकाण्डम् १७७

सर्ग १०] मनोहरकाण्डम् १७७

मार्गे छायां तु यः कुर्यान्म स्वर्गे च मदायते । मल्लिं मल्लारकां वाऽय यों लाथ मिच्छति ।५५। व्यजनं व्यजनाकांक्षी दानमेतत्तु चैत्रके।

जलं छत्रं तु व्यजनं दानं मीने विशिष्यते । चैत्रे मासे तु सम्प्राप्ते ब्राह्मणाम् कुसुमोत्करे ।५६। अल्पोदकद्रुमं तु चानको भुवि जायते । चैत्रे देयं जलं चान्नं तथा शय्या मनोरमा ।५७। आदर्शदानं ताम्बूलगुडदानं प्रकारयेत् । गोधूममुद्गयोर्दानं दानं दध्यादनस्य च ।५८। घृतयुक्तं कांस्यपात्रं दानमित्युत्तमस्य च । तथा श्रीफलदानं च दानं चाम्रफलस्य च ।५९। सूक्ष्मवस्त्रमंचकयोः पानपात्रं कमण्डलम् । यतीनां दण्डदानं वै तैलदानं मठेषु च ॥६०। जीर्णोद्धारं मठानां च घटानां करणं तथा । प्रासादकरणं चैव वापीकूपादिकं तथा ।६१। मार्गस्थानां छत्रदानं मध्याह्ने ऽतिथिपूजनम् । कमपात्रं यतीनां च पदोपानं तु शक्तितोऽपि ।६२। एतानि चैत्रमासे तु दानानि कथितानि हि । फल शाकं तु मूलं च कंदं पुष्पं तु चन्दनम् ॥६३। उशीरः शीनलं द्रव्यं कर्पूरं कस्तुरी शुभा। दीपदानं धेनुदानं गोहदानं तथा ऽमृतम् ॥६४॥ गोरसानां पृथग्दानं पवित्राह्मणभोजनम् । सुवासिनीपूजनं च रामनामप्रलेखनम् ॥६५॥ पुस्तकानां तथा दानं तथा कुङ्कुमकेशरे । जात्राफलं लवंगाश्च जातिपत्रीशशांकके ।६६। धातकीं नागरं धूपं बीजपूरं कलिंगकम् । जंबीरं पनसंबैवं कपित्थं मातुलुंगकम् ॥६७। कूष्मांडदानमार्गमञ्जनं मार्गशोधनम् । नयोशानहदानं च गजवाजिभवं तथा ।६८। एतानि चैत्रमासे तु दानानि कथितानि हि । यानि चैत्रे तु वर्ज्यानि तानि ते प्रवदाम्यहम् ॥६९॥ सर्वाणि चैव शाकानि क्षौद्रं मौर्य्याकं तथा राजमाषारुकं चापि चैत्रस्नायी प्रवर्जयेत् ।७०। परान्नं च परद्रोहं परदारागमं तथा । तीर्थेन्तानि सर्वत्रैव चैत्रस्नायी प्रवर्जयेत् ।७१॥ द्विदलं विलतैलं च तथा ऽन्नं शल्यदूषितम् । भावदुष्टं शब्ददुष्टं चैत्रस्नायी तु वर्जयेत् ॥७२॥

