श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 688, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६७२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
रमा सा दुर्लभा मत्र्ये रन्तेऽस्मिन् रक्तता परा । रजको निर्मलकरो रागः प्रीतिः सुखप्रदा ॥१७६॥ रामठः शुद्धिदोऽन्नस्य रुचिश्च प्रकीर्तितः । राज्यं सौख्यकरं श्रेष्ठं पुत्रदा सा रजस्वला ॥१७७॥ एवं यद्यद्रराद्यं तत्तच्छ्रेष्ठं भुवि स्मृतम् । रामाद्यवर्णसाम्यैर्वा द्विजपुत्राय मयेरितम् ॥१७८॥ अन्यच्चाथ शृणुष्व त्वं यन्मया कथ्यते तव । यथा प्रेम्णाऽमनाममुद्रा तव मया शुभा ॥१७९॥ वैशी नान्यस्य देवस्य नाममुद्रा प्रजायते । रामनाम विना नाममुद्रिकातो स्फुटाक्षरम् ॥१८०॥ न रुटा रुटाने स्पष्टमेतच्च महदद्भुतम् । अत्र प्रभावो रामस्य न्व सिद्धि द्विजपुत्रत्र ॥१८१॥ अतएव रामनाम काश्यां विश्वेश्वरः सदा । स्वयं जन्तोपदिशति जन्तूनां मुक्तिहेतवे ॥१८२॥ म अर्णवममग्नं नरं यस्तारयेन्मनुः । स एव तारकस्तत्र राममन्त्रः प्रकथ्यते ॥१८३॥ तारकाख्यस्त्वयं रामनाममन्त्रो न चेतरः । अत एवान्तकालेऽपि मनुकामानरम्य च ॥१८४॥ कर्णे सर्वत्र देवेशरामनामोपदिश्यते । अन्तकाले नृणां रामस्मरणं च मुहुर्मुहुः ॥१८५॥ इति कुर्वन्त्युपदेश मानवा मुक्तिहेतवं । अन्येष्वपि शववाहैं सदा लोकैर्मुहुर्मुहुः ॥१८६॥ रामनामेव मुख्यस्थं शवस्य पथि कीर्त्यते । रामनाम्नः परो मंत्रो न भूतो न भविष्यति ॥१८७॥ रामनाम्ना जपो नित्यं क्रियते शंभुनापि च । पार्वत्या नारदेनापि वायुपुत्रादिभिः सदा ॥१८८॥ रमयदि जनान् रामो रमते न मदात्मनि । राक्षसानां मारणाद्वा रामनाम महन्महत् ॥१८९॥ रमाल्हादकारो हि त्वकारोऽवनि संभवः । मर्हलोकान्मकारश्च त्रिवर्णात्मकमुच्यते ॥१९०। रकारेण निजं भक्तं भवाब्धेः परिरक्षति । अकारेणानिमाँख्यं हि स्वस्वरूपं करोतियत् ॥१९१॥ मनोरथान्मकारेण ददाति भ्वजनस्य यत् अथवा निजभक्तस्य मरणादि मुहुर्मुहुः ॥१९२॥
रमा (लक्ष्मी) इस संसारमें दुर्लभ है । रक्तमें एक असाधारण लालिमा विद्यमान रहा करती है । रजक (धोबी) मलोंको धोकर साफ करता है । राग प्रीतिका नाम है जिसने सारे संसारको अपनी मुट्ठीम कर रक्खा है ॥१७६॥ रामठ (हींग) अन्नकी पवित्र करनेवाली और एक रुचिकर वस्तु है । राज्य सुखकारी होता है। रजस्वला स्त्री पुत्रदायिनी होती है इस तरह जितने भी रकारादि वर्णन नाम हैं, वे सब श्रेष्ठ माने गये हैं। हे द्विजपुत्र ! जैसा मैंने तुम्ह बताया है, इन सबोंके श्रेष्ठ होनेका कारण वही रामके आदिम वर्णकी समानता है । १७७ । १७८ । हे शिष्य, अब दूसरी बात तुमसे कहता हूं, उसे सुनो । जिस तरह पढ़ने में तुम्हें रामनामकी मुद्रा वतन्वा आता है वैसी नाममुद्रा और किस' देवताकी नहीं है । रामनामके बिना किसी नाममुद्राम इस प्रकार र ज(राम) जैसा स्फुट अक्षर नहीं बनता । यह एक अद्भुत बात है । हे द्विजपुत्रत्र ! इसमें तुम रामका ही प्रभाव जानो । १७९-१८१ । इसीलिए काश म विश्वनाथजी राम-नामका जप करक प्राणियोका मुक्त होनेका उपदश म्वय दिया करते हैं ॥ १८२ ॥ जा मन्त्र संसाररूपी समुद्रमें डूबे हुए मनुष्य को तार सके उसी राममन्त्रको तारक सज्ञा है । १८३॥ एकमात्र यह रामका नाम ही तारक है इसीलिए सर्वत्र किसीके मरत समय उसके कानम रामनामका ही उपदेश दिया जाता है । मुमुर्खु प्राणीकी मुक्तिके लिए उससे बार-बार यही कहा जात है कि 'राम' का स्मरण करो । मत्रकों से जानेवाल लोग राम नामका ही कीर्तन करते हैं । रामनामसे श्रेष्ठ कोई मन्त्र न आज तक हुआ है और न होगा ॥ १८४-१८७ । स्वयं शिवजी भी नित्य रामनामका ही जप किया करते हैं। उसी तरह हनुमान्जी, नारद तथा पार्वतीजी भी सदा रामनामका जप करतो हैं ॥ १८८ ॥ भक्तोंके हृदयमे विहार करने या नित्य रमण करन अथवा राक्षसोंका संहार करनेके कारण ही रामनाम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ॥ १८९ ॥ 'राम' इस शब्दमें रकार स्मादक लादसे, मकार भूमण्डळसे एवं मकार महर्लोकस आया है। इसी कारण यह त्रिवर्णात्मक रामनाम है । १९० ॥ वे श्रीरामचन्द्रजी रक रके द्वारा भवसिधुस अपने भक्तकी रक्षा करत हैं। अकारसे निज भक्तोको अतिशय सौख्य प्रदान करत है। मकारस अपने भक्तोंकी कामना पूर्ण करत है अथवा मकारसे बार-बार अपने भक्तोंकी मरण आदि बाधाएँ दूर करते रहते हैं ।