भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 684
६६८आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

उपोष्याष्टसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि । इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां च प्रयत्नतः ॥११३॥
श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते । प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुवहूनि मे ॥११४॥
अनेकजन्मसम्विद्धान्यभ्यस्तानि मदोर्जितैः च ततः स्वर्णमयीं रामप्रतिमां पलमानतः ॥११५॥
निर्मितां द्विभुजां दिव्यां वामांकस्थितजानकीम् बिभ्रतीं दक्षिणकरे ज्ञानमुद्रां मनोरमाम् ॥११६॥
वामेनाधःकरेणाप्यर्हदेवीमालिङ्ग्य संस्थिताम् सिंहासने राजते च पलद्वयविनिर्मिते ॥११७॥
अशक्तो यो महानत्र स तु वित्तानुसारतः । पलेन वा तदर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः ॥११८॥
सौवर्णं राजतं वापि कारयेद्रघुनन्दनम् पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ धृतच्छत्रकराङ्कितौ ॥११९॥
चापद्वयसमायुक्तं लक्ष्मणं चापि कारयेत् मातुरङ्गगतं राममिन्द्रनीलसमप्रभम् ॥१२०॥
पञ्चामृतस्नानपूर्वं सम्पूज्य विधिवत्ततः अथांककुसुमैर्युक्तमर्घ्यं दद्याद्विचक्षणः ॥१२१॥
दशाननवधार्थाय धर्मसंस्थापनाय च । राक्षसानां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च ॥१२२॥
परित्राणाय साधूना जातो रामः स्वयं हरिः । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥१२३॥
इत्येवं विधिवत्कृत्वा रात्रौ जागरणं चरेत् ततः प्रातः समुत्थाय स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः ॥१२४॥
समाप्य विधिवद्रामं पूजयेद्विधिवत्सुने ततो होमं प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥१२५॥
पूर्वोक्तमण्डपे कुण्डे स्थण्डिले वा समाहितः लौकिकाग्नौ विधानेन शतमष्टात्तरं हुनेः ॥१२६॥
साज्येन पायसेनेव स्मरन् राममनन्यधीः । ततो भक्त्या सुसन्तोष्य ह्याचार्यं पूजयेद्द्विजः ॥१२७॥
ततो रामं स्मरन् दद्याद्देवं मन्त्रमुदीरयन् । इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलंकृताम् ॥१२८॥
चित्रवस्त्रयुगच्छन्नां रामोऽहं राघवाय ते श्रीरामप्रीतये दास्ये तुष्टो भवतु राघवः ॥१२९॥
इति दत्त्वा विधानेन दद्याद्वै दक्षिणां शुभाम् । ब्रह्महत्यादियापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥१३०॥


होकर मैं आठ पहरत क उपवास करके यह स्वर्णमयी प्रतिमा रामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये किसी बुद्धिमान् रामभक्तको दूंगा जिससे श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्न हों और मेरे उन महान् पापोंको हर लें, जो मैंने अनेक जन्मोंके अभ्यासवश किये हों । तदनन्तर एक पल सुवर्णकी बनी रामकी प्रतिमा, जिसमें दो भुजायें बनी हों, वाम-भागमें सीताजी और दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा विराजमान हो । ११३-११६ ॥ वे बायें हाथसे देवीका आलिङ्गन किये हों। पल चांदीकी बनी चौकीपर बैठे हों । ११७॥ जो प्राणी सर्वथा असमर्थ हों वह अपने वित्तानुसार एक पल, आधा पल अथवा आधेका भी आधा पल सुवर्ण या चाँदीकी प्रतिमा बनवाये । रामके पास ही छत्र और चमर लिये भरत तथा शत्रुघ्न खड़े हों और दो धनुष धारण किये लक्ष्मणजीकी प्रतिमा बनाये । मातुलुंग गोदीमें विराजमान इन्द्रनीलमणिकी प्रभाके समान प्रभावशाली रामको पंचामृतसे स्नान कराकर विधिवत् पूजन करे और बर्णांक पुष्पयुक्त अर्घ्य प्रदान करें । अर्घ्य देते समय 'दशाननवधार्थाय' आदि मंत्र पढ़ना जाय । जिसका अर्थ इस प्रकार है ॥ ११८-१२१ ॥ रावणको मारने, धर्मका स्थापन, राक्षसोंका विनाश और साधुओंकी रक्षाके लिए स्वयं विष्णु भगवान्‌ने अवतार लिया था । सब भ्राताओंके साथ आप मेरे इस अर्घ्यको स्वीकार करिए ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ यह सब विधि दिवाके दिनको करके रात्रिभर जागरण करे । सबेरे उठकर स्नान संध्या आदि क्रियायें करके विधिवत् पूजन करें। फिर मन्त्रको जाननेवाला यजमान हवनरूपी होम करे ॥ १२४, १२५ ॥ यह हवनविधि पूर्वोक्त मण्डपमें अथवा स्थण्डिल में किया जाय और लौकिक अग्निमे विधानपूर्वक एक सौ आठ आहुतियां खीर-घीसे दी जायें। इसका सामग्रीम घृत और खीरका रहना आवश्यक है । हवन करते समय अपने चित्तको इधर उधर न दौड़ाकर रामका स्मरण करना रहना चाहिए । १२६ ॥ १२७ ॥ तदनन्तर 'इमां स्वर्णमयी' इस मन्त्रका उच्चारण करता हुआ प्रतिज्ञा करे कि सब तरहसे अलंकृत यह सुवर्णमयी रामकी प्रतिमा श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्न करनेके हेतु मैं दान करूंगा । इससे श्रीरामजी प्रसन्न हों ॥ १२८ ॥ १२९ ॥ इस