छायाका प्रबन्ध करता है, वह स्वर्गलोकमें जाकर बहुवैभवके द्वारा पूजित होता है इस मासमें लोगोंको चाहिए कि जो मधुर पंखा चाहता हो, उसे पंखा दे। जो छाताका इच्छुक हो, उसे छाता दे। जो पानी चाहता हो, उसे पानी पिलावे। यह दान विशेष करके चैत्रमासके लिए बड़ा ही उपयोगी है। जो मनुष्य चैत्रमास आनेपर विप्रां कुटुम्बी ब्राह्मणको जलथरा शय्या नह देनों, वह परखर घातक होता है। इसलिए चैत्रमासमे जल अन्न तथा सुन्दर शय्याका दान देना चाहिये ॥ ५२-५७ ॥ इनके अतिरिक्त दर्पणका दान, ताम्बूल और गुड़का दान, गहूं, मूंग, दही, बादाम, घास भर हुए कांस्यपात्रका दान, आँवले रसका दान, बलका दान, आमका दान, महीन कपड़े और पलंगका दान, जल पीनेका पात्र, कमण्डलु तथा संन्यासियोंके लिये दण्डदान, मठोंमं तेलका दान, मठोंका जीर्णोद्धार, घंटाघर बनवाना, मकान बनवाना, कुआँ-बावली आदि बनवाना मार्गमें चलनेवालोंके लिय छत्रदान, दोपहरके समय अतिथियांका पूजन, यतियोंका कमण्डलु-दान और गोओंको ग्रासदान व चैत्रमासके दान बतलाये गये हैं। इनके अतिरिक्त चैत्रमासमें ये दान और बतलाये गये हैं। जैसे-फल शाक, मूल, कन्द, पुष्प, चन्दन ॥ ५८-६३। खस, इसी तरह और-और ठण्डी चीजें, कपूर, कस्तूरी, दीपदान धेनुदान गोदान, घासदान, यतियों और ब्राह्मणोंका भाजनदान, सोहागिन स्त्रियोंका पूजन, रामन मका लेखन, पुस्तकदान, कुमकुम और केशरका दान, आम्रफल, लौंग, जावित्री । ६४-६६ ॥ धातकी, नागरमोथा, धूप, बीजपूर, तरबूज, उम्बीर, नींबू, कटहल, कैंथा, कूष्माण्डदान, बगीचा लगाना, रास्ता साफ करवाना, जूनेका दान, हाथ एवं घड़ेका दान, ये सब दान चैत्रमासके लिए कहे गये हैं। अब मैं तुम्हें यह बतलाता हूँ कि चैत्रमासमें किन-किन वस्तुओंका परित्याग करना चाहिए ॥ ६७-६९ ॥ चैत्रस्नान करनेवालेको सब प्रकारके शाक, मधु, कांजी एवं राजमाष आदि वस्तुओंका परित्याग कर देना चाहिए ॥ ७० ॥ दूसरेका अन्न, दूसरेसे द्रोह और दूसरी स्त्रीके साथ समागम, चैत्रस्नायी इन कामोंको सर्वदाके लिए छोड़

६७८ आनंदरामायणे [ सर्गः १०

देववेदाद्विजानां च गुरुगोत्रतिनां तथा। स्त्रीराजमहतां निंदां चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥ ७३॥
माषमांसं विषं चूर्णं फले जंबीरमासम्। धान्ये मयूरिका प्रोक्ता चान्नं पर्युषितं तथा ॥७४॥
ब्रह्मचर्यमधःसुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम्। चतुर्थकाले भुंजीत कुर्याद्दानं सदा व्रती ॥७५॥
संवत्सरप्रतिपदि तैलमभ्यंग तु कारयेत्। चैत्रस्नायी नरोऽन्यत्र तैलाभ्यंगं न कारयेत् ॥ ७६॥
अलाबुं वापि वृंताकं कूष्मांडं पूर्तीफलम्। श्लेष्मातकं कलिंगं च कपित्थं चैव वर्जयेत् ॥७७॥
रजस्वलां त्यजेन्म्लेच्छपतितान्त्यजकैः सह। द्विजाद्विट्‌वेदवाह्यैश्च न वदेन्म्यर्वदा व्रती ॥७८॥
पलांडु लशुनं चैव छत्राकं गृंजनं तथा। नालिकामूलकं शिग्रुं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् । ७९।
एभिः स्पृष्टं शपाकेश्च सूतकान्नं च वर्जयेत्। द्विपाचितं च दग्धान्नं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥८०॥
एतानि वर्जयेन्नित्यं व्रती सर्वत्र तेष्वपि। कृच्छ्राद्यं च प्रकुर्वीत स्वशक्त्या रामतुष्टये ॥८१॥
क्रमान्कूष्मांडवृंताकछत्राकं मूलकं तथा। श्रीफलं च कलिंगं च फलं धात्र्याभवं तथा ॥८२॥
नारिकेलमलाबू च पटोलं बदरीफलम्। चर्मवृन्ताककं वल्लीशाकं तुलसिजं तथा । ८३॥
शाकान्येतानि वर्ज्यानि क्रमात्प्रतिपदादिषु । धात्रीफलं रवौ तद्वद्वर्जयेन्मर्वदा गृही ।८४।
एभ्योऽन्यद्वर्जयेत्किञ्चिद्रामप्रीत्यर्थे नरः। दत्त्वा व्रतान्ते विप्राय भक्षयेत्सर्वदैव हि ॥८५॥
फाल्गुनीपौर्णमारभ्य यावच्चैत्री तु पूर्णिमा । चैत्रस्नानं तु तावद्धि नरैः कार्यं च भक्तितः ॥८६।
जयवा मनिमगो मानुर्यावत्पात्रान्तमाचरेत् । दशमीं फाल्गुनीं शुक्लां समारभ्य यथोदिताम् ।८७॥
यावच्छ्वैत्र शुक्ल दशमी तावत्स्नानं प्रफारयेत् स्नानस्यैव त्रयो भेदाः शिष्य ते समुदीरिताः ॥८८॥
चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखमन्त्रता । तृतीया शुक्लभक्षस्य ह्यक्षयेति स्मृताऽथ या ॥८९॥


