श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 683, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६६७
प्रातस्तु विधिवन्स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् । चैत्रे नवम्यां प्राक्पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ ॥९६॥ उद्गते गुरुगौरांशोः स्वोच्चस्थे ग्रहपंचके । मेषे पूषणि संप्राप्ते लग्ने कर्कटकाह्वये ॥९७॥ आविरासीन्महाविष्णुः कौसल्यायां परः पुमान् । तस्मिन्दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतं नरैः ॥९८॥ तत्र जागरणं कुर्याद्रघुनाथपुरे जनैः । चैत्रशुद्धा तु नवमी पुनर्वसुयुता यदि ॥९९॥ सैवं मध्याह्नयोगेन महापुण्यतमा भवेत् । केवलापि प्रदोष्टव्या नवमीशब्दसंग्रहात् ॥१००॥ तस्मान्मध्याह्नयुक्ता सर्वैः कार्ये वै नवमीव्रतम् । श्रीरामनवमी प्रोक्ता कोटिसूर्यग्रहाधिका ॥१०१॥ उपोषशं जागरणं पितृनुद्दिश्य तर्पणम् । तस्मिन् दिने तु कर्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः ॥१०२॥ सर्वेषामप्ययं धर्मो भुक्तिमुक्तिफैकसाधनः । अपुत्रोऽपि पवित्रः कुन्वेदं व्रतमुत्तमम् ॥१०३॥ पूज्यः स्यात्सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः । यस्तु रामनवम्यां वै भुंक्ते मोहान् मूढधीः ॥१०४॥ कुंभीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः । अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वव्रतोत्तमम् ॥१०५॥ अन्यान्यव्रतानि कुरुते न तेषां फलभाग्भवेत् । आचार्यं चैव संपूज्य शृणुयात्प्रार्थयेन्निशि ॥१०६॥ श्रीरामप्रतिमादानं करिष्येऽहं द्विजोत्तम भक्त्या सर्वथा प्रीतो श्रीरामोऽस्तित्वमेव च ॥१०७॥ स्वगृहे चोत्तमे देशे दारुग्योऽज्ज्वलमंडपम् शंखचक्रहनुमद्भिः प्राग्द्वारे समलंकृतम् ॥१०८॥ गरुत्मच्छ ङ्गशार्ङ्गश्च दक्षिणे समलंकृतम् । गदाखड्गाद्यदंश्च पश्चिमे सुविभूषितम् ॥१०९॥ पद्मस्वस्तिकैर्लिंगैश्च कौवेरे समलंकृतम् मध्यमे ह्यनन्तपुष्पाणां वेदिकामुक्तमायतम् ॥११०॥ अष्टोत्तरसहस्रैश्च शालिग्रामक गुस्तैर् । अष्टपत्रं समालिख्य वेदिकायोगनुत्तमम् ॥१११॥ ततः संकल्पयेद्वै राममेव स्मरन् द्विज । अद्य रामनवम्यां च रामाराधनतत्परः ॥११२॥
युतप्रातः युक्त चैत्रशुक्लकी अष्टमीका व्रत करनेसे वाजपेय यज्ञका फल प्राप्त होता है। चैत्रशुक्लकी नवमीका जब कि पुनर्वसु नक्षत्र था उदित बृहस्पति तथा चन्द्रमाके साथ-साथ पाँच ग्रह उच्च स्थानमें बैठे थे, सूर्य मेष पर स्थित थे, कर्क लग्न थी, उस समय महाविष्णु भगवान् राम कौशल्यासे उत्पन्न हुए थे। इसलिए लोगोंको उस रोज उपवास करना चाहिए ॥९२-९०॥ अर्थात् उचित है कि इस तिथिको अयोध्यापुरमें जाकर रात्रिभर जागरण करे। चैत्रशुक्ला नवमी यदि पुनर्वसु नक्षत्रसे युक्त हो तो वह महापुण्यवती मानी जाती है । यदि मध्याह्न नक्षत्रीयुक्त नवमी न हो तो भी व्रत करना ही चाहिए क्योंकि सर्वत्र नवमी इस शब्दका ही संग्रह किया गया है, ९९ ॥ १००॥ इसलिए सब लोगोंको अच्छी तरह नवमीका व्रत करना चाहिए। यह रामनवमी कोटि सूर्यग्रहणसे भी अधिक पुण्यप्रद मानी जाती है ॥ १०१ ॥ जिन लोगोंको ब्रह्मप्राप्तिकी इच्छा हो, उन्हें चाहिए कि उस दिन उपवास, जागरण तथा पितरोंको तृप्त करनेके लिए तर्पण अवश्य करे ॥ १०२ ॥ क्योंकि सब लोगोंके लिए यह धर्म मुक्ति और मुक्तिका साधक है। यदि कोई मनुष्य अपवित्र या पापी हो तो इस व्रतको करनेसे वह उसी प्रकार सब प्राणियोंका पूज्य हो जाता है, जैसे रामचन्द्रजी स्वयं सबके आराध्यदेव हैं। जो मूढ़ रामनवमीको भोजन करता है ॥ १०३ ॥ १०४ ॥ वह बहुत समय तक कुम्भीपाक आदि घोर नरकोंमें पड़कर सड़ता है। सब उत्तम व्रत इस रामनवमीका व्रत न करके जो प्राणी और और व्रतोंको करता है, उस व्रतको करनेका फल नहीं मिलता। व्रतके दिन रात्रिको ब्राह्मणकी पूजा करके प्रार्थना करे — हे द्विजोत्तम ! आज मैं भक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीकी प्रतिमाका दान करूँगा। हे आचार्य ! आप मुझ ऊपर प्रसन्न हों ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ १०७ ॥ तदनन्तर अपने घरके किसी उत्तम स्थानपर बढ़िया मण्डप बनावे । उसके पूर्वद्वारपर शंख चक्र एवं हनुमज्जीको स्थापना करे । १०८ ॥ दक्षिण द्वारपर गरुड़ धनुष तथा बाणको स्थापित करे । उत्तर दिशामें कमल तथा स्वस्तिककी स्थापना करके उस अलंकृत करे । बीचमें चार हाथकी लम्बी-चौड़ी वेदी बनावे । वेदीपर अष्टोत्तरसहस्र शालिग्रामक रामचन्द्रकी रचना करे ॥ १०९-१११॥ इसके अनन्तर हे द्विज ! श्रीरामचन्द्रका स्मरण करता हुआ संकल्प करे कि इस रामनवमीको श्रीरामचन्द्रजीकी आराधनामें तत्पर