श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 682, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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पाषाणनिर्मिते चापि मूर्तौ कार्यं यथामुखम् । प्रत्यहं मङ्गलद्रव्यैः सर्वैस्त्रीभिः प्रपूजनम् ॥७९॥
मासमेकं तु नारीभिः स्नानं वै शीतलाभिधम् । अवश्यमेव कर्तव्यं सीतातीर्थे विशेषतः ॥८०॥
यत्र यत्र रामतीर्थं तस्य वामेऽवनिस्तले सीतातीर्थं तत्र तत्र ज्ञेयं सीताकृतं शुभम् ॥८१॥
चैत्रशुक्लतृतीयायामारभ्य सम्यगङ्गना । यावत्तृतीया वैशाखशुक्ला तावन्निरन्तरम् ॥८२॥
शीतलामन्त्रक स्नानं स्त्रीभिः सीताप्रेमचरेत् चैत्रशुक्लतृतीयायामक्षयायां तथापि च ।८३।
तृतीयायां तु नारीभिस्स्नानस्य प्रशस्तस्तत् अन्यत्र दिवसे स्त्रीभिस्स्नानौघं न शस्यते ।८४।
प्रत्यहं चोत्सवाः कार्याः सीतातार्थे पुनः शुभैः सुवासिनीपूजनं च कार्यं भक्त्या दिने दिने । ८५ ।
सुवासिनीनां देयानि वायनानि शुभानि च । निरन्तर पूजनाथै यदि शक्तिर्न विद्यते ८६
तदा कार्यं चैकदिने सुभगार्ना प्रपूजनम् । सुवासिनीनां देयं हि प्रत्यहं भोजनं परम् ॥८७
नानापक्वान्नसंयुक्तं घृतपायससंयुतम् अलङ्कारश्च वस्त्राणि रुच्यर्थादि च यत्सुखम् ॥८८
भर्तुरायुरभिवृद्ध्यर्थं नारीभिर्देयमुत्तमम् । एवं मासन्तु यान्यास्ते शीतलास्नानमुत्तमम् ॥८९
अक्षयायां तृतीयायां पूजयित्वा विशेषतः त्रिंशत्सुवासिनीभ्यश्च दद्याद्भोजनादिकम् ९०॥
सुरुपन्नि निजां पूज्य दत्त्वे वस्त्रं विमर्जनम् एष मासो वरः प्रोक्तः प्रशस्तश्च द्विजोत्तम । ९१।
अन्वीदृक्षं च तत्सर्वं मयाग्रे शृणु चेतसम् । अथातः कुल कामिस्तु चैत्रशुक्लष्टमीदिने ९२।
सीतारामा प्रजार्यन्त्वा महासंतपतारकम् अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबंति पुनर्वभौ ॥९३।
चैत्रे मासि सिताष्टम्यां न ते शोकमवाप्नुयुः । त्वामशोककराभीष्टं मधुमाससमुद्भवम् ९४।
पिबामि शोकमंदमो मामशोकं सदा कुरु। पुनर्वसुयुधोपेता चैत्र मासि मिताष्टमीम् ॥९५॥
आवश्यकता पड़नेपर पत्थरकी प्रतिमा बनवाया जा सकता है । उस तरह मूर्ति बनाकर गुप्तपूर्वक विचित्र मङ्गलमय द्रव्योंसे स्त्रियोंके साथ पूजन करे ॥७९॥ एक महीना स्त्रियोंके साथ शीतला नामक स्नान करे । और माहात्म्यीय जानकर स्नान करे तो विशेष अच्छा है ॥८०॥ जहाँ जहाँ रामतीर्थ है वहाँ-वहाँके रामके वामभागमें सीताका स्थान सनातन से ही विद्यमान रहता है ॥८१॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया-से लेकर जबतक वैशाखका अक्षय तृतीया न आये, तबतक निरन्तर सीतातीर्थमें जाकर शीतलास्नान करे ॥८२॥ स्त्रियोंको चाहिये कि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिए स्नान करे । चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया तथा अक्षय तृतीयाको स्त्रियोंको नाके स्नानका नेमधारण करना चाहिए । इसके सिवाय और किसी रोज स्त्रियोंके साथ बैठके स्नानका विधान नहीं है ॥८३ ॥८४॥ प्रतिदिन स्नानके साथ-साथ सीताके स्तुति तरह-तरहके उत्सव करना चाहिए । नित्य भक्तिपूर्वक स्त्रियोंका पूजन करना भी श्रेयस्कर है ॥८५॥ सुहागिन स्त्रियोंको इन दिनोंमें वायना देना भी उचित है । यदि निरन्तर पूजन करनेकी सामर्थ्य न हो तो केवल एक ही दिन सोहागिन स्त्रियोंका पूजन करे और बहु विविध पक्वान्न युक्त अच्छा-अच्छा भोजन कराये ॥८६॥८७॥ नाना प्रकारके वस्त्र आभूषण आदि भी वे स्त्रियाँ अवश्य दिना करें, जो अपने पतिकी आयुवृद्धि करना चाहती हों । इस तरह एक महीना शीतलास्नान करनेके बाद अक्षय तृतीयाको विशेष रीतिसे पूजन करके तीस सुहागिन स्त्रियोंको नाना प्रकारके भोजन अन्य आदि दे ॥८८-९०॥ इसके बाद अपने गुरुकी पत्नीका पूजन करके उसे भी वस्त्र-आभूषण आदि प्रदान करे । हे द्विजोत्तम ! इस तरह मैंने तुम्ह स्त्रियोंके लिए एक मासका व्रत बतलाया । ९१॥ अब मैं कुछ विशेष बातें बतलाता हूँ, सो सुनो। चैत्रशुक्ल अष्टमीको अशोककी कलियोंसे सीता और रामका पूजन करके जो लोग आठ अशोककी कली पीसकर पुनर्वसु नामक नक्षत्रमें पीते हैं, उन्हें कभी किसी प्रकारका शोक नहीं करना पड़ता । उस कलीका पान करते समय "त्वामशोककराभीष्ट" इस मन्त्रका पाठ करते रहना चाहिए । मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है- हे अशोक ! तुम्हारा जैसा नाम है, उसी प्रकार तुम लोगोंको शोकरहित भी करते हो । इसी कारण चैत्रमासमें उत्पन्न तुम्हारी कलिकाका मैं पी रहा हूँ। तुम मुझे सदा शोकरहित किये रहना । जो लोग पुनर्वसु नक्षत्र तथा