है । क्योंकि ये तीर्थके सब पुण्योंको नष्ट करनेवाले उत्पन्न हैं ॥ ७१ ॥ दाल, तिनका दल, कंकड़-पत्थर मिला हुआ अन्न, भावसे दूषित और बहुपर्युषित अन्नाका चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय । ७२ ॥ देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरुजन, गायत्री, स्त्री, राजा और अपनेसे बड़ेकी निन्दा का भी परित्याग कर देना चाहिए । ७३ ॥ प्र. थियाक, अलूका मांस, शममत्स्यका चूर्ण कञ्जम जंभार नावू, धान्यम मसूर और जूठा अन्न ये सब मांसतुल्य होते हैं, इसलिए इनको न खाय । ब्रह्मचर्य, पृथ्वीपर शयन, पत्तलमें भोजन और नौव प्रहरमें भ जन करता हुआ व्रती मनुष्य इन नियमांका बराबर पालन करे ॥७४-७५॥ केवल संवत्सरका मुख दिवाली प्रतिपदाका दिनमें तेल लगावे और किसी समय नहीं ॥ ७६ ॥ लौकी, भटा कुम्हड़ा, छोटा पपीता, लिसोढ़ा, तरबूज तथा कैथा इन वस्तुओंको न खाना चाहिए ॥७७॥ रजस्वला, चण्डाल, द्विजद्वेषी तथा वेदसे बहिष्कृत मनुष्योंसे बात भी न करे ॥७८॥ प्याज, लहशुन, छत्राक ( भुईंफोर), गाजर, मूली तथा सहिजन इन वस्तुओंको भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥७९॥ ऊपर बतलाये पतितों, कुत्ते तथा शौण्ड से छुए एवं सूतकके अन्नका भी परित्याग कर देना चाहिए । दोबारा पकाया और जला हुआ अन्न भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥ ८० ॥ ऊपर बताये चीज न खाय और अपनेसे बन पड़े तो रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिए कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत भी करे ॥ ८१ ॥ कुम्हड़ा, भंटा, भुईंफोड, मूली, बेल, तरबूज, आंवलेका फल नारियल, लौआ, परवल, बेर, चर्मवृन्ताक, बल्लीशक और तुलसी, इन्हे क्रमशः प्रतिपदा आदि तिथियोंको न खाय । उसी तरह रविवारको धात्रीफल (आंवला) न खाय ॥ ८२-८४ ॥ इनके अतिरिक्त भी रामको प्रसन्न करनेके लिए अपनी तरफसे कुछ वस्तुओंका परित्याग कर दे। किन्तु व्रतसमाप्तिके अनन्तर ब्राह्मणको उस वस्तु-का दान देकर खाय तो कोई हर्ज नही है ॥ ८५ ॥ फाल्गुनकी पूर्णिमासे लेकर चैत्रकी पूर्णिमा पर्यन्त भक्तिपूर्वक चैत्रस्नानका व्रत करना चाहिए ॥ ८६ ॥ अथवा जबतक सूर्य मीन राशिपर रहें, तबतक व्रत करता रहे फाल्गुण कृष्णपक्षकी दशमीसे लेकर चैत्रशुक्लकी दशमी तक स्नान करना चाहिए । इस तरह हे शिष्य ! इस चैत्रस्नानके भेद मैने तुमको बतलाये ॥८७।८८॥ चैत्रशुक्लकी तृतीयासे लेकर वैशाख शुक्लपक्षकी